महा-सुनवाई में CJI और ममता बनर्जी के बीच बहस, SIR मामले पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर जारी विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सीएम ममता बनर्जी ने खुद अदालत में अपनी बात रखने की कोशिश की. हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने बीच में ही उन्हें टोकते हुए कहा कि उनकी ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और श्याम दीवान पहले ही सभी दलीलें रख चुके हैं. बता दें कि इस मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी सोमवार को होगी. चुनाव आयोग पर ममता के आरोप बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी ने कहा कि वह न्याय के लिए अदालत आई हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्होंने चुनाव आयोग को तमाम फैक्ट्स बताए थे, लेकिन उन्हें नहीं सुना गया. इस पर CJI ने साफ किया कि आपकी नई याचिका में कुछ नए मुद्दे जरूर हैं, लेकिन जो बातें आप कह रही हैं, वे आपके वकील पहले ही अदालत के सामने रख चुके हैं. वोटर्स के नाम हटाए जा रहे हैंः ममता बनर्जी सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने रवींद्रनाथ टैगोर की स्पेलिंग में बदलावों का जिक्र करते हुए लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात कही. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है और राज्य में बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि फाइनल वोटर लिस्ट के लिए अब सिर्फ 11 दिन बचे हैं और यह प्रक्रिया 14 फरवरी तक पूरी होनी है, जबकि इस मामले की सुनवाई के लिए केवल चार दिन का समय बचा है. उन्होंने कहा कि राज्य में करीब 32 लाख ‘अनमैप्ड वोटर्स’ हैं और लगभग 3.26 करोड़ नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ पाई गई है, जो कुल मतदाताओं का करीब 20 प्रतिशत है. श्याम दीवान ने मांग की कि चुनाव आयोग को ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट’ में शामिल हर मतदाता का नाम सार्वजनिक करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के बावजूद कई मामलों में केवल नाम, उम्र और लिंग दर्ज हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि मतदाता का नाम सूची से क्यों हटाया गया. लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे वोटर लिस्ट में क्यों नहीं हैं. इस पर CJI ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि यह प्रक्रिया सिर्फ एक सामान्य सूचना नहीं है, बल्कि संबंधित लोगों को व्यक्तिगत नोटिस भी दिए जा रहे हैं. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह समय कृषि और त्योहारों का है, ऐसे में कई लोग अपने गृह जनपद से बाहर हैं. CJI ने सवाल किया कि जब बंगाल में बीएलओ पर दबाव और मौतों की बातें सामने आ रही हैं, तो असम जैसे राज्यों में ऐसा क्यों नहीं हो रहा. 'बंगाल को टारगेट किया जा रहा है' ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों में चुनाव आयोग सभी दस्तावेज स्वीकार कर रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल के मामले में उन्हें खारिज किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब त्योहार और फसल कटाई का मौसम है और बड़ी संख्या में लोग राज्य से बाहर हैं. इस दौरान ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सऐप कमीशन’ तक कह दिया. उन्होंने कहा, “इलेक्शन कमीशन… सॉरी, व्हाट्सऐप कमीशन यह सब कर रहा है. लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं. बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है.” सुनवाई के अंत में CJI ने कहा कि अदालत समय बढ़ाने का निर्देश दे सकती है. उन्होंने ममता बनर्जी से कहा कि अदालत को उनके वकील श्याम दीवान की काबिलियत पर पूरा भरोसा है और उन्होंने अपने लिए श्रेष्ठ वकील चुने हैं. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार को तय की है. CJI ने कहा कि चुनाव आयोग आज उठाए गए मुद्दों पर निर्देश लेकर अदालत के समक्ष आए. वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार को उपलब्ध ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची पेश करने को कहा गया है. सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की ओर से अधिकारियों के प्रति ‘होस्टिलिटी’ को लेकर लिखित आशंका जताई गई है. अदालत में क्या-क्या हुआ, यहां देखें ECI के वकील: 'मेरी इंस्ट्रक्शन यह थी कि सिर्फ स्पेलिंग की मामूली गलती पर नोटिस जारी नहीं किया जाएगा.' CJI: 'राज्य का एग्जीक्यूटिव हेड भी आज यहां मौजूद है. क्या यह संभव नहीं कि राज्य बंगला भाषा के विशेषज्ञ उपलब्ध कराए, जो समिति के साथ बैठकर स्थानीय उच्चारण और स्पेलिंग पर सलाह दें?' ममता बनर्जी: 'मैं इस पर सफाई दे सकती हूं, क्योंकि मैं उसी राज्य से हूं.' CJI: 'इसमें कोई संदेह नहीं कि आप वहीं से हैं.' ममता बनर्जी: 'बेंच का धन्यवाद कि मुझे बोलने की अनुमति दी गई. 'समस्या यह है कि वकील तब लड़ते हैं, जब सब कुछ खत्म हो चुका होता है. जब हमें न्याय नहीं मिलता, तब न्याय दरवाजों के पीछे रोता रहता है. मैंने चुनाव आयोग को छह पत्र लिखे, लेकिन एक का भी जवाब नहीं आया.'  'मैं कोई खास व्यक्ति नहीं हूं. मैं एक बंधुआ मजदूर जैसी हूं. मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं, मैं एक साधारण नागरिक हूं.' CJI: 'पश्चिम बंगाल सरकार ने भी याचिका दायर की है. सुप्रीम कोर्ट के सर्वश्रेष्ठ वकील राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं—कपिल सिब्बल, गोपाल और श्याम दीवान. हमारी मदद के लिए सर्वश्रेष्ठ लीगल टीम मौजूद है. 19 जनवरी को जब मामला आया था, तब श्री सिब्बल ने पश्चिम बंगाल सरकार और नागरिकों की समस्याएं बहुत स्पष्टता से रखी थीं. सभी मुद्दे चिन्हित हो चुके हैं. हर समस्या का समाधान होता है. हमें यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी निर्दोष नागरिक बाहर न रह जाए. 'सिर्फ तीन आधार ऐसे हैं, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होगी— पहला, दोषसिद्ध व्यक्ति. दूसरा, जो राज्य या देश से बाहर जा चुके हैं. तीसरा, गैर-नागरिक.'  लेकिन बंगाल में नामों का उच्चारण अलग तरीके से होता है. आजकल AI-आधारित रिकॉर्डिंग हो रही है. ऐसी तकनीकी या भाषाई गलती के कारण किसी असली नागरिक को बाहर नहीं किया जाना चाहिए. ECI: 'हमें अभी तक याचिका की कॉपी नहीं मिली है. हमें यह भी नहीं पता कि असली समस्या क्या है. हमें जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया जाए.' CJI: 'आपको कॉपी इसलिए नहीं दी गई क्योंकि यह मामला पहली … Read more

सुप्रीम कोर्ट ने कहा– व्हॉट्सऐप मेटा के साथ यूजर डेटा साझा न करे, प्राइवेसी को मिले संरक्षण

 नई दिल्ली व्हाट्सएप और मेटा की प्राइवेसी पॉलिसी मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है. कोर्ट ने साफ किया कि डेटा शेयरिंग की ये प्रक्रिया भारतीय यूजर्स के निजता के अधिकार के खिलाफ है.  हालांकि, सीसीआई के वकील ने एनसीएलएटी (NCLAT) के कुछ निष्कर्षों पर आपत्ति जताई है. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने व्हाट्सएप को निर्देश देते हुए कहा, 'हम आपको मेटा के साथ एक भी जानकारी साझा करने की अनुमति नहीं देंगे. हम आपको इस देश की नीतियों की गोपनीयता के साथ खेलने की इजाजत कतई नहीं देंगे.'  इस पूरे प्रकरण में कोर्ट के सामने तीन मुख्य अपीलें थीं, जो मेटा, व्हाट्सएप और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की ओर से दायर की गई थीं. सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने इन अपीलों का पक्ष रखा. सुनवाई के दौरान मेटा के वकील ने दलील दी कि कोर्ट के आदेश के मुताबिक 213 करोड़ रुपये के जुर्माने का भुगतान पहले ही किया जा चुका है. मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सवाल सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप और मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सुनवाई करते हुए बेहद कड़े सवाल उठाए और कंपनी को डेटा साझा करने से साफ मना कर दिया. CJI ने व्हाट्सएप की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि आपने इसे इतनी चालाकी से तैयार किया है कि इसे समझना नामुमकिन है. उन्होंने पूछा कि क्या देश का आम आदमी, जैसे घर में काम करने वाले नौकर, निर्माण मजदूर या छोटे विक्रेता, इस जटिल नीति को समझ पाएंगे? कोर्ट ने साफ कहा कि उपभोक्ताओं को इस ऐप की 'लत' लगा दी गई है और अब उनकी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है. यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो रहा- SC सीजेआई ने कहा कि लोगों के डेटा का इस्तेमाल व्यावसायिक लाभ के लिए किया जा रहा है और अब तक लाखों यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो चुका है. इस दौरान मेटा के वकील अखिल सिबल ने दलील दी कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सीमित डेटा शेयरिंग की अनुमति है. इस पर सीजेआई ने कहा, 'अगर आपको डेटा का कोई हिस्सा बेचने लायक लगेगा, तो आप उसे बेच देंगे! सिर्फ इसलिए कि भारतीय उपभोक्ता मूक हैं और उनके पास आवाज नहीं है, आप उन्हें शिकार नहीं बना सकते.' सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि व्हाट्सएप यूजर्स को सिर्फ दो ही विकल्प दे रहा है- 'या तो पॉलिसी स्वीकार करो या ऐप का इस्तेमाल बंद कर दो.' इस पर अदालत ने कहा कि बिहार के दूरदराज इलाकों या तमिलनाडु के गांवों में रहने वाले लोग, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, वे इस नीति के खतरनाक परिणामों को कभी नहीं समझ पाएंगे. डेटा शेयर करने की इजाजत से SC का साफ इनकार सीजेआई ने साफ शब्दों में कहा, 'जब तक आप हमें यह विश्वास नहीं दिला देते कि आपको ऐसा करने का कोई दैवीय अधिकार हासिल है, तब तक हम आपको डेटा शेयर करने की अनुमति नहीं देंगे.'  3 जजों की बेंच के सामने होगी अपीलों पर सुनवाई व्हाट्सएप के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी नीतियां दूसरे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों के स्टैंडर्ड्स के मुताबिक ही हैं. लेकिन इन दलीलों को सुनने को बाद सीजेआई ने बताया कि एनसीएलएटी के सामने जनवरी 2025 के आदेश की स्थिति अभी भी अहम है. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है. अब इन अपीलों पर विस्तृत सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच के सामने होगी. Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 32

सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन आखिरी दिन भी सुनाए 11 फैसले

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन जस्टिस एएस ओका ने इस पुरानी रवायत को बदल दिया है। उन्होंने शुक्रवार को अपने आखिरी कार्यदिवस पर कई बेंचों में हिस्सा लिया और 11 फैसले दिए। ऐसा उन्होंने तब किया है, जब उनकी मां का एक दिन पहले ही निधन हुआ था। वह गुरुवार को ही अपनी मां के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए मुंबई गए थे और फिर लास्ट वर्किंग डे पर काम करने के लिए दिल्ली लौट आए। शुक्रवार को शीर्ष अदालत में उनका आखिरी दिन था और इस मौके पर भी वह सिर्फ विदाई समारोह के आयोजनों में ही नहीं रहे बल्कि 11 फैसले सुनाए। उनका शनिवार को लास्ट डे रहेगा, लेकिन आज आखिरी कार्यदिवस था। उन्होंने पहले ही कहा था कि वह रिटायरमेंट शब्द से नफरत करते हैं। इसके अलावा उनका कहना था कि जजों को आखिरी दिन भी फैसले सुनाने चाहिए और बेंच का हिस्सा बनना सही रहता है। इसी के तहत उन्होंने कई सुनवाई में हिस्सा लिया और फिर अंत में प्रतीकात्मक बेंच का भी हिस्सा बने, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे। किसी भी जज के रिटायरमेंट पर प्रतीकात्मक जज चीफ जस्टिस के नेतृत्व में बैठती है। ऐसा जस्टिस को सम्मानजनक विदाई के लिए किया जाता है और यह परंपरा शीर्ष अदालत में दशकों से चली आ रही है। जस्टिस ओका बोले- आखिरी दिन भी करना चाहिए पूरा काम बता दें कि 21 मई को जस्टिस ओका के लिए फेयरवेल समारोह आयोजित हुआ था। इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से किया गया था। इस दौरान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं इस परंपरा को सही नहीं मानता कि रिटायरमेंट के दिन जज काम ही न करें। मैं पसंद करूंगा कि आखिरी कार्यदिवस पर भी काम करूं और कुछ फैसलों का हिस्सा बनूं। इसके अलावा उनका कहना था कि रिटायर होने वाले जज के लिए गार्ड ऑफ ऑनर 1:30 बजे दिया जाता है, जिसमें थोड़ी देरी की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिरी दिवस पर कम से कम शाम को 4 बजे तक तो काम करना ही चाहिए। जिला अदालत से की थी शुरुआत और SC तक आ पहुंचे उन्होंने कहा था कि मैं तो रिटायरमेंट शब्द से ही नफरत करता हूं। बता दें कि जस्टिस ओका ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से लॉ की पढ़ाई करने के बाद जून 1983 से वकालत शुरू की थी। उन्होंने अपने पिता श्रीनिवास ओका के ठाणे जिला अदालत स्थित चेंबर से वकालत शुरू की थी और वहां से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक का सफर तय किया। उनकी 29 अगस्त, 2003 को बॉम्बे हाई कोर्ट में एंट्री हुई थी। तब वह अस्थायी जज थे और फिर 2005 में परमानेंट हुए। वह कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस 10 मई, 2019 को बने थे। फिर वह 31 अगस्त, 2021 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर आए। उनका कार्य़काल शीर्ष अदालत में करीब 4 साल का रहा है।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 66

लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए वकीलों पर गंभीर आरोप लगाए, काम वकील नहीं करना चाहते, दोष हम पर आता है: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली बीते 14 मई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने वाले जस्टिस बी आर गवई ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए वकीलों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। CJI गवई ने कहा है कि वकील छुट्टियों के दौरान काम नहीं करना चाहते हैं, लेकिन लंबित मामलों के लिए कोर्ट को दोषी ठहराया जाता है। बता दें कि मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ उस समय भड़क गई, जब एक वकील ने याचिका को गर्मी की छुट्टियों के बाद सूचीबद्ध करने की अपील की। इस दौरान CJI गवई ने कहा, "पांच न्यायाधीश छुट्टियों के दौरान बैठ रहे हैं और काम करना जारी रख रहे हैं, फिर भी लंबित मामलों के लिए हमें दोषी ठहराया जाता है। असल में वकील ही छुट्टियों के दौरान काम नहीं करना चाहते हैं।" गौरतलब है कि हाल ही में शीर्ष अदालत ने एक अधिसूचना जारी की है जिसके तहत जजों की पीठ आगामी ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान काम भी करेंगी। 26 मई से 13 जुलाई तक चलने वाली अवधि को "पार्शियल कोर्ट वर्किंग डेज" का नाम दिया गया है। इन आंशिक न्यायालय कार्य दिवसों के दौरान दो से पांच वेकेशन बेंच बैठेंगी। वहीं मुख्य न्यायधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष पांच जज भी इस अवधि के दौरान अदालतें लगाएंगे। 26 मई से 1 जून तक सीजेआई गवई, जरिए सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस बी वी नागरत्ना क्रमशः पांच पीठों का नेतृत्व करेंगे। इस अवधि के दौरान शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक खुली रहेगी। रजिस्ट्री सभी शनिवार (12 जुलाई को छोड़कर), रविवार और सार्वजनिक छुट्टियों पर बंद रहेगी। बता दें कि पहले की प्रथा के मुताबिक ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान सिर्फ दो अवकाश पीठ ही हुआ करती थीं और वरिष्ठ न्यायाधीशों की अदालतें नहीं लगती थीं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 49

सिविल जज जूनियर डिविजन के पद के लिए उम्मीदवार को तीन साल कम से कम बतौर वकील प्रैक्टिस करना जरूरी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार को एक अहम फैसले में कहा कि सिविल जज जूनियर डिविजन के पद के लिए उम्मीदवार को तीन साल कम से कम बतौर वकील प्रैक्टिस करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रैक्टिस की अवधि प्रोविजनल नामांकन की तारीख से मानी जा सकती है, सर्वोच्च अदालत ने साफ किया कि यह शर्त आज से पहले उच्च न्यायालयों द्वारा शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया पर लागू नहीं होगी, यह शर्त केवल भविष्य की भर्तियों पर लागू होगी। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की तीन सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि देखा गया है कि जो नए लॉ ग्रेजुएट न्यायपालिका में नियुक्त होते हैं, उनके कारण कई समस्याएं हुई हैं। ऐसे में सभी उम्मीदवारों को न्यायपालिका में दाखिल होने के लिए कम से कम तीन साल बतौर वकील प्रैक्टिस करना जरूरी होगा। दिखाना होगा ऐसा सर्टिफिकेट सुप्रीम कोर्ट ने कहा शर्त पूरी करने के लिए उम्मीदवार को 10 साल तक प्रैक्टिस कर चुके वरिष्ठ वकील या तय न्यायिक अधिकारी द्वारा जारी सर्टिफिकेट को दिखाना होगा। कोर्ट ने ये भी कहा कि यदि  कोई वकील सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस कर रहा है तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में 10 साल तक प्रैक्टिस कर चुके वकील या तय न्यायिक अधिकारी द्वारा जारी सर्टिफिकेट दिखाना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रैक्टिस की अवधि नामांकन की तारीख से मानी जा सकती है। अदालत ने साफ किया कि यह आदेश उच्च न्यायालयों में हो चुकी नियुक्तियों पर लागू नहीं होगा यह शर्त केवल भविष्य की भर्तियों पर लागू होगी। और क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने? CJI ने कहा कि सभी राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करने के लिए नियमों में संशोधन करेंगी कि सिविल जज जूनियर डिवीजन के लिए उपस्थित होने वाले किसी भी उम्मीदवार के पास न्यूनतम 3 साल का अभ्यास होना चाहिए, इसे बार में 10 वर्ष का अनुभव वाले वकील द्वारा प्रमाणित और समर्थित किया जाना चाहिए, कोर्ट ने एक सुविधा देते हुए कहा कि जजों के विधि लिपिक के रूप में अनुभव को भी इस संबंध में गिना जाएगा। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 50

हम खुद 140 करोड़ है, भारत कोई धर्मशाला नहीं, जहां दुनिया भर के शरणार्थी घुस आएं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्‍ली सुप्रीम कोर्ट ने शरणार्थियों को लेकर बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है. दुनिया भर से आए शरणार्थियों को भारत में शरण क्यों दें? हम 140 करोड़ लोगों के साथ संघर्ष कर रहे हैं. हम हर जगह से आए शरणार्थियों को शरण नहीं दे सकते. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने श्रीलंका से आए तमिल शरणार्थी को हिरासत में लिए जाने के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए ये बात कही.   तुरंत भारत छोड़ देना… सुप्रीम कोर्ट में श्रीलंका के एक नागरिक की हिरासत के खिलाफ याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर दखल देने से इनकार कर दिया. पीठ मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इसमें निर्देश दिया गया था कि याचिकाकर्ता को UAPA मामले में लगाए गए 7 साल की सजा पूरी होते ही तुरंत भारत छोड़ देना चाहिए. जस्टिस दीपांकर दत्ता के नेतृत्व वाली बेंच में जस्टिस के. विनोद चंद्रन भी शामिल थे। श्रीलंकाई तमिल ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल की थी, जिसमें कहा गया था कि अपनी 7 साल की सजा पूरी होने के तुरंत बाद वह देश से निकल जाए। शख्स को UAPA के एक केस में 7 साल कैद की सजा मिली थी। लेकिन श्रीलंकाई तमिल ने सजा पूरी होने के बाद भारत में ही रहने की इच्छा जाहिर की। उसके वकील ने अदालत से कहा कि मेरा मुवक्किल वीजा लेकर भारत आया था। अब यदि वह अपने देश वापस गया तो फिर उसकी जान को खतरा होगा। उन्होंने कहा कि शख्स को बिना किसी डिपोर्टेशन की प्रक्रिया के ही करीब तीन सालों से हिरासत में रखा गया है। इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, 'आखिर आपका यहां बसने का क्या अधिकार है?' इस पर याची के वकील ने कहा कि वह एक शरणार्थी हैं और उनके बच्चे एवं पत्नी पहले से ही भारत में सेटल हैं। इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा कि याची को भारत छोड़ने का आदेश देने में किसी भी तरह से आर्टिकल 21 का उल्लंघन नहीं हुआ है। जस्टिस दत्ता ने कहा कि आर्टिकल 19 के तहत भारत में बसने का अधिकार सिर्फ यहां के नागरिक को ही है। किसी भी बाहरी व्यक्ति के पास कोई अधिकार नहीं है कि वह आए और यहां बस जाए। इस पर वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल यदि अपने देश वापस लौटे तो उनकी जान को खतरा होगा। इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा कि वह किसी और मुल्क में जा सकते हैं। रोहिंग्या रिफ्यूजी वाली अर्जी भी सुप्रीम कोर्ट ने की थी खारिज बता दें कि रोहिंग्या रिफ्यूजियों के मामले में भी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया था। दरअसल याची को 2015 में लिट्टे से जुड़े होने के आरोप में अरेस्ट किया गया था। 2018 में शख्स को ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार दिया था और 10 साल की कैद की सजा दी थी। इस फैसले के खिलाफ उसने हाई कोर्ट में अपील की थी, जिसके बाद उसकी सजा 7 साल हो गई। इसके साथ ही यह आदेश भी उच्च न्यायालय ने दिया था कि वह सजा पूरी होते ही देश छोड़ देगा। अब देश छोड़ने के फैसले के खिलाफ याची ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन अदालत ने राहत देने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस दत्ता ने पूछा कि यहां बसने का आपका क्या अधिकार है? वकील ने दोहराया कि याचिकाकर्ता एक शरणार्थी है। जस्टिस दत्ता ने कहा कि अनुच्छेद-19 के अनुसार, भारत में बसने का मौलिक अधिकार केवल नागरिकों को ही प्राप्त है। जब वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपने देश में जान का खतरा है, तो जस्टिस दत्ता ने कहा कि किसी दूसरे देश में चले जाइए। बता दें, साल 2015 में याचिकाकर्ता को दो अन्य लोगों के साथ LTTE ऑपरेटिव होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था। साल 2018 में याचिकाकर्ता को UAPA की धारा-10 के तहत अपराध के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराया गया था और उसे दस साल की कैद की सजा सुनाई गई थी।   मद्रास हाई कोर्ट ने साल 2022 में उसकी सजा को घटाकर साल साल कर दिया था, लेकिन निर्देश दिया कि उसे अपनी सजा के तुरंत बाद भारत छोड़ना होगा और भारत छोड़ने तक शरणार्थी शिविर में रहना चाहिए। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 43

राष्ट्रपति के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदला जा सकता है? अनुच्छेद 143 और सलाहकार क्षेत्राधिकार की व्याख्या

नई दिल्ली भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट की सलाह मांगी है कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए निर्धारित समयसीमा देश की सर्वोच्च अदालत के द्वारा तय की जा सकती है। यह कदम तब उठाया गया जब 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों को राष्ट्रपति को तीन माह में निपटाना होगा। क्या है अनुच्छेद 143(1)? संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति किसी कानूनी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह ले सकते हैं। यह राय बाध्यकारी नहीं होती, लेकिन इसका संवैधानिक महत्व काफी अधिक होता है। सुप्रीम कोर्ट को यह सलाह संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दी जाती है। राष्ट्रपति ने यह संदर्भ 13 मई को भेजा और इसमें कुल 14 कानूनी प्रश्न शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट क्या पहले भी राय देने से मना कर चुका है? सुप्रीम कोर्ट ने दो बार राष्ट्रपति की राय मांगने पर जवाब देने से इनकार किया है। 1993 में जब राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद में मंदिर की पूर्वस्थिति पर राय मांगी गई थी, जिसे कोर्ट ने धार्मिक और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत मानते हुए खारिज कर दिया। इससे पहले 1982 में पाकिस्तान से आए प्रवासियों के पुनर्वास संबंधी कानून पर राय मांगी गई थी, लेकिन बाद में वह कानून पारित हो गया और कोर्ट में याचिकाएं दायर हो गईं, जिससे राय अप्रासंगिक हो गई। कब-कब सुप्रीम कोर्ट ने दी थी राय? संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सबसे पहले महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली लॉज एक्ट- 1951 में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी. केरल शैक्षणिक बिल- 1957 पर संदर्भ को संवैधानिक तौर पर व्याख्या करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर विवाद पर नरसिंह राव सरकार के समय भेजे गए संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था की ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों से जुड़े मामलों में राय देना अनुच्छेद 143 के दायरे में नहीं आता है. साल 1993 में कावेरी जल विवाद मामले के संदर्भ पर भी सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर दिया था. साल 2002 में गुजरात चुनाव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अपील या पुनर्विचार याचिका दायर करने के बजाय 143 के तहत संदर्भ भेजा जाना सांविधानिक तौर पर गलत विकल्प है. हालांकि, पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की तरह संदर्भ पर राय बाध्यकारी नहीं होना संविधानिक तौर पर विचित्र है. राज्यपाल मामले से जुड़े कुछ पहलू 2G मामले में यूपीए सरकार के संदर्भ से मेल खाते हैं, तब सुप्रीम कोर्ट ने 122 फर्म और कंपनियों के 2G लाइसेंस पर स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द कर दिया था. तब केंद्र ने उसे फैसले के खिलाफ संदर्भ भेजते हुए पूछा था कि क्या नीतिगत मामलों में सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी होनी चाहिए. दरअसल, केशवानंद भारती मामले में संविधान पीठ के फैसले के अनुसार नीतिगत मामलों में संसद और केंद्र के निर्णय पर अदालतों की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए. तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल मामले में क्या हुआ? राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो जजों ने दिया था. कानूनविदों की मानें तो इस मामले में कम से कम पांच जजों की संविधान पीठ में सुनवाई होनी चाहिए थी. दरअसल, पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति को उन विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए समय-सीमा निर्धारित की थी जिन्हें राज्यपाल ने राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित किया. आठ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए एक समय-सीमा निर्धारित कर दी थी. इस फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से सुप्रीम कोर्ट से सवाल किए गए हैं कि जबकि संविधान में ऐसा जिक्र नहीं है, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दे दी. कानूनविद दो जजों की पीठ के फैसले पर इसलिए भी सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि पूर्व में दिया गया सर्वोच्च अदालत की बड़ी पीठ का फैसले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका की सीमा तय की गई है. दूसरी ओर संविधान में राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास विधायक कितने दिन लंबित रहेगा, इसका जिक्र नहीं है. संविधान में जो प्रावधान नहीं है उसकी व्याख्या करके सुप्रीम कोर्ट ने नए प्रावधान बना दिए. जबकि केशवानंद भारती फैसले के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को कानून निर्माण या संविधान संशोधन की शक्ति नहीं है सरकार की खामियों, कानून के निर्वात को ठीक करने के लिए जजों को संरक्षक की भूमिका मिली है. लेकिन यह साफ है कि राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए संदर्भ पर अगर सुप्रीम कोर्ट आगे बढ़ता है यानी राय देता है तो वह बाध्यकारी नहीं होगी. वह महज एक राय, सलाह या मशविरा होगा. क्या राष्ट्रपति निर्णय को पलटना चाहती हैं? सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि अनुच्छेद 143 का उपयोग किसी पहले से दिए गए निर्णय की समीक्षा या पलटने के लिए नहीं किया जा सकता है। 1991 में कावेरी जल विवाद पर कोर्ट ने कहा था कि निर्णय देने के बाद उसी विषय पर राष्ट्रपति की राय मांगना न्यायपालिका की गरिमा के विरुद्ध है। यदि सरकार चाहे तो वह पुनर्विचार याचिका या क्युरेटिव याचिका दायर कर सकती है, जो कि न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। राष्ट्रपति ने पूछे कैसे प्रश्न? अधिकांश प्रश्न 8 अप्रैल के फैसले से जुड़े हैं, लेकिन अंतिम कुछ प्रश्नों में सुप्रीम कोर्ट की स्वयं की शक्तियों पर भी सवाल उठाए गए हैं। प्रश्न 12 में पूछा गया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को पहले यह तय करना चाहिए कि कोई मामला संविधान की व्याख्या से जुड़ा है या नहीं, ताकि उसे बड़ी पीठ को भेजा जा सके? इसी तरहा प्रश्न 13 में पूछा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की शक्ति) के प्रयोग की सीमा क्या है। प्रश्न संख्या 14 में पूछा गया है कि केंद्र-राज्य विवादों की मूल सुनवाई का अधिकार किसके पास है। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास या अन्य अदालतों के पास … Read more