घरेलू क्रिकेट लीग में पहली बार DRS का इस्तेमाल, जून में होगी छत्तीसगढ़ क्रिकेट प्रीमियर लीग

रायपुर छत्तीसगढ़ के क्रिकेट प्रेमियों के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है। आगामी जून महीने से CCPL यानी छत्तीसगढ़ क्रिकेट प्रीमियर लीग के दूसरे सीजन का आगाज होने जा रहा है। पिछले सीजन की तुलना में इस बार कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। छत्तीसगढ़ क्रिकेट संघ इसकी अंतिम तैयारियों में जुटा हुआ है। नवा रायपुर स्थित शहीद वीरनारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम की सुविधाओं को भी अपग्रेड किया जा रहा है, ताकि आयोजन की गुणवत्ता और दर्शकों का अनुभव दोनों ही बेहतर हो। बता दें कि CCPL में इस बार अंतरराष्ट्रीय मैचों की तर्ज पर DRS (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) सिस्टम लागू किया जाएगा। यह अब तक केवल अंतरराष्ट्रीय मैचों और इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में देखने को मिलता था। इस सिस्टम के तहत, प्रत्येक टीम को तीन रिव्यू मिलेंगे, जिनका उपयोग वे ग्राउंड अंपायर के फैसले को चैलेंज करने के लिए कर सकते हैं। यह पहली बार है जब घरेलू क्रिकेट लीग में इस अत्याधुनिक तकनीकी प्रणाली का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे खेल के फैसले और भी निष्पक्ष और सटीक होंगे। BCCI पैनल के होंगे अंपायर, इंटरनेशनल कमेंटेटर करेंगे कमेंट्री CCPL में इस बार इंटरनेशनल कमेंटेटर्स की कमेंट्री होगी, जो पहले ही अंतरराष्ट्रीय मैचों में काम कर चुके हैं। लीग के लिए 10 अंतरराष्ट्रीय कमेंटेटरों की सूची तैयार की गई है, जिनमें से 3 से 4 कमेंटेटरों को फाइनल किया जाएगा। इसके साथ ही, बीसीसीआई पैनल के अंपायरों को इस लीग के मैचों में अपनी अंपायरिंग सेवा देने के लिए बुलाया जाएगा, जिससे मैचों की गुणवत्ता और निष्पक्षता सुनिश्चित होगी। छत्तीसगढ़ स्टेट क्रिकेट संघ के मीडिया प्रभारी राजेश दवे ने बताया कि हम छत्तीसगढ़ क्रिकेट प्रीमियर लीग का यह सीजन और बेहतर करने जा रहे हैं। इस बार डीआरएस सिस्टम, इंटरनेशनल कमेंटेटर और बीसीसीआई पैनल के अंपायर आयोजन में शामिल होंगे। दर्शकों के बैठने के लिए भी बेहतर व्यवस्था रहेगी। सीसीपीएल का स्टैंडर्ड बेहतर कर इसे एक ब्रांड बनाएंगे। इन 6 टीमों के बीच होगी भिड़ंत CCPL में पिछले सीजन की तरह इस बार भी 6 टीमें हिस्सा लेंगी। इन टीमों में रायपुर राइनोस, बिलासपुर बुल्स, सरगुजा टाइगर्स, बस्तर बाइसनस, रायगढ़ लायंस और राजनांदगांव पैंथर्स शामिल हैं। पिछले सीजन के फाइनल में रायपुर राइनोस ने बिलासपुर बुल्स को हराकर CCPL का खिताब अपने नाम किया था। नए खिलाड़ियों का भी होगा चयन CCPL के पिछले सीजन में टीम बनाने के लिए प्रदेशभर से 450 खिलाड़ियों को चुना गया था। इनमें से 280 खिलाड़ी शॉर्टलिस्ट हुए थे। इसके बाद फिर इनमें से 6 टीमों के लिए 120 खिलाड़ियों का चयन किया गया था, लेकिन इस बार उन खिलाड़ियों का चयन किया जाएगा जिन्होंने पिछले सीजन में अच्छा प्रदर्शन किया। खराब प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को बाहर किया जा सकता है, जबकि बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को मौका मिलेगा। TV पर होगा लाइव प्रसारण, स्टेडियम में मिलेगी फ्री एंट्री गौरतलब है कि इस बार भी CCPL के सभी मैचों का प्रसारण सोनी टीवी पर किया जाएगा। दर्शकों के लिए इस बार स्टेडियम में फ्री एंट्री होगी और उनकी बैठने की सुविधाओं को बेहतर बनाया जाएगा। स्टेडियम में आने वाले दर्शकों के लिए एक पास सिस्टम भी लागू किया जाएगा। recent visitors 46

पाकिस्तान की मिसाइलें फुस्स, सीमावर्ती फलौदी के युवक मलबे के साथ सेल्फी लेकर बना रहे मजाक

जोधपुर पहलगाम हमले के बाद आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर से बौखलाए पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर से लेकर गुजरात तक फैली भारत की हजारों किलोमीटर लंबी सीमा पर स्थित महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों और आम नागरिक इलाकों को निशाना बनाते हुए ड्रोन और मिसाइल हमले किए। राजस्थान में तीन रातों तक पाकिस्तान की ओर से लगातार एक ही तरह की बड़ी मिसाइल दागी गई। ये वही मिसाइलें थीं, जिन पर पाकिस्तान अक्सर नाज करता है और जिनके नाम गौरी, गजनवी, अब्दाली, नस्र और शाहीन जैसे रखकर उन्हें दुनिया की ताकतवर मिसाइलों में गिनाता है लेकिन भारतीय सेना ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम की मदद से इन सभी मिसाइलों और ड्रोनों को हवा में ही नष्ट कर दिया। 9 मई को दोपहर में पाकिस्तान की ओर से दागी गई कई मिसाइलें सीमावर्ती फलौदी क्षेत्र के गांवों के खेतों में आकर गिरीं। हालांकि प्रशासन और सेना ने पहले ही चेतावनी दी थी कि मिसाइल या ड्रोन के मलबे के पास न जाएं, क्योंकि इनमें लगे वारहेड या विस्फोटक कई बार सक्रिय अवस्था में रह जाते हैं और अचानक फट सकते हैं, जिससे जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है लेकिन इन चेतावनियों को दरकिनार करते हुए कुछ स्थानीय युवकों ने इन मिसाइलों को एक तरह से खिलौना ही बना डाला। सेना और प्रशासन के मौके पर पहुंचने से पहले ही कुछ ग्रामीणों ने मिसाइलों को उलट-पलटकर देखा, किसी ने कहा कि अगर इसमें कुछ काम की चीज हो तो निकाल लो तो किसी ने इनके साथ सेल्फी लेना शुरू कर दिया। कुछ युवक तो इन मिसाइलों को सामान्य वस्तु समझकर ट्रैक्टर-ट्रॉली या बोलेरो कैंपर में रखकर दूसरी जगह ले गए। हालांकि बाद में भारतीय वायुसेना के जवान मौके पर पहुंचे और मिसाइलों के मलबे को जब्त कर लिया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान की मिसाइलों का भारत के नागरिकों पर कोई डर नहीं है। फलौदी के युवाओं ने अपने व्यवहार से यह दिखा दिया कि उन्हें पाकिस्तान के मिसाइलों से कोई भय नहीं, भले ही उनके नाम शाहीन, गौरी या गजनवी क्यों न हों। हमारी सेना इतनी सक्षम हैं कि पाकिस्तान की दागी मिसाइलें भारत की धरती पर कोई नुकसान नहीं कर सकतीं। recent visitors 54

नागरिकों की सुरक्षा के लिये वाहनों की फिटनेस की जाँच के लिये चलाएं अभियान : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

नागरिकों की सुरक्षा के लिये वाहनों की फिटनेस की जाँच के लिये चलाएं अभियान : मुख्यमंत्री डॉ. यादव पुलिस महानिदेशक को दिये गये निर्देश भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश में नागरिकों की सुरक्षा के लिये सड़क पर चलने वाले सभी वाहनों विशेषकर परिवहन वाहनों के आवश्यक कागजों समेत फिटनेस, परमिट और रजिस्ट्रेशन वैधता की जाँच के लिये 13 मई से विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिये हैं। उन्होंने पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा को परिवहन विभाग के साथ मिलकर संयुक्त कार्रवाई करने के लिये कहा है। निर्देश में कहा गया है कि आवश्यक कागज न होने पर दोषी वाहन चालकों और मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाये।   recent visitors 34

दुनिया की सबसे महंगी कार, सिर्फ इन 3 धनकुबेरों के पास

नई दिल्ली दुनिया में कई अमीर लोग हैं, जिनके पास कई लग्जरी कारें होती हैं. इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें नई-नई कारें खरीदने का बहुत शौक होता है और वे लग्जरी कारों का कलेक्शन रखते हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि दुनिया की सबसे महंगी कार कौन सी है और किन लोगों के पास यह कार है? आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने जा रहे हैं. आइए जानते हैं. जब भी लग्जरी कारों का नाम आता है, तो सबसे पहले रोल्स रॉयस का नाम दिमाग में आता है. रोल्स रॉयस एक ब्रिटिश कार मैन्युफैक्चरिंग कंपनी है, जिसकी कारें शानदार और बेहद महंगी होती हैं. दुनिया की सबसे महंगी कार भी रोल्स रॉयस की ही है, जिसका नाम है रोल्स रॉयस बोट टेल. यह कार दुनिया की सबसे महंगी और लग्जरी कार मानी जाती है. अगर हम दुनिया की सबसे महंगी कार रोल्स रॉयस बोट टेल की कीमत की बात करें, तो यह इतनी महंगी है कि किसी का भी होश उड़ सकता है. इस कार की कीमत है 28 मिलियन डॉलर, यानी करीब 239 करोड़ रुपये. इसका नाम और डिजाइन क्लासिक याच (नाव) से मिलता-जुलता है, इसलिए इसे बोट-टेल नाम दिया गया है. रोल्स रॉयस कंपनी ने अपनी बोट टेल कार की सिर्फ 3 यूनिट्स बनाई हैं, जिनके मालिक दुनिया में केवल तीन लोग हैं. इनमें शामिल हैं:     रैपर जेड और उनकी पत्नी पॉप आइकन बियॉन्से.     अर्जेंटीना के फुटबॉलर माउरो इकार्डी.     पर्ल इंडस्ट्री के एक उद्योगपति, जिनका नाम सार्वजनिक नहीं है. यह कार इन तीनों के पास है, और यह इनकी खास लक्जरी लाइफस्टाइल का प्रतीक है. recent visitors 91

‘ब्रह्मोस’ मिसाइल जमीन, हवा और समुद्र से की जा सकती है लॉन्च

   नई दिल्ली भारत की ब्रह्मोस मिसाइल ने नूर खान (चकलाला) में एयरबेस सहित पाकिस्तान के कई प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठानों और एयरबेसों को निशाना बनाया। सूत्रों का कहना है कि भारत ने ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल तब किया, जब पाकिस्तान ने अपनी फतह 11 बैलिस्टिक मिसाइलों से नई दिल्ली को निशाना बनाने की कोशिश की। हालांकि, फतह को हरियाणा के सिरसा के पास एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने नाकाम कर दिया था।   सूत्रों ने बताया कि क्रूज मिसाइल का सामरिक उपयोग पाकिस्तान की परमाणु ताकत की छवि को कमजोर करने के लिए किया गया था। यह एक ऐसा मोड़ था, जिसने पाकिस्तान को झकझोर कर रख दिया और सेना प्रमुख असीम मुनीर सहित सैन्य नेतृत्व को कदम पीछे खींचने पर मजबूर किया। एक दिन पहले भारत ने लाहौर में वायु रक्षा प्रणाली पर हमला किया था। इससे पाकिस्तान की कमजोरियां उजागर हो गई थीं कि भारत की मिसाइलें उसके क्षेत्र में बहुत अंदर तक सटीकता से लक्ष्य को भेद सकती हैं। ब्रह्मोस समेत भारत की मिसाइलों ने रफीकी, मुरीदके, नूर खान, रहीम यार खान, सुक्कुर, चुनियन, स्कार्दू, भोलारी, जैकबाबाद में भारी नुकसान पहुंचाया। 'दागो और फिर भूल जाओ' का सिद्धांत ब्रह्मोस दो-चरणीय मिसाइल है। इसे रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस के एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। इसका नाम दो नदियों भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा से मिलाकर रखा गया है। यह भारत-रूस साझेदारी का प्रतीक भी है। मिसाइल ठोस ईंधन बूस्टर के साथ लॉन्च होती है जो उड़ान भरने के बाद अलग हो जाता है। इसके बाद तरल ईंधन से चलने वाला रैमजेट इंजन इसे मैक 3 की गति से आगे बढ़ाता है। 10 मीटर की ऊंचाई पर भी हमला कर सकती है मिसाइल यह 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ान भर सकती है और जमीन से 10 मीटर की ऊंचाई पर भी हमला कर सकती है। इसे दागो और भूल जाओ के सिद्धांत पर डिजाइन किया गया है। एक बार लॉन्च होने के बाद इसे किसी और मार्गदर्शन की जरूरत नहीं होती। मिसाइल का कम रडार सिग्नेचर और उच्च गतिज ऊर्जा के कारण इसे रोकना बेहद कठिन हो जाता है। 290 किमी है मानक रेंज ब्रह्मोस मिसाइलों की मानक मारक क्षमता 290 किलोमीटर है। हालांकि, हाल ही में 450 किलोमीटर से अधिक और 800 किलोमीटर तक की विस्तारित मारक क्षमता वाले संस्करणों का सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया गया है। भविष्य के वेरिएंट का लक्ष्य 1,500 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्यों पर हमला करना है। 24 वर्ष पहले हुआ था ब्रह्मोस का पहला परीक्षण ब्रह्मोस का पहला परीक्षण 12 जून, 2001 हुआ था। भारतीय नौसेना ने 2005 में आईएनएस राजपूत पर अपना पहली ब्रह्मोस प्रणाली शामिल की थी। भारतीय सेना ने 2007 में अपनी रेजिमेंट के साथ इसे शामिल किया और बाद में वायुसेना ने सुखोई-30एमकेआई विमान से हवाई-लॉन्च वाले संस्करण को शामिल किया। 2025 तक इसके दो संस्करण सेवा में हैं।   recent visitors 34

रायपुर, भिलाई समेत आठ निकायों में बीपीसीएल और गेल कंपनी लगाएगी प्लांट

   रायपुर  मुख्यमंत्री  विष्णु  देव  साय की पहल पर छत्तीसगढ़ के सभी नगरीय निकायों में जैव अपशिष्ट सह  कृषि अपशिष्ट के प्रसंस्करण के  लिए बायो-सीएनजी प्लांट लगाए जाएंगे। रायपुर, भिलाई समेत आठ निकायों में जमीन का चिन्हांकन किया जा चुका है। इन स्थानों पर बीपीसीएल और गेल 800 करोड़ का प्लांट लगाएंगे।  उल्लेखनीय  है  कि  पिछले 17 अप्रैल 2025  को  मुख्यमंत्री   श्री  विष्णु  देव  साय की  अध्यक्षता  में  आयोजित कैबिनेट की  बैठक  में  बायो- सीएनजी संयंत्रों के  लिए  सार्वजानिक  उपक्रमों  को  एक  रुपये  प्रति  वर्गमीटर  की  रियायती  दर  पर  भूमि  आबंटित किए  जाने  का  निर्णय  लिया  गया  था। कैबिनेट के निर्णय  के  बाद  नगरीय  प्रशासन  विभाग  द्वारा सभी  कलेक्टरों  को    जमीन  आबंटन  को  लेकर  निर्देश  जारी  कर  दिए  गए  हैं।   बीपीसीएल और गेल कंपनी को एक रुपए वर्गमीटर में 10 एकड़ जमीन 25 साल की लीज पर दी जाएगी। जैव अपशिष्ट सह  कृषि अपशिष्ट का  प्रसंस्करण इन संयंत्रों  में  किया  जाएगा। भारत में उपयोग होने वाले सीएनजी का लगभग 46 फीसदी वर्तमान में आयात किया जाता है और सरकार का लक्ष्य बायो-सीएनजी के उत्पादन और खपत के माध्यम से इस निर्भरता को कम करना है। बायो सीएनजी, जिसे बायो कंप्रेस्ड नेचुरल गैस भी कहा जाता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से वाहनों के ईंधन आऔर घरेलू ऊर्जा के रूप में किया जाता है। साथ ही सीएनजी वाहनों को ईंधन देने के लिए, एलपीजी के विकल्प के रूप में खाना पकाने और हीटिंग के लिए, बिजली उत्पादन के लिए, कुछ उद्योगों में हीटिंग और अन्य प्रक्रियाओं के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकता है। केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का अनुमान है कि भारत में बायो-सीएनजी उत्पादन की क्षमता लगभग 70 मिलियन मीट्रिक टन है। इसका उत्पादन बाजार की मांग के अनुरूप है, जिससे यह आर्थिक रूप से पूरी तरह व्यवहारिक है। क्या है बायोसीएनजी? बायोसीएनजी का उत्पादन जैविक अपशिष्ट पदार्थों जैसे पशु अपशिष्ट, खाद्य अपशिष्ट और औद्योगिक कीचड़ को बायोगैस और डाइजेस्टेट में तोड़कर किया जाता है। यह प्रक्रिया एक सीलबंद, ऑक्सीजन रहित टैंक में होती है, जिसे एनारोबिक डाइजेस्टर भी कहा जाता है। फिर बायोगैस को संसाधित किया जाता है, जिससे 95 फीसदी शुद्ध मीथेन गैस प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया से उच्च गुणवत्ता वाला सांद्रित तरल उर्वरक प्राप्त होता है। महीनेभर के भीतर टेंडर की प्रक्रिया की जाएगी शुरू नगरीय प्रशासन  विभाग  के  अनुसार प्रदेश के आठ स्थानों पर जमीन का चिन्हांकन कर लिया गया है। इसके लिए जल्द ही टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी। एक महीने के भीतर ही इसका टेंडर फाइनल करने के बाद काम शुरू कर दिया जाएगा। इसके बाद निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। recent visitors 33

DRDO के वैज्ञानिक ह्यूमनॉइड रोबोट पर काम कर रहे हैं, 2027 तक तैयार होगा जो रक्षा और अन्य क्षेत्रों में क्रांति लाएगा

बेंगलुरु रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिक एक ऐसे मानवरोबोट (ह्यूमनॉइड रोबोट) के विकास पर काम कर रहे हैं, जो अग्रिम पंक्ति के सैन्य मिशनों में हिस्सा ले सके. एक अधिकारी ने शनिवार को बताया कि इस रोबोट का उद्देश्य उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सैनिकों की जान को खतरे में डाले बिना जटिल कार्यों को अंजाम देना है. डीआरडीओ के तहत एक प्रमुख प्रयोगशाला, रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (इंजीनियर्स), इस मशीन को विकसित कर रही है. प्रत्यक्ष मानव निर्देशों के तहत जटिल कार्यों को करने में सक्षम होगी. इस रोबोट को विशेष रूप से ऐसे वातावरण में सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है, जहां जोखिम अधिक है. चार साल से चल रहा है प्रोजेक्ट पुणे में सेंटर फॉर सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज फॉर एडवांस्ड रोबोटिक्स के समूह निदेशक एस.ई. तलोले ने बताया कि उनकी टीम पिछले चार साल से इस परियोजना पर काम कर रही है. उन्होंने कहा कि हमने ऊपरी और निचले शरीर के लिए अलग-अलग प्रोटोटाइप विकसित किए हैं. आंतरिक परीक्षणों के दौरान कुछ कार्यों को सफलतापूर्वक हासिल किया है. यह ह्यूमनॉइड रोबोट जंगल जैसे कठिन इलाकों में भी काम कर सकेगा. हाल ही में पुणे में आयोजित नेशनल वर्कशॉप ऑन एडवांस्ड लेग्ड रोबोटिक्स में इस रोबोट को प्रदर्शित किया गया था. उन्नत विकास चरण में प्रोजेक्ट वर्तमान में यह प्रोजेक्ट अपने उन्नत विकास चरण में है. टीम का ध्यान रोबोट की ऑपरेटर के निर्देशों को समझने और उन्हें लागू करने की क्षमता को और बेहतर बनाने पर है. इस प्रणाली में तीन मुख्य घटक शामिल हैं:       एक्ट्यूएटर्स: ये मानव मांसपेशियों की तरह गति उत्पन्न करते हैं.       सेंसर: ये आसपास के वातावरण से वास्तविक समय में डेटा एकत्र करते हैं.       नियंत्रण प्रणाली: ये एकत्रित जानकारी का विश्लेषण करके रोबोट के कार्यों को निर्देशित करती हैं. तलोले ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि रोबोट वांछित कार्यों को सुचारू रूप से कर सके. इसके लिए संतुलन, तीव्र डेटा प्रोसेसिंग और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन में महारत हासिल करना आवश्यक है. डिज़ाइन टीम का नेतृत्व कर रहे वैज्ञानिक किरण अकेला ने बताया कि शोधकर्ता इन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. 2027 तक इस परियोजना को पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं. रोबोट की विशेषताएं और क्षमताएं डीआरडीओ के अधिकारियों ने बताया कि दो पैरों (बाइपेडल) और चार पैरों (क्वाड्रुपेडल) वाले रोबोट रक्षा और सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवा, घरेलू सहायता, अंतरिक्ष अन्वेषण और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएं प्रदान करते हैं. हालांकि, स्वायत्त और कुशल लेग्ड रोबोट बनाना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है. वैज्ञानिकों ने बताया कि इस ह्यूमनॉइड रोबोट का ऊपरी हिस्सा हल्के वजन वाले हाथों से सुसज्जित होगा, जिसमें गोलाकार रिवॉल्यूट जोड़ कॉन्फ़िगरेशन होगा. इसमें कुल 24 डिग्री ऑफ फ्रीडम होंगे – प्रत्येक हाथ में 7, ग्रिपर में 4, और सिर में 2. यह रोबोट जटिल स्वायत्त कार्य करने में सक्षम होगा, जैसे:  बंद-लूप ग्रिपिंग के साथ वस्तुओं को पकड़ना.   वस्तुओं को मोड़ना, धक्का देना, खींचना, स्लाइडिंग दरवाजे खोलना, वाल्व खोलना और बाधाओं को पार करना. खतरनाक सामग्रियों जैसे खदानों, विस्फोटकों और तरल पदार्थों को सुरक्षित रूप से संभालना. दोनों हाथ मिलकर सहयोगात्मक रूप से कार्य करेंगे, जिससे खतरनाक सामग्रियों को सुरक्षित रूप से संभाला जा सके. उन्नत तकनीकी विशेषताएं यह रोबोट दिन हो या रात, घर के अंदर हो या बाहर, निर्बाध रूप से काम करेगा. इसमें निम्नलिखित तकनीकी विशेषताएं शामिल होंगी… प्रोप्रियोसेप्टिव और एक्सटेरोसेप्टिव सेंसर: ये रोबोट को अपने शरीर और आसपास के वातावरण के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे.       डेटा फ्यूजन क्षमता: विभिन्न स्रोतों से डेटा को एकीकृत करने की क्षमता.       सामरिक संवेदन: यह रोबोट को जटिल परिस्थितियों में निर्णय लेने में मदद करेगा.       ऑडियो-विजुअल धारणा: यह रोबोट को देखने और सुनने की क्षमता प्रदान करेगा. इसके अलावा, यह ह्यूमनॉइड बाइपेड रोबोट निम्नलिखित विशेषताओं से लैस होगा…     फॉल और पुश रिकवरी: गिरने या धक्का दिए जाने पर स्वयं को संभालने की क्षमता.       वास्तविक समय में मैप जनरेशन: आसपास के क्षेत्र का नक्शा बनाने की क्षमता.       स्वायत्त नेविगेशन और पथ नियोजन: सिमुल्टेनियस लोकलाइजेशन एंड मैपिंग (एसएलएएम) के माध्यम से यह रोबोट जटिल और उच्च जोखिम वाले वातावरण में स्वायत्त रूप से संचालित हो सकेगा. भविष्य की संभावनाएं डीआरडीओ के इस ह्यूमनॉइड रोबोट प्रोजेक्ट से न केवल रक्षा क्षेत्र में क्रांति आएगी, बल्कि यह अन्य क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य सेवा, अंतरिक्ष अन्वेषण और औद्योगिक अनुप्रयोगों में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की उन्नत तकनीक सैनिकों की सुरक्षा को बढ़ाने के साथ-साथ मानव जीवन को और सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने में मदद करेगी.   recent visitors 46