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Geeta Press: Bitterness and animosity based on caste, gender is spreading in the society through religious books.

  • आरएसएस के सर संघ संचालक मोहन भागवत और गीता प्रेस को आईएएस राजा भैया ने लिखा पत्र
  • कटुता वाले अंश भाग को हिन्दू धर्म की पुस्तकों से हटाने की मांग

भोपाल। हिन्दू धर्म में समाज के सभी वर्गों के उत्थान की बात कही गई है, लेकिन कुछ चाणक्य बुद्धि वालों ने हिन्दू धर्म की आड़ में समाज में द्वेष भावना फैला रहे हैं। यही वजह है कि आज हिन्दू समाज में जमकर बिखराव है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। मीडिया में खबरें भी आये दिन सुर्खियां बनते हुए हम पढ़ और सुन रहे हैं। पुस्तकों के जरिये भी यह काम कुछ प्रकाशन बेधड़क और बेरोकटोक कर रहे हैं। इसमें गीता प्रेस की भूमिका सामने आ रही है।

गीता प्रेस ने हिन्दू धर्म की कुछ धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है। जिसके कुछ अंश भागो में वर्ण, जाति, लिंग आधारित व्याप्त कटुता एवं वैमनष्यता वाली बातें उल्लेखित हैं। जिससे समाज में भेदभाव की लकीर और लंबी हो रही है।

यह बात मप्र कैडर के रिटायर्ड आईएएस राजा भैया प्रजापति ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ संचालक मोहन भागवत-डा. हेडगेवार भवन, संघ बिल्डिंग, रोड, महल-नागपुर, महाराष्ट्र को भेजे पत्र में कही। उन्होंने यही पत्र गीता प्रेस-प्रबंध संचालक, गीता प्रेस, पी.ओ. गोरखपुर (उ.प्र.) को भी भेजा है। उन्होंने उक्त अंशों को हटाने तथा समाज में सामाजिक समरसता की भावना स्थापित करने की भी बात लिखी है। उन्होंने अपनी चिंता 5 बिंदुओं में व्यक्त की है।

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सामाजिक असमानता की खाई को पटना जरुरी

1. इस बात को सारा देश जानता है कि भारतवर्ष में हिन्दु समाज में वर्ण व्यवस्था तथा जाति व्यवस्था में व्याप्त असमानताओं के कारण एकता न होने से देश लंबे समय तक गुलाम रहा। सामाजिक असमानता तथा विषमताओं के कारण ही वर्तमान में सोशल मीडिया, समाचार पत्रों तथा समाचार चैनल्स में जातीय विद्वेष के बड़े-बड़े उदाहरण देखने को मिलते है। इस वर्ण व्यवस्था में महिलाओं को सम्मिलित मानते हुए करीब 95% प्रतिशत आबादी हिन्दु वर्णव्यवस्था में जातीय / वर्णनीय असमानता का शिकार है। शिक्षा के प्रचार – प्रसार से काफी हद तक सुधार भी परिलक्षित हुआ है, लेकिन अभी बहुत बड़े सुधार की आवश्यकता है।

2. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपना शताब्दी वर्ष मनाते हुए विज्ञान भवन, नई दिल्ली तथा नागपुर में कार्यक्रम करते हुए समाज में सामाजिक एकता के रूप में किये गये कार्यों का बखान किया है। फिर भी सामाजिक असमानता एवं विषमता अभी बरकरार है। अब समय आ गया है कि समय रहते सभी प्रकार की विषमताओं को खत्म करने के लिये भारत के सभी लोगों में समरसता तथा समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़िया सामाजिक समरसता के साथ जी सकें।

3. देश में दो प्रकार का आरक्षण वर्तमान में लागू है। एक तो धर्म आधारित (जाति/वर्ण) व्यवस्था के तहत लगभग 5 हजार वर्ष से लागू आरक्षण जो कि एक सामाजिक प्रभुत्व के रूप में है। दूसरा विधि/कानून द्वारा स्थापित 75 वर्ष वाला एवं 35 साल वाला राजनैतिक / सरकारी नौकरियों मे आरक्षण। भविष्य मे धीरे-धीरे यह सब समाप्त हों उसके लिये यह जरूरी है कि पहले सामाजिक प्रभुत्त्व के रूप में बरकरार आरक्षण को समाप्त करते हुए कानून द्वारा स्थापित आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त किया जाए, लेकिन सबको समानता बरकरार करने के उपरान्त ।

4. देश का सफल संचालन विधि द्वारा स्थापित कानूनों भर से नहीं होता है, बल्कि देश में व्याप्त परम्पराओ, रूढ़ियों एवं धर्म आधारित स्थापित मापदण्डो से भी होता है। वहीं धर्म आधारित जाति एवं वर्ण व्यवस्था एवं महिला असमानता के कारण व्यापक सुधार की जरूरत है। जिन धार्मिक पुस्तकों में वर्ण, जाति एवं लिंग के संबंध मे कटुता / वैमनष्यता के अंश निहित है उन अंशो को हटाने की नितान्त आवश्यकता है।

5. आशा है कि आप सामाजिक एकता स्थापित करने की कड़ी में समस्त वर्गों के सन्त, महात्माओं तथा समाज सुधारकों से समन्वय कराकर सामाजिक समरसता कायम कराएंगे। साथ ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ संचालक के पद पर सभी वर्गो को क्रमशः प्रतिनिधित्व (नेतृत्व) दिलवायेंगे।

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