नई दिल्ली
इंटरनेशनल लेवल पर मेडल्स जीतने वाले जूनियर एथलीटों को अब सरकार से नकद पुरस्कार नहीं मिलेगा. खेल मंत्रालय का यह नीतिगत बदलाव 1 फरवरी से लागू हुआ हुआ है. जिसका लक्ष्य उद्देश्य डोपिंग और उम्र संबंधी धोखाधड़ी (एज फ्रॉड ) के दोहरे खतरे से निपटना और साथ ही युवा खिलाड़ियों में जीत भूख को जिंदा रखना है.
पहले जो पुराना सिस्टम था, उसके तहत जूनियर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड पदक जीतने पर खिलाड़ी को लगभग 13 लाख रुपये मिलते थे, जबकि एशियन या कॉमनवेल्थ गेम्स में टॉप पोजीशन पर रहने पर खिलाड़ी को 5 लाख रुपये का नकद पुरस्कार मिलता था.
'इंडियन एक्सप्रेस' को खेल मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि इस निर्णय के पीछे एक प्रमुख कारण जूनियर इवेंट्स को पोडियम फिनिश तक सीमित न रखकर इनका प्रमोशन करना है.
इस अधिकारी ने कहा- हमने देखा कि केवल भारत ही ऐसे मॉडल का अनुसरण करता है, जहां जूनियर चैम्पियनशिप को अधिक महत्व दिया जाता है, नतीजतन, एथलीट उस स्तर पर इतनी मेहनत करते हैं, पर जब तक वो टॉप लेवल पर पहुंचते हैं, तब तक वे या तो थक जाते हैं या उनकी जीत भूख खत्म हो जाती है.
सीनियर एथलीट के लिए भी नियम बदले…
सीनियर एथलीटों के लिए पुरस्कार नीति में भी बदलाव किया गया है. खेल मंत्रालय ने राष्ट्रमंडल चैम्पियनशिप और दक्षिण एशियाई खेलों को पुरस्कार सूची से हटा दिया है. अंतरराष्ट्रीय मास्टर या ग्रैंडमास्टर मानदंड जीतने वाले शतरंज खिलाड़ियों को भी अब प्रोत्साहन नहीं मिलेगा.
क्यों लिया खेल मंत्रालय ने ये फैसला
पिछले कुछ सालों में नकद प्रोत्साहन को उन कारणों में से एक माना जाता रहा है, जो एथलीटों और उनके कोचों को उम्र धोखाधड़ी और डोपिंग अपराध करने के लिए प्रेरित करते हैं. 13 जनवरी तक राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, 2022 के बाद से भारत में डोप अपराधियों में से 10% से अधिक नाबालिग हैं, यानी 204 में से 22.
हालांकि, उम्र में हेराफेरी करने वाले खिलाड़ियों की संख्या पर निगरानी रखने के लिए कोई केंद्रीय व्यवस्था नहीं है, फिर भी पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न खेलों में सैकड़ों खिलाड़ियों को निलंबित किया जा चुका है और कई अन्य खिलाड़ी बच निकले हैं.

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