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प्रयागराज में 13 जनवरी से महाकुंभ की शुरुआत होने जा रही है. इसमें देश के 13 प्रमुख अखाड़े भी शामिल हो रहे हैं. सभी अखाड़ों में सर्वोच्च पद महामडंलेश्वर का होता, लेकिन एक अखाड़ा ऐसा भी है, जहां कोई महामडंलेश्वर नहीं है. हम जिस अखाड़े की बात कर रहे हैं, वो है श्रीशंभू पंचायती अटल अखाड़ा.

शंकराचार्य के निर्देश पर हुई थी स्थापना
इसके पीछे का करण अखाड़े में कड़ा अनुशासन और संन्यास देने की कठिन परिक्षा को माना जाता है. क्योंकि कठिन परीक्षा में ज्यादातर सफल नहीं हो पाते. इस अखाड़े की स्थापना गोंडवाना में 569 ईस्वी आदिगुरु शंकराचार्य के निर्देश पर हुई थी. आज हम आपको उन्हीं आदिगुरु शंकराचार्य के जीवन के बारे में बताने जा रहे हैं.

कब हुआ था आदिगुरु शकंराचार्य का जन्म
आदिगुरू शकंराचार्य केरल में जन्मे थे. आदि शकंराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी गांव में 508-9 ईसा पूर्व हुआ माना जाता है. उनकी मां का नाम आर्याम्बा और पिता का नाम शिवगुरु था. उन्होंने जंगलों, पहाड़ों से होते हुए ओंकारेश्वर में ज्ञान प्राप्त किया. ओंकारेश्वर से वो वेदांत के प्रचार के लिए निकल पड़े. जब वो वेदांत के प्रचार के लिए निकले उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 12 साल थी. ओंकारेश्वर से ज्ञान प्राप्त कर वो काशी की ओर चल पड़े.

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, आदिगुरु शंकराचार्य ने सिर्फ 32 साल की उम्र में देश के चार कोनों में चार मठ स्थापित कर दिए थे. इनको ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ के नाम से जाना जाता है. आज के समय में ये चारों पीठ बहुत ही पवित्र माने जाते हैं. इन चारों पीठों पर जो संन्यासी आसीन हैं उन्हें शंकराचार्य कहा जाता है.

आदिगुरु शंकराचार्य की ओर से स्थापित किए गए मठों का मकसद पूरे भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ना था. आदिगुरु शंकराचार्य ने पूरे भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ा. आदिगुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म को देश के कोने-कोने में पहुंचाया.

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