वरिष्ठता की अनदेखी बीईओ प्रभार वितरण पर उठे सवाल

शिक्षा विभाग में मनमानी पर उतारू हैं अधिकारी

मण्डला
 आदिवासी विकास विभाग द्वारा 26 जून 2020 को जारी स्पष्ट निर्देशों के बावजूद विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) के रिक्त पदों पर वरिष्ठता और समकक्षता को दरकिनार करते हुए मनमाने ढंग से प्रभार सौंपे जा रहे हैं। शासन के निर्देश थे कि बीईओ के रिक्त पदों का प्रभार वरिष्ठ अधिकारियों को ही सौंपा जाए और किसी कनिष्ठ अधिकारी को वरिष्ठ की उपस्थिति में यह जिम्मेदारी देना अनुचित और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए नुकसानदायक होगा।
     इसके विपरीत जिले में इन निर्देशों की खुलेआम अवहेलना हो रही है। विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद उन्हें दरकिनार कर कनिष्ठ अधिकारियों को पदभार सौंपा गया है। यह स्थिति न केवल वरिष्ठ अधिकारियों के आत्मसम्मान के खिलाफ है बल्कि विभागीय नैतिकता और संतुलन को भी प्रभावित कर रही है।
        स्थिति यह है कि कुछ विकासखंडों में वरिष्ठ अधिकारियों को "लूप लाइन" में डाल दिया गया है, यानी उन्हें ऐसी जिम्मेदारियों से वंचित कर दिया गया है जहाँ उनके अनुभव और क्षमता का कोई उपयोग नहीं हो रहा। वहीं, कुछ चुनिंदा अधिकारियों को तीन-तीन, चार-चार प्रभार देकर अत्यधिक कार्यभार सौंपा गया है। यह कार्यप्रणाली शासन की मंशा के एकदम विपरीत है और विभागीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
           सूत्रों के अनुसार अधिकारियों की उपलब्धता को जानबूझकर कम दिखाया गया है ताकि कुछ नजदीकी और पसंदीदा अधिकारियों को ही सभी प्रमुख पदों पर बनाए रखा जा सके। इससे योग्य और वरिष्ठ अधिकारी हतोत्साहित हो रहे हैं और विभाग में असंतोष का माहौल बनता जा रहा है।
        शिक्षा व्यवस्था पर इसका प्रतिकूल असर पड़ना स्वाभाविक है। जब योग्य अधिकारी निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिए जाते हैं और केवल "पहुंच" और "नजदीकी" आधार बन जाती है, तो इसका सीधा प्रभाव शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रशासनिक सुचारुता पर पड़ता है।
       यह मामला अब विभागीय चर्चाओं का केंद्र बन चुका है। जानकारों का कहना है कि यदि जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए, तो सच्चाई सामने आ सकती है और अनुचित लाभ उठाने वालों की पहचान हो सकती है।
        शासन के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करना गंभीर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। अतः जिला प्रशासन से अपेक्षा की जाती है कि वह इस विषय को गंभीरता से लेते हुए उच्च स्तरीय जांच कराए और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे। इससे न केवल योग्य अधिकारियों को उनका अधिकार मिलेगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भी एक नया विश्वास और संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।

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