प्रदूषण से कान, नाक और गले पर भी बुरा असर पड़ता है, हल्के में न लें

नई दिल्ली दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण अति गंभीर श्रेणी में पहुंच गया है। महीने भर से सिलसिला जारी है हालांकि बीच में कुछ हद तक स्थिति नियंत्रण में थी लेकिन एक बार फिर एक्यूआई ने लोगों की पेशानी पर बल डाल दिया है। प्रदूषण से कान, नाक और गले पर भी बुरा असर पड़ता है। हाल ही में इसे लेकर दिल्ली में एक सर्वे कराया गया, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य निकल कर सामने आए। हेल्थकेयर प्रदाता प्रिस्टीन केयर द्वारा कराए सर्वेक्षण में दिल्ली, मेरठ, फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद, रोहतक, चंडीगढ़, कानपुर आदि शहरों के 56,176 व्यक्तियों को शामिल किया गया। इनमें से लगभग आधे (41 प्रतिशत) ने उच्च प्रदूषण की अवधि के दौरान आंखों से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी, जबकि 55 प्रतिशत ने अपने कान, नाक या गले को प्रभावित करने वाली समस्याओं की बात बताई। इनमें से 38 प्रतिशत ने प्रदूषण की वजह से आंखों में जलन और सूजन की शिकायत की है। इसके प्रभावित लोगों में आंखें में लालिमा और खुजली जैसे आम लक्षण दिखाई दिए। लोगों ने प्रदूषण बढ़ने के दौरान इन बीमारियों में वृद्धि का उल्लेंख किया। इसमें गले में खराश, नाक में जलन और कान में तकलीफ जैसी ईएनटी समस्याएं भी शामिल थीं। इन स्वास्थ्य समस्यांओं ने दीर्घकालिक चिंताएं पैदा की। इस सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि ईएनटी समस्यांओं से जूझ रहे 68 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों से परामर्श नहीं करते। प्रिस्टिन केयर के ईएनटी सर्जन डॉ. धीरेंद्र सिंह ने बताया, ”खतरनाक वायु गुणवत्ता सभी के स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक है। बच्चे विशेष रूप से इसके प्रति संवेदनशील हैं। ऐसी हवा के संपर्क में आने से नाक और कान में संवेदनशील श्लेष्म झिल्ली में जलन हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप समय के साथ पुरानी स्थितियां हो सकती हैं। इन सबसे बचने के लिए बाहरी संपर्क को कम करना, मास्क पहनना और हाइड्रेटेड रहना आवश्यक है। इसके साथ ही आंखों के स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।” वही प्रिस्टिन केयर के सह-संस्थापक डॉ वैभव कपूर ने कहा, “यह जानकर आश्चर्य होता है कि लोग प्रदूषण और स्वास्थ्य पर इसके हानिकारक प्रभाव को कितने हल्के में लेते हैं। आंख और ईएनटी से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि के उपायों की तत्काल आवश्यकता पर जोर देती है। बढ़ते प्रदूषण के स्तर के साथ, व्यक्तियों को अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता है।” इन चुनौतियों के बावजूद सर्वेक्षण ने जनता के बीच इससे निपटने के उपायों को अपनाने में कमी नजर आई। केवल 35 प्रतिशत ने सुरक्षात्मक आईवियर या धूप का चश्मा पहनने की सूचना दी, और लगभग 40 प्रतिशत ने उच्च प्रदूषण वाले दिनों में ईएनटी से संबंधित मुद्दों के लिए कोई विशेष सावधानी नहीं बरतने की बात स्वीकार की। फिर भी, आधे से अधिक लोगों ने आंखों और ईएनटी स्वास्थ्य पर प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में चिंता व्यक्त की।   recent visitors 138

वायु प्रदूषण के गंभीर स्थिति को देखते दिल्ली में केंद्र सरकार के कर्मचारियों का भी समय बदला

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने दिल्ली में वायु प्रदूषण के गंभीर स्थिति को देखते हुए बृहस्पतिवार को अपने कर्मचारियों के लिए काम के अलग-अलग समय की घोषणा की। केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय द्वारा जारी आदेश में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए कर्मचारियों से वाहनों में साथ आने-जाने (वाहन पूलिंग) और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने को भी कहा गया है। इससे पहले दिल्ली सरकार और एमसीडी भी अपने दफ्तरों की टाइमिंग बदल चुकी है। आदेश में कहा गया कि दिल्ली में वायु प्रदूषण के गंभीर स्तर को देखते हुए केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और संगठनों को दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित कार्यालयों के संबंध में अलग-अलग समय अपनाने की सलाह दी जाती है। आदेश में कहा गया कि कार्यालय सुबह नौ बजे से शाम साढ़े पांच बजे तक और सुबह 10 बजे से शाम साढ़े बजे तक खुले रह सकते हैं। इसमें कहा गया है कि निजी वाहनों का उपयोग करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों को वाहन प्रदूषण को कम करने के लिए ‘वाहन पूलिंग’ करने और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। आदेश में कहा गया है कि यह सुनिश्चित करते हुए कि इसका किसी भी तरह से दक्षता और उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े, इन उपायों को मंत्रालयों/विभागों/संगठनों द्वारा अपनी कार्य से जुड़ी जरूरतों के अनुसार अपनाया जा सकता है। दिल्ली में एक सप्ताह से जारी ‘गंभीर’ प्रदूषण स्तर के बाद वायु गुणवत्ता में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन यह अब भी ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, बृहस्पतिवार सुबह नौ बजे राष्ट्रीय राजधानी में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 376 दर्ज किया गया। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्रीय सचिवालय सेवा (सीएसएस) अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक निकाय ने 18 नवंबर को गंभीर प्रदूषण स्तर के चलते घर से काम करने, काम के अलग-अलग समय और सभी कार्यालय भवनों में वायुशोधक लगाने की मांग की थी। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के सचिव को लिखे पत्र में सीएसएस फोरम ने कहा कि खराब वायु गुणवत्ता का कार्यस्थल उत्पादकता पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ रहा है। कर्मचारियों को श्वसन संबंधी समस्याएं, आंखों में जलन, थकान के लक्षण महसूस हो रहे हैं। recent visitors 85

दुनिया में होने वाली हर आठ में से एक मौत का कारण वायु प्रदूषण, वायु प्रदूषण तंबाकू से भी ज्यादा खतरनाक होता

नई दिल्ली क्या आपको पता है कि दुनिया में होने वाली हर आठ में से एक मौत का कारण वायु प्रदूषण होता है? एक तरह से वायु प्रदूषण तंबाकू से भी ज्यादा खतरनाक होता है. स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2024 की रिपोर्ट बताती है कि 2021 में दुनियाभर में तंबाकू की वजह से अनुमानित 75 से 76 लाख मौतें हुई होंगीं. जबकि, वायु प्रदूषण के कारण 81 लाख मौतें. यानी, दुनिया में 12% मौतों का कारण जहरीली हवा है. वहीं, दुनियाभर में हर साल एक करोड़ से ज्यादा मौतें हाई ब्लडप्रेशर के कारण होती हैं. ये बातें इसलिए चिंता बढ़ाती हैं, क्योंकि राजधानी दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) का स्तर 500 के करीब पहुंच गया है. यानी अब यहां AQI 'गंभीर' की श्रेणी में आ गया है. जब ये 'गंभीर' की श्रेणी में आ जाता है तो अच्छे-खासे तंदरुस्त लोग भी बीमार पड़ सकते हैं. ये रिपोर्ट बताती है कि सबसे बड़ा रिस्क PM2.5 है. PM2.5 का मतलब है 2.5 माइक्रोन का कण. ये बहुत ही महीन कण होता है. इसे ऐसे समझिए कि ये इंसान के बाल से भी 100 गुना ज्यादा पतला होता है. ये इतना छोटा है कि नाक और मुंह के जरिए हमारे शरीर में घुस जाता है. जैसे ही ये हमारे शरीर में आता है तो दिल और फेफड़ों को प्रभावित करता है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में PM2.5 के कारण 78 लाख मौतें हुई थीं. यानी, वायु प्रदूषण के कारण जितनी मौतें हुई थीं, उनमें से 96 फीसदी से ज्यादा की वजह यही कण था. इतना ही नहीं, वायु प्रदूषण के कारण होने वाली 90 फीसदी से ज्यादा बीमारियों का कारण भी यही छोटा सा कण होता है. सबसे खतरनाक PM2.5 2024 की स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर की रिपोर्ट बताती है कि 2021 में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण जहरीली हवा ही थी. सबसे ज्यादा खतरा साउथ एशियाई और अफ्रीकी देशों पर है. रिपोर्ट से पता चलता है कि 81 लाख मौतों में से 58 फीसदी की वजह वातावरण में मौजूद प्रदूषण रहा. जबकि, 38 फीसदी मौतें घरों के अंदर मौजूद प्रदूषण की वजह से हुई थीं. चिंता बढ़ाने वाली बात ये है कि पांच साल से छोटे बच्चों की मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण भी वायु प्रदूषण ही है. इतने छोटे बच्चों की मौतों की सबसे बड़ी वजह है. जबकि, वायु प्रदूषण के कारण 2021 में पांच साल से छोटे 7 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी. इतना ही नहीं, साउथ एशिया और अफ्रीकी देशों में जन्म के बाद पहले महीने में होने वाली 30 फीसदी से ज्यादा मौतों का कारण भी जहरीली हवा ही है. भारत के लिए कितना बड़ा खतरा? एक अनुमान के मुताबिक, भारत में हर साल तंबाकू की वजह से 10 लाख के आसपास लोग मारे जाते हैं. जबकि, वायु प्रदूषण के कारण 21 लाख लोग मारे गए थे. यानी, लगभग दोगुना. इस हिसाब से देखा जाए तो भारत में हर महीने औसतन 1.75 लाख और हर दिन 5,753 लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हो जाती है. अकेले भारत में ही पांच साल से कम उम्र के 1.69 लाख बच्चों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हो गई थी. ये आंकड़ा दुनिया में सबसे ज्यादा था. दूसरे नंबर पर नाइजीरिया था, जहां 1.14 लाख बच्चों की मौत हुई थी. पाकिस्तान में 68 हजार से ज्यादा बच्चे मारे गए थे. रिपोर्ट बताती है कि वायु प्रदूषण के कारण होने वाले अस्थमा 5 से 14 साल की उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है. 15 फरवरी 2013 को लंदन की रहने वालीं 9 साल की एला किस्सी-डेब्रा की मौत अस्थमा अटैक से हो गई थी. वो दुनिया की पहली शख्स हैं, जिनके डेथ सर्टिफिकेट में मौत की वजह 'वायु प्रदूषण' दर्ज है. रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में सबसे जहरीली हवा साउथ एशियाई देशों में है. वायु प्रदूषण के कारण दुनिया में जितनी मौतें हुई थीं, उनमें आधी से ज्यादा सिर्फ भारत और चीन में हुई थी. चीन में 23 लाख तो भारत में 21 लाख लोगों की मौत का कारण वायु प्रदूषण था. हवा में मौजूद PM2.5 सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि इससे बेमौत ही लोग मारे जा रहे हैं और हार्ट डिसीज, लंग कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं. भारत में हर एक लाख आबादी में से 148 की मौत का कारण वायु प्रदूषण है. ये वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है. PM2.5 में नाइट्रेट और सल्फेट एसिड, केमिकल, मेटल और धूल-मिट्टी के कण होते हैं. ये कण इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों में काफी अंदर तक घुस सकते हैं और गंभीर रूप से बीमार कर सकते हैं. इस कारण दिल और फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोगों की मौत भी हो सकती है. जबकि, स्वस्थ लोगों को इससे हार्ट अटैक, अस्थमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारी हो सकती है. इसी साल जनवरी में एक स्टडी आई थी, जिसमें दावा किया गया था कि दुनियाभर में PM2.5 की सबसे ज्यादा मात्रा भारत में है. वहीं, दिल्ली में इसकी मात्रा सबसे ज्यादा है. इस स्टडी में दावा किया गया था कि सर्दी के मौसम में भारत में घर के अंदर की हवा बाहर की हवा से 41% ज्यादा प्रदूषित होती है. हाल ही में साइंस जर्नल लैंसेट में एक स्टडी छपी थी. स्टडी में बताया गया था कि शहरी इलाकों में वायु प्रदूषण नॉन-स्मोकर्स में लंग कैंसर के खतरे को बढ़ा रहा है. recent visitors 154

Air Pollution : जहरीली हवा से पाक के शहर बेहाल, AQI पहुंचा 1000 के पार

लाहौर पाकिस्तान का लाहौर प्रदूषण से जूझ रहा है, इसको देखते हुए वहां के सभी प्राइमरी स्कूलों को एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया गया है. शनिवार को पाकिस्तान के लाहौर में प्रदूषण का स्तर 1000 के पार पहुंच गया, ये काफी खतरनाक स्तर है. वहीं पाकिस्तान के पंजाब में भी AQI रविवार को 1000 पहुंच गया है. जो कि अभूतपूर्व है. लाहौर के 14 मिलियन के करीब लोग प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं, ये प्रदूषण, डीजल वाली गाड़ियों से निकालने वले धुआं और पराली जलाने के साथ- साथ मौसम सर्द होने के कारण बढ़ रहा है. लाहौर के पर्यावरण अधिकारी ने बताया कि मौसम पूर्वानुमान के अनुसार शहर की हवा आने वाले 6 दिनों में ऐसी ही रहने वाली है और इसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है. जिस वजह से लाहौर के सभी प्राथमिक स्कूलों को एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया गया है. बच्चों के लिए प्रदूषण ज्यादा खतरनाक है पंजाब (पाकिस्तान)  की मंत्री मरियम औरंगजेब ने कहा कि ये धुआं लोगों के लिए कभी हानिकारक है, हम लगातार स्थितियों पर नजर रख रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि हमने बच्चों के लिए स्कूल में मास्क को अनिवार्य कर दिया है. बच्चों को प्रदूषण से ज्यादा खतरा होता है, क्योंकि बच्चों का फेफड़ा बड़ो की तुलना में कम विकसित होता है. औसत जीवन प्रत्याशा में आई गिरावट पिछले सप्ताह लाहौर के अधिकारियों ने सारे स्कूलों में बाहर की गतिविधियों पर अगले साल की जनवरी तक के लिए रोक लगा दिया था, साथ ही प्रदूषण से बचने के लिए स्कूल के समय भी बदलाव किया था. इसके अलावा लाहौर के सरकारी और निजी दफ्तरों ने भी अपने आधे कर्मचारियों को सोमवार से घर से काम करने के लिए कहा है. वहीं शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के अध्ययन के अनुसार लाहौर के लोगों की औसतन जीवन प्रत्याशा में 7.5 साल की कमी आई है.     recent visitors 76

पराली जलाने के कारण दिल्ली की वायु गुणवत्ता खराब हो रही, सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा और पंजाब को लगाई फटकार

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पंजाब और हरियाणा सरकारों को पराली जलाने वाले किसानों से केवल नाममात्र का मुआवजा वसूलने पर कड़ी फटकार लगाई। पराली जलाने के कारण दिल्ली की वायु गुणवत्ता खराब हो रही है, जिससे राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को भी खूब सुनाया। कोर्ट ने कहा कि आयोग पराली जलाने की घटनाओं पर नियंत्रण करने में असफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि आयोग ने पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए उनके निर्देशों को लागू करने का कोई प्रयास नहीं किया है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह भी कहा कि 29 अगस्त को दिल्ली में वायु प्रदूषण पर चर्चा के लिए बुलाई गई आयोग की बैठक में केवल 11 में से 5 सदस्य ही उपस्थित हुए थे, और अदालत के निर्देशों पर कोई चर्चा भी नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि जब तक लोग यह नहीं समझेंगे कि उन्हें वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा, तब तक पराली जलाना नहीं रुकेगा। प्रदूषण फैलाने के खिलाफ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को सौंपी गई है। हालांकि अदालत ने पाया कि न तो आयोग और न ही पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारें इस समस्या को समाप्त करने के प्रति गंभीर हैं, जहां पराली जलाने की घटनाएं अब भी हो रही हैं। जस्टिस अभय एस ओका की अध्यक्षता वाली बेंच ने CAQM की स्थिति रिपोर्ट की समीक्षा के बाद ये टिप्पणियां कीं। अदालत ने पिछले हफ्ते आयोग और उसकी विभिन्न उप-समितियों से इस समस्या को सुलझाने के लिए वर्षों से उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी मांगी थी, क्योंकि सर्दियों के महीनों में पराली जलाने से दिल्ली की वायु गुणवत्ता बेहद खराब हो जाती है। रिपोर्ट की समीक्षा करते हुए, बेंच जिसमें जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल थे। उन्होंने कहा, "जब तक लोग यह नहीं जानेंगे कि उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाएगा, तब तक वे नहीं रुकेंगे और न ही उन्हें उपलब्ध मशीनों का इस्तेमाल करेंगे।" अदालत ने यह भी नोट किया कि आयोग केवल राज्य सरकारों के साथ बैठकें आयोजित करने में व्यस्त है और अपने आदेशों को लागू करने के प्रयास नहीं कर रहा है। अदालत ने कहा कि आयोग को अधिनियम की धारा 14 और 15 के तहत अपराधियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने, जुर्माना लगाने और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को बंद करने का अधिकार है। अदालत ने कहा, "किसी न किसी कारण से वे किसी के खिलाफ मामला दर्ज नहीं करना चाहते। आपको अपने आदेशों को पत्र और भावना में लागू करना चाहिए। केवल बैठकें बुलाने से कुछ नहीं होगा, कार्रवाई जरूरी है।" केंद्र और CAQM की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि पराली जलाने पर कड़ी कार्रवाई के आदेश 10 जून, 2010 को जारी किए गए थे और उसके बाद कई आदेश पारित हुए, जिनमें आखिरी आदेश अप्रैल 2024 का है। इसमें राज्य सरकारों को अवैध पराली जलाने के खिलाफ कार्रवाई करने और आयोग और केंद्र द्वारा प्रस्तावित अन्य उपायों को लागू करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें पराली हटाने की मशीनें उपलब्ध कराना और पराली जलाने वाले किसानों को हतोत्साहित करना शामिल है। ASG ने यह भी बताया कि इस साल अब तक आयोग की तीन उप-समितियों की 11 बैठकें हो चुकी हैं। अदालत ने कहा, "आयोग खुद ही अपने आदेशों को लागू कराने का प्रयास करता नहीं दिख रहा है।" अदालत ने पंजाब और हरियाणा सरकारों से जून 2010 और अप्रैल 2024 के आदेशों को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों की रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने यह भी कहा कि आयोग के आदेशों को लागू करने के लिए बनाई गई उप-समिति की अंतिम बैठक 29 अगस्त को हुई थी, जिसमें जून 2010 के आदेश का कार्यान्वयन एजेंडे में नहीं था। अदालत ने कहा, "यदि किसानों के खिलाफ मुकदमा नहीं चल सकता, तो अधिकारियों को दोषी ठहराया जाना चाहिए। आपको दिखाना चाहिए कि आपने जो तंत्र 2021 के अधिनियम के तहत बनाया था, वह अभी भी मौजूद है।" ASG ने अदालत को बताया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत एफआईआर दर्ज की गई हैं, जो अधिकारियों द्वारा जारी आदेशों की अवहेलना से संबंधित है। बेंच ने कहा, "आपने दंडित करने के लिए सबसे हल्का प्रावधान चुना है, जबकि आपके पास CAQM अधिनियम के तहत कठोर प्रावधान हैं।" CAQM द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से पता चला कि 15 से 30 सितंबर के बीच पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की 129 अवैध घटनाएं हुईं। अदालत ने कहा कि उनसे जुर्माना वसूलना कोई उद्देश्य पूरा नहीं करेगा, क्योंकि इस समय की जरूरत है कि उन्हें कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाए। पंजाब सरकार ने अदालत को बताया कि किसानों को वैकल्पिक प्रोत्साहन प्रदान करने के बाद ही दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए, जैसे कि पराली हटाने की मशीनें। राज्य के एडवोकेट जनरल गुरमिंदर सिंह ने कहा कि राज्य में 1.4 लाख से अधिक मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन 10 एकड़ से कम भूमि वाले छोटे किसानों को इन मशीनों को चलाने के लिए ड्राइवर और ईंधन चाहिए।  recent visitors 77