बृजभूषण के करीबी का कायम हुआ ‘दबदबा’- भारतीय कुश्ती महासंघ से आखिर हटा बैन

नई दिल्ली खेल मंत्रालय ने भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) पर लगाया गया निलंबन हटा दिया है, जिससे खेल में कई महीनों से बनी अनिश्चितता समाप्त हो गई है और विभिन्न प्रतियोगिताओं के आयोजन का रास्ता भी साफ हो गया है, जिनमें अम्मान में होने वाली एशियाई चैंपियनशिप के लिए चयन ट्रायल भी शामिल है। मंत्रालय ने संचालन संबंधी गतिविधियों में खामियों के कारण 24 दिसंबर, 2023 को डब्ल्यूएफआई को निलंबित कर दिया था। नई संस्था का गठन इससे तीन दिन पहले 21 दिसंबर को हुआ था। डब्ल्यूएफआई के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के करीबी संजय सिंह का फिर से 'दबदबा' कायम हो गया। 'डब्ल्यूएफआई ने सुधारात्मक कदम उठाए' संजय सिंह के नेतृत्व वाली नई संस्था ने बृजभूषण शरण सिंह के गढ़ नंदिनी नगर, गोंडा में अंडर -15 और अंडर -20 राष्ट्रीय चैंपियनशिप आयोजित करने की घोषणा की थी, जिससे सरकार नाराज थी क्योंकि पूर्व भाजपा सांसद यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे थे। मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा कि डब्ल्यूएफआई ने सुधारात्मक कदम उठाए हैं और इसलिए खेल और खिलाड़ियों के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए मंत्रालय ने निलंबन हटाने का फैसला किया है। WFI को कुछ निर्देशों का करने है पालन संजय सिंह ने पीटीआई से कहा, ‘‘मैं इस फैसले के लिए मंत्रालय का आभार व्यक्त करता हूं। अब हम सुचारू रूप से काम कर सकेंगे। खेल के लिए यह बेहद जरूरी था। खिलाड़ी प्रतियोगिताओं में भाग नहीं ले पाने के कारण परेशान थे।’’ मंत्रालय ने हालांकि डब्ल्यूएफआई से कुछ निर्देशों का पालन करने को कहा है जैसे कि डब्ल्यूएफआई को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्वाचित पदाधिकारियों के बीच शक्ति का संतुलन बना रहे तथा वह स्वयं को निलंबित या बर्खास्त किए गए अधिकारियों से अलग रखे। 4 सप्ताह के अंदर हलफनामा देना होगा नए महासचिव प्रेम चंद लोचब विरोधी खेमे से चुने गए थे और मंत्रालय के निर्देश को उसी संदर्भ में समझा जा सकता है। मंत्रालय ने अपने आदेश ने कहा, ‘‘डब्ल्यूएफआई की कार्यकारी परिषद को इस संबंध में चार सप्ताह के अंदर हलफनामा देना होगा। किसी भी तरह का कोई भी उल्लंघन उचित कानूनी कार्रवाई को आमंत्रित करेगा, जिसमें खेल संहिता के तहत कार्रवाई भी शामिल है।’’ इसमें यह भी कहा गया है कि डब्ल्यूएफआई को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए चयन खेल संहिता के मौजूदा प्रावधानों और यूडब्ल्यूडब्ल्यू (कुश्ती की अंतरराष्ट्रीय संचालन संस्था) द्वारा समय-समय पर जारी नियमों के साथ इस संबंध में जारी अन्य नवीनतम निर्देशों के अनुसार स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए। ‘WFI जल्द करेगा ये जरूरी काम’ डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका पालन नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, ‘‘हम जल्द ही कार्यकारिणी की बैठक बुलाएंगे और चयन ट्रायल्स के लिए एक परिपत्र भी जारी करेंगे। हमें इन निर्देशों का पालन करने में कोई समस्या नहीं है।’’ एशियाई चैंपियनशिप का आयोजन 25 मार्च से जॉर्डन के अम्मान में किया जाएगा। मंत्रालय के निलंबन और प्रमुख पहलवान विनेश फोगाट, बजरंग पूनिया और सत्यव्रत कादियान द्वारा दायर अदालती मामलों के कारण भारतीय पहलवान जाग्रेब और अल्बानिया में रैंकिंग सीरीज़ टूर्नामेंट में भाग नहीं ले पाए थे। केवल WFI को मान्यता देता है UWW बृजभूषण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले पहलवानों ने तर्क दिया था कि निलंबित होने के कारण डब्ल्यूएफआई के पास राष्ट्रीय टीमों को चुनने का अधिकार नहीं है। अदालत ने भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) को डब्ल्यूएफआई का कामकाज संभालने के लिए तदर्थ पैनल को बहाल करने का निर्देश दिया था, लेकिन देश की सर्वोच्च खेल संस्था ने यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि यूडब्ल्यूडब्ल्यू केवल डब्ल्यूएफआई को मान्यता देता है और तदर्थ पैनल से प्रविष्टियां स्वीकार नहीं करेगा। ‘युवा खिलाड़ी खामियाजा भुगत रहे थे’ यूडब्ल्यूडब्ल्यू ने आईओए को धमकी दी थी कि अगर उसके प्रशासन में हस्तक्षेप किया गया तो डब्ल्यूएफआई को फिर से निलंबित कर दिया जाएगा। हरियाणा के एक प्रमुख अभ्यास केंद्र से जुड़े एक कोच ने कहा, ‘‘यह हम सभी के लिए राहत की बात है कि निलंबन हटा दिया गया है। प्रतियोगिताओं का आयोजन नहीं हो रहा था और युवा खिलाड़ी बिना किसी गलती के खामियाजा भुगत रहे थे। वे टूर्नामेंट नहीं खेल रहे थे, कोई राष्ट्रीय शिविर नहीं था। निलंबन बहुत पहले ही हटा लिया जाना चाहिए था।’’ recent visitors 27

सर्वे में देखने को मिला, इजरायली नागरिकों का कहना है कि पीएम नेतन्याहू को पद से इस्तीफा दे देना चाहिए

जरूसलम इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ उनके ही देश में असंतोष चरम पर पहुंच गया है। इसकी बानगी एक सर्वे में देखने को मिली, जिसमें करीब तीन चौथाई इजरायली नागरिकों का कहना है कि पीएम नेतन्याहू को 7 अक्टूबर, 2023 की घटनाओं की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट द्वारा रविवार को जारी किए गए मासिक सर्वे के नतीजों के अनुसार लगभग 75 फीसदी इजरायलियों का मानना है कि नेतन्याहू को अब अपना पद छोड़ देना चाहिए। टाइम्स ऑफ इजरायल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी महीने के लिए, किए गए एइजरायली वॉयस इंडेक्स (जो जनता की राय का एक मासिक सर्वेक्षण है) के सर्वे में 48 फीसदी लोगों का कहना है कि नेतन्याहू को तुरंत अपना पद छोड़ देना चाहिए, जबकि 24.5 फीसदी लोगों का मानना ​​है कि गाजा में युद्ध की समाप्ति के बाद उन्हें पीएम पद छोड़ देना चाहिए। इसके अलावा 14.5 फीसदी लोगों का कहना है कि उन्हें इस्तीफा दिए बिना और पद पर बरकरार रहते हुए गाजा से निपटने की जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। हालांकि, 10 फीसदी लोग ऐसे भी हैं, जिनका कहना है कि नेतन्याहू को अब न तो जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है और न ही इस्तीफा देने की जरूरत है। 'प्राइम मिनिस्टर नहीं क्राइम मिनिस्टर' कुल मिलाकर देखें तो इस सर्वे में पाया गया है कि कुल 72.5% लोगों का मानना ​​है कि नेतन्याहू को जिम्मेदारी लेनी चाहिए और अभी या युद्ध के बाद इस्तीफा दे देना चाहिए, जबकि 87% लोगों का मानना ​​है कि उन्हें 7 अक्टूबर की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, भले ही वे बाद में इस्तीफा दें या नहीं। बता दें कि इजरायल में लंबे समय से लोग 'प्राइम मिनिस्टर नहीं क्राइम मिनिस्टर' नाम का पोस्टर हाथों में थाम नेतन्याहू के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। यहूदियों में भी भारी रोष जहां तक बात रही यहूदियों की तो 45% यहूदी उत्तरदाताओं का मानना ​​है कि नेतन्याहू को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए, जबकि 59% अरबों का मानना है कि नेतन्याहू को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। यह यहूदियों की तुलना में काफी ज्यादा है। ये सर्वे 25 से 28 फरवरी के बीच कराए गए थे। 73 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इस बात पर अपनी सहमति जताई कि इजरायल को हमास के साथ युद्ध विराम/बंधक वापसी समझौते के दूसरे चरण में आगे बढ़ना चाहिए। इस समझौते में दुश्मनी की पूर्ण समाप्ति, गाजा से वापसी और सभी बंधकों की रिहाई के बदले में फिलिस्तीनी कैदियों की रिहाई शामिल है। गाजा पर समझौते से जुड़े सवाल के उत्तरदाताओं में नेतन्याहू की अपनी लिकुड पार्टी के 61.5% मतदाता शामिल थे। हालांकि समझौते को जारी रखने के लिए समर्थकों की संख्या अन्य गठबंधन दलों के मतदाताओं के बीच विरोधियों से ज्यादा है। recent visitors 32

अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित शिक्षक पर विभागीय कार्रवाई साक्ष्य प्रस्तुत करने का अंतिम अवसर

अम्बिकापुर विकासखंड सीतापुर के कन्या माध्यमिक शाला, भूसू के शिक्षक श्री राबर्ट लकड़ा के खिलाफ लगातार 11 वर्षों से अनाधिकृत अनुपस्थिति के मामले में विभागीय जांच पूरी कर ली गई है। जिला पंचायत सरगुजा द्वारा जारी अंतिम सूचना में उन्हें तीन दिनों के भीतर संबंधित कार्यालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया गया है, अन्यथा एकतरफा सेवा से बर्खास्तगी की कार्रवाई की जाएगी।       श्री राबर्ट लकड़ा 12 फरवरी 2014 से बिना किसी सूचना के अपने कर्तव्यों से अनुपस्थित हैं। कई बार कारण बताओ नोटिस जारी करने के बावजूद उन्होंने कोई जवाब प्रस्तुत नहीं किया। आरोप-पत्र और दस्तावेजों की तामिली के प्रयास भी विफल रहे क्योंकि उनका कोई संपर्क उपलब्ध नहीं हो सका। परिस्थितियों को देखते हुए, 09 जून 2023 को विभागीय जांच शुरू की गई और 04 मार्च 2025 को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसमें श्री लकड़ा के विरुद्ध लगे आरोप प्रमाणित पाए गए। अब अंतिम सूचना जारी करते हुए उन्हें 03 दिनों के भीतर उपस्थित होकर साक्ष्य प्रस्तुत करने का अंतिम अवसर दिया गया है। यदि शिक्षक श्री लकड़ा नियत समय में उपस्थित नहीं होते हैं, तो उनकी सेवा समाप्त करने की कार्रवाई की जाएगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी उनकी होगी। recent visitors 27

ट्रंप ने भारत को लेकर दावा किया था कि नई दिल्ली से उन्हें भरोसा मिला है कि अमेरिकी उत्पादों के आयात पर टैक्स में कमी की

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बढ़-चढ़कर दावे करने के लिए जाने जाते हैं। पिछले दिनों वाइट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यूक्रेन को यूरोप की फंडिंग को लेकर उन्होंने एक दावा किया था, जिसे उसी दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने खारिज कर दिया था। तब डोनाल्ड ट्रंप चुप रह गए थे। अब ऐसा ही मौका भारत के साथ भी आया है। उन्होंने भारत को लेकर दावा किया था कि नई दिल्ली से उन्हें भरोसा मिला है कि अमेरिकी उत्पादों के आयात पर टैक्स में कमी कर दी जाएगी। अब उनके इस दावे को भारत ने खारिज कर दिया है। वाणिज्य सचिव सुनील बरथवाल ने संसदीय पैनल को बताया है कि ऐसी कोई भी प्रतिबद्धता अमेरिका के आगे जाहिर नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि टैरिफ में कटौती जैसा कोई वादा भारत ने अमेरिका से नहीं किया है। विदेश मामलों की संसदीय समिति के समक्ष वाणिज्य सचिव ने बताया कि भारत और अमेरिका के बीच अब भी वार्ता जारी है। फिलहाल किसी भी तरह का ट्रेड अग्रीमेंट फाइनल नहीं हुआ है। संसदीय समिति के कई सदस्यों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे को लेकर चिंता जाहिर की थी। इस पर बरथवाल ने जवाब देते हुए कहा, 'अमेरिकी राष्ट्रपति के दावों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर ही कुछ नहीं कहा जा सकता। फिलहाल दोनों देशों के बीच ट्रेड अग्रीमेंट को लेकर वार्ता जारी है। भारत ने अब तक अमेरिका के साथ ट्रेड टैरिफ में कटौती की कोई प्रतिबद्धता जाहिर नहीं की है।' वाणिज्य सचिव ने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ समझौतों में भारतीय हितों का संरक्षण किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत फ्री ट्रेड का पक्षधर है और उदारता की नीति अपनाता है। हमारी कोशिश है कि दोनों देशों के बीच कारोबार में इजाफा हो। भारतीय अधिकारी ने कहा कि हम फ्री ट्रेड की बात करते हैं, लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि ट्रेड वार से किसी के भी हितों का संरक्षण नहीं हो सकेगा। इससे मंदी की आहट जरूर आ सकती है। बरथवाल ने ससंदीय समिति को बताया, ‘भारत मनमाने तरीके से टैरिफ में कोई कटौती नहीं करेगा। खासतौर पर ऐसे उद्योगों में जो घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत टैरिफ में कटौती के लिए द्विपक्षीय वार्ता को तरजीह देता है और यह भी ध्यान रखता है कि राष्ट्रीय हितों से समझौता न किया जाए।’ कनाडा और मेक्सिको से तुलना पर भी भारत ने दिया जवाब कनाडा और मेक्सिको के साथ भारत की तुलना को भी उन्होंने खारिज किया। बरथवाल ने कहा कि कनाडा और मेक्सिको के साथ तो अमेरिका का अवैध प्रवासी, घुसपैठ और सुरक्षा के मामले पर भी मतभेद है। लेकिन भारत का मामला अलग है। हम अमेरिका के साथ वही समझौता करेंगे, जो दोनों के लिए हितकारी हो। बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप लगातार दूसरे देशों से आने वाले सामान पर टैरिफ में इजाफे के ऐलान कर रहे हैं। इससे दुनिया भर के बाजारों को नुकसान पहुंच रहा है। डाउ जोंस, वॉल स्ट्रीट से लेकर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज तक में लगातार बिकवाली का माहौल बना हुआ है। खबर है कि भारत ने अमेरिका के साथ समझौते के लिए सितंबर 2025 तक का वक्त मांगा है। recent visitors 31

अस्पतालों में मुसलमानों के लिए अलग वार्ड बनाया जाए, जिससे हिंदू समुदाय सुरक्षित महसूस कर सके: विधायक केतकी सिंह

बलिया विधानसभा सदन में भोजपुरी में बोलने वाली बलिया के बांसडीह विधायक केतकी सिंह ने एक हैरान कर देने वाला बयान दिया है। सोमवार को बलिया पहुंचीं भाजपा एमएलए ने मीडिया से बातचीत करते हुए अस्पतालों में मुसलमानों के लिए अलग वार्ड बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों के लिए एक अलग विंग या बिल्डिंग बनाई जाए। जिससे हिंदू समुदाय सुरक्षित महसूस कर सके। उनका ये बयान अब सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। हाल ही में यूपी बजट में बलिया को मेडिकल कॉलेज का तोहफा मिला। यूपी विधानसभा सत्र खत्म होने के बाद बांसडीह विधायक केतकी सिंह सोमवार को बलिया पहुंची। यहां भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनका जमकर स्वागत किया। मेडिकल कॉलेज के लिए उन्होंने सीएम योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद दिया। साथ ही इसका श्रेय जनता को दिया। हालांकि मीडिया से बातचीत के दौरान केतकी सिंह कुछ ऐसा कह गईं जो अब सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा। दरअसल मेडिकल कॉलेज बनने को लेकर उन्होंने कहा, "मुसलमानों को तय करना है कि क्योंकि होली, दीवाली, रामनवमी जब होती है तो उनको दिक्कत होने लगती है। हो सकता है कि हमारे साथ इलाज कराने में भी उनको दिक्कत होने लगे। जब इतना खर्चा हो ही रहा है तो महराज जी (सीएम योगी) से एक कमरा बना ही दिया जाए, एक अलग विंग या बिल्डिंग बना ही दिया जाए। अगर आपको हमारे साथ रहने में दिक्कत है तो वहां इलाज करा लो।" केतकी सिंह ने आगे कहा, "हमारा इलाज तो होना ही है और अच्छा होना है। ये मांग कर रही हूं कि जब मेडिकल कॉलेज बन ही रहा है तो एक अलग विंग उन लोगों के लिए बना ही दिया जिससे हम भी सुरक्षित महसूस करें। क्या पता किस चीज पर थूक-थूकाकर हमें मिल जाए। उससे भी सुरक्षित रहें।" सदन में भोजपुरी में संबोधन पर विधायक का स्वागत सदन में पहली बार भोजपुरी में बोलने वाली भाजपा विधायक केतकी सिंह का सोमवार को विधानसभा सत्र के बाद पहली बार जिले में आगमन पर कार्यकर्ताओं ने रेलवे स्टेशन से लेकर उनके मैरीटार स्थित घर तक जगह-जगह स्वागत किया। लखनऊ-छपरा एक्सप्रेस से बलिया रेलवे स्टेशन पर पहुंची विधायक को कार्यकर्ताओं ने फूल-मालाओं से लाद दिया। recent visitors 31

हाईकोर्ट का आदेश बिना मान्यता के छात्रों को एडमिशन देने वाली यूनिवर्सिटी-कॉलेज पर केस दर्ज करो

जबलपुर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के अंतर्गत सेंट्रल लॉ कॉलेज के छात्रों को मान्यता न होने के चलते बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन ना होने के मामले में अब कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी गाज गिर सकती है। हाईकोर्ट ने इसे छात्रों के साथ धोखाधड़ी करार देते हुए भोपाल कमिश्नर को जांच के लिए आदेशित किया है। बार काउंसिल में एनरोलमेंट ना होने का मामला जबलपुर हाईकोर्ट में व्योम गर्ग,रागिनी गर्ग, शिखा पटेल एवं अन्य के ने स्टेट वॉर काउंसिल में होने वाले स्टूडेंट्स के एनरोलमेंट नहीं किए जाने पर याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में बताया कि स्टेट वॉर काउंसिल और यूनिवर्सिटी ने एफिलेटेड कॉलेज से लॉ की डिग्री प्राप्त किए जाने के बावजूद भी एनरोलमेंट नहीं किए। साथ ही याचिकार्ताओं ने हाईकोर्ट से मामले में दखल दिए जाने की गुहार लगाई। कोर्ट के द्वारा पिछली सुनवाई के दौरान लगाई गई थी फटकार इस याचिका में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की मुख्य बेंच ने राज्य सरकार को याचिका में मौजूद कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी समेत उन सभी कॉलेजों पर जो बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं उन पर कार्रवाई कर उसकी रिपोर्ट को अगली सुनवाई में पेश करने के निर्देश दिए गए थे। जिस पर राज्य सरकार के द्वारा रिपोर्ट पेश नहीं किए जाने पर कोर्ट ने फटकार लगाई। राज्य सरकार में उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना का नोटिस भी कोर्ट ने जारी किया। राज्य सरकार ने अपना पल्ला झाड़ा इस याचिका में हुई पूर्व की सुनवाई में सभी प्रतिवादियों की ओर से जवाब दाखिल किया गए। जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कॉलेज(सेंट्रल इंडिया लॉ कॉलेज) के द्वारा मान्यता शुल्क न दिए जाने की वजह से उसे मान्यता नहीं दिए जाने की बात कही गई है। जिस पर सरकार की तरफ से कोर्ट में बताया गया कि इस पूरे मामले में संबंधित यूनिवर्सिटी के द्वारा गलती की गई है। यूनिवर्सिटी ने कॉलेज का वेरिफिकेशन क्यों नहीं किया। जिस पर यूनिवर्सिटी ने यह तर्क दिया गया की बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा 2021-22 के लिए जारी कॉलेज की सूची में इस कॉलेज को व्यक्तिगत तौर पर अमान्य नहीं बताया गया था। कोर्ट ने बताया एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर अमान्य घोषित नहीं होने की वजह से इसे पोर्टल पर अपलोड किया गया और कॉलेज के द्वारा खुद को एफिलेटेड बताते हुए बच्चों के एडमिशन किए जाने का जवाब कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट के द्वारा सभी तर्कों के आधार पर इस पूरे मामले को एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर माना। हालांकि फिर भी राज्य की तरफ से खुद को गलत ना ठहराते हुए मामले से पल्ला झाड़ता की कोशिश की गई। चीफ जस्टिस की बेंच ने की सुनवाई इस याचिका पर सुनवाई चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने की। जिसमें सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आए कि नियम अनुसार नए कॉलेजों को प्रोविजनल मान्यता 3 सालों के लिए एवं रेगुलर कॉलेज को यह मान्यता 5 सालों के लिए दी जा सकती है। इसके बाद भी वार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कई मामलों में 20 साल बाद भी पूर्वाधार पर मान्यता दी गई है। जिसे कोर्ट ने छात्रों के साथ सीधी तौर पर धोखाधड़ी बताया। उच्च शिक्षा विभाग की ओर से कोर्ट में वीसी के माध्यम से प्रस्तुत हुए उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुपम राजन को भी कोर्ट ने फटकार लगाई। भोपाल कमिश्नर को जांच के आदेश कोर्ट ने कहा कि अब तक आप लोग क्या कर रहे थे। इसके साथ ही को कोर्ट ने भोपाल कमिश्नर को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए हैं और इस जांच में बार काउंसिल को भी भोपाल कमिश्नर की पूरी सहायता करने साथ ही जांच की रिपोर्ट को कोर्ट के समक्ष दो हफ्तों में पेश किए जाने के निर्देश जारी करते हुए इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को तय की गई है। इसके बाद जांच रिपोर्ट के आधार पर कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जा सकता है। recent visitors 41

Immigration and Foreigners Bill : अवैध अप्रवास रोकने के लिए सरकार ने नया विधेयक…

नई दिल्ली घुसपैठ और अवैध अप्रवास रोकने के लिए लाेकसभा में मंगलवार को अप्रवासन और विदेशी विधेयक 2025 पेश किया गया है। अमित शाह की तरफ से गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक पेश किया। उन्होंने कहा कि किसी को देश में आने से रोकने के लिए यह बिल नहीं लाया गया है, बल्कि यह विधेयक इसलिए लाया गया है कि विदेशी भारत आएं। वे यहां के नियमों का पालन करके ही आएं। हालांकि कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी और टीएमसी सांसद सौगत राय ने बिल का विरोध किया है। Immigration and Foreigners Bill 2025 का क्या है उम्मीद इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य भारत के इमिग्रेशन नियमों को आधुनिक बनाना और उन्हें मजूबत करना है। यह बिल भारत में दाखिल होने और यहां से बाहर जाने वाले व्यक्तियों के संबंध में पासपोर्ट या बाकी यात्रा दस्तावेजों की जरूरतों और विदेशियों से संबंधित मामलों को रेगुलेट करने की शक्तियां केंद्र सरकार को देगा। इनमें वीजा और रजिस्ट्रेशन की जरूरत और उससे संबंधित मामलों को शामिल किया गया है। इमिग्रेशन से जुड़ा यह विधेयक देश की सुरक्षा के लिहाज से काफी अहम है। इस विधेयक में कानूनी स्थिति साबित करने की जिम्मेदारी राज्य के बजाय व्यक्ति पर डाल दी गई है। यह विधेयक स्पष्ट रूप से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता या अखंडता के लिए खतरा माने जाने वाले किसी भी विदेशी नागरिक के प्रवेश या निवास पर पाबंदी लगाता है। साथ ही अनिवार्य करता है कि सभी विदेशी आगमन पर रजिस्ट्रेशन करें और उनकी आवाजाही, नाम परिवर्तन और संरक्षित या प्रतिबंधित क्षेत्रों में उनकी एंट्री पूरी तरह बैन हो। इसके अलावा, शैक्षणिक प्रतिष्ठानों, अस्पतालों और नर्सिंग होम जैसी संस्थाओं को इमिग्रेशन ऑफिसर को विदेशी नागरिकों की मौजूदगी की जानकारी देनी पड़ेगी। इमिग्रेशन नियमों के उल्लंघन के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान प्रस्तावित कानून में इमिग्रेशन नियमों के उल्लंघन के लिए सख्त सजा का भी प्रावधान किया गया है। वैध पासपोर्ट या वीज़ा के बिना भारत में अवैध रूप से एंट्री करने पर पांच साल तक की कैद और 5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। जाली दस्तावेज़ों का इस्तेमाल करने वालों को दो से सात साल तक जेल और एक लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। निर्धारित समय से अधिक समय तक रहना, वीजा शर्तों का उल्लंघन करना या प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश करने जैसे अपराधों के लिए तीन साल तक की कैद, 3 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। बिना उचित दस्तावेज के व्यक्तियों को लाने और ले जाने वाले ट्रांसपोर्ट को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। उन पर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है और भुगतान न करने पर उनके वाहन जब्त किए जा सकते हैं। ऐसे मामलों में जहां किसी विदेशी को प्रवेश से वंचित किया जाता है। ट्रांसपोर्टर पर उनके तत्काल प्रस्थान को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होगी। विधेयक में आव्रजन अधिकारियों को ज्यादा शक्तियां भी दी गई हैं। जिसमें बिना वारंट के व्यक्तियों को गिरफ्तार करने का अधिकार तक शामिल है। केंद्र सरकार के पास विदेशी नागरिकों के आवाजाही को लेकर इस कानून के बाद ज्यादा अधिकार आएंगे। इसमें प्रस्थान को रोकने, प्रवेश को प्रतिबंधित करने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पहुंच को प्रतिबंधित करने की पावर शामिल है। विदेशी नागरिकों को अपने खर्च पर भारत से बाहर निकलना होगा। पहचान के उद्देश्य से बायोमेट्रिक डेटा देना होगा।     प्रस्तावित कानून विदेशी अधिनियम 1946     भारत में प्रवेश के लिए पासपोर्ट अधिनियम 1920     विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम 1939     आव्रजन यानी वाहक दायित्व अधिनियम 2000 समेत कई औपनिवेशिक युग के कानूनों को बदलने की कोशिश है। ये कानून, मूल रूप से विश्व युद्ध के समय युद्धकालीन परिस्थितियों के लिए बनाए गए थे, अब पुराने हो चुके हैं। सरकार ने तर्क दिया कि आव्रजन नियमों को आधुनिक बनाने और गैर जरूरी प्रावधानों को खत्म करने के लिए एक एकीकृत कानून की जरूरत है। गृह राज्य मंत्री ने भी बिल पेश करते हुए इस बात पर जोर दिया कि यह बिल की पूरी तरह संवैधानिक है और सातवीं अनुसूचि में यह विषय आता है। भारत में प्रवेश और निष्कासन विषय के तहत यह बिल लाया गया है। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा के लिहाज से यह बिल बहुत जरूरी है। राय ने कहा कि हम किसी को रोकने के लिए यह बिल नहीं ला रहे बल्कि जो लोग आएं वे भारत के कानून का पालन करें। इसके लिए यह बिल ला रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी विदेशी के अस्पताल या फिर शैक्षणिक परिसर में जाने से पहले उसकी जानकारी अब भी मुहैया कराई जाती थी। लेकिन अब तक प्रावधान आदेश के रूप में था। जिसे कानून के रूप में लाया जा रहा है। नित्यानंद राय की ओर से बिल पेश करने के दौरान कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने बिल का विरोध करते हुए कहा कि यह मूलभूत अधिकारों का हनन है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक संविधान के मुताबिक नहीं है और इसमें विदेशी नागरिकों के अस्पताल में भर्ती होने तक का ब्यौरा मांगा गया है जो कि मेडिकल एथिक्स के खिलाफ है। तिवारी ने मांग करते हुए कहा कि इस बिल को वापस लिया जाए या फिर जेपीसी के पास भेजा जाए।   recent visitors 36