नेतन्याहू भारत आ रहे, दिल्ली में अरब देशों के साथ बैठक तय; जयशंकर का मिडिल ईस्ट गेम चर्चा में

नई दिल्ली इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अगले हफ्ते भारत दौरे पर आ रहे हैं. इससे पहले भारत के EAM एस जयशंकर ने मिडिल ईस्ट को टारगेट करते हुए डबल मास्टरस्ट्रोक चला है. उन्होंने नेतन्याहू के दौरे से पहले अरब देशों को पहले ही दिल्ली बुलाकर एक बड़ा मैसेज दिया है. जयशंकर की गजब की कूटनीति का नतीजा है कि अरब देशों ने भारत को फिलिस्तीन का ‘मसीहा’ मानना शुरू कर दिया है. आगे जानें जयशंकर के बेहतरीन बैलेंसिंग एक्ट की वजह से जियो पॉलिटिक्स में भारत का कद किस तरह बढ़ रहा है? भारत ने आज यानी 31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में ‘दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्री बैठक’ (IAFMM) की मेजबानी की है. यह बैठक पूरे 10 साल के लंबे इंतजार के बाद हुई है. इसमें अरब लीग के सभी 22 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए. दिलचस्प बात यह है कि यह बैठक जयशंकर की दिसंबर 2025 की इजरायल यात्रा और प्रधानमंत्री नेतन्याहू की प्रस्तावित भारत यात्रा के ठीक बीच में हो रही है. इस बैठक के दौरान भारतीय EAM का एक ऐसा बेहतरीन बैलेंसिंग एक्ट देखने को मिला, जिसकी वजह से जियो पॉलिटिक्स में भारत का कद और भी बढ़ गया है. फिलिस्तीन का ‘मसीहा’ भारत दिल्ली पहुंची फिलिस्तीनी विदेश मंत्री वारसेन अगाबेकियन शाहीन ने सीधा और भावनात्मक कार्ड खेला है. उन्होंने जयशंकर से मुलाकात के बाद सार्वजनिक तौर पर अपील करते हुए कहा है कि ‘भारत ही वह महान देश है जो इजरायल-फिलिस्तीन जंग को रुकवा सकता है. पीएम मोदी की इजरायल से दोस्ती और अरब देशों से रिश्ते उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा ‘मध्यस्थ’ बनाते हैं’. फिलिस्तीन ने भारत से गाजा के पुनर्निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने की मांग की है. इजरायल का जिगरी दोस्त दिसंबर 2025 में जब जयशंकर इजरायल में थे, तो वहां सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) के एक हमले में यहूदियों की मौत पर उन्होंने गहरी संवेदना जताई थी. भारत और इजरायल ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को फिर से दोहराया है. भारत और इजरायल के बीच ड्रोन तकनीक और मिसाइल डिफेंस को लेकर एक गुप्त समझौता भी परवान चढ़ रहा है. जयशंकर का बैलेंसिंग एक्ट एक तरफ भारत इजरायल के साथ अत्याधुनिक हथियारों का सौदा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ 22 अरब देशों को एक साथ मेज पर बिठाकर अपनी ऊर्जा जरूरतों (Energy Security) को सुरक्षित कर रहा है. जयशंकर ने साबित कर दिया है कि भारत अब दुनिया के उन चंद देशों में से है, जो युद्ध के दो धुर विरोधियों से एक साथ हाथ मिला सकते हैं. ‘मिडिल ईस्ट’ का नया पावर सेंटर: भारत     अरब देशों के साथ बैठक की सह-अध्यक्षता UAE कर रहा है. जयशंकर ने साफ कर दिया है कि भारत जियो पॉलिटिक्स का एक बड़ा और अहम प्लेयर है.     भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है. जयशंकर इसे ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बना रहे हैं, जहाँ अरब देशों का समर्थन भारत के लिए बहुत जरूरी है.     सिल्क रूट को टक्कर: ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे’ (IMEC) को फिर से जिंदा करने के लिए अरब देशों का साथ लेना इस बैठक का गुप्त एजेंडा है.   recent visitors 36

गोल्ड रेट अपडेट: बजट 2026 के बाद सोना हो सकता है सस्ता, एक्सपर्ट्स ने दिए संकेत

नई दिल्ली 1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में यूनियन बजट पेश करेंगी. इस दिन पर सोने की कीमतों पर सबसे ज्यादा नजर रहने वाली है, क्योंकि लोग उम्मीद कर रहे हैं कि बजट में सोने से जुड़ी कोई बड़ी घोषणा हो सकती है. अभी सोने की कीमत एमसीएक्स पर 10 ग्राम 24 कैरेट के लिए करीब 1.49 लाख रुपये के आसपास है. चांदी 2.91 लाख रुपये प्रति किलो है. पिछले बजट से सोना 100 फीसदी और चांदी 250 फीसदी तक महंगा हो चुका है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बजट में सोने पर कस्टम ड्यूटी या इंपोर्ट ड्यूटी में कोई बड़ा बदलाव नहीं होने की उम्मीद है. पिछले साल बजट में सोने पर कुल कस्टम ड्यूटी 15 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी कर दी गई थी. अब एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सरकार इसे और कम नहीं करेगी क्योंकि आयात बहुत ज्यादा हो रहा है. सोना और चांदी के आयात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. अगर ड्यूटी बढ़ाई गई तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं लेकिन ऐसा होने की कम संभावना है. बजट में क्या गोल्ड पर आ सकता है बड़ा फैसला? एक्सपर्ट्स की राय है कि इनकम टैक्स रिटर्न में सोने के गहनों या ज्वेलरी की ज्यादा जानकारी देने के नए नियम आ सकते हैं. शेड्यूल एएल में ज्यादा डिटेल मांगी जा सकती है. सेल्फ रिपोर्टिंग का तरीका शुरू हो सकता है, ताकि सोने की होल्डिंग ट्रैक की जा सके. सोने की बिक्री पर टैक्स नियमों में कुछ राहत मिल सकती है. जीएसटी में भी छोटे बदलाव जैसे मेकिंग चार्जेस पर 5 फीसदी जीएसटी या 3 फीसदी जीएसटी में एडजस्टमेंट की बात हो सकती है. लेकिन घर में रखे सोने पर कोई हार्ड लिमिट नहीं लगेगी. पुराना गोल्ड कंट्रोल एक्ट 1990 में खत्म हो चुका है और अब वैध सोर्स से सोना रखने पर कोई सीमा नहीं है. शादीशुदा महिलाओं के लिए 500 ग्राम, अविवाहित के लिए 250 ग्राम और पुरुषों के लिए 100 ग्राम तक डिस्क्रेशनरी तरीके से कोई जब्ती नहीं होती. एक्सपर्ट्स जैसे दीपाश्री शेट्टी और सोनम चंदवानी कहते हैं कि रिपोर्टिंग और डिस्क्लोजर पर फोकस रहेगा न कि घरेलू होल्डिंग पर सख्त नियम. अगर हार्ड लिमिट लगाई गई तो लोगों में डर फैलेगा और ब्लैक मार्केट बढ़ सकता है. इसलिए सरकार सावधानी बरतेगी. क्या बजट पर गिरेगा सोने का भाव? बजट 2026 के दिन पर सोने की कीमत क्या होगी, इसकी भविष्यवाणी मुश्किल है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बजट में अगर कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ तो कीमतें स्थिर रह सकती हैं या छोटी गिरावट आ सकती है. लेकिन अगर ड्यूटी में कटौती की उम्मीद से लोग खरीदारी बढ़ा दें तो रिबाउंड हो सकता है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अगर ड्यूटी 3-5 फीसदी कम हुई तो 10 ग्राम पर 2000 से 4000 रुपये तक गिरावट आ सकती है. लेकिन ऐसा होने की कम संभावना है. बाजार में पहले से ही कीमतें हाई हैं और बजट के बाद सोमवार को ट्रेडिंग में तेज मूवमेंट देखने को मिल सकता है. बजट सोने के लिए ज्यादा बड़ा सरप्राइज नहीं देगा. फोकस रिपोर्टिंग और टैक्स राहत पर रहेगा. सोने की कीमतें ग्लोबल फैक्टर्स जैसे इन्फ्लेशन, जियोपॉलिटिकल टेंशन और सेंट्रल बैंक की खरीदारी से ज्यादा प्रभावित होंगी. भारतीय परिवारों के लिए सोना संपत्ति बनाने का जरिया है इसलिए सरकार बैलेंस बनाए रखेगी. बजट के बाद सोने में इंटरमिटेंट करेक्शन के बाद रिकवरी हो सकती है. recent visitors 37

महंगाई का नया वार: 1 फरवरी से पान-मसाला और सिगरेट हुए महंगे, नियम बदले

नई दिल्ली जनवरी का महीना खत्म होने वाला है और कल से नए फरवरी महीने की शुरुआत हो जाएगा. हर महीने की तरह ये महीना भी कई बड़े बदलावों (Rule Change From 1st February) के साथ शुरू होने जा रहा है. इनमें एलपीजी सिलेंडर की कीमतों (LPG Cylinder Price) से लेकर टोल टैक्स पर फास्टैग से जुड़े नियम (FASTag Rule Change) तक शामिल हैं. वहीं सबसे बड़ा शॉक पान-मसाला और सिगरेट के शौकीनों को लगने वाला है. जी हां, 1 फरवरी 2026 से इन तंबाकू प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ (Pan-Masala Cigarette Price Hike) सकती हैं, क्योंकि सरकार इन पर लागू टैक्स में इजाफा करने वाली है.  साल की शुरुआत में की थी तैयारी इस साल की शुरुआत में ही सरकार की ओर से GST क्षतिपूर्ति उपकर के स्थान पर एक नया उत्पाद शुल्क और उपकर अधिसूचित किया गया था. पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसके तहत देश में 1 फरवरी 2026 से तंबाकू उत्पादों और पान मसाला पर अधिक टैक्स का प्रावधान किया गया है. अधिसूचना को देखें, तो तंबाकू और पान मसाला पर नए शुल्क लागू जीएसटी दरों के अतिरिक्त लगाए जाएंगे. जनवरी की शुरुआत में वित्त मंत्रालय ने चबाने वाले तंबाकू, जर्दा और गुटखा पैकिंग मशीन (क्षमता निर्धारण और शुल्क संग्रह) नियम, 2026 को भी अधिसूचित किया. ये नियम चबाने वाले तंबाकू प्रोडक्ट्स के निर्माताओं से उत्पादन क्षमता का आकलन करने और शुल्क वसूलने की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं. रिपोर्ट की मानें, तो केंद्र सरकार का यह कदम दिसंबर 2025 में संसद द्वारा दो विधेयकों को मंजूरी दिए जाने के बाद आया, जो पान मसाला निर्माण पर नए स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर और तंबाकू उत्पादों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाने की अनुमति देते हैं.   कीमतों पर दिखेगा टैक्स इफेक्ट  सरकार द्वारा संशोधित टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 1 फरवरी से सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाने से लंबी, प्रीमियम सिगरेट पर सबसे अधिक वृद्धि देखने को मिलेगी. बदलाव के तहत सिगरेट की लंबाई के आधार पर प्रति 1,000 स्टिक पर 2,050 रुपये से लेकर 8,500 रुपये तक का उत्पाद शुल्क लगाया जाएगा, जो फरवरी  पहली तारीख से प्रभावी होगा. ध्यान रहे कि यह शुल्क 40% जीएसटी से अलग होगा.  टैक्स की मार के चलते इन तंबाकू प्रोडक्ट्स को बनाने वाली कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन प्रभावित होगा और ऐसे में कंपनियां इसकी भरपाई के लिए ग्राहकों पर बोझ बढ़ा सकती हैं. सीधे शब्दों में कहें तो सिगरेट, पान-मसाला, गुटखा महंगे हो जाएंगे और इनके शौकीनों को अब ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ेगी.  Crisil ने इसे लेकर क्या कहा?  क्रिसिल की एक रिपोर्ट को देखें, तो सिगरेट उद्योग को शुल्क में बढ़ोतरी से बिक्री में गिरावट का सामना भी करना पड़ सकता है. वर्तमान में, सिगरेट पर 28 प्रतिशत वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के क्षतिपूर्ति उपकर भी लगते हैं, लेकिन 1 फरवरी से ये क्षतिपूर्ति उपकर हटा दिया जाएगा और सिगरेट की लंबाई के आधार पर एक अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लागू होगा. क्रिसिल ने Tax Hike से घरेलू सिगरेट उद्योग में अगले वित्तीय वर्ष में 6-8 फीसदी की गिरावट का अनुमान जताया है.  recent visitors 26

हाईकोर्ट में जजों की भारी कमी, पेंडिंग मामलों की संख्या 4,80,592; समाधान में 40 साल लग सकते हैं

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर में यदि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या 42 से बढ़कर 75 या 85 नहीं होती है, तो साढ़े चार लाख 80 हजार से अधिक लंबित प्रकरणों का बैकलाग खत्म करने में पांच या दस साल नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय लग सकता है। एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण इस संबंध में एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी लंबित मामलों के बढ़ने का प्रमुख कारण है। ऐसे में हाई कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति और उनके समाधान पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक हो गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए के तहत राज्य का यह दायित्व है कि प्रत्येक नागरिक को न्याय तक समान और प्रभावी पहुंच सुनिश्चित की जाए। लेकिन यदि न्याय मिलने में दशकों का समय लगे, तो यह संवैधानिक प्रावधान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। वर्तमान स्थिति इसी ओर संकेत करती है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में 11 जजों की कमी, बढ़ते मामलों से बढ़ेगी मुश्किल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की बात करें तो यहां 53 स्वीकृत पदों के मुकाबले फिलहाल केवल 42 न्यायाधीश कार्यरत हैं। यानी 11 पद रिक्त, जो कुल स्वीकृत संख्या का करीब 20.75 प्रतिशत है। यह आंकड़ा इसलिए और चिंताजनक हो जाता है, क्योंकि मध्य प्रदेश पहले से ही लंबित मामलों के मामले में देश के बड़े राज्यों में शामिल है। हाईकोर्ट में जजों की यह कमी न केवल मामलों की सुनवाई को धीमा करती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में आम लोगों के भरोसे को भी कमजोर करती है। वकीलों और सामाजिक संगठनों का लंबे समय से कहना रहा है कि जजों की कमी के कारण नियमित सुनवाई संभव नहीं हो पाती और तारीख पर तारीख न्याय व्यवस्था की पहचान बनती जा रही है। केंद्र सरकार ने संसद को यह भी बताया कि जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका में नियुक्ति और पदों का निर्धारण संबंधित राज्य सरकार और हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 1639 न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं। इनमें से 803 जज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं, जो कुल कार्यरत संख्या का 48.99 प्रतिशत है। वहीं, करीब 51 प्रतिशत न्यायिक अधिकारी अन्य वर्गों से हैं। हालांकि, सरकार ने संसद में जिला-वार रिक्त पदों का कोई अलग-अलग ब्योरा पेश नहीं किया। इससे यह साफ हो जाता है कि मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में निचली अदालतों पर बढ़ते बोझ के बावजूद, जजों की वास्तविक कमी का जिला स्तर पर कोई सार्वजनिक और पारदर्शी आकलन सामने नहीं आया है। जानकारों का मानना है कि अगर जिला-वार आंकड़े सामने आएं, तो स्थिति और भी गंभीर नजर आ सकती है। देशभर की स्थिति: कई हाईकोर्ट में हालात बेहद गंभीर अगर देशभर की तस्वीर पर नजर डालें, तो हालात केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में 94 स्वीकृत पदों में से 14 पद खाली हैं, यानी करीब 14.9 प्रतिशत। दिल्ली हाईकोर्ट में 60 में से 16 पद (26.6 प्रतिशत) और मद्रास हाईकोर्ट में 75 में से 22 पद (29.3 प्रतिशत) रिक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी 34 स्वीकृत पदों में से एक पद खाली है, जो भले ही प्रतिशत में कम लगे, लेकिन शीर्ष अदालत में हर एक जज की भूमिका बेहद अहम होती है। इलाहाबाद, कलकत्ता और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में सबसे ज्यादा संकट आंकड़ों के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की कमी सबसे ज्यादा है। यहां 160 स्वीकृत पदों के मुकाबले 50 पद खाली हैं, यानी 31.25 प्रतिशत। कलकत्ता हाईकोर्ट की स्थिति और भी गंभीर है, जहां 72 में से 29 पद रिक्त हैं, जो 40.3 प्रतिशत बैठता है। वहीं जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख और झारखंड हाईकोर्ट में हालात बेहद चिंताजनक बताए गए हैं, जहां 44 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में न्यायपालिका संसाधनों की भारी कमी से जूझ रही है। मध्य प्रदेश की निचली अदालतों में वर्गवार प्रतिनिधित्व मध्य प्रदेश में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों का वर्गवार विवरण भी संसद में पेश किया गया। इसके अनुसार:     अनुसूचित जाति (SC): 263 जज – लगभग 16.05%     अनुसूचित जनजाति (ST): 232 जज – लगभग 14.15%     अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 308 जज – लगभग 18.79%     अन्य वर्ग: 836 जज – लगभग 51.01% कुल मिलाकर 1639 कार्यरत न्यायिक अधिकारियों में से लगभग आधे SC, ST और OBC वर्ग से हैं। हालांकि, सवाल यह भी उठ रहा है कि जब पद ही पर्याप्त नहीं हैं, तो प्रतिनिधित्व के ये आंकड़े न्यायिक बोझ को कितना कम कर पा रहे हैं। भोपाल के एडवोकेट सुनील आदिवासी ने द मूकनायक से बातचीत में न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि अदालतों में जजों की कमी तो पहले से ही एक बड़ी समस्या है, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दलित और आदिवासी वर्ग से आने वाले जज केवल नाम मात्र के बराबर रह गए हैं। उनका कहना है कि सामाजिक न्याय की जिस अवधारणा की बात संविधान करता है, वह तब तक अधूरी रहेगी, जब तक न्याय देने वाली व्यवस्था में ही वंचित तबकों की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाती। एडवोकेट सुनील आदिवासी ने आगे कहा कि जब न्यायपालिका में दलित-आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद सीमित होता है, तो इसका असर फैसलों की संवेदनशीलता और समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुंच पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते जजों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व पर ध्यान नहीं दिया गया, तो न्यायपालिका से आम जनता का भरोसा कमजोर होना तय है। न्याय में देरी और न्याय से वंचित? विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की कमी सीधे-सीधे न्याय में देरी से जुड़ी हुई है। जब एक-एक जज पर हजारों मामलों का बोझ हो, तो त्वरित और प्रभावी न्याय की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक रिक्त पदों को भरने में हो रही देरी पर … Read more

मेडिकल ब्रेकथ्रू: AIIMS दिल्ली ने स्ट्रोक इलाज को बनाया आसान और सस्ता

नई दिल्ली भारत में आज स्ट्रोक एक गंभीर और तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ता स्ट्रेस, गलत खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण स्ट्रोक के मामले हर साल लगातार बढ़ रहे हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि हर साल लाखों भारतीय स्ट्रोक का शिकार होते हैं, जिनमें से कई लोगों की जान चली जाती है. जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ और एक्टर मिथुन चक्रवर्ती, हाल के कुछ सालों में कई जानी-मानी हस्तियां स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी का सामना कर चुकी हैं. इससे साफ है कि यह बीमारी अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. स्ट्रोक के बाद कई मरीजों में शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या लकवा, बोलने-समझने में परेशानी, चलने-फिरने में दिक्कत और रोजमर्रा के कामों में दूसरों पर निर्भरता बढ़ जाती है.  AIIMS की नई स्टडी से नई उम्मीद ऐसे में AIIMS दिल्ली की एक नई स्टडी स्ट्रोक के मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. इस स्टडी के अनुसार, रोजाना सिर्फ 30 मिनट धूप में समय बिताना स्ट्रोक से उबर रहे मरीजों की रिकवरी, नींद और मूड में सुधार कर सकता है. वो भी बिना किसी अधिक खर्च के… एम्स की यह स्टडी नवंबर 2023 से अप्रैल 2025 के बीच की गई और इसे संस्थान के पांचवें रिसर्च डे पर पेश किया गया. इसमें पाया गया कि जिन स्ट्रोक मरीजों को नियमित इलाज और फिजियोथेरेपी के साथ सनलाइट थेरेपी दी गई, उनकी जिंदगी की गुणवत्ता उन मरीजों की तुलना में काफी बेहतर रही जिन्हें केवल सामान्य इलाज दिया गया.  कैसे की गई स्टडी? इस स्टडी में 18 से 80 वर्ष के उन मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें पिछले एक महीने के अंदर मिडियम लेवल का स्ट्रोक हुआ था.     200 से ज्यादा मरीजों की स्क्रीनिंग के बाद 40 मरीजों को चुना गया और फिर उन्हें दो ग्रुप में बांटा गया.      पहला ग्रुप सिर्फ स्टैंडर्ड मेडिकल ट्रीटमेंट और रिहैबिलिटेशन और दूसरा ग्रुप स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट और करीब दो हफ्तों तक हर दूसरे दिन 30 मिनट धूप में बैठना.      धूप की तीव्रता 10,000 से 25,000 लक्स के बीच रखी गई, जो हल्की आउटडोर डे-लाइट के बराबर होती है. सुरक्षा के लिए लक्स मीटर से लगातार निगरानी की गई.     तीन महीने तक मरीजों की शारीरिक क्षमता, मूड, नींद, रोजाना के काम करने की शक्ति और ओवरऑल वेल-बीइंग को देखा गया. स्टडी का नतीजा क्या हुआ? डॉक्टरों के मुताबिक, सनलाइट थेरेपी लेने वाले मरीजों में नींद की क्वालिटी  बेहतर हुई. नींद के साथ मूड और मानसिक स्थिति में सुधार देखा गया और खुद रोजाना के काम में आत्मनिर्भरता बढ़ी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि धूप शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को ठीक करती है, विटामिन D बढ़ाने में मदद करती है और सूजन को कम कर सकती है, जो स्ट्रोक रिकवरी में अहम रोल निभाते हैं.  भारतीयों के लिए क्यों है खास? भारत में स्ट्रोक रिकवरी एक लंबा और महंगा प्रोसेस माना जाता है, जिसकी वजह से कई बार लोग इसको अफोर्ड नहीं कर पाते हैं. कई मरीजों को लंबे समय तक फिजियोथेरेपी और देखभाल की जरूरत होती है, जो हर किसी के लिए पॉसिबल नहीं. ऐसे में 30 मिनट की धूप जैसी फ्री, सुरक्षित और आसानी से मौजूद थेरेपी खासतौर पर गांव के इलाकों और घर पर रिकवरी कर रहे मरीजों के लिए बेहद  उपयोगी हो सकती है. हालांकि स्टडी का सैंपल साइज छोटा था और यह एक ही सेंटर पर की गई, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर आगे बड़े लेवल पर इस पर रिसर्च होती है, तो सनलाइट थेरेपी पोस्ट-स्ट्रोक केयर का अहम हिस्सा बन सकती है. स्ट्रोक पर क्या कहते हैं ICMR के आंकड़े ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में भारत में करीब 12 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आए. इतना ही नहीं, लगभग 94 लाख लोग ऐसे थे जो स्ट्रोक के बाद इसके लंबे समय तक रहने वाले असर जैसे कमजोरी, बोलने में दिक्कत या याददाश्त की समस्या से जूझ रहे थे. ICMR के 2021 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्ट्रोक आज मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन चुका है. यह डिसेबिलिटी की छठी सबसे बड़ी वजह भी है, यानी बड़ी संख्या में लोग स्ट्रोक के बाद नॉर्मल जिंदगी नहीं जी पाते हैं. 2023 में लैंसेट जर्नल में पब्लिश एक स्टडी, जो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ की गई थी. उस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो साल 2050 तक कम और मिडियम इनकम वाले देशों में करीब 1 करोड़ लोगों की मौत स्ट्रोक की वजह से हो सकती है, और इस खतरे से भारत भी बाहर नहीं है. recent visitors 41

दुश्मन के लिए खौफनाक हथियार: राफेल से बड़ी डील, ब्रह्मास्त्र जो पानी में आग लगा सकता है

नई दिल्ली भारत और जर्मनी के बीच करीब 8 अरब डॉलर (लगभग 70,000 से 72,000 करोड़ रुपये) के प्रोजेक्ट-75(I) पनडुब्बी निर्माण समझौते पर मार्च के अंत तक हस्ताक्षर होने की संभावना है. यह सबमरीन डील अब तक का भारत का सबसे बड़ा रक्षा सौदा बन सकता है और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा. बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और सूत्रों के मुताबिक इसे हाल ही में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की जनवरी में भारत यात्रा के दौरान निर्णायक गति मिली. प्रोजेक्ट-75 इंडिया (P-75I) का उद्देश्य इंडियन नेवी के पुराने हो चुके पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को आधुनिक बनाना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा एवं डेटरेंस कैपेबिलिटी (प्रतिरोध की क्षमता) को मजबूत करना है. ऐसे समय में जब चीन और पाकिस्तान हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा रहे हैं, भारत के लिए अल्‍ट्रा मॉडर्न सबमरीन की तैनाती रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है. P-75I प्रोजेक्‍ट के तहत छह उन्नत पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन का निर्माण किया जाएगा. शॉर्टलिस्‍ट किए गए टाइप-214 नेक्स्ट जेनरेशन सबमरीन फ्यूल सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस होंगी, जिससे वे कई हफ्तों तक बिना सतह पर आए समुद्र के भीतर रह सकती हैं. इससे उनकी पहचान और ट्रैकिंग का जोखिम काफी कम हो जाता है और नौसेना की सीक्रेट ऑपरेशन क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है. चीन और पाकिस्‍तान ने खासतौर पर अरब सागर के साथ ही हिन्‍द महासागर क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को काफी बढ़ावा दिया है. इससे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पेश होने लगी हैं. यही वजह है कि भारत सबमरीन फ्लीट को अपग्रेड करने के साथ ही उसे बढ़ा भी रहा है. क्‍या है सबमरीन डील? oइस परियोजना में जर्मनी की थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ साझेदारी में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) देश में ही इन पनडुब्बियों का निर्माण करेगी. ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, रणनीतिक साझेदारी मॉडल के तहत 45 से 60 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण का लक्ष्य रखा गया है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूती मिलेगी. प्रस्तावित समझौते में पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी अहम टेक्‍नोलॉजिकल ट्रांसफर का भी प्रावधान होने की संभावना है, जो भारत की लॉन्‍ग टर्म रक्षा आत्मनिर्भरता के लिए अहम माना जा रहा है. भारतीय नौसेना के पास फिलहाल करीब एक दर्जन रूसी मूल की पनडुब्बियां और छह फ्रांसीसी निर्मित स्कॉर्पीन श्रेणी की आधुनिक पनडुब्बियां हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बदलते सामरिक हालात और क्षेत्रीय चुनौतियों के मद्देनजर भारत को अपनी पनडुब्बी क्षमता में और विस्तार की जरूरत है. इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अक्टूबर 2014 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने प्रोजेक्ट-75(I) के तहत 6 नई पनडुब्बियों की खरीद को मंजूरी दी थी, जबकि जुलाई 2021 में औपचारिक अनुरोध प्रस्ताव (RFP) जारी किया गया. राफेल फाइटर जेट से भी बड़ी डील यह प्रोजेक्‍ट केवल नेवी की युद्ध क्षमता को ही नहीं बढ़ाएगी, बल्कि देश के जहाज निर्माण और रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी बड़ा प्रोत्साहन देगी. इससे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए नए अवसर पैदा होंगे और पनडुब्बी प्रणालियों, स्पेयर पार्ट्स तथा उपकरणों के निर्माण से जुड़ा एक व्यापक औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित होगा. जर्मनी के साथ सबमरीन करार भारत के लिए अभी तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील साबित होगी. यह साल 2016 में की गई राफेल फाइटर जेट खरीद समझौते से भी बड़ा है. भारत ने फ्रांस से 36 राफेल फाइटर जेट ₹58000 में खरीदा था, जबकि जर्मनी के साथ सबमरीन डील ₹72000 करोड़ की है. नेवी के लिए 51 वॉरशिप सरकार हाल के वर्षों में भारतीय नौसेना के स्वदेशीकरण रोडमैप 2015–2030 को तेजी से लागू कर रही है. इसके तहत देश में 51 बड़े युद्धपोतों का निर्माण जारी है, जिनकी कुल लागत करीब 90,000 करोड़ रुपये है. वर्ष 2014 से अब तक भारतीय शिपयार्ड्स नौसेना को 40 से अधिक स्वदेशी युद्धपोत और पनडुब्बियां सौंप चुके हैं, और बीते एक वर्ष में औसतन हर 40 दिन में एक नया पोत नौसेना में शामिल हुआ है. विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत-जर्मनी के बीच होने वाला यह पनडुब्बी सौदा न केवल रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देगा, बल्कि भारत को क्षेत्रीय समुद्री शक्ति संतुलन में और अधिक सशक्त भूमिका निभाने में मदद करेगा. recent visitors 34

10 राज्य जो सबसे ज्यादा कर्ज़ में डूबे हैं, पंजाब से पश्चिम बंगाल तक की पूरी लिस्ट

नई दिल्ली भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) की रफ्तार तेज है और ये दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ती हुई इकोनॉमी में बना हुआ है. वर्ल्ड बैंक से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) तक ने इसका लोहा माना है. लेकिन तेजी से बढ़ते देश में, क्या आप जानते हैं कि कौन से राज्य सबसे ज्यादा कर्ज में डूबे हुए हैं? तो भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर नजर डाल लें, जिनसे पता चलता है कि कई बड़े राज्यों को कर्ज के बोझ तले दबकर अपने रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा इनके ब्याज के भुगतान में खर्च करना पड़ता है.  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के FY2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि कई बड़े राज्यों में कर्ज के ब्याज का भुगतान उसके अपने टैक्स और नॉन-टैक्स रेवेन्यू का 42% तक हिस्सा ले लेता है. इस तगड़े ब्याज भुगतान की वजह से इन राज्यों के पास सड़क, स्कूल, हेल्थ सर्विसेज और नए प्रोजेक्ट्स पर खर्च करने के लिए पैसों की कमी हो जाती है. कर्ज की मार झेल रहे भारत के 10 टॉप राज्यों के बारे में बात करें, तो… पश्चिम बंगाल वित्त वर्ष 2025 में पश्चिम बंगाल पर ब्याज भुगतान का बोझ अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा था. राज्य को टैक्स और नॉन टैक्स रेवेन्यू से 1.09 लाख करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन सिर्फ ब्याज भुगतान पर 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए. इसका मतलब हुआ कि उसके राजस्व का 42% हिस्सा तो ब्याज चुकाने में ही चला गया.  पंजाब-बिहार दूसरे पायदान पर पंजाब रहा, जिसने अर्जित रेवेन्यू का 34% हिस्सा ब्याज भुगतान करने में खर्च कर दिया. Punjab का राजस्व कलेक्शन 70,000 करोड़ रुपये था और इसने कर्ज के ब्याज भुगतान पर करीब 24,000 करोड़ रुपये खर्च किए. इसके बाद तीसरे नंबर पर Bihar का नाम आता है, जिसने 62,000 करोड़ रुपये के रेवेन्यू में से लगभग 21 हजार करोड़ रुपये का ब्याज भुगतान किया और ये इसका 33% रहा.  केरल-तमिलनाडु केरल द्वारा FY2025 में 1.03 लाख करोड़ रुपये का रेवेन्यू कलेक्शन किया गया था और इसका 28% या करीब 29,000 करोड़ रुपये तो ब्याज के पेमेंट में ही चला गया. पांचवे नंबर पर तमिलनाडु रहा, जिसने अपने कलेक्शन में से 62,000 करोड़ रुपये या 28% का ब्याज पेमेंट किया था. इसके टैक्स रेवेन्यू सबसे अधिक रहा, लेकिन कर्ज की मार से ये राज्य भी बेहाल रहा.  हरियाण-राजस्थान और आंध्र प्रदेश Top-10 कर्ज के तले दबे राज्यों में अगला नंबर हरियाणा का है और इसने 94,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने के बाद इसमें से 27% या करीब 25,000 करोड़ रुपये का ब्याज भुगतान किया. सातवें पायदान पर राजस्थान था और राज्य ने 1.48 लाख करोड़ रुपये के राजस्व में से 38,000 करोड़ रुपये का ब्याज चुकाया. इसके अलावा आंध्र प्रदेश ने 1.2 लाख करोड़ रुपये के राजस्व पर 29 हजार करोड़ रुपये ब्याज भरा था.  MP-कर्नाटक लिस्ट में नौवें स्थान पर मध्य प्रदेश शामिल हैं और इसका वित्त वर्ष 2025 में टैक्स और नॉन-टैक्स रेवेन्यू 1.23 लाख करोड़ रुपये रहा था, जिसमें से ब्याज के भुगतान पर 27,000 करोड़ रुपये या कुल कलेक्शन का करीब 22% खर्च हुआ. बात दसवें पायदान की करें, तो यहां पर कर्नाटक है, जिसका कलेक्शन 2.03 लाख करोड़ रुपये का था और ब्याज भुगतान 19% यानी 39,000 करोड़ रुपये रहा.  recent visitors 34