नई दिल्ली
विराट कोहली और रोहित शर्मा। दो दिग्गज। बतौर कप्तान या खिलाड़ी, दोनों भारतीय क्रिकेट के एक युग की धुरी रहे हैं। एक-डेढ़ दशक से वे भारत में क्रिकेट के पर्याय रहे हैं। दोनों ने अचानक 5 दिन के अंतराल में टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया। संन्यास तो एक न एक दिन लेना ही था, लेकिन तरीका अलग हो सकता था। भारतीय क्रिकेट की नई परिभाषा गढ़ने वाले इन दोनों महान खिलाड़ियों को ग्राउंड में विदाई मिलनी चाहिए थी। कुछ ऐसा ही महान स्पिनर आर अश्विन के भी साथ हुआ था जिन्होंने अनगिनत मौकों पर बल्ले और गेंद से टीम इंडिया को जीत दिलाई थी।

कोहली और रोहित का यूं संन्यास लेना खटक रहा है। फेयरवेल मैच तो होना ही चाहिए था। फैंस और दर्शकों को भी तो पता चले कि वे इन दोनों महान खिलाड़ियों को आखिरी बार सफेद जर्सी में खेलते हुए देख रहे हैं। अफसोस, ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ, इसके कुछ जवाब हो सकते हैं लेकिन ऐसी विदाई सम्मानजनक और गरिमापूर्ण तो कतई नहीं है। यह दिखाता है कि भारतीय क्रिकेट में कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं को, बीसीसीआई को इस पर सोचना होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो बीसीसीआई ने रोहित शर्मा को दो टूक कह दिया था कि अब आप हमारे टेस्ट प्लान में फिट नहीं बैठते। अगर प्रदर्शन की कसौटी पर वह खरे नहीं उतरे थे तो ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन यह बात तो ऐसे भी कही जा सकती थी कि अगला मैच आपका आखिरी टेस्ट होगा। आप उस कप्तान को ये बता रहे कि आपका टेस्ट करियर तत्काल प्रभाव से खत्म हो चुका है, जिसने बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के दौरान कप्तान होते हुए भी टीम के हित में खुद को ड्रॉप कर दिया था। अगर बीसीसीआई ने, चयनकर्ताओं ने मान ही लिया था कि रोहित शर्मा का टेस्ट करियर पूरा हो चुका है तो वे उन्हें इसकी जानकारी बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी के दौरान भी तो दे सकते थे। हिटमैन सीरीज के दौरान ही संन्यास का ऐलान कर दिए होते।

जहां तक विराट कोहली की बात है तो उन्होंने खुद ही बीसीसीआई को अपनी इच्छा बताई थी कि वह टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहना चाहते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीसीसीआई ने उनसे गुजारिश भी की थी कि इंग्लैंड दौरे के मद्देनजर वह अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करें लेकिन बोर्ड ने जोर देकर दबाव नहीं डाला। फैसला कोहली पर छोड़ दिया। अगले महीने टीम इंडिया को इंग्लैंड दौरे पर जाना है। उसे 20 जून से 5 टेस्ट मैचों की सीरीज खेलनी है।

सवाल लाजिमी है कि कोहली जब खुद इंग्लैंड दौरे से पहले संन्यास पर अडिग थे तो इसमें बीसीसीआई क्या कर सकती थी? वह तो उन्हें ग्राउंड पर खेलते हुए विदाई का मौका दे ही रही थी, विराट ही नहीं माने। लेकिन यह बात गले नहीं उतरती कि बीसीसीआई ने कोहली को मनाने की गंभीर कोशिश की। दिल्ली के रणजी कोच और पूर्व राष्ट्रीय चयनकर्ता सरणदीप सिंह ने तो दावा किया है कि कोहली इंग्लैंड दौरे के लिए तैयारी कर रहे थे। इतने उत्साहित थे कि 3-4 शतक मारने का लक्ष्य रखे थे। किसी एक टेस्ट सीरीज में 4 शतकों का कारनामा वह 2014-15 में कर भी चुके हैं। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ जो उन्हें अचानक संन्यास लेना पड़ा?

2024-25 के बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में टीम इंडिया को ऑस्ट्रेलिया के हाथों 3-1 से शिकस्त झेलनी पड़ी। विराट कोहली ने 5 मैच की 9 पारियों में एक शतक के साथ 190 रन बनाए जो उनकी ख्याति के अनुरूप तो बिल्कुल नहीं था। उसके बाद कोहली ने इस साल जनवरी में रेलवे के खिलाफ रणजी मैच में दिल्ली की तरफ से खेला। अगर बॉर्डर-गावस्कर सीरीज में खराब प्रदर्शन के दबाव से वह संन्यास के बारे में सोचते तो फिर उसके बाद घरेलू क्रिकेट क्यों खेलते?

 

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