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नई दिल्ली
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मुख्य व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी चीन पर 104 फीसदी का जवाबी शुल्क लगा दिया है। इससे दुनिया की दो बड़ी आर्थिक महाशक्तियों (अमेरिका और चीन) के बीच व्यापार युद्ध गहरा गया है। ट्रंप प्रशासन की नई शुल्क दरें बुधवार (9 अप्रैल) मध्यरात्रि से ही लागू हो चुकी हैं। ट्रंप ने इससे पहले 2 अप्रैल को रेसिप्रोकल टैरिफ की घोषणा की थी, जिसके जरिए चीन पर तब 34 फीसदी का अतिरिक्त टैक्स लगाया गया था। इस पर पलटवार करते हुए चीन ने भी अमेरिकी सामानों के आयात पर 34 फीसदी का टैक्स लगा दिया था।

चीन के पलटवार के बाद ट्रंप प्रशासन ने चीन से 24 घंटे के अंदर शुल्क हटाने को कहा था और ऐसा नहीं करने की स्थिति में चीनी वस्तुओं पर 50 फीसदी अतिरिक्त शुल्क और लगाने की धमकी दी थी। जब चीन अमेरिकी धमकी के आगे नहीं झुका तो मंगलवार तक दी गई मियाद खत्म होते ही ट्रंप प्रशासन ने चीन पर 50 फीसदी यानी कुल मिलाकर 104 फीसदी टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया।

चीन-अमेरिका व्यापार का क्या हिसाब-किताब?
दोनों देशों के रुख से साफ हो गया कि कोई भी पक्ष नरमी बरतने के मूड में नहीं है और दोनों ही देश अंत तक व्यापार युद्ध लड़ने को तैयार हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दो आर्थिक महाशक्तियों की आपसी लड़ाई की पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा। इसका अर्थ इन दोनों देशों के व्यापार आंकड़े में छिपा है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल दोनों आर्थिक दिग्गजों ने करीब 585 अरब डॉलर मूल्य के सामान का व्यापार किया था। इनमें से अमेरिका ने चीन से 440 अरब डॉलर मूल्य के सामान आयात किए, जबकि एशियाई दिग्गज ने 145 अरब डॉलर मूल्य के यूएस उत्पाद आयात किए। यानी अमेरिका का व्यापार असंतुलन 295 अरब डॉलर का रहा है, जिसे वह टैरिफ लगाकर पाटने की कोशिशों में जुटा है।

क्या-क्या हो जाएगा महंगा?
चीन ने अमेरिका से सबसे ज्यादा सोयाबीन आयात किया है। इसे 4.40 करोड़ सुअरों के खिलाने के लिए मंगवाया है। इसके बाद बड़ी मात्रा में अमेरिका से फार्मास्यूटिकल्स और पेट्रोलियम उत्पाद मंगवाए हैं, जबकि अमेरिका चीन से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटर और खिलौने आयात करता है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक कारों के लिए बैटरी भी चीन से ही निर्यात किया जाता है।

मिडिया रिपोर्ट के अनुसार, चीन से अमेरिका में होने वाले आयात में सबसे बड़ा हिस्सा स्मार्टफोन का है, जो कुल आयात का 9 फीसदी है। इन स्मार्टफोन्स का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी एप्पल के लिए चीन में बनाया जाता है। अब ट्रंप के 104 फीसदी के जवाबी शुल्क से यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका में इन सामानों की कीमतों में भारी उछाल आने की संभावना है और इसका बोझ कहीं न कहीं अमेरिका जनता की जेब पर ही पड़ने वाला है। हालांकि, इस प्रतिशोध में अमेरिका से आयातित सामान की कीमतें भी चीन में बढ़नी तय हैं, जिसका बोझ चीनियों को उठाना पड़ेगा।

इस जंग का पूरी दुनिया पर क्या असर?
इस व्यापार युद्ध का पहला असर तो दुनिया भर के शेयर बाजारों पर दिखने लगा है। बुधवार को चीन का ब्लू-चिप सीएसआई300 इंडेक्स 1.2 प्रतिशत नीचे खुला, जबकि शंघाई कंपोजिट इंडेक्स 1.1 प्रतिशत गिरा। भारतीय शेयर बाजार में भी बुधवार को गिरावट देखने को मिली है। बाजा विशेषज्ञ इस टैरिफ वार से ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावट आने और मंदी आने की आशंका जता रहे हैं। विशेषज्ञ चीन की जीडीपी में गिरावट की आशंका भी जता रहे हैं।

गोल्डमैन सैक्स और बीएनपी पारिबा के अनुसार, 54 फीसदी टैरिफ पर ही 2025 में चीन की जीडीपी में 2.4 फीसदी की गिरावट आ सकती है। बड़ी बात यह है कि कोविड महामारी और आर्थिक मंदी से पहले ही चीनी अर्थव्यवस्था डगमग हाल में है और अभी संभल ही रही थी, तभी अमेरिकी टैरिफ से एक बार फिर चीन का आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है। हालांकि, गौर करने वाली बात यह भी है कि इस व्यापार युद्ध में चीन अकेली ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं होगी जिसे संकट झेलना पड़ेगा। अमेरिका को तो भुगतान करना ही होगा, साथ में कई पड़ोसी वियतनाम, दक्षिण कोरिया और अन्य देशों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन-अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 43%
अमेरिका में चीनी माल के दाम में बढ़ोत्तरी की वजह से उसकी मांग घट सकती है। इसके फलस्वरूप चीनी सामान आस-पड़ोस के बाजारों पर कब्जा कर सकता है। इससे उन देशों में उत्पादन, रोजगार और बाजार प्रभावित हो सकता है। इससे कई देशों में मंदी आ सकती है। भारत की अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं रह सकती है। वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फिति और मंदी का खतरा इसलिए भी गना हुआ है क्योंकि वैश्विक अर्थव्यस्था में IMF के अनुसार अमेरिका और चीन की हिस्सेदारी करीब 43 फीसदी की है।

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