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लोगों के हाथों अपनी प्रसन्नता-अप्रसन्नता बेच नहीं देनी चाहिए। कोई प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हों और निंदा करने लगे तो दुखी हो चलें। यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूर्णतया अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर अपनी समीक्षा आप करने की हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। निंदा से दुःख लगता हो तो अपनी नजर में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित न होने दें। जिसकी निंदा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनाएं।

सच्ची प्रशंसा पाने का सही तरीका एक ही है की अपने को दिन-दिन सुधारते चले जाएं और भावना तथा क्रिया की दृष्टि से उस स्तर पर जा पहुंचे जिस पर पहुंचने में आत्मसंतोष प्राप्त होता है और आतंरिक उल्लास प्रस्फुटित होता है। अपनी दृष्टि में अपना प्रशंसित होना सारे संसार के मुंह से गाई जाने वाली प्रशंसा की अपेक्षा कहीं बेहतर है।

जीवन की यात्रा के दौरान यदि व्यक्ति को प्रशंसा मिलती है तो उसका अपने कार्य के प्रति उत्साह बढ़ जाता है और वे अधिक ऊर्जा से अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। निंदा जहां होती है, खुशी वहां से पलायन कर जाती है। जिनका स्वभाव है निंदा करना, वे किसी भी परिस्थिति में निंदा प्रवृत्ति का त्याग नहीं कर सकते हैं इसलिए समझदार इंसान वही है जो ऐसे लोगों द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों की उपेक्षा कर अपने काम में मस्त रहता है।

 

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