WWF की रिपोर्ट: भारतीय जिस तरीके से खाते हैं, वो धरती के लिए सबसे अच्छा आहार

नई दिल्ली वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट के अनुसार, भारत के फूड कंजप्शन पैटर्न को G20 अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक टिकाऊ माना गया है. रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अगर ग्लोबल फूड कंजप्शन भारत के समान हो जाए, तो 2050 तक जलवायु प्रभाव काफी कम हो जाएगा. वहीं, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका टिकाऊ उपभोग के मामले में सबसे खराब स्थान पर हैं. उसके बाद ऑस्ट्रेलिया (6.8), यूएसए (5.5), ब्राजील (5.2), फ्रांस (5), इटली (4.6), कनाडा (4.5) और यूके (3.9) का स्थान है। बेहतर देशों में इंडोनेशिया (0.9) भारत (0.84) के बाद आता है और चीन (1.7), जापान (1.8) और सऊदी अरब (2) से आगे है. भारत का सस्टेनेबल कंजप्शन पैटर्न WWF की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर दुनिया में हर कोई 2050 तक दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मौजूदा खाद्य कंजप्शन पैटर्न को अपना ले, तो हम खाद्य-संबंधित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस जलवायु लक्ष्य को 263 फीसदी तक पार कर जाएंगे और हमें सहारा देने के लिए एक से सात पृथ्वी की आवश्यकता होगी. भारत का बाजरा-केंद्रित खाना एक अपवाद के रूप में सामने आता है, जिसमें देश को स्थिरता के लिए एक मॉडल के रूप में स्थापित किया गया है. अगर सभी देश भारत के कंजप्शन मॉडल को देखें, तो रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि फूड प्रोडक्शन को बनाए रखने के लिए 2050 तक एक पृथ्वी (0.84) से भी कम की आवश्यकता होगी. यह भोजन के लिए ग्रहीय जलवायु सीमा से बेहतर है, यह सुझाव देता है कि भारत की फूड सिस्टम ग्लोबल तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रख सकती है. recent visitors 132

महाकुंभ-2025: श्री आदि शंकर विमान मंडपम् मंदिर श्रद्धालुओं के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र होगा

प्रयागराज महाकुंभ-2025 में संगम किनारे बना दक्षिण भारतीय शैली का श्री आदि शंकर विमान मंडपम् मंदिर श्रद्धालुओं के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र होगा। स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूर्व मंदिर में विग्रहों के दर्शनों के लिए आ चुके हैं। महाकुंभ के लिए योगी सरकार मंदिर के आसपास विकास कार्य करा रही है। मंदिर की आभा ऐसी है कि वो श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच लेती है। मंदिर के प्रबंधक रमणी शास्त्री के अनुसार कांचिकामकोटि के 69वें पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती ने अपने गुरु चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती की इच्छापूर्ति के लिए श्री आदि शंकर विमान मंडपम् का निर्माण कराया। गुरु चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ने वर्ष 1934 में प्रयाग में चातुर्मास किया था। उन दिनों वो दारागंज के आश्रम में रुके थे। प्रतिदिन पैदल संगम स्नान को आते थे। उस दौरान बांध के पास उन्हें दो पीपल के वृक्षों के बीच खाली स्थान नजर आया। गुरु चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ने धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया और स्वयं के तपोबल से यह साबित किया कि इसी स्थान पर आदि शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट के बीच संवाद हुआ था। बाद में यहीं पर कुमारिल भट्ट ने तुषाग्नि में आत्मदाह किया था। रमणी शास्त्री ने बताया कि इसी स्थान पर गुरु चंद्रशेखरेंद्र ने मंदिर बनाने की इच्छा व्यक्त की थी, जिसे शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती ने पूर्ण किया। 17 वर्ष लगे मंदिर निर्माण में श्री आदि शंकर विमान मंडपम् की नींव वर्ष 1969 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल बी. गोपाल रेड्डी ने रखी थी। तब इंजीनियर बी. सोमो सुंदरम् और सी.एस. रामचंद्र ने मंदिर का नक्शा तैयार किया था। मंदिर प्रबंधन के साथ उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम ने भी निर्माण में सहयोग दिया था। जिन 16 पिलर्स पर मंदिर टिका है, उनका निर्माण उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम के तत्कालीन असिस्टेंट इंजीनियर कृष्ण मुरारी दुबे की देख-रेख में कराया गया था। 17 मार्च 1986 को मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। श्री आदि शंकर विमान मंडपम् में विग्रह और निर्माण में प्रयोग किए गए पत्थर दक्षिण भारत से लाए गए हैं। मंदिर द्रविड़ियन आर्किटेक्चर का नायाब उदाहरण है। 130 फीट ऊंचा है मंदिर 130 फीट ऊंचे इस मंदिर में श्री आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित की गई है। देवी कामाक्षी और 51 शक्तिपीठ के अलावा तिरुपति बालाजी और सहस्र योग लिंग के साथ 108 शिवलिंग मंदिर में स्थापित हैं। गणेश जी का मंदिर भी है। मंदिर प्रातः 6 बजे से दोपहर 1 बजे और सायं 4 से रात्रि 8 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। मंदिर के ऊपरी तलों से संगम का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। इन दिनों भी श्री आदि शंकर विमान मंडपम् में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते हैं। महाकुंभ के दौरान लाखों श्रद्धालु श्री आदि शंकर विमान मंडपम् में आएंगे और विग्रहों के दर्शन करेंगे।   recent visitors 211

रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव : 13 नवंबर को होगा मतदान, मतदान सेक्टरों की संख्या 19 से बढ़ाकर की 38

रायपुर रायपुर दक्षिण विधानसभा में उपचुनाव को लेकर चुनाव आयोग ने तैयारियों को तेज कर दिया है। 13 नवंबर को होने वाले मतदान के लिए इस बार सेक्टरों की संख्या को 19 से बढ़ाकर 38 कर दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को सुगम बनाना और किसी भी आपात स्थिति में त्वरित सहायता पहुंचाना है। इस निर्णय से मतदान की गति बनाए रखने और मतदाताओं को अधिक सुविधाएं प्रदान करने की उम्मीद है। सेक्टरों की संख्या बढ़ाने का कारण लोकसभा चुनाव के दौरान रायपुर दक्षिण में 19 सेक्टर बनाकर चुनाव संपन्न करवाया गया था। हालांकि, इस बार उपचुनाव में मतदाताओं को बेहतर सेवाएं देने और चुनाव प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए सेक्टरों की संख्या दोगुनी कर दी गई है। इससे सेक्टर अधिकारियों और मतदान केंद्रों के बीच की दूरी कम होगी, जिससे किसी भी आपात स्थिति में त्वरित सहायता पहुंचाना संभव हो सकेगा। आपात स्थिति में होगी त्वरित सहायता सेक्टरों की संख्या बढ़ाने से आपात स्थिति में त्वरित सहायता पहुंचाना आसान होगा। चाहे कानून व्यवस्था की स्थिति को मेंटेन करना हो या किसी प्रकार की मेडिकल इमरजेंसी, सहायता की पहुंच तेज और सुगम होगी। मतदान केंद्रों और सेक्टर कार्यालयों के बीच दूरी कम होने से चुनाव प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी और सुव्यवस्थित हो जाएगी। वहीं, ला एंड आर्डर की स्थिति बनने या फिर आपात स्थिति बनने पर त्वरित रूप से यहां सहायता उपलब्ध करवाई जा सकेगी। पूर्व में हुई बैठक के दौरान इस पर निर्णय लिया गया और कलेक्टर डॉ गौरव सिंह ने आदेश जारी किया, ताकि मतदान के दौरान किसी भी प्रकार की परेशानियों को रोका जा सके। आयोग का बढ़ेगा खर्च, बढ़ेगी कर्मचारियों की संख्या एक सेक्टर में सेक्टर अधिकारी के अलावा एक ड्राइवर रखा जाता है। वहीं, एक दल बनाया जाता है, जिसमें मेडिकल टीम, सुरक्षा गार्ड, एक अन्य कर्मचारी रहते हैं और एक पीठासीन अधिकारी रहते हैं। ऐसे में सेक्टराें की संख्या बढ़ाने से कर्मचारियों की संख्या दोगुनी होगी और आयोग का खर्च भी गाड़ियों अन्य मदों में बढ़ेगा। इस तरह की होंगी सुविधाएं – मतदान सटीक मॉनिटरिंग व रिपोर्टिंग – ला एंड आर्डर मेंटेन करने में सहूलियत – मतदान केंद्रों की सेक्टरों से दूरी घटेगी – मशीन खराब होने पर तुरंत बदला जा सकेगा – मतदान की गति नहीं थमेगी – मेडिकल टीम व सुरक्षा बल भी बढ़ेंगे recent visitors 95

चीन में लगातार जन्म दर कम हो रही कमी, जानें भारत समेत दूसरे देशों का क्या है हाल

नईदिल्ली चीन में पिछले कुछ सालों में जन्म दर में भारी गिरावट आई है, जिसके चलते चीन में बच्चों के स्कूल माने जाने वाले कई किंडर गार्डन बंद कर दिए गए हैं. ये स्थिति सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि कई देशों के लिए चिंता का विषय है. जहां घटती जन्म को बढ़ाने के लिए सरकार लगातार कई प्रयास कर रही है. ऐसे में चलिए जानते हैं कि आखिर भारत का जन्म दर के मामले में क्या हाल है. चीन में क्यों घट रही जन्म दर? चीन में दशकों तक चली एक-संतान नीति के कारण लोगों में एक बच्चे को जन्म देने की मानसिकता बन गई. जी हां, एक समय ऐसा था जब चीन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन गया था. जिसके चलते चीन ने दो बच्चे पैदा करने पर रोक लगा दी थी. ऐसे में अब लोग एक ही बच्चे को जन्म देते हैं और उसका पालन पोषण करते हैं. इसके अलावा शहरीकरण के कारण लोगों की जीवनशैली में बदलाव आया है. करियर और जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है. वहीं महिलाएं अब शिक्षित और स्वतंत्र हैं. वो करियर बनाने और परिवार नियोजन के फैसले स्वयं ले रही हैं. साथ ही बच्चों की परवरिश में आने वाली लागत लगातार बढ़ रही है. इसके अलावा चीन की आबादी भी तेजी से बूढ़ी हो रही है. चीन में गिरती जन्मदर के क्या हैं प्रभाव? अब सवाल ये उठता है कि चीन अपनी घटती जनसंख्या से परेशान क्यों हो रहा है? तो बता दें कि कम जन्मदर से श्रम शक्ति कम होगी, जो आर्थिक विकास को प्रभावित करेगी. इसके अलावा बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से सामाजिक सुरक्षा प्रणाली पर दबाव बढ़ेगा. साथ ही कम युवाओं के कारण सैन्य शक्ति कमजोर हो सकती है. भारत में जन्म दर की क्या है स्थिति? भारत में भी पिछले समय के मुकाबले जन्म दर घटी है. अब हमारे देश में दंपत्ति एक या दो बच्चों को ही जन्म देने पर जोर दे रहे हैं. हालांकि चीन के मुकाबले भारत में ये समस्या फिलहाल कम है. वहीं कई ऐसे देश हैं जहां घटती जन्म दर एक बड़ी समस्या है. बता दें जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों में भी जन्मदर में गिरावट देखी जा रही है. जिसके लिए सरकार को आगे आकर जन्म दर को बढ़ाने के प्रयास करने पड़ रहे हैं. जी हां, इन देशों में सरकार बच्चे पैदा करने के लिए तरह-तरह के ऑफर देकर लोगों को आकर्षित कर रही है. recent visitors 215

रूस ने शुरू कर दी न्यूक्लियर हमले की प्रैक्टिस, ऐक्शन से थर्राई दुनिया

मॉस्को बीते दो साल से भी ज्यादा वक्त से रूस-यूक्रेन मोर्चे पर हैं। रूस इस बात पर आमादा है कि वह यूक्रेन को तबाह करके ही मानेगा, वहीं यूक्रेन है कि रूस के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं है। अब यह युद्ध सबसे कठिन दौर में प्रवेश कर गया है क्योंकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने परमाणु बलों को विशेष अभ्यास शुरू करने का आदेश दिया। यह दो हफ्तों में दूसरी बार है जब पुतिन ने ऐसा सैन्य अभ्यास शुरू किया है। पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली नाटो गठबंधन अब भी इस बढ़ते तनाव से निपटने के तरीकों को लेकर अनिश्चित हैं। तनाव तब और बढ़ा जब अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने यूक्रेन को लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें उपलब्ध कराने की योजना बनाई ताकि वह रूस के अंदर गहरे क्षेत्र तक निशाना बना सके। रूस ने पश्चिम को साफ तौर पर चेतावनी दी है कि अगर यूक्रेन ने पश्चिमी समर्थन के साथ इस तरह का कदम उठाया, तो वह अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने पर विचार करेगा। क्रेमलिन ने अपनी परमाणु नीति को अपडेट किया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि पुतिन की स्वीकृति से यह नीति गैर-परमाणु देशों के खिलाफ भी लागू हो सकती है। परमाणु अभ्यास की शुरुआत करते हुए पुतिन ने कहा, "हम परमाणु हथियारों के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए अधिकारियों की कार्रवाई का अभ्यास करेंगे और इसके अंतर्गत बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का जरूरी इस्तेमाल करेगा।" उन्होंने यह भी कहा कि परमाणु हथियारों का उपयोग अत्यंत असाधारण स्थिति में ही किया जाएगा, लेकिन इन्हें हमेशा तत्परता में रखना आवश्यक है। पुतिन ने यह भी स्पष्ट किया, "हम एक नई हथियार दौड़ में शामिल नहीं होना चाहते, लेकिन हम अपनी परमाणु ताकत को उचित स्तर पर बनाए रखेंगे।" नाटो ने रूस पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसमें उत्तर कोरिया द्वारा रूस को यूक्रेन में लड़ने के लिए सैनिक भेजने का मुद्दा शामिल है। पेंटागन ने कहा है कि उत्तर कोरिया ने रूस को कम से कम 10,000 सैनिक भेजे हैं, जबकि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की का दावा है कि यह संख्या 12,000 से अधिक हो सकती है। पेंटागन की डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी सबरीना सिंह ने कहा, "हमें विश्वास है कि डीपीआरके ने कुल मिलाकर लगभग 10,000 सैनिक रूस के पूर्वी क्षेत्र में प्रशिक्षण के लिए भेजे हैं। इनमें से कुछ सैनिक यूक्रेन के करीब पहुंच गए हैं और हमें चिंता है कि रूस इन सैनिकों का उपयोग यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में करेगा।" पुतिन ने अपने देश की रक्षा के मुद्दे पर स्पष्ट करते हुए कहा कि यह केवल रूस का आंतरिक मामला है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर यूक्रेन नाटो में शामिल होने का निर्णय लेता है, तो रूस भी अपनी सुरक्षा को लेकर जो जरूरी होगा, वह करेगा। रूसी सेना ने अपने हालिया अभ्यास के दौरान टीवर क्षेत्र में भी प्रशिक्षण किया, जो मास्को के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इस अभ्यास में यार्स इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) जैसे उपकरणों का भी इस्तेमाल किया गया, जो अमेरिका के हर कोने तक प्रहार करने में सक्षम हैं। रूस और अमेरिका दुनिया के कुल परमाणु हथियारों के 88% का नियंत्रण रखते हैं। पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पहले भी यह चेतावनी दी थी कि यदि रूस और नाटो में सीधा टकराव हुआ, तो यह तीसरे विश्व युद्ध का कारण बन सकता है। रिपब्लिकन राष्ट्रपति उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने भी परमाणु युद्ध के जोखिम को लेकर चेतावनी दी है। पुतिन ने कहा, "बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों और नए बाहरी खतरों के बीच, हमारे पास तैयार और आधुनिक रणनीतिक बलों का होना महत्वपूर्ण है।" उन्होंने बताया कि रूस नए स्थिर और मोबाइल-आधारित मिसाइल सिस्टम की ओर बढ़ रहा है, जिनमें प्रक्षेपण की तैयारी का समय कम है और ये मिसाइल डिफेंस सिस्टम को भी मात दे सकते हैं। वहीं पेंटागन ने स्पष्ट किया है कि अगर उत्तर कोरिया रूस का समर्थन करने के लिए सैनिक भेजता है, तो अमेरिका यूक्रेन के हथियारों के उपयोग पर कोई नई सीमाएं नहीं लगाएगा। recent visitors 88

योगी सरकार की नई योजना से होगी 8 लाख की कमाई, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूटूबर को फायदा

लखनऊ उत्तर प्रदेश सरकार ने डिजिटल दुनिया में रोजगार के नए दरवाजे खोलते हुए एक नई सोशल मीडिया पॉलिसी की घोषणा की है। इसके तहत सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स अब राज्य की कल्याणकारी योजनाओं और अन्य पहल का प्रचार करके हर महीने 8 लाख रुपये तक कमा सकते हैं। यह पॉलिसी राज्य के युवाओं और डिजिटल क्रिएटर्स के लिए रोजगार के अवसर पैदा करेगी। इसी के साथ-साथ सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाने में मदद करेगी। इस पॉलिसी में क्या है खास? दरअसल, यूपी सरकार ने एक नई सोशल मीडिया पॉलिसी की घोषणा की है। इस पॉलिसी का मकसद न केवल सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना है, बल्कि राज्य के युवाओं और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को एक मौका देना है, जिसके तहत वे सरकारी योजनाओं और पहल को प्रमोट करके हर महीने लाखों रुपये कमा सकते हैं। यह पॉलिसी फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लागू होगी, जिससे डिजिटल दुनिया में रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। इंफ्लुएंसर्स के लिए सुनहरा मौका इस पॉलिसी के तहत सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करने के लिए पैसे मिलेंगे। खास बात यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इंफ्लुएंसर्स के फॉलोअर्स और सब्सक्राइबर्स के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया है, जिसके अनुसार उनकी अधिकतम कमाई तय की गई है। एक्स (ट्विटर), फेसबुक, इंस्टाग्राम – अधिकतम भुगतान: ₹5 लाख प्रति माह (X) – अधिकतम भुगतान: ₹4 लाख प्रति माह (फेसबुक) – अधिकतम भुगतान: ₹3 लाख प्रति माह (इंस्टाग्राम) – अधिकतम भुगतान: ₹2 लाख प्रति माह (कम फॉलोअर्स के लिए) यूट्यूब – अधिकतम भुगतान: ₹8 लाख प्रति माह (वीडियो, शॉर्ट्स, और पॉडकास्ट के लिए) – अन्य श्रेणियों में ₹7 लाख, ₹6 लाख और ₹4 लाख प्रति माह तक की कमाई हो सकती है। इंफ्लुएंसर्स को सरकारी योजनाओं के वीडियो, ट्वीट्स, पोस्ट्स और रील्स को सोशल मीडिया पर शेयर करना होगा, जिसे ‘V-Form’ नामक एक डिजिटल एजेंसी संभालेगी। यह एजेंसी इस पूरी प्रक्रिया को मैनेज करेगी, जिससे इंफ्लुएंसर्स को सीधे भुगतान मिलेगा। कैसे बन सकते हैं इसका हिस्सा? अगर आप एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर हैं और इस पॉलिसी का लाभ उठाना चाहते हैं, तो आपको इन बातों का ध्यान रखना होगा। सोशल मीडिया अकाउंट्स की श्रेणीः आपको पहले यह तय करना होगा कि आपके फॉलोअर्स या सब्सक्राइबर्स की संख्या किस कैटेगरी में आती है। एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब के लिए अलग-अलग कैटेगरी बनाई गई हैं, जिसके आधार पर आपकी कमाई तय होगी। रजिस्ट्रेशन: इस स्कीम का हिस्सा बनने के लिए आपको सरकार द्वारा नामित एजेंसी ‘V-Form’ के माध्यम से रजिस्टर करना होगा। इसके लिए आपको अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी, फॉलोअर्स की संख्या और कंटेंट के नेचर को सबमिट करना होगा। कॉन्टेंट की अपलोडिंगः रजिस्ट्रेशन के बाद आपको सरकारी योजनाओं से जुड़े वीडियो, पोस्ट्स, रील्स या पॉडकास्ट को अपने प्लेटफार्म पर अपलोड करना होगा। इन पोस्ट्स के माध्यम से सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनकी लाभकारी पहल को जनता के सामने लाना होगा। अधिकतम कमाई: जैसे-जैसे आपके फॉलोअर्स और सब्सक्राइबर्स बढ़ेंगे, वैसे-वैसे आपकी कैटेगरी भी बढ़ेगी, जिससे आप हर महीने 8 लाख रुपये तक कमा सकते हैं। यूट्यूब पर कंटेंट क्रिएटर्स के लिए यह विशेष रूप से फायदेमंद हो सकता है, जहां वीडियो, शॉर्ट्स और पॉडकास्ट के माध्यम से उन्हें सबसे अधिक कमाई का मौका मिलेगा। सिस्टम से जुड़े लोगों का मानना है कि यह पॉलिसी केवल सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को ही नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों को लाभान्वित करने वाली है। इसके माध्यम से सरकारी योजनाओं को तेजी से और प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाया जा सकेगा। खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां लोगों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी कम पहुंच पाती है, इस पॉलिसी के जरिए उन्हें सरकारी लाभों के बारे में पता चलेगा। फर्जी खबरों पर भी लग सकेगी रोक! इस पॉलिसी का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह सोशल मीडिया पर फैलने वाली फर्जी और भ्रामक खबरों पर भी अंकुश लगाएगी। इसके तहत सरकार ने नियम बनाए हैं, जिसमें किसी भी प्रकार के आपत्तिजनक, राष्ट्र-विरोधी या समाज-विरोधी कंटेंट पोस्ट करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। फर्जी खबरों, नफरत फैलाने वाले संदेशों और समाज को भड़काने वाले कंटेंट पर सरकार की नजर रहेगी और उचित जरूरी उठाए जाएंगे। recent visitors 135

पराली जलाने पर SC सख्त, पराली जलाने पर CQM से मांगा जवाब

लुधियाना बीते 24 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पराली जलाने के मुद्दे पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) से जवाब तलब किया कि पराली जलाना फिर से क्यों शुरू हो गया? सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि ‘सीएक्यूएम एक्ट की धारा-14 के तहत जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कदम उठाया गया है।’ अदालत ने पंजाब और हरियाणा की सरकारों को भी फटकार लगाते हुए कहा कि दोनों राज्यों ने पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की है। दरअसल, सीएक्यूएम की धारा के तहत पराली जलाने पर अधिकारियों, कर्मचारियों को सजा का भी प्रावधान है। सवाल है कि क्या अकारण सर्वोच्च न्यायालय को पराली जलाने पर एक जिम्मेदार संस्थान को फटकार लगानी पड़ी! पंजाब में पराली जलाने के मामले आठ से 93 तक पहुंच गए क्या सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद पराली प्रबंधन विफल हो चुका है? क्या कृषक जन-मन अब भी पूरी तरह से पराली प्रबंधन पर पुरानी परिपाटी से चल रहा है? जाहिर है, कुछ न कुछ कुप्रबंधित जरूर है। सितंबर माह के आंकड़ों के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पराली जलाने के कुल 75 मामले उजागर हो चुके हैं। हैरत की बात है कि 15-25 सितंबर के बीच पिछले वर्ष की तुलना में हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं पांच से ग्यारह फीसद तक बढ़ी हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष इसी अवधि में जहां हरियाणा में पराली जलाने के तेरह मामले पाए गए थे, इस बार बढ़ कर 70 हो गए। इसी तरह पंजाब में पराली जलाने के मामले आठ से 93 तक पहुंच गए। हरियाणा में करनाल, कुरुक्षेत्र और यमुनानगर सर्वाधिक प्रभावित जनपद हैं। वहां कुल 70 मामलों में 31 मामले पाए गए। इसी तरह पंजाब के कुल 93 मामलों में से 58 मामले तरनातरन, गुरुदासपुर और अमृतसर में पाए गए। अनवरत पराली दहन से बिगड़ती आबोहवा का खमियाजा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को भुगतना पड़ता है। सर्दियों के शुरुआती दौर में ही दम घुटने-सा लगता है। अभी बीते 24 सितंबर तक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता सूचकांक 203 तक दर्ज किया गया। ऐसे हालात में सुप्रीम की फटकार स्वाभाविक है। पराली जलाने पर निगरानी के लिए हर वर्ष निगाह रखी जाती है ऐसा नहीं कि सरकार ने विगत वर्षों में पराली दहन को लेकर कुछ नहीं किया। पर शासन, प्रशासन, सरकारी संस्थाओं और पराली जलाने वाले किसानों के बीच संबंध में जरूर कुछ कमी रह जाती है। पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट के हवाले से केंद्र सरकार ने सूबे की सरकारों को पराली जलाने के दोषी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ न देने का सख्त निर्देश दिया है। पराली जलाने पर निगरानी के लिए हर वर्ष 15 सितंबर तक ‘कंसोर्टियम फार रिसर्च आन एग्रो इकोसिस्टम मानिटरिंग ऐंड माडलिंग फ्राम स्पेस’ (क्रीम्स) द्वारा सेटेलाइट से निगाह रखी जाती है। इससे ‘गूगल लोकेशन’ के साथ पराली जलाने का पता लग जाता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पराली जलाने पर दो एकड़ से कम क्षेत्र के लिए ढाई हजार रुपए, दो से पांच एकड़ क्षेत्र के लिए पांच हजार रुपए और पांच एकड़ से अधिक क्षेत्र के लिए पंद्रह हजार रुपए तक अर्थदंड का प्रावधान किया है। दुबारा पराली जलाने पर संबंधित किसान के खिलाफ कारावास और अर्थदंड का भी प्रावधान है। इसी तरह धान काटने के यंत्र कंबाइन हार्वेस्टर में ‘स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम’ (एसएमएस) अनिवार्य कर दिया गया है। बिना एसएमएस वाले कंबाइन के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। विगत वर्षों में विभिन्न सूबों में हजारों किसानों के विरुद्ध पराली जलाने पर एफआइआर भी दर्ज कराई गई है। पराली जलाने से मृदा में मौजूद अनेक लाभदायक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक एक टन पराली जलने से मृदा में मौजूद 5.5 किलो ग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलो ग्राम फास्फोरस, 25 किलो ग्राम पोटैशियम, 1.2 किलो ग्राम सल्फर समेत अन्य उपयोगी पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान की रपट के मुताबिक उत्तर भारत के राज्यों में पराली जलाने के कारण तकरीबन दो लाख करोड़ रुपए की आर्थिक हानि होती है। एक अन्य जानकारी के मुताबिक दिल्ली में पराली प्रदूषण की वजह से ‘एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन’ (एआरआइ) ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले बच्चों और बुजुर्गों में ज्यादा होता है। प्रदूषण का स्तर उच्च होने के कारण दिल्ली वासियों की जीवन प्रत्याशा में लगभग साढ़े छह साल की कमी आई है। पराली जलने से कार्बन मोनो आक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड, मीथेन, पाली सायक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इन प्रदूषकों के प्रसार से ‘स्माग’ का एक मोटा आवरण निर्मित होता है, जिससे ब्रोंकाइटिस, तंत्रिका और हृदय संबंधी, यहां तक कि कैंसर जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इस समस्या का समाधान केवल सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं किया जा सकता है। इसके लिए किसानों को जागरूक बनाना होगा। किसान कम अवधि वाली धान की प्रजातियां लगाएं, जिससे पराली जलाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, और अगली फसल के लिए पराली विघटन को पर्याप्त समय मिल जाए। पिछले वर्ष हरियाणा सरकार ने धान की सीधी बिजाई के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया था, जिससे 30 सितंबर तक वहां की मंडियों में आठ लाख टन धान बिकने आया था। इससे इतर, धान की कम अवधि वाली प्रजातियों, जैसे पीआर-126, पीबी 1509 आदि बोने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। ‘हैप्पी सीडर’ का प्रयोग किया जाए, जिसमें पराली का बंडल बनकर ऊपर आ जाता है, गेहूं की बुवाई हो जाती है और पराली का बंडल पलवार के रूप में खेत पर बिछ जाता है। इसके अलावा ‘पैलेटाइजेशन’ को अपनाया जा सकता है। इसमें पुआल को सुखाकर गुटिका के रूप में बदल दिया जाता है, उसे कोयले के साथ मिलाकर थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों में ईंधन की तरह प्रयोग करते हैं। इससे एक ओर जहां कोयले की बचत होती है, वहीं दूसरी ओर कार्बन उत्सर्जन में कटौती होती है। ‘गौठान’ छत्तीसगढ़ का एक नवीन प्रयोग है। इसमें पांच एकड़ सरकारी भूमि में दान की गई पराली एकत्र कर गाय के गोबर और प्राकृतिक एंजाइम मिला कर जैविक खाद बनाई जाती है। पराली को ‘कंप्रेस्ड बायो गैस प्लांट’ (सीबीजीपी) में भेज दिया जाए तो ईंधन तैयार हो जाता है। दिल्ली के … Read more