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कोंडागांव.

कोंडागांव जिला भौगोलिक दृष्टि से वर्षा आधारित एवं आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहाँ लंबे समय से धान एवं कुछ सीमित फसलों की खेती की जाती रही है, जिससे किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता, इस आशय कृषि विज्ञान केंद्र,कोंडागांव द्वारा कसावा फसल की खेती  व मूल्य संवर्धन पर रविवार को एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया गया जिसमें केशकाल  विकासखंड के अमोडा, डोंगइपारा,सलेभाट, सिंकागांव व चेरबेडा के 56 किसानों ने भाग लिया |

इस कार्यक्रम के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ.सुरेश कुमार मरकाम द्वारा किसानों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया, उन्होंने बताया कि कसावा एक ऐसी फसल है जो कम पानी, कम उर्वरक एवं सीमित संसाधनों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है तथा इससे खाद्य

उत्पाद,स्टार्च,टैपिओका,आटा,चिप्स एवं पशु आहार जैसे अनेक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं  उन्होंने कसावा फसल की आर्थिक उपयोगिता,मूल्य संवर्धन की संभावनाओं तथा इसके माध्यम से किसानों की आय को दोगुना करने की दिशा में विस्तार से जानकारी दी,जिससे किसानों को बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त हो सके ।  
इस अवसर पर ग्राम सरपंच श्रीमती चंद्रकला सरकार ने कसावा की खेती को ग्रामीण एवं आदिवासी किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया,वहीं जिला महिला मुक्ति मोर्चा की अध्यक्ष श्रीमती सोमा दास ने इसे महिला किसानों एवं स्वयं सहायता समूहों के लिए आजीविका का एक सशक्त साधन बताया।

इसके साथ ही केंद्र के भूपेन्द्र ठाकुर, शस्य वैज्ञानिक,  द्वारा कसावा की उन्नत किस्म ‘ जया’ के पोषण गुणों पर प्रकाश डाला , जो विटामिन-ए से भरपूर  किस्म है तथा अतिशीघ्र तैयार होने वाली फसल है, और विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या को कम करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। उन्होंने बताया कि इस किस्म के नियमित सेवन से बच्चों एवं महिलाओं में विटामिन-ए की कमी को दूर करने में मदद मिलती है, जिससे पोषण सुरक्षा को बल मिलता है तथा किसानों को फसल प्रबंधन, निराई-गुड़ाई एवं रोग नियंत्रण से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया। वहीं केंद्र की डॉ.प्रिया सिन्हा, फार्म मशीनरी वैज्ञानिक ने किसानों को कसावा की कटिंग लगाने की वैज्ञानिक तकनीक,उचित रोपण दूरी,भूमि की तैयारी तथा मशीनों के माध्यम से कसावा की खेती के आधुनिक तरीकों की जानकारी दी,जिससे श्रम लागत कम होती है और उत्पादन में वृद्धि संभव होती है।  

नवीन किस्म  के साथ नवाचार:  डॉ.सुरेश मरकाम,द्वारा राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन (NHM) के अंतर्गत लगभग 15 हेक्टेयर  क्षेत्र में किसानों के खेतों पर कसावा की खेती करवाई जा रही है,कसावा (Cassava/टैपिओका),जिसे स्थानीय भाषा में “आलू कांदा”   कहा जाता है,सामन्यत: खुले बाजार में उबालकर बेचीं जाने वाली फसल है,  इस परियोजना में किसानो को कसावा की कटिंग ,दवाई, जैविक खाद व मशीन (समूह में )वितरित किया जायेगा जिससे किसान इस नवाचार से  स्थायी रूप से जुड़ सके , सामान्यत: किसान स्थानीय किस्म का उपयोग करते है जिसमे उपज  कम होता है तथा उसका पोषक मान  भी कम होता है , किसानो को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान,तिरुवनंतपुरम (तिरुअनंतपुरम), केरल की  विकसित किस्म (  जया )  वितरित की जा रही है प्रति पौधा पैदावार भी अधिक होता है।

कम प्रतिस्पर्धी एवं अधिक लाभ वाली फसल आलू कांदा :- कार्यक्रम में विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ.हितेश मिश्रा द्वारा जिले में कृषि नवाचार को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया गया तथा जिले में कसावा की खेती को एक नवाचार के रूप में किसानों के खेतों में बढ़ावा दिया जा रहा है,जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों की आय में वृद्धि, फसल विविधीकरण, पोषण सुरक्षा तथा परंपरागत कृषि से हटकर कम प्रतिस्पर्धी एवं अधिक लाभ देने वाली फसलों को अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित करना है उन्होंने बताया कि कसावा जैसी फसलें बाजार में कम उपलब्ध होने के कारण अधिक मांग रखती हैं और किसानों को अन्य पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतर लाभ प्रदान कर सकती हैं।

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