Tuesday, July 7, 2026 11:24 am

केरल हाईकोर्ट का फैसला, ‘महिला की शारीरिक संरचना पर टिप्पणी को उत्पीड़न माना जाएगा’

नई दिल्ली। केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं की शारीरिक संरचना पर टिप्प्णी को यौन उत्पीड़न करार दिया है। केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति ए बदरुद्दीन ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसी टिप्पणी को यौन उत्पीड़न का अपराध मानते हुए कार्रवाई की जानी चाहिए। केरल राज्य विद्युत बोर्ड (केएसईबी) के एक पूर्व कर्मचारी पर उसी कार्यालय की एक महिला कर्मचारी ने आरोप लगाए थे। महिला ने कहा था कि आरोपी पूर्व कर्मचारी ने 2013 से उसके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इसके बाद 2016-17 में आपत्तिजनक संदेश और वॉयस कॉल करना शुरू कर दिया। केएसईबी और पुलिस में शिकायत के बावजूद वह उसे आपत्तिजनक संदेश भेजता रहा। कई शिकायतों के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 ए (यौन उत्पीड़न) और 509 (महिला की शील का अपमान) और केरल पुलिस अधिनियम की धारा 120 (ओ) (अवांछित कॉल, पत्र, लिखित, संदेश द्वारा संचार के किसी भी माध्यम से उपद्रव पैदा करना) के तहत मामला दर्ज किया। आरोपी ने यौन उत्पीड़न के मामले को रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। आरोपी ने याचिका में दावा किया कि किसी व्यक्ति के शरीर की अच्छी संरचना होने का मात्र उल्लेख करने पर उसे आईपीसी की धारा 354 ए और 509 तथा केरल पुलिस अधिनियम की धारा 120 (ओ) के दायरे में यौन उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वहीं अभियोजन पक्ष और महिला ने तर्क दिया कि आरोपी के कॉल और संदेशों में अभद्र टिप्पणियां थीं। वह उसे परेशान करता था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 354ए और 509 तथा केरल पुलिस अधिनियम की धारा 120 (ओ) के तहत अपराध के लिए उपयुक्त तत्व सामने आते हैं। अदालत ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने 6 जनवरी के आदेश में कहा कि मामले के तथ्यों पर गौर करने के बाद यह स्पष्ट है कि प्रथम दृष्टया अभियोजन पक्ष का मामला कथित अपराधों को आकर्षित करने के लिए बनाया गया है। इसके चलते आपराधिक विविध मामला खारिज हो जाता है। recent visitors 52

केरल हाईकोर्ट ने हाथियों की परेड से जुड़े आवेदन को किया खारिज

केरल धार्मिक कार्यक्रम के दौरान हाथियों की परेड से जुड़े आवेदन को केरल हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। दरअसल, CDM यानी कोचीन देवसोम बोर्ड ने मंदिर उत्सव के दौरान हाथियों के बीच 3 मीटर की दूरी रखने के आदेश से छूट की मांग की थी। अदालत का कहना है कि जानवरों की भलाई के लिए ये निर्देश जरूरी थे। मामले में जस्टिस एके जयशंकरन नाम्बियार और जस्टिस गोपीनाथ पी की बेंच सुनवाई कर रही थी। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रथाओं को संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। CDB ने तिरुपुनिथुरा के मंदिर में होने वाले उत्सव के दौरान छूट के लिए अदालत में आवेदन दिया था। बोर्ड की तरफ से पेश हुए एडवोकेट केपी सुधीर ने कहा था 15 हाथियों की परेड उत्सव का अभिन्न अंग है। बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस नाम्बियार ने कहा, 'अगर किसी ग्रंथ में हाथी के इस्तेमाल की बात नहीं कही गई है, तो यह जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं है। हम यह नहीं कह रहे कि हाथियों को शामिल न करें। लोगों के विश्वास और धार्मिक उत्साह बनाए रखने के लिए हाथियों का मौजूद होना ठीक है, लेकिन आपको यह साबित करना होगा कि हाथियों के बीच 3 मीटर के कम दूरी ठीक होगी।' बोर्ड का कहना था कि अगर निर्देशों का पालन किया जाता है, तो उत्सव में शामिल होने वाले हाथियों की संख्या सीमित रह जाएगी। ऐसे में लंबे समय से चली आ रही उत्सव की परंपराएं बधित होंगी। इसपर जस्टिस नाम्बियार ने कहा, 'हम यह मानने से इनकार करते हैं कि हिंदू धर्म इतना कमजोर है कि यह हाथियों की मौजूदगी नहीं होने से ढह जाएगा।' जस्टिस गोपीनाथ ने कहा, 'जब तक आप यह नहीं दिखा देते कि हाथियों के बगैर धर्म का अस्तित्व नहीं रहेगा, तब तक जरूरी धार्मिक प्रथा का सवाल ही नहीं उठता है।' इस मामले में कोर्ट हाथियों के भलाई पर ध्यान लगा रहा है, जो कई बार परेड और उत्सवों के दौरान मुश्किल हालात का सामना करते हैं। 13 नवंबर को बेंच ने क्रूरता को रोकने के लिए अंतरिम दिशानिर्देश जारी किए गए थे। इनमें त्योहारों का रजिस्ट्रेशन और परेड के समय हाथियों के बीच कम से कम 3 मीटर की दूरी की बात कही गई थी। recent visitors 60