ट्रांसपोर्ट कंपनी पर कोर्ट ने लगाया एक करोड़ से अधिक राशि का जुर्माना

भोपाल दिसंबर 2018 में इंदौर भोपाल हाईवे पर एक निजी बस ने स्कॉर्पियो गाड़ी को टक्कर मारी थी. इस हादसे में गाड़ी में सवार महिला व बाल विकास परियोजना के अधिकारी रंजीत धर्मराज की मौके पर मौत हो गई थी. जिसके बाद परिजनों ने न्याय के लिए न्यायलय का रुख किया था. अब 5 साल बाद इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है. कंपनी परिजनों को एक करोड़ से अधिक राशि का करें भुगतान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश खंडेलवाल ने सुनवाई के दौरान कहा कि रंजीत धर्मराज महिला व बाल विकास विभाग में परियोजना अधिकारी के पद पर पदस्थ थे और अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी से इंदौर से भोपाल जा रहे थे. इसी दौरान रास्ते में सोनकच्छ के पास वर्मा ट्रेवल्स की बस ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी. इस हादसे में उनकी मौके पर ही मौत हो गई. इस मामले में कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए परिजनों को एक करोड़ से अधिक की मुआवजा राशि देने के नोटिस जारी किया है. न्यायालय ने कहा कि गलती बस का संचालन कर रही निजी कंपनी की है. इस स्थिति में क्षतिपूर्ति के रूप में बीमा कंपनी परिजनों को भुगतान करें. बिना परमिट इंदौर-भोपाल रूट पर दौड़ रही थी निजी कंपनी की बस बता दें कि जब अधिकारी रंजीत धर्मराज की स्कॉर्पियो गाड़ी को वर्मा बस ने टक्कर मारी थी, उस दौरान बस में परमिट नहीं था और परमिट के इस बस का संचालन किया जा रहा था. इतना ही नहीं रूट परमिट ना होने के बाबजूद ये बस इंदौर-भोपाल रूट पर दौड़ रही थी. recent visitors 81

धार कलेक्टर सहित दो अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट ने गिरफ्तारी वारंट जारी …

इंदौर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले के कलेक्टर प्रियांक मिश्र और जिला पंचायत के मुख्य तत्कालीन कार्यपालन अधिकारी शृंगार श्रीवास्तव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का आदेश दिया है। अदालत के आदेश का पालन नहीं करने पर यह आदेश जारी किया गया है। इस मामले में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रसन्ना भटनागर ने बताया कि याचिकाकर्ता मिथुन चौहान ग्राम पंचायत नालछा जिला धार में ग्राम रोजगार सहायक के पद पर पदस्थ था। 25 फरवरी 2017 को स्वास्थ खराब होने के कारण वह एक दिन कार्य पर उपस्थित नहीं हो सका। एक दिन की अनुपस्थिति को कदाचरण बताते हुए, बिना जांच किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए उसे हटा दिया गया। हाईकोर्ट में लगाई थी रिट याचिका उक्त आदेश को चुनौती देते हुए ग्राम रोजगार सहायक ने अपील प्रस्तुत की, लेकिन अपील भी निरस्त कर दी गई। जिसके बाद उसने 2019 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में रिट याचिका प्रस्तुत की। इसके बाद हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए 22 अगस्त 2023 को उसकी सेवा समाप्ति के आदेश को निरस्त कर दिया गया था। इसके साथ ही यह आदेश भी दिया गया कि ग्राम रोजगार सहायक को 50 प्रतिशत पिछले वेतन सहित वापस नौकरी पर रखा जाए। हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया इस आदेश को चुनौती देते हुए शासन के द्वारा अपील प्रस्तुत की गई, लेकिन 3 जुलाई 2024 को अपील भी निरस्त हो गई। अपील निरस्त होने के बाद भी हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया।याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका प्रस्तुत की जिसमें दिनांक 20 सितंबर 2024 को शासन को यह निर्देश दिए कि वह आदेश का पालन करें। इसके साथ ही 4 अक्टूबर 2024 को न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहें। इसके बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया और न ही उक्त दोनों अधिकारी हाईकोर्ट में उपस्थित रहे। इसलिए न्यायालय द्वारा कलेक्टर और मुख्य कार्यपालन अधिकारी के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए गए हैं। recent visitors 93

कोर्ट ने अधिवक्ता से पूछा अधिकारी सेवानिवृत्ति की कगार पर पहुंच चुके, लिफाफा खोलकर क्यों पदोन्नति का लाभ नहीं दे रहे

 जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति द्वारिकाधीश बंसल ने अवमानना प्रकरण पर सुनवाई करते हुए ओपन-कोर्ट में अपनी तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रशासनिक अधिकारी छह माह में भी आदेश का पालन नहीं करा सकते तो पद से त्यागपत्र दे दें। कोर्ट ने यह कटाक्ष गृह विभाग के तत्कालीन एसीएस और वर्तमान में जीएडी के एसीएस संजय दुबे पर किया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि 14 अक्टूबर तक आदेश का पालन सुनिश्चित नहीं किया गया तो अनावेदक अधिकारी अवमानना कार्रवाई के लिए तैयार रहें। यदि उन्हें आदेश अनुचित लगे तो अपील करने स्वतंत्र होंगे। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को नियत की गई है। ऑर्डर शीट अभी नहीं आई अवमानना याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी विजय पुंज की ओर से अधिवक्ता मनोज चंसोरिया ने पक्ष रखा। उन्होंने अवगत कराया कि फिलहाल इस मामले की ऑर्डर-शीट बाहर नहीं आई है। किंतु ओपन कोर्ट में जताई गई नाराजगी उल्लेखनीय है। पदोन्नति का लिफाफा खोलकर लाभ प्रदान किया जाए कोर्ट ने मौखिक आदेश में साफ कर दिया है कि अवमानना याचिकाकर्ता की पदोन्नति का लिफाफा खोलकर लाभ प्रदान किया जाए। दरअसल, हाई कोर्ट ने मार्च में पुंज की याचिका पर सुनवाई करते हुए राहतकारी आदेश पारित किया था। कैबिनेट से समन्वय नहीं बना पाए लेकिन छह माह बीतने के बावजूद राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता यह तर्क दे रहे हैं कि मामले में कैबिनेट से समन्वय किया जाना है इसलिए देरी हो रही है। इस दलील को गंभीरता से लेकर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी कर दी कि ऐसे अधिकारी को इस्तीफा दे देना चाहिए जो छह माह बीतने के बावजूद कैबिनेट से समन्वय नहीं बना पाए हैं। 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहा अवमानना याचिकाकर्ता अधिवक्ता मनोज चंसोरिया ने अवगत कराया कि अवमानना याचिकाकर्ता पुंज इसी वर्ष 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। लिहाजा, राज्य शासन के वकील की ओर से एक माह की मोहलत मांगना बेमानी है। यह सुनते ही कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता से पूछा आप कारण बताइए कि क्यों आपके अधिकारी सेवानिवृत्ति की कगार पर पहुंच चुके अवमानना याचिकाकर्ता के प्रकरण में लिफाफा खोलकर पदोन्नति का लाभ नहीं दे रहे हैं। recent visitors 83

सनातन और योगी आदित्यनाथ के खिलाफ की थी आपत्तिजनक टिप्पणी, हाईकोर्ट ने कहा-नहीं होगी FIR निरस्त

जबलपुर भगवान राम, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और हिंदू धर्म के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक इंस्टाग्राम पोस्ट के मामले में मोहम्मद बिलाल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। मोहम्मद बिलाल ने सतना के एक पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294, 153ए, 295ए और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1) और 3(2) के तहत उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी। बिलाल ने अपनी याचिका में दावा किया था कि कुछ लोगों ने दो दिन पहले उसका इंस्टाग्राम अकाउंट हैक कर लिया और आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड कर दिया। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की सिंगल जज बेंच ने कहा, "एफआईआर से यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता से पूछा था कि उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर आपत्तिजनक पोस्ट क्यों अपलोड की गई है। यह बताने के बजाय कि वह पोस्ट उसका अकाउंट हैक करके किसी और ने अपलोड की है, उसने (याचिकाकर्ता) शिकायतकर्ता को गाली देना और अपमानित करना शुरू कर दिया और उसकी धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचाई।'' पिछले महीने के हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया था, "याचिकाकर्ता का यह आचरण दर्शाता है कि उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर किसी और द्वारा आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड करने का बचाव गलत है। चूंकि याचिकाकर्ता ने खुद अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड करने की बात स्वीकार की है, इसलिए उसे शिकायतकर्ता के साथ जिस तरह से प्रतिक्रिया की गई, उस तरह से प्रतिक्रिया करने का कोई अधिकार नहीं है।" जस्टिस अहलूवालिया ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, इस पर इस समय विचार नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया है कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि संबंधित एफआईआर में संज्ञेय अपराध का खुलासा किया गया है, हस्तक्षेप करने का कोई मामला नहीं बनता है। recent visitors 62

हाईकोर्ट ने कहा कोविड से मौत पर नहीं मिला परिवार को क्लेम, सरकार ने निगम के सहायक दरोगा को अपात्र बताया, ब्याज समेत मुआवजा देने के आदेश

इंदौर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने कोविड के दौरान नगर निगम में कार्यरत कर्मचारी की मृत्यु के मामले में उसकी पत्नी को मुख्यमंत्री कोविड 19 योद्धा कल्याण योजना का लाभ देने का आदेश दिया है। योजना के अंतर्गत मिलने वाली राशि पर शासन को बैंक दर से ब्याज भी देना होगा। मामला निगमकर्मी जगदीश करोसिया का है। 10 जुलाई 2020 को नगर निगम ने उन्हें सुपरवाइजर के रूप में नियुक्ति दी थी। उनके जिम्मे कोरोना संक्रमित क्षेत्र में सैनिटाइजर इत्यादि से छिड़काव करवाने की जिम्मेदारी थी। काम के दौरान 29 अगस्त 2020 को उनकी कोरोना से मृत्यु हो गई। यह भी पढ़ें जगदीश की पत्नी अलका ने शासन को आदेश देकर मुख्यमंत्री कोविड 19 योद्धा कल्याण योजना का लाभ दिए जाने की गुहार लगाई, लेकिन डिप्टी रिलीफ कमिश्नर ने नियमों का हवाला देते हुए इस आवेदन को निरस्त कर दिया। उनका कहना था कि वे योजना के लिए पात्र नहीं हैं। इस पर एडवोकेट आयुष अग्रवाल के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर ने शासन को आदेश दिया कि वह जगदीश की पत्नी को योजना का लाभ दे। कोर्ट ने योजना के तहत मिलने वाली सहायता राशि पर बैंक दर से ब्याज भी दिलवाया है। कर्बला मैदान मामले में हाई कोर्ट में दायर हुई अपील कर्बला मैदान मामले में 13 सितंबर को आए जिला न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में अपील दायर हुई है। यह अपील पंच मुसलमान कर्बला मैदान कमेटी लालबाग रोड इंदौर की ओर से दायर हुई है। अपील में निगमायुक्त, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड भोपाल और अन्य को पक्षकार बनाया गया है। गौरतलब है कि 13 सितंबर को पंद्रहवें जिला न्यायाधीश नरसिंह बघेल ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि नगर निगम इंदौर कर्बला मैदान की खसरा नंबर 1041 की 6.70 एकड़ जमीन का स्वामी है। उक्त अपील इसी फैसले को चुनौती देते हुए दायर की गई है। recent visitors 84

MP के पांच अफसर मुश्किल में फंसे, हाईकोर्ट ने जमानती वारंट जारी किया

 इंदौर मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के 5 अफसरों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया गया है. इंदौर हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना करने पर मध्य प्रदेश सरकार के पांच अफसर मुश्किल में फंस गए हैं. हाईकोर्ट  ने इन सभी के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है. मामला एक कर्मचारी के वेतनमान से जुड़ा है.     इंदौर के एक कर्मचारी के पक्ष में हाईकोर्ट ने अप्रैल-2024 में फैसला दिया था. इसके बाद भी  मध्यप्रदेश सरकार ने उसे यह लाभ नहीं दिया. इसी के खिलाफ कर्मचारी ने अवमानना की याचिका लगाई थी, जिस पर हाईकोर्ट ने जमानती वारंट जारी किया. इनके खिलाफ जारी किया वारंट हाईकोर्ट ने 12 अगस्त-2024 को हुई सुनवाई में स्वास्थ्य विभाग से जुड़े पांच अधिकारियों मोहम्मद सुलेमान, दिनेश श्रीवास्तव, विवेक पोरवाल, आरसी पनिका और मनीष रस्तोगी के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है. 9 सितंबर को मामले में अगली सुनवाई होगी, जिसमें सभी अधिकारियों को पेश होने के लिए कहा है. वेतनमान नहीं मिला तो ली हाईकोर्ट की शरण संविदा कर्मियों के लिए पूर्व मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने एक पॉलिसी बनाई थी, जिसमें 100 पर्सेंट वेतनमान देने का फैसला लिया गया था. ज्यादातर कर्मचारियों को जद में ले लिया और उन्हें वेतनमान मिल भी गया, लेकिन विभागीय लापरवाही के कारण कुछ कर्मचारी छूट गए. एक कर्मचारी हैं पार्थन पिल्लई, जो इंदौर में स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हैं. उन्हें वेतनमान नहीं मिला. उन्होंने अफसरों को इस संबंध में बताया, लेकिन कुछ नहीं हुआ. आखिर में उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली.     याचिकाकर्ता ने बताया कि कम्प्युटर प्रोग्रामर हूं और एमसीए और एमबीए हूं. पांच साल से संषर्ष कर रहा हूं, कोई सुनवाई नहीं है. अपनी पत्नी के जेवर बेच दिए हैं और इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है. नवंबर-2023 में हाईकोर्ट ने आदेश दिया और दूसरे कर्मचारियों की तरह वेतनमान देने के लिए कहा. 4 महीने में वेतनमान मिलना था, लेकिन अप्रैल-2024 तक वेतनमान नहीं मिला तो पार्थन पिल्लई ने अवमानना याचिका कोर्ट में लगाई थी. जिस पर सिंगल बेंच के जज प्रणव वर्मा ने आदेश सुनाया.   recent visitors 81

ट्रैफिक पुलिस के उपनिरीक्षक की हत्या के मामले में आरोपित युवक को दोषी करार देते हुए 7 साल जेल और अर्थदंड की सजा सुनाई

भोपाल  राजधानी की एक अदालत ने ट्रैफिक पुलिस के उपनिरीक्षक की हत्या के मामले में आरोपित युवक को दोषी करार देते हुए 7 साल जेल और अर्थदंड की सजा सुनाई है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश अमिताभ मिश्र की अदालत ने तीन साल पुराने मामले में यह फैसला दिया है। आरोपित उस वक्त एमटेक की पढ़ाई कर रहा था। ट्रैफिक सब इंस्पेक्टर ने उसकी बाइक का 600 रुपए का चालान काट दिया था, जिससे नाराज होकर उसने चाकू से हमला कर दिया था। हमले में बुरी तरह घायल सब इंस्पेक्टर की 13 दिन तक चले इलाज के बाद मौत हो गई थी। इस प्रकरण में शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक सुधाविजय सिंह भदौरिया ने पैरवी की। यह था मामला जनसंपर्क अधिकारी मनोज त्रिपाठी ने बताया कि 7 अगस्त 2021 को एसआई श्रीराम दुबे एमपी नगर क्षेत्र में ड्यूटी पर तैनात थे। उस दिन उनकी ड्यूटी थाना द्वारा संचालित क्रेन पर थी, जो नो पार्किंग जोन में खड़े वाहनों को उठाने का काम करती है। उसी दौरान उन्होंने ज्योति टाकीज के पास नो-पार्किंग मे खड़ी एक बाइक को क्रेन से उठाकर क्राइम ब्रांच थाना परिसर में लाकर खड़ा कर दिया था। थोड़ी देर बाद दोपहर करीब 01 बजे हर्ष मीणा नामक युवक (जिसने वहां बाइक खड़ी की थी) बाइक लेने के लिए क्राइम ब्रांच के परिसर में बने जब्ती के वाहनों के यार्ड में पहुंचा। एसआई ने उससे 600 रुपये का चालान बनवाने को कहा, जिसको लेकर उसकी एसआई से बहस हो गई थी। वह उस वक्त तो चालान रसीद कटवाने के बाद बाइक लेकर वहां से चला गया। बाद में वह फिर आया और क्राइम ब्रांच थाने के गेट के पास खड़ा हो गया। उसी दौरान उसने एसआई के पास आकर फिर उनसे बहस की और अचानक चाकू निकालकर उनके पेट में घोंप दिया। घायल एसआइ को उपचार के लिए जेपी अस्पताल पहुंचाया गया था, जहां से कुछ समय बाद उनकी छुट्टी कर दी गई थी। पेट में गहरा घाव होने कारण दो दिन बाद एसआई की हालत बिगड़ने लगी थी। घटना के तेरह दिन बाद एसआई दुबे की मौत हो गई थी। न्यायालय ने आरोपित को भारतीय दंड विधान की धारा 304 भाग दो में 7 वर्ष के कारावास और 3 हजार रुपये के अर्थदण्ड से दंडित किया है। recent visitors 77