जबलपुर में 150 करोड़ रुपये का कैंसर इंस्टीट्यूट, मशीन और सुविधाएं लापता, लोगों का बेहतर इलाज का सपना अधूरा

Jabalpur’s ₹150-crore cancer institute, missing machinery and facilities, leaves people’s dreams of better treatment unfulfilled.

विशेष संवाददाता: जितेन्द्र श्रीवास्तव/अर्पिता श्रीवास्तव 

जबलपुर। कैंसर से जंग में हर दिन और हर घंटा अहम होता है, लेकिन नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (एससीआई) में इलाज की आस लेकर पहुंच रहे मरीजों के सामने इंतजार और संसाधनों की कमी बड़ी चुनौती बन गई है।

साल 2023 में करीब 150 करोड़ रुपए की लागत से शुरू हुए इस संस्थान से उम्मीद थी कि शहर समेत आसपास के आठ जिलों के मरीजों को कैंसर का समुचित इलाज यहीं मिल सकेगा। तीन साल से अधिक समय गुजरने के बाद भी संस्थान पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा।

लीनियर एक्सीलेटर मशीन का इंतजार

रेडिएशन के लिए जरूरी लीनियर एक्सीलरेटर मशीन का इंतजार है। विशेषज्ञ डॉक्टरों के स्वीकृत पदों के मुकाबले महज चार आन्कोलाजिस्ट पदस्थ हैं, जबकि आठ डाक्टरों की तत्काल जरूरत बताई जा रही है। नर्सिंग स्टाफ भी करीब 40 प्रतिशत कम है। कीमो वार्ड में एक नर्स पर 15 मरीजों की जिम्मेदारी है।

इतना ही नहीं, जरूरी कीमो दवाएं भी 15 से 20 दिन तक स्टाक से बाहर हो जाती हैं। पिछले साल 6400 मरीजों ने यहां पंजीयन कराया, लेकिन सिर्फ 2100 को पूरा इलाज मिल सका। बाकी 4300 मरीजों को दूसरे शहरों या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ा।

आन्को सर्जरी उपकरणों की जरूरत

संस्थान के लिए लीनियर एक्सीलरेटर के अलावा फ्लो साइटोमीटर, सीटी सिम्युलेटर, क्यूए टूल्स, मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड और आन्को सर्जरी उपकरणों की जरूरत है। इनकी खरीदी के लिए कई बार टेंडर प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन तीन बार टेंडर निरस्त होने और प्रशासनिक स्तर पर लगातार हुए बदलावों के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

12 विभागों में सिर्फ चार आन्कोलाजिस्ट

एससीआई के पास चार आन्कोलाजिस्ट सहित सात से आठ विशेषज्ञ हैं, जबकि जरूरत 16 की है। नर्सिंग स्टाफ की संख्या भी बेहद सीमित है, मेडिकल कॉलेज के स्टाफ से अधिकांश काम एससीआई का चल रहा है।

लीनियर एक्सीलरेटर का हो रहा इंतजार

मेडिकल कॉलेज प्रशासन की मानें तो इस साल दिसंबर तक लीनियर एक्सीलरेटर मिल जाएगी। प्रस्तावित करीब 42 करोड़ रुपए से यह मशीन जर्मनी से आएगी, बजट को विभाग की हरी झंडी मिल चुकी है। लेकिन तब तक मरीजों का इंतजार जारी रहेगा। महत्वपूर्ण है कि एससीआई की घोषणा 2014-15 में हुई थी।

भवन तीन साल में बनकर तैयार होना था, लेकिन 2020-21 तक कार्य चलता रहा। बाद में शुरूआत 2023 में हुई भी तो आधी-अधूरे संसाधनों के साथ। अब आलम यह है कि अनेक जांच मशीनों के अभाव में एक ही छत के नीचे सारा इलाज नहीं हो पा रहा है।

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