साय ने की राज्योत्सव 2024 की तैयारियों की समीक्षा, 4 से 6 नवंबर तक होगा राज्योत्सव का आयोजन

रायपुर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राज्योत्सव 2024 की तैयारियों की समीक्षा की। नया रायपुर स्थित राज्योत्सव स्थल पर 4 से 6 नवंबर तक राज्योत्सव का आयोजन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री की अपील कि प्रदेशवासी राज्योत्सव के अवसर पर अपने घरों में दीप प्रज्ज्वलित कर दीपोत्सव के साथ राज्योत्सव मनाएं। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने प्रदेशवासियों से राज्योत्सव के अवसर पर 1 नवंबर को अपने -अपने घरों में दीप प्रज्ज्वलित कर दीपोत्सव के साथ राज्योत्सव उत्सव मनाने की अपील की है। राज्योत्सव के अवसर पर नवा रायपुर, अटलनगर में 10 हजार दीप प्रज्ज्वलित किए जाएंगे। मुख्यमंत्री ने सभी शहरों और गांव में नागरिकों से 1 नवंबर की शाम को अपने-अपने घरों में दीप प्रज्ज्वलित करने की अपील की है। आम जनता के लिए राज्योत्सव स्थल तक आने जाने के लिए बस की सुविधा उपलब्ध रहेगी। नया रायपुर के राज्योत्सव  स्थल तक आने जाने के लिए आम जनता को परिवहन की सुविधा रियायती दर पर उपलब्ध कराई जाएगी। राज्योत्सव के दौरान आयोजन स्थल पर प्रत्येक दिन शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। संस्कृति संध्या में वॉलीवुड सिंगर शान, नीति मोहन, इंडियन आइडल विजेता पवनदीप और अरुनिदिता होंगे आकर्षण का केंद्र, सांस्कृतिक संध्या में 4 नवंबर को बॉलीवुड सिंगर श्री शांतनु मुखर्जी (शान) का कार्यक्रम आयोजित किया गया है। 5 नवंबर को बॉलीवुड सिंगर नीति मोहन का कार्यक्रम होगा। 6 नवंबर की शाम को इंडियन आइडल विजेता पवनदीप और अरुनिदिता का कार्यक्रम मुख्य आकर्षण का केंद्र होगा। 6 नवंबर को राज्य अलंकरण समारोह राज्योत्सव के आखिरी दिन 6 नवंबर को राज्य अलंकरण समारोह का आयोजन किया जाएगा जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को राज्य अलंकरण से सम्मानित किया जाएगा। विकास प्रदर्शनी प्रमुख योजनाओं को प्रदर्शित किया जाएगा राज्योत्सव स्थल पर विभिन्न विभागों द्वारा प्रमुख विभागीय योजनाओं पर केंद्रित प्रदर्शनी लगाई जाएगी। निजी संस्थानों और पीएसयू संस्थानों के लिए भी हैंगर बनाया जाएगा। कृषि और जल संसाधन विभाग द्वारा भी प्रदर्शनी लगाई जाएगी। प्रदर्शनी में विभागों की नई योजनाएं प्रमुखता से प्रदर्शित की जाएगी। शिल्पग्राम, फूड कोर्ट, फैन पार्क होंगे आकर्षण का केंद्र राज्योत्सव आयोजन स्थल पर शिल्पग्राम, फूड कोर्ट भी बनाया जाएगा। यहां ट्राइबल फूड भी उपलब्ध होगा। बच्चों के लिए फन पार्क भी बनाया जाएगा जहां विभिन्न झूले होंगे। बैठक में मुख्यमंत्री के कृषि एवं नीति सलाहकार धीरेन्द्र तिवारी, मुख्य सचिव अमिताभ जैन, मुख्यमंत्री के सचिव पी.दयानंद और राहुल भगत, संस्कृति विभाग के सचिव अन्बलगन पी. संचालक विवेक आचार्य सहित वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे। recent visitors 62

प्रयागराज महाकुंभ में जाने वालों के लिए खुशखबरी, प्रयागराज और नैनी जंक्शन पर रुकेंगी ये ट्रेनें, जानें शेड्यूल

प्रयागराज 2025 में प्रयागराज में लगने वाले महाकुंभ को लेकर एक तरफ जहां स्थानीय स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं. वहीं,  दूसरी तरफ महाकुंभ में शामिल होने जाने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के मद्देनजर भारतीय रेलवे भी तैयारी कर रहा है. इसी क्रम में महाकुंभ-2025 के अवसर पर प्रयागराज जं. एवं नैनी जं. स्टेशनों पर ट्रेनों का अस्थायी ठहराव देने का फैसला किया गया है. ताकि महाकुंभ में देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं को पहुंचने में आसानी हो सके. हम यहां पर उन सभी ट्रेनों की लिस्ट दे रहे हैं जो महाकुंभ के दौरान प्रयागराज और नैनी स्टेशनों पर रुकेंगी. इस संदर्भ में जानकारी देते हुए पूर्व मध्य रेल के सीपीआरओ सरस्वती चंद्र ने बताया कि महा कुंभ-2025 के अवसर पर रेलवे प्रशासन द्वारा श्रद्धालु यात्रियों की होने वाली अतिरिक्त भीड़ को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित ट्रेनों का 02 मिनट का अस्थाई ठहराव प्रदान किया गया है. यहां देखें ट्रेनों की लिस्ट : > राजेन्द्रनगर से 09.01.2025 से 27.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 12393 राजेंद्र नगर-नई दिल्ली संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस प्रयागराज 00.20 बजे पहुंच कर 00.22 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी.  > राजेन्द्रनगर से 09.01.2025 से 27.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 12394 नई दिल्ली- राजेंद्र नगर संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस प्रयागराज 00.38 बजे पहुंच कर 00.40 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी. > रक्सौल से 11.01.2025 से 22.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 15267 रक्सौल-लोकमान्य तिलक अंत्योदय एक्सप्रेस नैनी जं. 07.33 बजे पहुंच कर 07.35 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी. > रक्सौल से 13.01.2025 से 24.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 15268 लोकमान्य तिलक-रक्सौल अंत्योदय एक्सप्रेस नैनी जं. 15.43 बजे पहुंच कर 15.45 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी.  > पुणे से 05.01.2025 से 26.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 11033 पुणे-दरभंगा एक्सप्रेस नैनी जं. 15.43 बजे पहुंच कर 15.45 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी.  दरभंगा से 10.01.2025 से 21.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 11034 दरभंगा-पुणे एक्सप्रेस नैनी जं. 07.33 बजे पहुंच कर 07.35 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी. > दरभंगा से 15.01.2025 से 26.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 15559 दरभंगा-अहमदाबाद अंत्योदय एक्सप्रेस नैनी जं. 07.33 बजे पहुंच कर 07.35 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी. > अहमदाबाद से 10.01.2025 से 21.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 15560 अहमदाबाद-दरभंगा अंत्योदय एक्सप्रेस नैनी जं. 19.50 बजे पहुंच कर 19.52 बजे आगे के लिए प्रस्थान करेगी.  > अहमदाबाद से 10.01.2025 से 26.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 19483 अहमदाबाद-बरौनी एक्सप्रेस 03.44/03.46 बजे भरतकूप स्टेशन पर और 03.52/03.54 बजे शिवरामपुर स्टेशन पर रुकते हुए आगे के लिए प्रस्थान करेगी.  >बरौनी से 09.01.2025 से 27.02.2025 तक खुलने वाली गाड़ी सं. 19484 बरौनी-अहमदाबाद एक्सप्रेस 09.29/09.31 बजे शिवरामपुर स्टेशन पर और 09.37/09.39 बजे भरतकूप स्टेशन पर रुकते हुए आगे के लिए प्रस्थान करेगी.   recent visitors 74

जनगणना की यह प्रक्रिया 2025 में होगी शुरू, 2026 तक जारी रहने की उम्मीद

नई दिल्ली केंद्र की मोदी सरकार ने चार साल की देरी के बाद 2025 में जनगणना शुरू करने जा रही है। सरकार के सूत्रों ने इसकी जानकारी दी है। जनगणना की यह प्रक्रिया 2025 में शुरू होकर 2026 तक जारी रहने की उम्मीद है। सूत्रों ने बताया कि जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का परिसीमन शुरू होगा और यह काम 2028 तक पूरा कर लिया जाएगा। यह घटनाक्रम कई विपक्षी दलों द्वारा जाति जनगणना की मांग के बीच हुआ है। भारत में पिछली बार जनगणना 2011 में हुई थी। अगला चरण 2021 में शुरू होना था, लेकिन कोरोना माहमारी के कारण इसमें देरी हो गई। तब से, इस बारे में कई सवाल पूछे जा रहे हैं कि अगली जनगणना के आंकड़े कब प्रकाशित किए जाएंगे। मोदी सरकार जनगणना रिकॉर्ड करने की तैयारी में जुटी हुई है। कुछ राजनीतिक दलों द्वारा जाति जनगणना की मांग के बावजूद, सूत्र बता रहे हैं कि फिलहाल मोदी सरकार की जाति जनगणना की अनुमति देने की कोई योजना नहीं है। दरअसल, मौजूदा फॉर्म में, जहां सर्वेक्षण करने वाला हर व्यक्ति अपना नाम, विवरण, पारिवारिक विवरण आदि प्रकाशित करता है, वहीं उसके पास धर्म का विवरण दर्ज करने का विकल्प होता है। एक और कॉलम है जो उन्हें अनुसूचित जनजाति या अनुसूचित जाति (एससी/एसटी) के रूप में पहचानता है। फॉर्म में एकमात्र अतिरिक्त बात यह होगी कि सर्वेक्षण करने वाले लोगों को अपने धर्म के तहत अपने संप्रदाय का उल्लेख करने की अनुमति होगी। कांग्रेस, आरजेडी और कई अन्य पार्टियां जाति जनगणना की मांग कर रही हैं। बिहार में जेडीयू जैसे बीजेपी के गठबंधन सहयोगियों ने भी इस बारे में बात की है, लेकिन मोदी सरकार पर कोई दबाव नहीं डाला है। केंद्रीय स्तर पर, अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट पर छोड़ दिया गया है। बीजेपी की दूसरी सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी भी मानती है कि जनगणना होनी चाहिए, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आम जनता, खासकर युवा आबादी के लाभ के लिए ‘कौशल जनगणना’ की सक्रिय रूप से वकालत कर रहे हैं। आरएसएस भी जाति जनगणना के पक्ष में है, बशर्ते कि यह किसी पार्टी द्वारा राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए न किया जा रहा हो।   recent visitors 71

दिवाली मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन 1 नवंबर 2024, दिन शुक्रवार को आयोजित किया जाएगा

नई दिल्ली नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने मुहूर्त ट्रेडिंग के तारीख और समय का ऐलान कर दिया है। एनएसई ने दी जानकारी में बताया है कि दिवाली मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन 1 नवंबर 2024, दिन शुक्रवार को आयोजित किया जाएगा। मुहूर्त ट्रेडिंग का समय 6 बजे शाम से 7 बजे शाम तक रहेगा। इस दौरान शेयरों की खरीद बिक्री की जा सकेगी। 1 नवंबर को रेगुलर ट्रेडिंग नहीं होगी। सिर्फ एक घंटे के लिए शेयर बाजार इस दिन खुलेगा। 1 नवंबर को प्री-ओपनिंग सेशन की टाइमिंग शाम 5:45 से शाम 6:00 बजे तक आयोजित की जाएगी। मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन के दिन कैसा होता है बाजार का प्रदर्शन? ऐतिहासिक तौर पर मुहूर्त ट्रेडिंग के दिन निवेशकों पॉजिटिव रिटर्न मिला है। पिछले 17 मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन में से 13 में शेयर बाजार बढ़त के साथ बंद हुआ है। बता दें, 2008 में वैश्विक मंदी के बीच भी शेयर बाजार मुहूर्त ट्रेडिंग के दिन 5.86 प्रतिशत चढ़ गया था। साल 2022 के बाद 12 मुहर्त ट्रेडिंग में से 9 के दौरान बाजार में तेजी देखने को मिली है। 2022 में सेंसेक्स 355 अंक या 0.55 प्रतिशत की उछाल के साथ बंद हुआ था। क्यों खास है मुहूर्त ट्रेडिंग? दिवाली का दिन भारतीय परंपराओं में बेहद खास दिन माना जाता है। इस दिन को असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है। लोग इस दिन से एक नई शुरुआत करते हैं। मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन भी इन्हीं परंपराओं से जुड़ा है। यह एक प्रतीकात्मक ट्रेडिंग सेशन होता है। कई लोगों की मान्यताएं हैं कि इस दिन निवेश करने से साल भर अच्छा रिटर्न मिलता है। इसके अलावा इस दिन को पुराने खातों को खत्म और नई खातों को शुरू करने के तौर पर भी लोग देखते हैं। अगर आप भी इन ट्रेडिंग सेशन के दौरान निवेश कि योजना बना रहे हैं तो ध्यान रखें कि समय काफी कम होता है। ऐसें में रिस्क काफी अधिक रहता है। recent visitors 75

इस दिवाली चीन का निकला दिवाला, 1.25 लाख करोड़ का नुकसान… नहीं बिक रहा है चाइनीज सामान, ‘मेड इन इंडिया’ का जलवा

नई दिल्ली पिछले कुछ वर्षों से दिवाली और धनतेरस पर चाइनीज प्रोडक्ट्स की डिमांड भारतीय बाजारों में लगातार घटती जा रही है. खासकर डेकोरेटिंग आइटम्स की बिक्री पहले के मुकाबले काफी घटी है. डिमांड कम होने से आयात भी कम हो रहा है, जिससे घरेलू सामानों की बिक्री बढ़ रही है. दरअसल, देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल' अभियान का असर अब दिखने लगा है. चाइनीज सामानों की बिक्री लगातार घट रही है. इस साल अधिकतर लोग दिवाली पर स्वदेशी सामान खरीदते हुए नजर आ रहे हैं. खासकर लोग इलेक्ट्रॉनिक्स सजावट के सामान 'मेड इन इंडिया' देखकर ही खरीद रहे हैं. चाइनीज प्रोडक्ट्स का विरोध    एक अनुमान के अनुसार दिवाली से जुड़े चीनी सामानों की बिक्री में तगड़ी गिरावट से चीन को करीब 1 लाख 25 हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है. क्योंकि लगातार कई वर्षों से दिवाली पर चाइनीज प्रोडक्ट्स का बहिष्कार किया जा रहा है. कुम्हारों से मिट्टी के दीये और सजावट का सामान खरीदकर लोग 'वोकल फॉर लोकल' अभियान को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं. कैट ने देशभर के व्यापारिक संगठनों से आग्रह किया है कि वह अपने क्षेत्र की जो महिलाएं, कुम्हार, कारीगर सहित अन्य लोग दीपावली से संबंधित सामान बना रहे हैं, उनकी बिक्री में वृद्धि करने में सहायता करें. इससे लोगों में जागरुकता बढ़ी है, और अब वो घरेलू प्रोडक्ट्स को तरजीह दे रहे हैं. जिससे चीन को करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. कन्फ़ेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) जो व्यापारियों का संगठन है, उसने व्यापारियों से अपील की है कि वो लोकल प्रोडक्ट्स को बढ़ावा दें. कैट के जनरल सेक्रेटरी और चांदनी चौक के सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने बताया कि इस दिवाली पर 'वोकल फॉर लोकल' का दर्शन पूरी तरह बाजारों में दिख रहा है क्योंकि करीब सारी खरीदारी भारतीय सामानों की ही हो रही है. सोने-चांदी की खूब खरीदारी बता दें, भारतीय परंपरा में दिवाली और धनतेरस पर जमकर खरीदारी की जाती है. इस दिन खासतौर पर लोग सोने-चांदी के आभूषण और अन्य वस्तुएं, सभी प्रकार के बर्तन, रसोई का सामान, वाहन, कपड़े और रेडीमेड गारमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली का सामान एवं उपकरण, व्यापार करने के उपकरण जैसे कंप्यूटर एवं कंप्यूटर से जुड़े उपकरण, मोबाइल, बही खाते और फर्नीचर खरीदते हैं. कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के मुताबिक इस साल धनतेरस पर लगभग 60 हजार करोड़ रुपये के कारोबार होने का अनुमान लगाया गया है. जबकि दिवाली तक यह आंकड़ा 1 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा. इस दौरान सोने, चांदी के अलावा पीतल के बने बर्तन की जबरदस्त खरीद हुई है.  इस बार करीब 2500 करोड़ रुपये की चांदी खरीदी गई. जबकि एक दिन में 20 हजार करोड़ का सोना बिक गया है.   recent visitors 67

मध्यप्रदेश के विकास की रोमांचक यात्रा

मध्यप्रदेश दिवस 1 नवम्बर पर विशेष मध्यप्रदेश के विकास की रोमांचक यात्रा भोपाल मध्यप्रदेश की रोमांचक विकास यात्रा के बारे में विस्तार से जानते हुए 1911 की जनगणना रिपोर्ट के पन्ने पलटना भी रोमांचक अनुभव से कम नहीं। यह रिपोर्ट आईसीएस जे.सी. मार्टिन ने तैयार की थी। वे सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार के सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ सेंसस ऑपरेशंस थे। वर्ष 1901 से 1910 के दशक में बेरार प्रोविंस को सेंट्रल प्रोविंस में शामिल किया गया। इस प्रकार सेंट्रल प्रोविंस के 8 ब्रिटिश जिले बेरार के चार जिले और 15 सामंती राज्यों को मिलाकर जनगणना होनी थी। यह पांचवीं जनगणना थी जो 10 मार्च 1911 में शुरू हुई। कुल 91,770 गणनाकार, 8,422 सुपरवाइजर और 675 चार्ज सुपरिंटेंडेंट मिलाकर एक लाख से ज्यादा का स्टाफ जनगणना के लिए था। यह क्षेत्र एक लाख 31 हजार वर्ग मील था। जनसंख्या 160 लाख थी। यह ब्रिटिश इंडिया के कुल क्षेत्रफल का 7.3% था, जो जापान के क्षेत्रफल से थोड़ा काम। आज का मध्यप्रदेश जो पहले मध्य भारत प्रांत था वह इसी सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार का भाग था। वर्ष 1911 की सेंसस रिपोर्ट के साक्षरता संबंधित 8वें चैप्टर में कुछ बेहद दिलचस्प आंकड़े मिलते हैं। इसमें अखबारों की संख्या और प्रसार संख्या के आंकड़े भी प्रकाशित किए गए। हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती दैनिक, मासिक, पाक्षिक और साप्ताहिक पत्रों की संख्या 27 थी और प्रसार संख्या 10,627 थी। इसी प्रकार संस्कृत मारवाड़ी, गुजराती, तमिल, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की कुल 640 किताबें इस दौरान प्रकाशित हुई थी। सेकेंडरी स्कूलों की संख्या 444 थी, जिसमें 53,308 बच्चे पढ़ते थे। प्राथमिक स्कूल 3865 थे, जिसमें 2 लाख 77 हजार 620 बच्चे पढ़ते थे। प्रत्येक 30 व्यक्ति में से एक साक्षर था। अंग्रेजी साक्षरता का अलग से आकलन किया गया था। प्रत्येक 10 हजार की जनसंख्या में 55 पुरुष और 5 महिलाएं अंग्रेजी में साक्षर थीं। नागपुर, जबलपुर, सागर और अमरावती में अंग्रेजी पढ़ने-बोलने वाले ज्यादा थे क्योंकि इन्हीं जगहों पर अंग्रेजी अफसरों की पोस्टिंग होती थी और वे अंग्रेजी में लोगों से बात करते थे। एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि 1901 से 1910 के बीच 562 मील रेलवे रूट था। रेलवे में सबसे ज्यादा 36 हजार 367 लोगों को रोजगार मिला था। दूसरे नंबर पर सिंचाई विभाग था, जिसमें 18 हजार 473 को नौकरियां मिली थी। मध्यप्रदेश का जन्म स्वतन्त्रता मिलने तक इस विशाल क्षेत्र का विकास आगे बढ़ता रहा। बाद में भाषा, सांस्कृतिक आधार पर और प्रशासनिक प्रबंधन की दृष्टि से अलग राज्य बनाने की मांग शुरू हुई। देश की एकता बनाए रखते हुए क्षेत्रीय संतुलन की बातें मुखर हुईं। परिणामस्वरुप 29 दिसंबर 1953 को राज्यों के पुनर्गठन आयोग बनाया गया। जस्टिस सैयद फैसल अली अध्यक्ष और हृदय नाथ कुंजूरू, कोवल्लम माधव पणिक्कर इसके सदस्य थे। आयोग ने 30 सितंबर 1955 को सिफारिशों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें मुख्य रूप से जिन बिंदुओं पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाना था, उसमें परिवर्तन के परिणाम, भारत की एकता और सुरक्षा, भाषा और संस्कृति, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता, राष्ट्रीय विकास की योजना, राज्यों के आकार जैसे बिंदुओं का ध्यान रखा गया था। आयोग की अनुशंसाओं को अमल में लाने के लिए संविधान में संशोधन अनिवार्य प्रक्रिया थी। फलस्वरूप लोकसभा में 18 अप्रैल 1956 को संविधान नवम संशोधन विधेयक पेश हुआ। इसे अक्टूबर में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और 1 नवंबर 1956 को यह पूर्ण रूप से अधिनियम बना। साथ ही सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार में शामिल मराठी भाषी जिले महाराष्ट्र में शामिल हो गए और मध्यप्रदेश में 43 जिले बचे। बाद में दो जिलों का क्षेत्रफल के अनुसार विभाजन हुआ और 45 जिलों का मध्यप्रदेश बना। जनसंख्या वृद्धि, वैश्विक विकास के मानदंडों के साथ कदमताल करते हुए मध्यप्रदेश का विकास निरंतर होता रहा। वर्ष 2000 में जन-आकांक्षाओं के अनुरूप छत्तीसगढ़ राज्य बना। मानव संसाधन, परिसंपत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों का स्वाभाविक रूप से बटवारा हुआ । विकास की गति रुकी नहीं। विकास का आकलन करने के परंपरागत तरीकों, मापदंडों के अलावा भी कई नए क्षेत्रों में मध्यप्रदेश नई उपलब्धियों और नए कीर्तिमान के साथ आगे बढ़ रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी जैसे नए क्षेत्रों में मध्यप्रदेश गतिशील है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ जिस प्रकार कदमताल कर रहा है वह सराहनीय है। प्रशासनिक नवाचारों और विकास प्रक्रिया में सूचना प्रौद्योगिकी जनित नवाचारी हस्तक्षेप से आम नागरिकों का जीवन आसान हुआ है। रोमांचक यात्रा वर्ष 1956, वर्ष 2000 और वर्तमान समय के मध्यप्रदेश में बड़ा परिवर्तन साफ दिखता है। शहरों और गांवों के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन हुआ है। सूचना क्रांति ने जीवन के हर आयाम को छुआ है। अधोसंरचनात्मक विकास से सामाजिक बदलाव आया है। जनसंख्या की निरंतर वृद्धि और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां बने रहने के बावजूद विकास की बाधाएं समाप्त हो रही हैं। प्रदेश के गठन के बाद 1961 की जनगणना 323.7 लाख थी। कुछ आधारपभूत आंकड़ों से मध्यप्रदेश की विकास यात्रा और ज्यादा रोमांचक हो जाती है। अर्थव्यवस्था तेजी से बढी है। वर्ष 2003 में जीडीपी 71,594 करोड़ थी जो अब बढ़कर 13,63,327 करोड़ हो गई है। प्रति व्यक्ति आय वर्ष 1956 में मात्र 261 रूपए, 2003 में 11,718 करोड़ और वर्तमान में 1,42,565 करोड़ है। कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव हुआ है। इसका कारण सिंचाई और बिजली की भरपूर उपलब्धता है। किसान-मित्र नीतियों से खेती आधारित अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत हुई। खेती से जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। अब सामान्य खेती से आगे बढ़कर कृषि उद्यमिता पर मध्यप्रदेश ने कदम रख रहा है। कृषि क्षेत्र में निर्यात बढ़ा है। मध्यप्रदेश का गेहूं, चावल, दालें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जा रही हैं। एक अन्य क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन हुआ है वह राजस्व संग्रह का क्षेत्र। सरकार और व्यापारिक समुदाय के परस्पर सहयोग एवं विश्वास के रिश्तों से स्वप्रेरित राजस्व अदा करने की संस्कृति को बढ़ावा मिला है। मध्यप्रदेश जीएसटी संग्रहण में देश में पहले पांच राज्यों में है। यह राजस्व सरप्लस राज्य बन गया है। बिजली संकट से जूझने के बाद मध्य प्रदेश पावर सरप्लस राज्य है। नवकरणीय ऊर्जा जैसे नए क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रदेश के विभिन्न भूभाग में समान रूप से औद्योगिक निवेश एवं विकास करने के उद्देश्य को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रीजनल इंडस्ट्री कांक्लेव की श्रृंखला की शुरुआत की। अब तक उज्जैन … Read more

मोदी सरकार ने तमिलनाडु, बिहार, झारखंड और गुजरात से की कॉन्‍ट्रैक्‍ट फार्मिंग की शुरुआत

नई दिल्‍ली सरकार ने पहली बार किसानों के साथ 1,500 हेक्टेयर जमीन पर दालें (अरहर और मसूर) उगाने के लिए कॉन्‍ट्रैक्‍ट फार्मिंग यानी अनुबंध खेती सौदों पर हस्ताक्षर किए हैं। ऐसा तमिलनाडु, बिहार, झारखंड और गुजरात जैसे राज्यों में किया गया है। यह पायलट डील ऐसे राज्यों में खेती का विस्तार करके दालों में आत्मनिर्भरता हासिल करने की योजना का हिस्सा है जहां किसान परंपरागत रूप से दालें उगाने के इच्छुक नहीं हैं। यह सौदा किसानों और भारतीय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ (NCCF) के बीच हुआ है। इसके तहत किसान अपनी जमीन पर अरहर और मसूर उगाएंगे। एजेंसी सरकार के बफर स्टॉक के लिए उनकी उपज का एक हिस्सा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या बाजार मूल्य पर खरीदेगी, जो भी अधिक हो। आगे क्‍या है योजना? एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि खरीद की मात्रा इस साल बफर स्टॉक के हिसाब से ज्यादा नहीं होगी। लेकिन, उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में जब कॉन्‍ट्रैक्‍ट फार्मिंग के तहत अधिक क्षेत्र लाया जाएगा तो यह बढ़ेगा। फिलहाल, सरकार की ओर से रजिस्‍टर्ड दाल उत्पादकों की पूरी उपज खरीदने की प्रतिबद्धता के बावजूद सरकारी एजेंसियां खरीद लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। कारण है कि उत्पादन में गिरावट के कारण कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। इससे निजी कंपनियां किसानों को अधिक दाम दे रही हैं। पिछले साल से दालों की महंगाई ऊंची बनी हुई है। अनियमित बारिश ने लगातार दो साल तक फसल के आकार को कम कर दिया है। इससे सरकार को घरेलू सप्‍लाई बढ़ाने के लिए आयात प्रतिबंधों को हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। सरकार ने किसानों से वादा किया है कि वे MSP या बाजार मूल्य पर अरहर, उड़द और मसूर की असीमित मात्रा में खरीद करेंगे, जो भी अधिक हो, बशर्ते वे इसके पोर्टल पर पंजीकरण कराएं। महंगाई पर न‍िशाना आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है कि जुलाई और अगस्त में 6% के निशान से नीचे रहने के बाद सितंबर में खाद्य महंगाई दर में 9.24% की बढ़ोतरी हुई है। इसके चलते खुदरा महंगाई दर सितंबर में नौ महीनों के ऊंचे स्तर 5.5% पर वापस आ गई है। हालांकि, अच्छी बुवाई और अधिक उपज की संभावना के कारण पिछले महीने दालों की कीमतों में गिरावट आई। 16 महीनों में पहली बार 10% से अधिक की मुद्रास्फीति की गति से घटकर 9.81% रह गई। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, सब्जियों और दालों की बढ़ती कीमतों के कारण सितंबर में घर पर पकाए जाने वाली शाकाहारी थाली की लागत में साल-दर-साल 11% की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दालों की कीमतें, जो शाकाहारी थाली की लागत का 9% हिस्सा हैं, 2023 में उत्पादन में गिरावट के कारण 14% बढ़ी हैं। इससे इस साल शुरुआती स्टॉक कम हुआ। इससे थाली की कीमतों में और बढ़ोतरी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में दालों के उत्पादन में गिरावट आई है। वहीं, डिस्पोजेबल इनकम और अधिक जनसंख्या के कारण मांग में बढ़ोतरी हुई है। लगातार घट रहा है उत्‍पादन कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2021-22 में 27.3 मिलियन टन से दालों का उत्पादन वित्तीय वर्ष 2022-23 में घटकर 26 मिलियन टन और वित्तीय वर्ष 2023-24 में 24.5 मिलियन टन रह गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में दालों का आयात काफी बढ़ा है। यह वित्त वर्ष 2023-24 में 4.7 मिलियन टन हो गया। भारत में दालों की वर्तमान वार्षिक खपत लगभग 27 मिलियन टन अनुमानित है। भारत मोजाम्बिक, तंजानिया, मलावी और म्यांमार से अरहर और कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, रूस और तुर्की से मसूर का आयात करता है। recent visitors 134