Rare species of bird Sand Grouse present in Tiger Reserve
- एक परिंदा ऐसा भी जिसके पंख बन जाते हैं पानी भरने का बर्तन प्यास बुझाने दूर से लाता है पानी
सागर/तेन्दूखेड़ा ! वीरांगना रानी दुर्गावती (नौरादेही) टाइगर रिजर्व अब दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों के बसेरा के रूप में भी अपनी पहचान बनाता जा रहा है। वर्तमान में यहां एक ऐसा दुर्लभ परिंदा पाया जाता है, जो अपने चूजों की प्यास बुझाने के लिए काफी दूर से पानी भरकर अपने पंखों में लाता है। जो अपने आप में प्रकृति का नायब तोहफा है, जो हमारे जिले में भी मौजूद है सैंड ग्राउंस या सैंड सैंडपाइपर को भारत में दहियर या दहियल पक्षी के नाम से जाना जाता है। साथ ही इसे दहियर, दहियल, ग्वालिन, दयाल, दहगल, काली सुई चिड़िया, श्रीवद, दहियक, कालकंठ के नाम से जाना जाता है। इस पक्षी की खासियत ये है कि बीज, दाने और घास के तिनकों को भोजन बनाता है। लेकिन पानी के लिए लंबा 30 से 40 किमी तक का सफर तय करता है। खासकर अपने चूजों को पानी पिलाने के लिए ये जो तरीका अपनाता है, वो अपने
आप में अनोखा है ये अपने शरीर के निचले हिस्सा में पानी का संग्रह करता है और फिर अपने चूजों की प्यास बुझाने के साथ उन्हें ठंडा करने के लिए अपने शरीर से पानी देता है। अपने बच्चों के लिए पानी लेकर आते है। इनका पानी लाने का तरीका अनोखा होता है। यह अपने शरीर के निचले हिस्से के पंखों को पानी में डुबो डुबोकर पानी को सोखते है। जब उन्हें भरोसा हो जाता है कि उनके पंखों में काफी मात्रा में पानी इकट्ठा हो गया है, तो फिर मीलों सफर तय कर अपने बच्चों के पास पहुंचते हैं और उनके बच्चे पंखों से पानी पीते हैं और पानी झड़ाकर बच्चों को ठंडक प्रदान करते हैं। जो अपने आप में एक अनूठा है
इनका कहना है
नौरादेही शुष्क इलाका है यहां पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों में एक सैंड ग्राउस का भी बसेरा है। ये एक दुर्लभपक्षी है, क्योंकि ज्यादातर बड़े और खुले मैदान में पाया जाता है, जिनकी संख्या कम होने के कारण इनके प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। लेकिन नौरादेही टाइगर रिजर्व में ये पाया जाता है। हमारे यहां सैंड ग्राउस और पेंटेड सैंड ग्राउस दोनों पाए जाते हैं
डॉ एए अंसारी डिप्टी डायरेक्टर टाइगर रिजर्व

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