नई दिल्ली
विदेशी निवेशकों के लिए भारत सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बना गया है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों, निजी इक्विटी फर्मों और स्थानीय स्तर पर परिचालन करने वाली कंपनियों ने डिविडेंड इनकम, प्रॉफिट और रिइनवेस्टेड अर्निंग्स के रूप में अप्रैल-जून तिमाही में कुल 12.2 अरब डॉलर कमाए। यह वह राशि है जो विदेशी निवेशकों ने तीन महीने के दौरान भारत से निकाली। यह पांच साल पहले की तुलना में दोगुना से भी अधिक है जो भारतीय फाइनेंशियल एसेट्स की मजबूत आय संभावनाओं को रेखांकित करता है।
आरबीआई के आंकड़ों से यह भी पता चला है कि कुल इनवेस्टमेंट इनकम आउटफ्लो जून तिमाही में दोगुना से ज्यादा बढ़ा है। 2019 की अप्रैल-जून तिमाही में यह $11 अरब था जो इस साल इसी अवधि में $21.6 अरब हो गया है। अमेरिका स्थित कंसल्टेंसी बैन एंड कंपनी की एक रिपोर्ट के अनुसार 2024 की पहली छमाही में निजी इक्विटी से निकासी छह साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। एग्जिट डील वैल्यू में साल-दर-साल 40% की वृद्धि हुई, जो कैलेंडर वर्ष 2023 की पहली छमाही में $9.5 अरब से बढ़कर 2024 की पहली छमाही में $13.3 अरब हो गई।
क्या कहते हैं जानकार
PwC इंडिया के पार्टनर-रिस्क कंसल्टिंग और लीडर-फाइनेंशियल सर्विसेज और ट्रेजरी रिस्क मैनेजमेंट, कुंतल सूर ने कहा, 'पिछले कुछ वर्षों में पीई फर्मों ने अच्छा मुनाफा कमाया है। बढ़ते शेयर बाजारों ने उन्हें लिस्टेड फर्मों में उनके निवेश के लिए अच्छा मूल्यांकन दिया। इससे उन्हें निवेशकों को अच्छा रिटर्न देने का मौका मिला। इसके अलावा कई निवेशकों के लिए ब्याज दरें अधिक होने के कारण उनके देशों में पुनर्निवेश के कई अवसर रहे हैं।' बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत में किए गए निवेश से प्राप्त लाभ और लाभांश भी निवेश आय में परिलक्षित होते हैं।
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'इसके दो कारक हैं। पहला, ऐसे समय में समग्र राजस्व में वृद्धि करना जब मंदी के कारण लाभ अस्थिर हो। दूसरा, विनिर्माण के कुछ क्षेत्रों में अतिरिक्त क्षमता को देखते हुए पुनर्निवेश की कम आवश्यकता महसूस की जाती है।' जानकारों का कहना है कि यह आउटफ्लो चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकता है और बाहरी क्षेत्र के संकेतकों के लिए हानिकारक हो सकता है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह अभी भी चालू खाते के आउटफ्लो का एक छोटा हिस्सा है।

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