सीएम हेल्पलाइन चीख रही है, राजधानी बेहाल, व्यवस्था बदहाल, शिकायतों ने खोल दी सरकार की पोल

The CM Helpline is screaming for attention; the capital is in distress, the system is in shambles, and the complaints have exposed the government.

भोपाल । मध्य प्रदेश में विकास के दावों की चमक जितनी तेज़ दिखाई जाती है, सीएम हेल्पलाइन के आंकड़े उतनी ही तेजी से उस चमक की परतें उधेड़ रहे हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि जुलाई 2026 में नगरीय निकायों से जुड़ी 51,610 शिकायतें दर्ज हुईं। असली सवाल यह है कि आखिर जनता को अपनी बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए बार-बार मुख्यमंत्री की हेल्पलाइन तक क्यों पहुंचना पड़ रहा है?
क्या नगर निगम और नगर पालिकाएं अपने मूल दायित्व निभाने में विफल हो चुकी हैं? या फिर शिकायतों का अंबार इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक व्यवस्था जनता की अपेक्षाओं से बहुत पीछे छूट गई है?
स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब 44,126 शिकायतें ग्रेडिंग अवधि तक लंबित रह जाती हैं और 10,136 शिकायतें 50 दिन से अधिक समय तक फाइलों में धूल खाती रहती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि हजारों नागरिकों की समस्याएं सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटती रहीं, लेकिन समाधान नहीं मिला।

‘डी’ रेटिंग… क्या यह सिर्फ एक ग्रेड है या शासन की असफलता का प्रमाण?

प्रदेश के नगरीय निकायों को मिला ‘डी’ रेटिंग केवल एक प्रशासनिक रिपोर्ट नहीं है। यह उस व्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड है, जो शहरों को साफ रखने, सड़कें दुरुस्त करने, सीवर व्यवस्था संभालने, पेयजल उपलब्ध कराने और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाएं देने के लिए बनाई गई है।
जब पूरी व्यवस्था को ‘डी’ ग्रेड मिले, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह केवल अधिकारियों की नाकामी है, या फिर निगरानी और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है?

राजधानी भोपाल सबसे ऊपर… क्या यही मॉडल राजधानी है?

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि भोपाल पूरे प्रदेश में शिकायतों के मामले में पहले स्थान पर है।
6,469 शिकायतें।
यानी मध्य प्रदेश की हर आठवीं शिकायत राजधानी से।
यदि मुख्यमंत्री, मंत्रालय और अधिकांश वरिष्ठ अधिकारियों का शहर ही नागरिक सुविधाओं के संकट से जूझ रहा है, तो छोटे शहरों और कस्बों की वास्तविक स्थिति का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
भोपाल में हजारों शिकायतें लंबित रहना यह संकेत देता है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति, जवाबदेही और निगरानी की भी है।

जनता की मजबूरी: टैक्स दो… फिर शिकायत करो… फिर इंतजार करो

एक नागरिक टैक्स देता है ताकि उसे साफ सड़कें, स्वच्छ कॉलोनियां, नियमित पेयजल, बेहतर सीवर व्यवस्था और सुरक्षित सार्वजनिक सुविधाएं मिल सकें।
लेकिन वास्तविकता यह है कि नागरिक पहले समस्या झेलता है, फिर शिकायत दर्ज करता है, फिर महीनों इंतजार करता है, और कई मामलों में समाधान फिर भी नहीं मिलता।

क्या यही सुशासन है?

क्या ‘गुड गवर्नेंस’ सिर्फ भाषणों तक सीमित है?

हर सरकारी कार्यक्रम में सुशासन, डिजिटल प्रशासन और जनसेवा की बातें होती हैं।

लेकिन यदि लाखों लोग अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए हेल्पलाइन का सहारा लेने को मजबूर हों और उनमें से बड़ी संख्या समय पर हल ही न हो, तो यह डिजिटल सफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का संकेत माना जाएगा।
सरकार को यह भी बताना चाहिए कि वर्षों से चल रही शिकायतों के बावजूद आखिर कौन-सी स्थायी सुधार योजना लागू हुई, जिससे शिकायतों की संख्या कम होती दिखाई दे?

सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?

जब किसी निजी कंपनी का प्रदर्शन लगातार खराब होता है तो उसके प्रबंधन से जवाब मांगा जाता है।
लेकिन सरकारी व्यवस्था में हजारों शिकायतें लंबित रहने के बाद भी क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होती है?
क्या किसी नगर निगम आयुक्त, मुख्य नगर पालिका अधिकारी या संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से सार्वजनिक रूप से जवाब मांगा गया?
यदि नहीं, तो फिर सुधार की उम्मीद किस आधार पर की जाए?

लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है।

जब नागरिकों की आवाज़ लगातार हेल्पलाइन पर दर्ज होती रहे और समाधान की गति शिकायतों से पीछे रह जाए, तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि विश्वास का संकट बन जाता है।
‘डी’ रेटिंग किसी रिपोर्ट की एक पंक्ति भर नहीं है। यह उन हजारों परिवारों की कहानी है, जिन्हें साफ पानी, टूटी सड़क, जाम सीवर, अंधेरी गलियों और बदहाल नागरिक सेवाओं के बीच जीना पड़ रहा है।
सरकार के सामने चुनौती अब नई योजनाएं घोषित करने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की है कि सीएम हेल्पलाइन शिकायत दर्ज करने का माध्यम भर नहीं, बल्कि समाधान दिलाने की गारंटी भी है। क्योंकि जनता को आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए।

Loading spinner
Advertisement