69000 शिक्षक भर्ती : गलत दस्तावेज लगाकर नियुक्ति पाने वाले अभ्यर्थियों पर लगातार कार्रवाई जारी, अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग

लखनऊ 69000 शिक्षक भर्ती में गलत दस्तावेज लगाकर नियुक्ति पाने वाले अभ्यर्थियों पर लगातार कार्रवाई जारी है। ऐसे अभ्यर्थियों को जिलों में नौकरी से बर्खास्त किया जा रहा है। इसी क्रम में इस भर्ती में नौकरी के लिए आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों ने गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग की है। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का नेतृत्व कर रहे अमरेंद्र पटेल ने कहा कि गलत तरीके से नौकरी पाने वाले अभ्यर्थियों की संख्या बड़ी है। विभाग के अधिकारी अब भी उनका बचाव कर रहे हैं, जो गलत है। उन्होंने सरकार से मांग की कि गलत तरीके से नौकरी पाने वाले लोगों को बाहर किया जाए, साथ ही उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाए, जिन्होंने यह भ्रष्टाचार का खेल किया है। recent visitors 50

अरुणाचल में फिर शुरू हुआ विरोध- चीन से टक्कर के लिए भारत भी उसी नदी पर बना रहा बांध

ईंटानगर अरुणाचल प्रदेश के तीन जिलों में शुक्रवार को सैकड़ों लोगों ने सड़कों पर उतरकर सियांग नदी पर प्रस्तावित 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' (SUMP) के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। दरअसल इस प्रोजेक्ट के सर्वेक्षण के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की तैनाती की गई है। इससे लोग बेहद नाराज नजर आ रहे हैं। यह विवादास्पद परियोजना ईस्ट सियांग जिले के बेगिंग क्षेत्र में प्रस्तावित है। भारत सरकार का दावा है कि यह परियोजना चीन द्वारा तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाए जा रहे विशाल जलविद्युत बांध से उत्पन्न संभावित खतरे का मुकाबला करने के लिए जरूरी है। यारलुंग त्सांगपो नदी को भारत के अरुणाचल प्रदेश में सियांग और असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है। स्थानीय विरोध और तैनाती से तनाव बढ़ा स्थानीय लोग नवंबर 2024 से इस परियोजना के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं और सर्वेक्षण के प्रयासों को लगातार रोकते आ रहे हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने विरोध को काबू में करने और सर्वे कार्य को पूरा कराने के लिए अर्धसैनिक बलों की तैनाती की, जिससे नया विरोध भड़क गया। पासीघाट के निवासी निथ परोन ने बताया, “प्रदर्शन शांतिपूर्ण था। लेकिन जब सैकड़ों लोग एकत्र हुए, तो थोड़ी अफरा-तफरी मच गई, जिससे नदी पर बना एक झूलता पुल क्षतिग्रस्त हो गया। पुलिस या सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग नहीं किया है।” 100,000 से अधिक लोगों के विस्थापन की आशंका सियांग, ऊपरी सियांग और पूर्वी सियांग जिलों में स्थानीय निवासियों, विशेष रूप से आदि समुदाय के लोगों, ने इस प्रोजेक्ट का विरोध किया है, क्योंकि उनका मानना है कि यह उनकी आजीविका, कृषि भूमि और सांस्कृतिक विरासत को खतरे में डालेगा। सियांग नदी के दीते डाइम, परोंग और उग्गेंग क्षेत्रों में बनने वाली इस परियोजना से कम से कम एक लाख लोगों के विस्थापित होने की आशंका है। पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं, क्योंकि यह परियोजना जैवविविधता से भरपूर क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। सरकार ने दी राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने नवंबर में कहा था कि चीन द्वारा तिब्बत में बनाए जा रहे बांध से उत्पन्न खतरे- जैसे अचानक बाढ़ आना और जल संकट को देखते हुए भारत को तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा, “अगर हमने अभी कदम नहीं उठाया, तो हम बाहरी शक्तियों की दया पर निर्भर हो जाएंगे। यह परियोजना जल भंडारण कर बाढ़ नियंत्रण और जल संकट से निपटने में मदद करेगी।” खांडू ने कहा, "चीन का यारलुंग त्सांगपो पर बन रहा 60,000 मेगावाट का बांध अरुणाचल, असम और बांग्लादेश में तबाही मचा सकता है। SUMP इस खतरे का मुकाबला करने के लिए एक रणनीतिक कदम है।" ‘दिबांग रेजिस्टेंस’ ने दी कड़ी प्रतिक्रिया गुरुवार को ‘डिबांग रेजिस्टेंस’ नामक एक स्थानीय समूह ने बयान जारी कर कहा, “शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बावजूद सशस्त्र बलों की तैनाती न केवल गलत है, बल्कि उन लोगों की आवाज को दबाने जैसा है जो इस परियोजना से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।” उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को जमीन के वास्तविक मालिकों से सीधे संवाद करना चाहिए और उनकी चिंताओं को समझते हुए समाधान निकालना चाहिए। बयान में आगे कहा गया, “हमें एक साथ मिलकर ऐसा रास्ता खोजना होगा जो लोगों के अधिकारों और दृष्टिकोण को मान्यता देता हो। यह एक अनुचित और दमनकारी कदम है। हम अपने समुदाय के साथ खड़े हैं और न्याय की मांग करते रहेंगे।” चीन के बांध से क्षेत्रीय असंतुलन की आशंका दिसंबर 2024 में चीन ने दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध के निर्माण को मंजूरी दी थी, जो तिब्बत के पूर्वी क्षेत्र में स्थित है। इसका अनुमानित बजट 137 बिलियन डॉलर है और यह सालाना 300 अरब किलोवॉट-घंटा बिजली उत्पन्न करेगा- जो वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े ‘थ्री गॉर्जेस डैम’ से तीन गुना अधिक है। भारत और बांग्लादेश को निचले क्षेत्रों में इसके असर को लेकर गंभीर चिंता है।   recent visitors 56

सीएम साय पहुंचे नारायणपुर के बासिंग स्थित BSF कैंप, DRG जवानों के साथ खाया खाना

नारायणपुर बस्तर के नक्सल इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र में चलाया गया, जिसमें नक्सली लीडर बवस राजू समेत 27 नक्सली मारे गए। इस ऐतिहासिक अभियान के बाद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आज नारायणपुर के बासिंग स्थित BSF कैंप पहुंचे, जहां उन्होंने जवानों का हौसला बढ़ाया। इस दौरान DRG के जवानों को गश्त के लिए 200 मोटरसाइकिलें वितरित की गईं। मुख्यमंत्री ने ऑपरेशन में शहीद हुए जवानों के परिवारों से मुलाकात की और DRG के जवानों के साथ बैठकर भोजन भी किया, जिससे उनका मनोबल और भी ऊंचा हुआ। DRG की महिला कमांडो ने बताया कि पहली बार कोई मुख्यमंत्री उनके बीच आया, उनके साथ बैठकर भोजन किया और यह अनुभव उनके लिए गर्व का क्षण रहा। इस अभियान में उन्हें कठिन परिस्थितियों के बावजूद सफलता मिली और बीती रात उन्होंने अपनी जीत का जश्न भी मनाया। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को नारायणपुर के एसपी ने बताया कि यह सफलता किस तरह कठिन परिस्थितियों में हासिल हुई, कैसे उन्होंने 15 घंटे में 32 किलोमीटर का पैदल सफर तय किया, नदी-नालों को पार किया और सीधे बसव राजू के डेरे तक पहुंचे। इस अभियान की रणनीति और साहसिकता की प्रशंसा करते हुए मुख्यमंत्री ने आपका सरकार, आपका ग्राम अभियान के तहत जनचौपाल लगाकर स्थानीय ग्रामीणों से संवाद किया। उन्होंने ग्रामीणों से पूछा कि क्या उन्हें राशन मिल रहा है, बिजली की व्यवस्था है या नहीं, क्या महतारी वंदन योजना का लाभ उन्हें समय पर मिल रहा है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वे यही देखने और सुनने के लिए आए हैं कि सरकार की योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर पहुंच रहा है या नहीं। मुख्यमंत्री ने नक्सलियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील दोहराई सीएम साय ने कहा कि यह क्षेत्र नक्सलवाद से लंबे समय से प्रभावित रहा है। जब से उनकी सरकार सत्ता में आई है वे शांति बहाली के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, लेकिन नक्सल प्रभाव के कारण विकास अवरुद्ध था। अब जब केंद्र और राज्य दोनों में उनकी सरकार है तो बाकी क्षेत्रों की तरह यहां भी विकास होगा। उन्होंने नक्सलियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील दोहराई और बताया कि अब तक 1300 लोग नक्सली विचारधारा छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं। महिलाओं ने हाथ उठाकर कहा – महतारी वंदन योजना का मिल रहा लाभ मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जवानों की प्रतिबद्धता से उन्हें पूरा विश्वास है कि यह क्षेत्र जल्द ही नक्सलमुक्त होगा और सरकार का संकल्प 31 मार्च 2026 तक पूर्ण विकास और शांति की स्थापना अवश्य पूरा होगा। ग्रामीणों को अपने मंत्रियों से परिचय कराते हुए मुख्यमंत्री ने पूछा कि क्या सरकार बनने के बाद उन्हें योजनाओं का लाभ मिल रहा है। ग्रामीणों ने हाथ उठाकर महतारी वंदन योजना की पुष्टि की। एक महिला माहेश्वरी ने बताया कि उन्होंने महतारी वंदन योजना की राशि से सिलाई मशीन खरीदी और अब 4,000 से 5,000 तक की मासिक आमदनी कर रही है। सीएम साय ने ग्रामीणों को दी ये सौगातें मुख्यमंत्री ने मौके पर ही विकास कार्यों की कई घोषणाएं की। पुलिया निर्माण के लिए 20 लाख, खेल मैदान के लिए 10 लाख, सीसी रोड के लिए 25 लाख और घोटुल के लिए 15 लाख कुल 1 करोड़ 4 लाख की योजनाएं घोषित की। इसके अलावा गढ़ बंगाल से डोनर तक 30 किलोमीटर सड़क और डोंगरगढ़ से ओरछा तक सड़क निर्माण की भी घोषणा की। recent visitors 50

भारतीय डेलिगेशन के मॉस्को पहंचने से पहले भी यही स्थिति बनी रही, यहां घंटों ड्रोन अटैक की कोशिश की गई

रूस रूस ने बताया कि उसे पिछले तीन दिनों में देश भर में कम से कम 485 ड्रोन हमले का सामना करना पड़ा है। अकेले मॉस्को और इसके आसपास के इलाके में 63 ड्रोन अटैक की कोशिश की गई। आज भारतीय डेलिगेशन के मॉस्को पहंचने से पहले भी यही स्थिति बनी रही। यहां घंटों ड्रोन अटैक की कोशिश की गई। एयरपोर्ट को बंद करना पड़ गया। इसके कारण भारतीय सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को लेकर रूस यात्रा पर निकली फ्लाइट को घंटों तक हवा में चक्कर लगाना पड़ा। ऐसा कहा जा रहा है कि ड्रोन हमले के कारण एयरपोर्ट को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था। इस प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई डीएमके सांसद कनिमोझी कर रही हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन द्वारा किए गए ड्रोन हमले के कारण कई घंटों तक घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों उड़ानों का संचालन स्थगित रहा। इसके कारण सांसद कनिमोझी के नेतृत्व वाले डेलिगेशन को उतरने की अनुमति नहीं दी गई। इसके कारण फ्लाइट हवा में ही चक्कर लगाती रही। काफी देरी के बाद विमान की सुरक्षित लैंडिंग कराई गई। रूस में भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने हवाई अड्डे पर सर्वदलीय सांसदों के प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया और उन्हें सुरक्षित रूप से उनके होटल तक पहुंचाया। कनिमोझी रूस, स्पेन, ग्रीस, स्लोवेनिया और लातविया में एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही हैं। यह डेलिगेशन इन देशों को 22 अप्रैल के पहलगाम हमलों के जवाब में पाकिस्तान के खिलाफ भारत द्वारा हाल ही में शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बारे में जानकारी देगा। साथ ही क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति पर भारत का रुख भी स्पष्ट करेगा।   recent visitors 66

सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन आखिरी दिन भी सुनाए 11 फैसले

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन जस्टिस एएस ओका ने इस पुरानी रवायत को बदल दिया है। उन्होंने शुक्रवार को अपने आखिरी कार्यदिवस पर कई बेंचों में हिस्सा लिया और 11 फैसले दिए। ऐसा उन्होंने तब किया है, जब उनकी मां का एक दिन पहले ही निधन हुआ था। वह गुरुवार को ही अपनी मां के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए मुंबई गए थे और फिर लास्ट वर्किंग डे पर काम करने के लिए दिल्ली लौट आए। शुक्रवार को शीर्ष अदालत में उनका आखिरी दिन था और इस मौके पर भी वह सिर्फ विदाई समारोह के आयोजनों में ही नहीं रहे बल्कि 11 फैसले सुनाए। उनका शनिवार को लास्ट डे रहेगा, लेकिन आज आखिरी कार्यदिवस था। उन्होंने पहले ही कहा था कि वह रिटायरमेंट शब्द से नफरत करते हैं। इसके अलावा उनका कहना था कि जजों को आखिरी दिन भी फैसले सुनाने चाहिए और बेंच का हिस्सा बनना सही रहता है। इसी के तहत उन्होंने कई सुनवाई में हिस्सा लिया और फिर अंत में प्रतीकात्मक बेंच का भी हिस्सा बने, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे। किसी भी जज के रिटायरमेंट पर प्रतीकात्मक जज चीफ जस्टिस के नेतृत्व में बैठती है। ऐसा जस्टिस को सम्मानजनक विदाई के लिए किया जाता है और यह परंपरा शीर्ष अदालत में दशकों से चली आ रही है। जस्टिस ओका बोले- आखिरी दिन भी करना चाहिए पूरा काम बता दें कि 21 मई को जस्टिस ओका के लिए फेयरवेल समारोह आयोजित हुआ था। इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से किया गया था। इस दौरान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं इस परंपरा को सही नहीं मानता कि रिटायरमेंट के दिन जज काम ही न करें। मैं पसंद करूंगा कि आखिरी कार्यदिवस पर भी काम करूं और कुछ फैसलों का हिस्सा बनूं। इसके अलावा उनका कहना था कि रिटायर होने वाले जज के लिए गार्ड ऑफ ऑनर 1:30 बजे दिया जाता है, जिसमें थोड़ी देरी की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिरी दिवस पर कम से कम शाम को 4 बजे तक तो काम करना ही चाहिए। जिला अदालत से की थी शुरुआत और SC तक आ पहुंचे उन्होंने कहा था कि मैं तो रिटायरमेंट शब्द से ही नफरत करता हूं। बता दें कि जस्टिस ओका ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से लॉ की पढ़ाई करने के बाद जून 1983 से वकालत शुरू की थी। उन्होंने अपने पिता श्रीनिवास ओका के ठाणे जिला अदालत स्थित चेंबर से वकालत शुरू की थी और वहां से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक का सफर तय किया। उनकी 29 अगस्त, 2003 को बॉम्बे हाई कोर्ट में एंट्री हुई थी। तब वह अस्थायी जज थे और फिर 2005 में परमानेंट हुए। वह कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस 10 मई, 2019 को बने थे। फिर वह 31 अगस्त, 2021 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर आए। उनका कार्य़काल शीर्ष अदालत में करीब 4 साल का रहा है।   recent visitors 74

भारत सरकार ने नकदी रहित उपचार स्कीम की शुरू, स्वास्थ्य मंत्री जायसवाल ने बताया इन अस्पतालों में मिलेगा लाभ

रायपुर सड़क दुर्घटना में चोटिल होने वालों के लिए भारत सरकार ने नकदी रहित उपचार स्कीम शुरू की है. इस संबंध में जानकारी देते हुए स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा है कि यह एक बेहद जनउपयोगी योजना है, जिसमें सड़क दुर्घटना होने पर पीड़ितों को आयुष्मान योजना के अंतर्गत पंजीकृत अस्पताल में नकदी रहित मुफ्त उपचार सुविधा मिलेगी. स्वास्थ्य मंत्री जायसवाल ने बताया कि योजना के तहत दुर्घटना में हताहत व्यक्ति सात दिन तक डेढ़ लाख रुपए तक का निःशुल्क इलाज के लिए पात्र होगा. इस तरह से एक ही परिवार के दो व्यक्ति की दुर्घटना होती है तो 3 लाख तक, और 3 लोग हताहत होते हैं तो 4.5 लाख तक मुफ्त इलाज हो सकेगा. इसमें वे सभी हास्पिटल शामिल होंगे, जिन्हें आयुष्मान योजना के तहत शामिल किया गया है. श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि अगर किसी की दुर्घटना होती है और उसे नजदीकी आयुष्मान संबद्ध हास्पिटल में ले जाया जाता है. लेकिन वहां भी इलाज के संसाधन नहीं हैं, या स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं है, तो वह हास्पिटल तुरंत दूसरे अस्पताल में केस भेजेगा और पोर्टल में इसे अपडेट करेगा, ताकि विशेषज्ञ वाली जगह में तुरंत इलाज शुरू हो सके. उन्होंने कहा कि अभी ट्रामा और पॉलीट्रामा के अंतर्गत कुछ और सक्षम हास्पिटल को इस योजना के तहत शामिल किया जाएगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसका लाभ मिल सके. इसके लिए सभी मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देशित किया गया है. स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने इस जनहितकारी और महत्वपूर्ण योजना को राज्य में तत्काल प्रारंभ करने के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और गृह मंत्री विजय शर्मा को धन्यवाद देते हुए उनका आभार व्यक्त किया है. recent visitors 48

किस मजहब के लोग सबसे ज्यादा छोड़ रहे अपना धर्म और क्या अपना रहे, जाने दिलचस्प है आंकड़ा

नई दिल्ली दुनिया भर के कई देश मजहब के नाम पर संघर्ष कर रहे हैं तो वहीं आंतरिक संघर्ष भी आस्था के नाम पर होते रहे हैं। लेकिन विश्व में एक ऐसा तबका भी तेजी से बढ़ रहा है, जो किसी धर्म में आस्था ही नहीं रखता यानी नास्तिक। खासतौर पर यूरोप, अमेरिका, साउथ कोरिया आदि में मजहब से दूरी बनाने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे मसलों पर शोध करने वाली संस्था प्यू रिसर्च के अनुसार इटली, जर्मनी, स्पेन, स्वीडन जैसे देशों में जन्म से प्राप्त धर्म को छोड़ने वाले लोगों की संख्या अधिक है। सर्वे के अनुसार इटली में 28.7 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो नास्तिक हो गए हैं और उन्होंने अपने परिवार से प्राप्त धर्म को छोड़ दिया है। ऐसे ही जर्मनी में 19.8 फीसदी, स्पेन में 19.6 पर्सेंट और स्वीडन में 16.7 फीसदी लोगों ने अपना धर्म छोड़ दिया है और खुद को नास्तिक घोषित किया है। इसी तरह चिली में 15, मेक्सिको में 13.7 फीसदी और नीदरलैंड में 12.6 पर्सेंट लोगों ने अपने जन्म से प्राप्त धर्म छोड़ा है। इनमें से 99 फीसदी से ज्यादा लोग ईसाई थे, जो अब खुद को नास्तिक बताने लगे हैं। इस तरह धर्म छोड़कर जाने वाले लोगों की सबसे ज्यादा संख्या ईसाइयों की है। यूके में भी धर्म के प्रति लोगों की रुचि कम हो रही है और करीब 12 फीसदी लोग नास्तिक हो गए हैं। इसी तरह जापान में 10.7, ग्रीस में 10.2, कनाडा में 9.5 फीसदी लोगों ने अपना धर्म त्याग दिया है और अब उनका कहना है कि वे किसी भी मजहब में आस्था ही नहीं रखते। किस पंथ के लोग सबसे ज्यादा छोड़ रहे हैं अपनी आस्था अब सवाल यह है कि ब्रिटेन से लेकर इटली तक नास्तिक बनने वाले लोगों की बड़ी संख्या किस पंथ की है और इससे किसे ज्यादा नुकसान है। इसका जवाब भी प्यू रिसर्च के सर्वे में दिया गया है। सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा ईसाई धर्म से जुड़े लोगों ने ही खुद को नास्तिक घोषित कर लिया है। सर्वे में बताया गया कि 28.4 फीसदी ने ईसाई धर्म छोड़ा है तो महज 1 फीसदी ने ही अपनी आस्था बदलते हुए ईसाई पंथ को अपनाया है। वहीं जर्मनी में 19.7 फीसदी ईसाई ऐसे हैं, जो अब खुद को नास्तिक बताने लगे हैं। इस तरह दुनिया के कई मुल्कों में तेजी से ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो किसी भी धर्म में आस्था नहीं रखते। वहीं दिलचस्प बात है कि इस्लाम और हिंदू धर्म ऐसे हैं, जिनमें अपना जन्म से प्राप्त धर्म छोड़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। recent visitors 76