Thursday, July 16, 2026 2:06 am

सरकार ने कहा- गलत जानकारी से बिगड़े हालात, भोपाल गैस त्रासदी के जहरीले कचरे को लेकर हाईकोर्ट ने दिया छह हफ्ते का समय

भोपाल। भोपाल गैस त्रासदी के जहरीले कचरे को लेकर मचे घमासान के बीच आज सोमवार को जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान होईकोर्ट की डिवीजन बेंच से सरकार ने कहा कि गलत जानकारी के कारण पीथमपुरा में हालात बिगड़े और  स्थिति खराब हुई। सरकारा ने कोर्ट से छह हफ्ते का समय मांगा। इस पर चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने सरकार की मांग मानते हुए उसे छह सप्ताह का समय दे दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी को होगी। दरअसल, यूनियन कार्बाइड के कचरे के निस्तारण को लेकर हाईकोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई। इस दौरान सरकार की ओर से कोर्ट में एक हलफनामा पेश किया है। जिसमें सरकार ने बताया है कि  यूनियन कार्बाइड के कचरे को लेकर लोगों द्वारा भ्रामक जानकारियां फैलाई जा रही है। इस पर कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए मुद्दे से जुड़ी फेक जानकारी या न्यूज पर रोक लगा दी है। साथ ही कोर्ट ने सरकार से कहा है कि गलत जानकारी को दूर किया जाए। अलग अनुमति की जरूरत नहीं सुनवाई के दौरान सरकार ने रामकी कंपनी में खड़े कंटेनर को अनलोड करने की अनुमति कोर्ट से मांगी है। इस पर कोर्ट ने कहा कि इसके लिए अलग अनुमति की जरूरत नहीं है। निस्तारण के पूर्व आदेश में ही यह कार्रवाई आती है। राज्य सरकार ने कोर्ट में बताया कि कचरे को अभी जलाया नहीं गया है। इस पर कोर्ट ने सरकार को अपने स्तर पर निस्तारण करने की छूट दी है। सरकार की ओर से इसे लेकर कोर्ट से छह सप्ताह का समय मांगा। सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने सरकार की मांग के अनुसार उसे छह सप्ताह का समय दिया है। इंदौर के डॉक्टर्स ने भी पेश की आपत्तियां इसके अलावा भी कोर्ट में कचरे के निस्तारण को लेकर इंदौर के डॉक्टर्स द्वारा कई आवेदन और आपत्तियां पेश की गई हैं। इन्हें लेकर कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वो सभी आवेदन और आपत्तियां को संज्ञान में लेकर उसमें दिए गए तथ्यों को देखे। मामले में अगली सुनवाई 18 फरवरी को होगी। recent visitors 57

लोक सेवकों के सैलरी की जानकारी आरटीआई में देना अनिवार्य, हाईकोर्ट का अहम आदेश

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) में लोकसेवकों के वेतन की जानकारी देना अनिवार्य है। गोपनीयता के तर्क पर इसकी सूचना देने से इन्कार नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने लोकसेवकों के वेतन की सूचना देने से इन्कार करने के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई में यह निर्णय दिया। हाई कोर्ट ने लोकसेवकों के वेतन की जानकारी सार्वजनिक महत्व की है, जिसे गोपनीय नहीं माना जा सकता। पूर्व में जारी आदेश निरस्त कर दिया सूचना आयोग और लोक सूचना अधिकारी ने भी इस सूचना को गोपनीय माना था। ऐसे में, एकल पीठ ने इन दोनों के पूर्व में जारी आदेश को भी निरस्त कर दिया। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को एक माह में सूचना उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत याचिकाकर्ता छिंदवाड़ा निवासी एमएम शर्मा की ओर से दलील दी गई थी कि लोक सेवकों के वेतन की जानकारी को सार्वजनिक करना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा-चार के तहत अनिवार्य है। ऐसे में, लोक सेवकों के वेतन की जानकारी को धारा 8 (1)(जे) का हवाला देकर व्यक्तिगत या तृतीय पक्ष की सूचना बताकर छिपाना अधिनियम के उद्देश्यों और पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है। जानकारी उपलब्ध कराने से इन्कार किया दरअसल, याचिकाकर्ता ने छिंदवाड़ा वन परिक्षेत्र में कार्यरत दो कर्मचारियों के वेतन भुगतान के संबंध में जानकारी मांगी थी। लोक सूचना अधिकारी ने जानकारी को निजी और तृतीय पक्ष की जानकारी बताते हुए इसे उपलब्ध कराने से इन्कार कर दिया था। तर्क दिया गया कि संबंधित कर्मचारियों से उनकी सहमति मांगी गई थी, लेकिन उनका उत्तर न मिलने पर जानकारी गोपनीय होने के कारण उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। recent visitors 69

NEET PG Counselling से पहले राउंड के रिजल्ट पर HC ने लगाई रोक, सरकार और DME को नोटिस जारी

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एमडी एमएस कोर्स में दाखिले के लिए नीट पीजी काउंसलिंग के पहले राउंड के परिणाम घोषित करने पर आगामी सुनवाई तक रोक लगा दी है। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि 24 नवंबर की रात 12 तक पहले राउंड की काउंसलिंग जारी रखें लेकिन उसका रिजल्ट घोषित नहीं करें। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एसए धर्माधिकारी एवं जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने  डीएमई, मप्र सरकार व अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 28 नवंबर को होगी।   रीवा के डॉक्टर अभिषेक शुक्ला की याचिका पर हुई सुनवाई   दरअसल रीवा निवासी डॉक्टर अभिषेक शुक्ला की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हो बताया कि पीजी कोर्स में दाखिले के लिए नीट ने मेरिट लिस्ट तैयार की थी यह सूची नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया अपनाते हुए जारी की गई थी। दलील यह भी दी गई की राज्य शासन ने मेरिट लिस्ट तैयार करने में दूसरी बार नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया को अपनाया इस कारण नीट की मेरिट लिस्ट में अच्छी रैंकिंग होने के बावजूद भी प्रदेश की मेरिट लिस्ट में याचिकाकर्ता का नाम नीचे हो गया। ये भी कहा गया याचिका में याचिका में यह भी बताया गया कि पहले राउंड के लिए चॉइस फिलिंग और चॉइस लॉकिंग की प्रक्रिया शुरू हो गई है जो 24 नवंबर की रात 12 तक चलेगी और इसका रिजल्ट 26 नवंबर को घोषित किया जाना है। recent visitors 54

HC में नर्मदा के किनारे की जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे-आपत्ति पर उठे सवाल

जबलपुर  मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) हाई कोर्ट (MP High Court) में एक याचिका दाखिल की गई है, जिसमें नर्मदा नदी (Narmada River) के किनारे की सरकारी जमीन पर वक्फ का दावा किए जाने पर सवाल उठाया गया है. मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की पीठ ने मामले की प्राथमिक सुनवाई के बाद स्थिति को बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया है. साथ ही, राज्य सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब मांगा गया है. याचिकाकर्ता ने क्या कहा? नर्मदापुरम के समाजसेवी ओमप्रकाश शर्मा ने अदालत में अपनी याचिका में बताया कि उन्होंने नर्मदा किनारे की जमीन पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया था, जिससे वहां हरियाली बढ़ी और मृदा क्षरण की समस्या में कमी आयी है. वहीं इससे नर्मदा के तटबंधों को भी स्थिरता मिली है. याचिका में दावा किया गया कि मोहम्मद मकसूद नामक व्यक्ति ने इस जमीन को वक्फ की बता कर शरद सिंह के नाम पर पंजीकृत करा दिया है. इस विवाद के चलते वहां के पेड़ काटकर निर्माण कार्य की तैयारी की जा रही है. वक्फ बोर्ड की है ये आपत्ति सुनवाई के दौरान कोर्ट को सूचित किया गया कि जब जमीन के नामांतरण का आवेदन किया गया, तब वक्फ बोर्ड ने इस पर आपत्ति जताई थी. इससे पहले भी कोर्ट ने एक जनहित याचिका के दौरान यह निर्देश दिया था कि नर्मदा के किनारे 300 मीटर के दायरे में किसी भी तरह का निर्माण नहीं किया जा सकता. ऐसे में, यह सवाल उठता है कि नजूल सीट नंबर-46 पर स्थित सरकारी जमीन, जिसे दस्तावेजों में 'बंगला' के रूप में दर्ज किया गया है, वक्फ बोर्ड की जमीन कैसे मानी जा सकती है. अगली सुनवाई कब होगी? इस मामले की अगली सुनवाई के लिए संबंधित पक्षों से उनके जवाब आने के बाद कोर्ट अगला कदम तय करेगा. recent visitors 58

हाइ कोर्ट ने मासूम से ज्यादती फिर सिर काटने वाले की फांसी की सजा उम्रकैद में बदली

 जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल व न्यायमूर्ति देव नारायण मिश्रा की युगलपीठ ने सागर अंतर्गत बंडा में मासूम बहन से दुष्कर्म के बाद सिर काटकर जघन्य हत्या के बहुचर्चित मामले में सत्र न्यायालय के फैसले को पलट दिया। मामला दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में नहीं आता है हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि यह मामला दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में नहीं आता है, जहां अपीलकर्ता को केवल मृत्युदंड ही दिया जाना उचित है। आरोपित ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था ऐसा इसलिए भी क्योंकि घटना के बाद आरोपित ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था। वह समाज के वंचित श्रमिक वर्ग से आता है, अतएव उसकी सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि, शिक्षा के स्तर को ध्यान में रखते हुए सजा बदली। एक बेहतर नागरिक बनने के लिए अवसर मिले इस आधार पर हाई कोर्ट का सुविचारित मत है कि मृत्युदंड के स्थान पर पश्चाताप से ग्रस्त एक युवा को सुधार करने और एक बेहतर नागरिक बनने के लिए इसी जीवन में अवसर मिलना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता ने पक्ष रखा इस मामले की सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता सागर, बंडा निवासी राम प्रसाद अहिरवार सहित अन्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त व दिलीप सिंह परिहार ने पक्ष रखा। पेशेवर हत्यारा नहीं , उसका पहला अपराध था अधिवक्ता ने दलील दी कि सत्र न्यायालय ने इस मामले को विरल से विरलतम श्रेणी में रखकर मृत्युदंड जैसा अपेक्षाकृत कठोर फैसला सुना दिया। बावजूद इसके कि अपीलकर्ता राम प्रसाद अहिरवार एक पेशेवर हत्यारा नहीं है। यह उसका पहला अपराध था। मृतिका की वास्तविक आयु सिद्ध करने में भी विफल अभियोजन पक्ष मृतिका की वास्तविक आयु सिद्ध करने में भी विफल रहा है। आरोपित व्यक्ति समाज के वंचित वर्ग अनुसूचित जाति समुदाय से हैं। उसके माता-पिता की मजदूर पृष्ठभूमि से आते हैं। सामाजिक परिवेश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए उनके लिए उपलब्ध शिक्षा और सामाजिक संपर्क का स्तर जातिगत गतिशीलता और हमारे समाज में मौजूद ग्रामीण शहरी विभाजन के सामाजिक परिवेश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यद्यपि हत्या करना क्रूरता है लेकिन राम प्रसाद अहिरवार की आयु और उसके द्वारा अपराध स्वीकार करने को भी ध्यान में रखना चाहिए। क्या था मामला नाबालिग 13 मार्च, 2019 को घर से स्कूल परीक्षा देने निकली थी। जब घर वापस नहीं लौटी तो 14 मार्च, 2019 को गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। गन्नी नामक युवक ने पुलिस को बताया कि वह रामभगत के खेत की ओर गया था, जहां एक बालिका का सिर कटा शव देखा है। जिसके बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। इसी के साथ अपराध पंजीबद्ध किया गया। recent visitors 85