महा-सुनवाई में CJI और ममता बनर्जी के बीच बहस, SIR मामले पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर जारी विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सीएम ममता बनर्जी ने खुद अदालत में अपनी बात रखने की कोशिश की. हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने बीच में ही उन्हें टोकते हुए कहा कि उनकी ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और श्याम दीवान पहले ही सभी दलीलें रख चुके हैं. बता दें कि इस मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी सोमवार को होगी. चुनाव आयोग पर ममता के आरोप बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी ने कहा कि वह न्याय के लिए अदालत आई हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्होंने चुनाव आयोग को तमाम फैक्ट्स बताए थे, लेकिन उन्हें नहीं सुना गया. इस पर CJI ने साफ किया कि आपकी नई याचिका में कुछ नए मुद्दे जरूर हैं, लेकिन जो बातें आप कह रही हैं, वे आपके वकील पहले ही अदालत के सामने रख चुके हैं. वोटर्स के नाम हटाए जा रहे हैंः ममता बनर्जी सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने रवींद्रनाथ टैगोर की स्पेलिंग में बदलावों का जिक्र करते हुए लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात कही. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है और राज्य में बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि फाइनल वोटर लिस्ट के लिए अब सिर्फ 11 दिन बचे हैं और यह प्रक्रिया 14 फरवरी तक पूरी होनी है, जबकि इस मामले की सुनवाई के लिए केवल चार दिन का समय बचा है. उन्होंने कहा कि राज्य में करीब 32 लाख ‘अनमैप्ड वोटर्स’ हैं और लगभग 3.26 करोड़ नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ पाई गई है, जो कुल मतदाताओं का करीब 20 प्रतिशत है. श्याम दीवान ने मांग की कि चुनाव आयोग को ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट’ में शामिल हर मतदाता का नाम सार्वजनिक करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के बावजूद कई मामलों में केवल नाम, उम्र और लिंग दर्ज हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि मतदाता का नाम सूची से क्यों हटाया गया. लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे वोटर लिस्ट में क्यों नहीं हैं. इस पर CJI ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि यह प्रक्रिया सिर्फ एक सामान्य सूचना नहीं है, बल्कि संबंधित लोगों को व्यक्तिगत नोटिस भी दिए जा रहे हैं. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह समय कृषि और त्योहारों का है, ऐसे में कई लोग अपने गृह जनपद से बाहर हैं. CJI ने सवाल किया कि जब बंगाल में बीएलओ पर दबाव और मौतों की बातें सामने आ रही हैं, तो असम जैसे राज्यों में ऐसा क्यों नहीं हो रहा. 'बंगाल को टारगेट किया जा रहा है' ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों में चुनाव आयोग सभी दस्तावेज स्वीकार कर रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल के मामले में उन्हें खारिज किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब त्योहार और फसल कटाई का मौसम है और बड़ी संख्या में लोग राज्य से बाहर हैं. इस दौरान ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सऐप कमीशन’ तक कह दिया. उन्होंने कहा, “इलेक्शन कमीशन… सॉरी, व्हाट्सऐप कमीशन यह सब कर रहा है. लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं. बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है.” सुनवाई के अंत में CJI ने कहा कि अदालत समय बढ़ाने का निर्देश दे सकती है. उन्होंने ममता बनर्जी से कहा कि अदालत को उनके वकील श्याम दीवान की काबिलियत पर पूरा भरोसा है और उन्होंने अपने लिए श्रेष्ठ वकील चुने हैं. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार को तय की है. CJI ने कहा कि चुनाव आयोग आज उठाए गए मुद्दों पर निर्देश लेकर अदालत के समक्ष आए. वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार को उपलब्ध ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची पेश करने को कहा गया है. सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की ओर से अधिकारियों के प्रति ‘होस्टिलिटी’ को लेकर लिखित आशंका जताई गई है. अदालत में क्या-क्या हुआ, यहां देखें ECI के वकील: 'मेरी इंस्ट्रक्शन यह थी कि सिर्फ स्पेलिंग की मामूली गलती पर नोटिस जारी नहीं किया जाएगा.' CJI: 'राज्य का एग्जीक्यूटिव हेड भी आज यहां मौजूद है. क्या यह संभव नहीं कि राज्य बंगला भाषा के विशेषज्ञ उपलब्ध कराए, जो समिति के साथ बैठकर स्थानीय उच्चारण और स्पेलिंग पर सलाह दें?' ममता बनर्जी: 'मैं इस पर सफाई दे सकती हूं, क्योंकि मैं उसी राज्य से हूं.' CJI: 'इसमें कोई संदेह नहीं कि आप वहीं से हैं.' ममता बनर्जी: 'बेंच का धन्यवाद कि मुझे बोलने की अनुमति दी गई. 'समस्या यह है कि वकील तब लड़ते हैं, जब सब कुछ खत्म हो चुका होता है. जब हमें न्याय नहीं मिलता, तब न्याय दरवाजों के पीछे रोता रहता है. मैंने चुनाव आयोग को छह पत्र लिखे, लेकिन एक का भी जवाब नहीं आया.'  'मैं कोई खास व्यक्ति नहीं हूं. मैं एक बंधुआ मजदूर जैसी हूं. मैं अपनी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं, मैं एक साधारण नागरिक हूं.' CJI: 'पश्चिम बंगाल सरकार ने भी याचिका दायर की है. सुप्रीम कोर्ट के सर्वश्रेष्ठ वकील राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं—कपिल सिब्बल, गोपाल और श्याम दीवान. हमारी मदद के लिए सर्वश्रेष्ठ लीगल टीम मौजूद है. 19 जनवरी को जब मामला आया था, तब श्री सिब्बल ने पश्चिम बंगाल सरकार और नागरिकों की समस्याएं बहुत स्पष्टता से रखी थीं. सभी मुद्दे चिन्हित हो चुके हैं. हर समस्या का समाधान होता है. हमें यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी निर्दोष नागरिक बाहर न रह जाए. 'सिर्फ तीन आधार ऐसे हैं, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होगी— पहला, दोषसिद्ध व्यक्ति. दूसरा, जो राज्य या देश से बाहर जा चुके हैं. तीसरा, गैर-नागरिक.'  लेकिन बंगाल में नामों का उच्चारण अलग तरीके से होता है. आजकल AI-आधारित रिकॉर्डिंग हो रही है. ऐसी तकनीकी या भाषाई गलती के कारण किसी असली नागरिक को बाहर नहीं किया जाना चाहिए. ECI: 'हमें अभी तक याचिका की कॉपी नहीं मिली है. हमें यह भी नहीं पता कि असली समस्या क्या है. हमें जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया जाए.' CJI: 'आपको कॉपी इसलिए नहीं दी गई क्योंकि यह मामला पहली … Read more

सुप्रीम कोर्ट ने कहा– व्हॉट्सऐप मेटा के साथ यूजर डेटा साझा न करे, प्राइवेसी को मिले संरक्षण

 नई दिल्ली व्हाट्सएप और मेटा की प्राइवेसी पॉलिसी मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है. कोर्ट ने साफ किया कि डेटा शेयरिंग की ये प्रक्रिया भारतीय यूजर्स के निजता के अधिकार के खिलाफ है.  हालांकि, सीसीआई के वकील ने एनसीएलएटी (NCLAT) के कुछ निष्कर्षों पर आपत्ति जताई है. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने व्हाट्सएप को निर्देश देते हुए कहा, 'हम आपको मेटा के साथ एक भी जानकारी साझा करने की अनुमति नहीं देंगे. हम आपको इस देश की नीतियों की गोपनीयता के साथ खेलने की इजाजत कतई नहीं देंगे.'  इस पूरे प्रकरण में कोर्ट के सामने तीन मुख्य अपीलें थीं, जो मेटा, व्हाट्सएप और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की ओर से दायर की गई थीं. सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने इन अपीलों का पक्ष रखा. सुनवाई के दौरान मेटा के वकील ने दलील दी कि कोर्ट के आदेश के मुताबिक 213 करोड़ रुपये के जुर्माने का भुगतान पहले ही किया जा चुका है. मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सवाल सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप और मेटा की नई प्राइवेसी पॉलिसी पर सुनवाई करते हुए बेहद कड़े सवाल उठाए और कंपनी को डेटा साझा करने से साफ मना कर दिया. CJI ने व्हाट्सएप की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि आपने इसे इतनी चालाकी से तैयार किया है कि इसे समझना नामुमकिन है. उन्होंने पूछा कि क्या देश का आम आदमी, जैसे घर में काम करने वाले नौकर, निर्माण मजदूर या छोटे विक्रेता, इस जटिल नीति को समझ पाएंगे? कोर्ट ने साफ कहा कि उपभोक्ताओं को इस ऐप की 'लत' लगा दी गई है और अब उनकी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है. यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो रहा- SC सीजेआई ने कहा कि लोगों के डेटा का इस्तेमाल व्यावसायिक लाभ के लिए किया जा रहा है और अब तक लाखों यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल हो चुका है. इस दौरान मेटा के वकील अखिल सिबल ने दलील दी कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सीमित डेटा शेयरिंग की अनुमति है. इस पर सीजेआई ने कहा, 'अगर आपको डेटा का कोई हिस्सा बेचने लायक लगेगा, तो आप उसे बेच देंगे! सिर्फ इसलिए कि भारतीय उपभोक्ता मूक हैं और उनके पास आवाज नहीं है, आप उन्हें शिकार नहीं बना सकते.' सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि व्हाट्सएप यूजर्स को सिर्फ दो ही विकल्प दे रहा है- 'या तो पॉलिसी स्वीकार करो या ऐप का इस्तेमाल बंद कर दो.' इस पर अदालत ने कहा कि बिहार के दूरदराज इलाकों या तमिलनाडु के गांवों में रहने वाले लोग, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती, वे इस नीति के खतरनाक परिणामों को कभी नहीं समझ पाएंगे. डेटा शेयर करने की इजाजत से SC का साफ इनकार सीजेआई ने साफ शब्दों में कहा, 'जब तक आप हमें यह विश्वास नहीं दिला देते कि आपको ऐसा करने का कोई दैवीय अधिकार हासिल है, तब तक हम आपको डेटा शेयर करने की अनुमति नहीं देंगे.'  3 जजों की बेंच के सामने होगी अपीलों पर सुनवाई व्हाट्सएप के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी नीतियां दूसरे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों के स्टैंडर्ड्स के मुताबिक ही हैं. लेकिन इन दलीलों को सुनने को बाद सीजेआई ने बताया कि एनसीएलएटी के सामने जनवरी 2025 के आदेश की स्थिति अभी भी अहम है. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है. अब इन अपीलों पर विस्तृत सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच के सामने होगी. Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 33

सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन आखिरी दिन भी सुनाए 11 फैसले

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन जस्टिस एएस ओका ने इस पुरानी रवायत को बदल दिया है। उन्होंने शुक्रवार को अपने आखिरी कार्यदिवस पर कई बेंचों में हिस्सा लिया और 11 फैसले दिए। ऐसा उन्होंने तब किया है, जब उनकी मां का एक दिन पहले ही निधन हुआ था। वह गुरुवार को ही अपनी मां के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए मुंबई गए थे और फिर लास्ट वर्किंग डे पर काम करने के लिए दिल्ली लौट आए। शुक्रवार को शीर्ष अदालत में उनका आखिरी दिन था और इस मौके पर भी वह सिर्फ विदाई समारोह के आयोजनों में ही नहीं रहे बल्कि 11 फैसले सुनाए। उनका शनिवार को लास्ट डे रहेगा, लेकिन आज आखिरी कार्यदिवस था। उन्होंने पहले ही कहा था कि वह रिटायरमेंट शब्द से नफरत करते हैं। इसके अलावा उनका कहना था कि जजों को आखिरी दिन भी फैसले सुनाने चाहिए और बेंच का हिस्सा बनना सही रहता है। इसी के तहत उन्होंने कई सुनवाई में हिस्सा लिया और फिर अंत में प्रतीकात्मक बेंच का भी हिस्सा बने, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे। किसी भी जज के रिटायरमेंट पर प्रतीकात्मक जज चीफ जस्टिस के नेतृत्व में बैठती है। ऐसा जस्टिस को सम्मानजनक विदाई के लिए किया जाता है और यह परंपरा शीर्ष अदालत में दशकों से चली आ रही है। जस्टिस ओका बोले- आखिरी दिन भी करना चाहिए पूरा काम बता दें कि 21 मई को जस्टिस ओका के लिए फेयरवेल समारोह आयोजित हुआ था। इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से किया गया था। इस दौरान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं इस परंपरा को सही नहीं मानता कि रिटायरमेंट के दिन जज काम ही न करें। मैं पसंद करूंगा कि आखिरी कार्यदिवस पर भी काम करूं और कुछ फैसलों का हिस्सा बनूं। इसके अलावा उनका कहना था कि रिटायर होने वाले जज के लिए गार्ड ऑफ ऑनर 1:30 बजे दिया जाता है, जिसमें थोड़ी देरी की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिरी दिवस पर कम से कम शाम को 4 बजे तक तो काम करना ही चाहिए। जिला अदालत से की थी शुरुआत और SC तक आ पहुंचे उन्होंने कहा था कि मैं तो रिटायरमेंट शब्द से ही नफरत करता हूं। बता दें कि जस्टिस ओका ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से लॉ की पढ़ाई करने के बाद जून 1983 से वकालत शुरू की थी। उन्होंने अपने पिता श्रीनिवास ओका के ठाणे जिला अदालत स्थित चेंबर से वकालत शुरू की थी और वहां से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक का सफर तय किया। उनकी 29 अगस्त, 2003 को बॉम्बे हाई कोर्ट में एंट्री हुई थी। तब वह अस्थायी जज थे और फिर 2005 में परमानेंट हुए। वह कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस 10 मई, 2019 को बने थे। फिर वह 31 अगस्त, 2021 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर आए। उनका कार्य़काल शीर्ष अदालत में करीब 4 साल का रहा है।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 67

लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए वकीलों पर गंभीर आरोप लगाए, काम वकील नहीं करना चाहते, दोष हम पर आता है: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली बीते 14 मई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने वाले जस्टिस बी आर गवई ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए वकीलों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। CJI गवई ने कहा है कि वकील छुट्टियों के दौरान काम नहीं करना चाहते हैं, लेकिन लंबित मामलों के लिए कोर्ट को दोषी ठहराया जाता है। बता दें कि मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ उस समय भड़क गई, जब एक वकील ने याचिका को गर्मी की छुट्टियों के बाद सूचीबद्ध करने की अपील की। इस दौरान CJI गवई ने कहा, "पांच न्यायाधीश छुट्टियों के दौरान बैठ रहे हैं और काम करना जारी रख रहे हैं, फिर भी लंबित मामलों के लिए हमें दोषी ठहराया जाता है। असल में वकील ही छुट्टियों के दौरान काम नहीं करना चाहते हैं।" गौरतलब है कि हाल ही में शीर्ष अदालत ने एक अधिसूचना जारी की है जिसके तहत जजों की पीठ आगामी ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान काम भी करेंगी। 26 मई से 13 जुलाई तक चलने वाली अवधि को "पार्शियल कोर्ट वर्किंग डेज" का नाम दिया गया है। इन आंशिक न्यायालय कार्य दिवसों के दौरान दो से पांच वेकेशन बेंच बैठेंगी। वहीं मुख्य न्यायधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष पांच जज भी इस अवधि के दौरान अदालतें लगाएंगे। 26 मई से 1 जून तक सीजेआई गवई, जरिए सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस बी वी नागरत्ना क्रमशः पांच पीठों का नेतृत्व करेंगे। इस अवधि के दौरान शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक खुली रहेगी। रजिस्ट्री सभी शनिवार (12 जुलाई को छोड़कर), रविवार और सार्वजनिक छुट्टियों पर बंद रहेगी। बता दें कि पहले की प्रथा के मुताबिक ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान सिर्फ दो अवकाश पीठ ही हुआ करती थीं और वरिष्ठ न्यायाधीशों की अदालतें नहीं लगती थीं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 50

सिविल जज जूनियर डिविजन के पद के लिए उम्मीदवार को तीन साल कम से कम बतौर वकील प्रैक्टिस करना जरूरी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार को एक अहम फैसले में कहा कि सिविल जज जूनियर डिविजन के पद के लिए उम्मीदवार को तीन साल कम से कम बतौर वकील प्रैक्टिस करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रैक्टिस की अवधि प्रोविजनल नामांकन की तारीख से मानी जा सकती है, सर्वोच्च अदालत ने साफ किया कि यह शर्त आज से पहले उच्च न्यायालयों द्वारा शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया पर लागू नहीं होगी, यह शर्त केवल भविष्य की भर्तियों पर लागू होगी। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की तीन सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि देखा गया है कि जो नए लॉ ग्रेजुएट न्यायपालिका में नियुक्त होते हैं, उनके कारण कई समस्याएं हुई हैं। ऐसे में सभी उम्मीदवारों को न्यायपालिका में दाखिल होने के लिए कम से कम तीन साल बतौर वकील प्रैक्टिस करना जरूरी होगा। दिखाना होगा ऐसा सर्टिफिकेट सुप्रीम कोर्ट ने कहा शर्त पूरी करने के लिए उम्मीदवार को 10 साल तक प्रैक्टिस कर चुके वरिष्ठ वकील या तय न्यायिक अधिकारी द्वारा जारी सर्टिफिकेट को दिखाना होगा। कोर्ट ने ये भी कहा कि यदि  कोई वकील सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस कर रहा है तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में 10 साल तक प्रैक्टिस कर चुके वकील या तय न्यायिक अधिकारी द्वारा जारी सर्टिफिकेट दिखाना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रैक्टिस की अवधि नामांकन की तारीख से मानी जा सकती है। अदालत ने साफ किया कि यह आदेश उच्च न्यायालयों में हो चुकी नियुक्तियों पर लागू नहीं होगा यह शर्त केवल भविष्य की भर्तियों पर लागू होगी। और क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने? CJI ने कहा कि सभी राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करने के लिए नियमों में संशोधन करेंगी कि सिविल जज जूनियर डिवीजन के लिए उपस्थित होने वाले किसी भी उम्मीदवार के पास न्यूनतम 3 साल का अभ्यास होना चाहिए, इसे बार में 10 वर्ष का अनुभव वाले वकील द्वारा प्रमाणित और समर्थित किया जाना चाहिए, कोर्ट ने एक सुविधा देते हुए कहा कि जजों के विधि लिपिक के रूप में अनुभव को भी इस संबंध में गिना जाएगा। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 50

हम खुद 140 करोड़ है, भारत कोई धर्मशाला नहीं, जहां दुनिया भर के शरणार्थी घुस आएं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्‍ली सुप्रीम कोर्ट ने शरणार्थियों को लेकर बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है. दुनिया भर से आए शरणार्थियों को भारत में शरण क्यों दें? हम 140 करोड़ लोगों के साथ संघर्ष कर रहे हैं. हम हर जगह से आए शरणार्थियों को शरण नहीं दे सकते. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने श्रीलंका से आए तमिल शरणार्थी को हिरासत में लिए जाने के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए ये बात कही.   तुरंत भारत छोड़ देना… सुप्रीम कोर्ट में श्रीलंका के एक नागरिक की हिरासत के खिलाफ याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर दखल देने से इनकार कर दिया. पीठ मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इसमें निर्देश दिया गया था कि याचिकाकर्ता को UAPA मामले में लगाए गए 7 साल की सजा पूरी होते ही तुरंत भारत छोड़ देना चाहिए. जस्टिस दीपांकर दत्ता के नेतृत्व वाली बेंच में जस्टिस के. विनोद चंद्रन भी शामिल थे। श्रीलंकाई तमिल ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल की थी, जिसमें कहा गया था कि अपनी 7 साल की सजा पूरी होने के तुरंत बाद वह देश से निकल जाए। शख्स को UAPA के एक केस में 7 साल कैद की सजा मिली थी। लेकिन श्रीलंकाई तमिल ने सजा पूरी होने के बाद भारत में ही रहने की इच्छा जाहिर की। उसके वकील ने अदालत से कहा कि मेरा मुवक्किल वीजा लेकर भारत आया था। अब यदि वह अपने देश वापस गया तो फिर उसकी जान को खतरा होगा। उन्होंने कहा कि शख्स को बिना किसी डिपोर्टेशन की प्रक्रिया के ही करीब तीन सालों से हिरासत में रखा गया है। इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, 'आखिर आपका यहां बसने का क्या अधिकार है?' इस पर याची के वकील ने कहा कि वह एक शरणार्थी हैं और उनके बच्चे एवं पत्नी पहले से ही भारत में सेटल हैं। इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा कि याची को भारत छोड़ने का आदेश देने में किसी भी तरह से आर्टिकल 21 का उल्लंघन नहीं हुआ है। जस्टिस दत्ता ने कहा कि आर्टिकल 19 के तहत भारत में बसने का अधिकार सिर्फ यहां के नागरिक को ही है। किसी भी बाहरी व्यक्ति के पास कोई अधिकार नहीं है कि वह आए और यहां बस जाए। इस पर वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल यदि अपने देश वापस लौटे तो उनकी जान को खतरा होगा। इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा कि वह किसी और मुल्क में जा सकते हैं। रोहिंग्या रिफ्यूजी वाली अर्जी भी सुप्रीम कोर्ट ने की थी खारिज बता दें कि रोहिंग्या रिफ्यूजियों के मामले में भी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया था। दरअसल याची को 2015 में लिट्टे से जुड़े होने के आरोप में अरेस्ट किया गया था। 2018 में शख्स को ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार दिया था और 10 साल की कैद की सजा दी थी। इस फैसले के खिलाफ उसने हाई कोर्ट में अपील की थी, जिसके बाद उसकी सजा 7 साल हो गई। इसके साथ ही यह आदेश भी उच्च न्यायालय ने दिया था कि वह सजा पूरी होते ही देश छोड़ देगा। अब देश छोड़ने के फैसले के खिलाफ याची ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन अदालत ने राहत देने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस दत्ता ने पूछा कि यहां बसने का आपका क्या अधिकार है? वकील ने दोहराया कि याचिकाकर्ता एक शरणार्थी है। जस्टिस दत्ता ने कहा कि अनुच्छेद-19 के अनुसार, भारत में बसने का मौलिक अधिकार केवल नागरिकों को ही प्राप्त है। जब वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपने देश में जान का खतरा है, तो जस्टिस दत्ता ने कहा कि किसी दूसरे देश में चले जाइए। बता दें, साल 2015 में याचिकाकर्ता को दो अन्य लोगों के साथ LTTE ऑपरेटिव होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था। साल 2018 में याचिकाकर्ता को UAPA की धारा-10 के तहत अपराध के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराया गया था और उसे दस साल की कैद की सजा सुनाई गई थी।   मद्रास हाई कोर्ट ने साल 2022 में उसकी सजा को घटाकर साल साल कर दिया था, लेकिन निर्देश दिया कि उसे अपनी सजा के तुरंत बाद भारत छोड़ना होगा और भारत छोड़ने तक शरणार्थी शिविर में रहना चाहिए। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 45

राष्ट्रपति के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदला जा सकता है? अनुच्छेद 143 और सलाहकार क्षेत्राधिकार की व्याख्या

नई दिल्ली भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट की सलाह मांगी है कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए निर्धारित समयसीमा देश की सर्वोच्च अदालत के द्वारा तय की जा सकती है। यह कदम तब उठाया गया जब 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों को राष्ट्रपति को तीन माह में निपटाना होगा। क्या है अनुच्छेद 143(1)? संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति किसी कानूनी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह ले सकते हैं। यह राय बाध्यकारी नहीं होती, लेकिन इसका संवैधानिक महत्व काफी अधिक होता है। सुप्रीम कोर्ट को यह सलाह संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दी जाती है। राष्ट्रपति ने यह संदर्भ 13 मई को भेजा और इसमें कुल 14 कानूनी प्रश्न शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट क्या पहले भी राय देने से मना कर चुका है? सुप्रीम कोर्ट ने दो बार राष्ट्रपति की राय मांगने पर जवाब देने से इनकार किया है। 1993 में जब राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद में मंदिर की पूर्वस्थिति पर राय मांगी गई थी, जिसे कोर्ट ने धार्मिक और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत मानते हुए खारिज कर दिया। इससे पहले 1982 में पाकिस्तान से आए प्रवासियों के पुनर्वास संबंधी कानून पर राय मांगी गई थी, लेकिन बाद में वह कानून पारित हो गया और कोर्ट में याचिकाएं दायर हो गईं, जिससे राय अप्रासंगिक हो गई। कब-कब सुप्रीम कोर्ट ने दी थी राय? संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सबसे पहले महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली लॉज एक्ट- 1951 में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी. केरल शैक्षणिक बिल- 1957 पर संदर्भ को संवैधानिक तौर पर व्याख्या करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर विवाद पर नरसिंह राव सरकार के समय भेजे गए संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था की ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों से जुड़े मामलों में राय देना अनुच्छेद 143 के दायरे में नहीं आता है. साल 1993 में कावेरी जल विवाद मामले के संदर्भ पर भी सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर दिया था. साल 2002 में गुजरात चुनाव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अपील या पुनर्विचार याचिका दायर करने के बजाय 143 के तहत संदर्भ भेजा जाना सांविधानिक तौर पर गलत विकल्प है. हालांकि, पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की तरह संदर्भ पर राय बाध्यकारी नहीं होना संविधानिक तौर पर विचित्र है. राज्यपाल मामले से जुड़े कुछ पहलू 2G मामले में यूपीए सरकार के संदर्भ से मेल खाते हैं, तब सुप्रीम कोर्ट ने 122 फर्म और कंपनियों के 2G लाइसेंस पर स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द कर दिया था. तब केंद्र ने उसे फैसले के खिलाफ संदर्भ भेजते हुए पूछा था कि क्या नीतिगत मामलों में सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी होनी चाहिए. दरअसल, केशवानंद भारती मामले में संविधान पीठ के फैसले के अनुसार नीतिगत मामलों में संसद और केंद्र के निर्णय पर अदालतों की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए. तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल मामले में क्या हुआ? राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो जजों ने दिया था. कानूनविदों की मानें तो इस मामले में कम से कम पांच जजों की संविधान पीठ में सुनवाई होनी चाहिए थी. दरअसल, पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति को उन विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए समय-सीमा निर्धारित की थी जिन्हें राज्यपाल ने राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित किया. आठ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए एक समय-सीमा निर्धारित कर दी थी. इस फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से सुप्रीम कोर्ट से सवाल किए गए हैं कि जबकि संविधान में ऐसा जिक्र नहीं है, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दे दी. कानूनविद दो जजों की पीठ के फैसले पर इसलिए भी सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि पूर्व में दिया गया सर्वोच्च अदालत की बड़ी पीठ का फैसले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका की सीमा तय की गई है. दूसरी ओर संविधान में राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास विधायक कितने दिन लंबित रहेगा, इसका जिक्र नहीं है. संविधान में जो प्रावधान नहीं है उसकी व्याख्या करके सुप्रीम कोर्ट ने नए प्रावधान बना दिए. जबकि केशवानंद भारती फैसले के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को कानून निर्माण या संविधान संशोधन की शक्ति नहीं है सरकार की खामियों, कानून के निर्वात को ठीक करने के लिए जजों को संरक्षक की भूमिका मिली है. लेकिन यह साफ है कि राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए संदर्भ पर अगर सुप्रीम कोर्ट आगे बढ़ता है यानी राय देता है तो वह बाध्यकारी नहीं होगी. वह महज एक राय, सलाह या मशविरा होगा. क्या राष्ट्रपति निर्णय को पलटना चाहती हैं? सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि अनुच्छेद 143 का उपयोग किसी पहले से दिए गए निर्णय की समीक्षा या पलटने के लिए नहीं किया जा सकता है। 1991 में कावेरी जल विवाद पर कोर्ट ने कहा था कि निर्णय देने के बाद उसी विषय पर राष्ट्रपति की राय मांगना न्यायपालिका की गरिमा के विरुद्ध है। यदि सरकार चाहे तो वह पुनर्विचार याचिका या क्युरेटिव याचिका दायर कर सकती है, जो कि न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। राष्ट्रपति ने पूछे कैसे प्रश्न? अधिकांश प्रश्न 8 अप्रैल के फैसले से जुड़े हैं, लेकिन अंतिम कुछ प्रश्नों में सुप्रीम कोर्ट की स्वयं की शक्तियों पर भी सवाल उठाए गए हैं। प्रश्न 12 में पूछा गया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को पहले यह तय करना चाहिए कि कोई मामला संविधान की व्याख्या से जुड़ा है या नहीं, ताकि उसे बड़ी पीठ को भेजा जा सके? इसी तरहा प्रश्न 13 में पूछा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की शक्ति) के प्रयोग की सीमा क्या है। प्रश्न संख्या 14 में पूछा गया है कि केंद्र-राज्य विवादों की मूल सुनवाई का अधिकार किसके पास है। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास या अन्य अदालतों के पास … Read more

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आतिशबाजी की स्थिति में शिकायत निवारण बनाना होगा, भंडारण और बिक्री पर भी प्रतिबंध

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पटाखे जलाने के कारण होने वाले वायु प्रदूषण के मामले पर सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में पटाखों के निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब एनसीआर में शामिल अन्य राज्यों को एक महीने के भीतर प्रतिबंध लगाना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आतिशबाजी की स्थिति में शिकायत निवारण और शिकायत तंत्र बनाना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि दिल्ली ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (ईपीए) की धारा पांच के तहत यह निर्देश जारी किए हैं, ताकि जुर्माना लगाया जा सके और अन्य राज्यों को भी इसका पालन करना चाहिए। जस्टिस अभय एस. ओक की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि हमने दिल्ली तथा एनसीआर में पटाखों के निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध के मामले में सुनवाई के दौरान तीन अप्रैल को आदेश जारी कर निर्देश दिए थे। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली सरकार द्वारा आदेश के अनुपालन का हलफनामा दाखिल कर बताया गया कि पटाखों का निर्माण, भंडारण आदि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर हम एनसीआर के क्षेत्रों में राजस्थान, यूपी और हरियाणा को ईपीए की धारा 5 के तहत इसी तरह के निर्देश जारी करने का निर्देश देते हैं और इसे एक महीने के भीतर जारी किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने बीते 3 अप्रैल को दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को सही ठहराया था। अदालत ने कहा था कि जब तक यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं हो जाता कि ग्रीन पटाखों से जीरो प्रदूषण होता है, तब तक प्रतिबंध के पुराने आदेश में बदलाव करने का कोई औचित्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा था कि स्वच्छ वातावरण में जीना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरों को देखते हुए पटाखों पर प्रतिबंध लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि हर व्यक्ति एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता और सड़कों-गलियों में काम करने वाले लोगों पर प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 55

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों से कहा- वे बच्चा तस्करी रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएं, जारी की गाइडलाइंस

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामलों पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जिस अस्पताल से बच्चा चुराया जाता है उसका लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस फैसले का सख्ती से पालन किया जाए। बता दें कि वाराणसी और आसपास के अस्पतालों से बच्चों की चोरी के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2024 में आरोपियों को जमानत दे दी थी, अब सुप्रीम कोर्ट ने इस जमानत को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एक देशव्यापी गिरोह था और इनके चुराए हुए बच्चे पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान तक से मिले हैं। कोर्ट ने आरोपियों को समाज के लिए खतरा बताया है। इसी के साथ कोर्ट ने  उत्तर प्रदेश सरकार को भी इस मामले में देरी करने के लिए फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों से कहा है कि वे बच्चा तस्करी रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी अस्पताल से बच्चा चोरी होता है, तो सरकार को तुरंत उस अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए। माता-पिता रहें सावधान- सुप्रीम कोर्ट ने सभी माता-पिता को सलाह दी है कि वे अस्पताल में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहें। बच्चा खरीदना भी अपराध- कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर कोई निसंतान दंपत्ति चोरी किए हुए बच्चे को खरीदते हैं, तो यह भी अपराध है। कोर्ट ने ऐसे लोगों की भी जमानत रद्द कर दी है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 63

सुप्रीम कोर्ट पहुंचे कपिल सिब्बल वक्फ काननू के खिलाफ दायर याचिकाओं पर जल्द सुनवाई की मांग

नई दिल्ली वक्फ संशोधन बिल 2025 को संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी मंजूरी दे दी, लेकिन अब तक इसका विरोध नहीं थमा है. वक्फ कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अब तक 6 याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, जिन पर जल्द सुनवाई की उम्मीद है. सोमवार (7 अप्रैल, 2025) को राज्यसभा सांसद और सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में जल्द सुनवाई का अनुरोध किया है, जिस पर मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने भी सुनवाई का आश्वासन दिया है. एडवोकेट कपिल सिब्बल याचिकाकर्ता जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से कोर्ट में पेश हुए थे. उन्होंने कहा, 'हम वक्फ कानून में किए गए संशोधनों का विरोध करते हैं और जल्द सुनवाई की मांग करते हैं.' चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि जल्द सुनवाई के अनुरोध को लेकर पहले ही व्यवस्था बनी हुई है. आपको यहां इसे रखने की कोई जरूरत नहीं थी. सीजेआई ने कहा, 'मैं दोपहर को इन अनुरोधों को देखूंगा और मामले की सुनवाई पर फैसला लूंगा.' उन्होंने सुनवाई का आश्वासन दिया है. वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ अबतक सुप्रीम कोर्ट में 6 याचिकाएं दायर हुई हैं. याचिकाकर्ता आज सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से जल्दी सुनवाई की मांग कर सकते हैं. चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने स्पष्ट किया कि जल्द सुनवाई के लिए पहले से ही एक व्यवस्था मौजूद है, इसलिए इसे यहां रखने की आवश्यकता नहीं थी. उन्होंने कहा कि वह दोपहर में इन अनुरोधों पर गौर करेंगे और मामले की सुनवाई के संबंध में निर्णय लेंगे. उन्होंने सुनवाई का आश्वासन भी दिया है. वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ अब तक सुप्रीम कोर्ट में छह याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं, और याचिकाकर्ता आज चीफ जस्टिस से त्वरित सुनवाई की मांग कर सकते हैं. अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी और निजाम पाशा ने भी पेशी दी. कानून के खिलाफ सबसे पहले कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने 4 अप्रैल को याचिका प्रस्तुत की थी. इसके अतिरिक्त, एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने वक्फ कानून में संशोधनों की वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. एक गैर सरकारी संगठन ‘सिविल राइट्स के संरक्षण के लिए संघ’ ने भी एक याचिका प्रस्तुत की है. केरल के सुन्नी मुस्लिम विद्वानों का धार्मिक संगठन ‘समस्त केरल जमीयत-उल उलेमा’ ने एडवोकेट जुल्फिकार अली पी एस के माध्यम से यह याचिका दाखिल की है. अन्य याचिकाकर्ताओं के लिए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी और निजाम पाशा भी पेश हुए थे. कानून के खिलाफ सबसे पहले  कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने 4 अप्रैल को याचिका दाखिल की थी. उनके अलावा एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी और आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने वक्फ कानून के संशोधनों की वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. एक गैर सरकारी संगठन 'एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स' ने भी याचिका दायर की है. केरल के सुन्नी मुस्लिम विद्वानों के धार्मिक संगठन 'समस्त केरल जमीयत-उल उलेमा' ने एडवोकेट जुल्फिकार अली पी एस के माध्यम से याचिका दाखिल की. याचिकाओं में क्या-क्या सवाल उठाए गए हैं? सुप्रीम कोर्ट में दायर इन याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का तर्क देते हुए कहा है कि यह विधेयक धार्मिक मामलों के प्रबंधन में स्वतंत्रता को प्रभावित करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को दी गई है. खासकर, वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान और सरकार को वक्फ संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण देने की व्यवस्था को मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप माना जा रहा है. याचिकाओं में दावा किया गया है कि यह विधेयक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह केवल मुस्लिम समुदाय से संबंधित वक्फ संपत्तियों को लक्षित करता है, जबकि अन्य धर्मों के ट्रस्ट या धार्मिक संस्थानों के लिए समान प्रावधान लागू नहीं किए गए हैं. विधेयक में वक्फ संपत्तियों के सर्वेक्षण और प्रबंधन के लिए सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ाने के प्रावधानों को संपत्ति के अधिकार के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता को कम करता है और संपत्तियों पर समुदाय के नियंत्रण को खतरे में डालता है. कुछ याचिकाओं में यह सवाल उठाया गया है कि यह विधेयक अल्पसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को कमजोर करता है, जो संविधान के तहत संरक्षित है.विधेयक में जिला कलेक्टर जैसे सरकारी अधिकारियों को वक्फ संपत्तियों के सर्वेक्षण और विवादों को निपटाने का अधिकार देना भी विवाद का कारण बना है. बता दें संसद के दोनों सदनों से बजट सत्र में पारित वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 को शनिवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिल गई. इस संबंध में गजट अधिसूचना जारी होने के साथ ही वक्फ अधिनियम, 1995 का नाम भी बदलकर यूनिफाइड वक्फ मैनेजमेंट, इम्पावरमेंट, एफिशिएंसी एंड डेवलपमेंट (उम्मीद) अधिनियम, 1995 हो गया है.   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. 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सुप्रीम कोर्ट ने पासपोर्ट देने से इनकार, कोर्ट ने कहा, इलाहाबादिया को अब दो हफ्ते बाद आना

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने यूट्यूबर और पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया को झटका देते हुए पासपोर्ट जारी करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने इलाहाबादिया को अब दो हफ्ते बाद आने को कहा है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि अगर पासपोर्ट जारी करने का आदेश दिया जाता है तो इससे जांच प्रभावित हो सकती है। इससे पहले उनके वकील अभिनव चंद्रचूड़ ने कोर्ट से गुजारिश की कि याचिकाकर्ता की आजीविका मशहूर हस्तियों के साक्षात्कार करने से ही चलती है,और इसके लिए उन्हें लगातार यात्रा करनी पड़ती है। इसलिए जब्त पासपोर्ट रिलीज करने का आदेश दिया जाय। चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि याचिकाकर्ता ने पिछले आदेश के अनुसार अंडरटेकिंग भी दाखिल की है। दरअसल, चंद्रचूड़ ने रणवीर इलाहाबादिया के आजीविका प्रभावित होने का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय से पासपोर्ट जमा करने की शर्त में संशोधन करने का अनुरोध किया था। इलाहाबादिया ने दलील दी थी कि पॉडकास्ट उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत है और उनके द्वारा काम पर रखे गए लगभग 280 लोग इस कार्यक्रम पर निर्भर हैं। दो हफ्ते में पूरी होगी जांच इस पर कोर्ट ने कहा कि इसके दो पहलू हैं। अगर हम आपको यात्रा करने की अनुमति देते हैं, तो जांच पर असर पड़ेगा और उसे स्थगित भी किया जा सकता है। मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जांच पूरी होने में अभी 2 सप्ताह लगेंगे। इसके बाद कोर्ट ने इलाहाबादिया को दो सप्ताह बाद आने को कहा। इलाहाबादिया ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष संकल्प लिया कि वह अपने शो में शालीनता बनाए रखेंगे। कोर्ट ने एक अन्य यूट्यूबर आशीष चंचलानी का पासपोर्ट भी जारी करने से इनकार कर दिया है। ये सभी स्टैंड-अप कॉमेडी शो 'इंडियाज गॉट लेटेंट' में अश्लील कमेंट करने के आरोपी हैं। शो के दौरान इलनलोगों ने माता-पिता के सेक्स पर अभद्र टिप्पणी की थी। इसके खिलाफ इन पर कई मुकदमे दायर किएा गए थे।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 43

सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा के बाद हुए दंगों के केस में 6 को किया बरी, वह अवैध भीड़ का हिस्सा थे

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के मामले के छह आरोपियों को  बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी मामले में सिर्फ मौके पर मौजूद होना या वहां से गिरफ्तारी होना यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वे गैरकानूनी भीड़ के हिस्सा थे। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने गुजरात हाईकोर्ट के 2016 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें गोधरा कांड के बाद 2002 में हुए दंगों के मामले में छह लोगों को बरी करने के फैसले को पलट दिया गया था। बेंच ने कहा कि सिर्फ मौके पर मौजूद होना या वहां से गिरफ्तारी होना यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वे (छह लोग) एक हजार से ज्यादा लोगों की गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा थे। धीरूभाई भाईलालभाई चौहान और पांच अन्य को उस घटना में एक साल की जेल की सजा सुनाई गई थी, जिसमें कथित तौर पर भीड़ ने वडोद गांव में एक कब्रिस्तान और एक मस्जिद को घेर लिया था। सभी अपीलकर्ता आरोपियों को मौके से गिरफ्तार कर लिया गया था। निचली अदालत ने सभी 19 आरोपियों को बरी कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने उनमें से 6 को दोषी ठहराया। एक आरोपी की मामला लंबित रहने के दौरान मौत हो गई थी। अपीलकर्ताओं सहित 7 लोगों को एफआईआर में नामजद किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने एक निचली अदालत के 2003 के फैसले को बहाल करते हुए उन्हें बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी तरह की दोषी भूमिका के अभाव में मौके पर उनकी गिरफ्तारी 28 फरवरी 2002 को वडोद में हुई घटना में उनकी संलिप्तता के बारे में निर्णायक नहीं है। खासकर तब जब उनके पास से न तो विध्वंस का कोई हथियार बरामद हुआ और ना ही कोई भड़काऊ सामग्री। बेंच ने कहा कि पुलिस ने गोलीबारी की, जिससे लोग इधर-उधर भागने लगे। इस तरह की झड़प में एक निर्दोष व्यक्ति को भी अपराधी समझ लिया जाता है। इसलिए, अपीलकर्ताओं की मौके से गिरफ्तारी उनकी दोषी होने की गारंटी नहीं है। बेंच ने कहा कि सामूहिक झड़पों में अदालतों पर यह सुनिश्चित करने का भारी दायित्व होता है कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को दोषी न ठहराया जाए और उसकी स्वतंत्रता छीनी न जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को सावधान रहना चाहिए और उन गवाहों की गवाही पर भरोसा करने से बचना चाहिए, जो आरोपी या उसकी भूमिका का विशेष संदर्भ दिए बिना सामान्य बयान देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि अक्सर (खासकर जब अपराध का स्थान सार्वजनिक स्थान होता है) लोग जिज्ञासावश अपने घर से बाहर निकलकर यह देखने लगते हैं कि आसपास क्या हो रहा है। ऐसे लोग केवल एक दर्शक से अधिक कुछ नहीं होते। हालांकि, गवाह को वे गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा लग सकते हैं। बेंच ने कहा, "इस प्रकार, सावधानी के नियम के रूप में और कानून के नियम के रूप में नहीं, जहां रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य इस तथ्य को स्थापित करते हैं कि बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे, केवल उन व्यक्तियों को दोषी ठहराना सुरक्षित हो सकता है, जिनके खिलाफ प्रत्यक्ष कृत्य का आरोप लगाया गया है। कई बार ऐसे मामलों में सावधानी के नियम के रूप में और कानून के नियम के रूप में नहीं, अदालतों ने बहुलता परीक्षण को अपनाया है। अर्थात, दोषसिद्धि तभी कायम रह सकती है जब इसका समर्थन कुछ निश्चित संख्या में गवाहों द्वारा किया जाए जो घटना का सुसंगत विवरण देते हैं।" बेंच ने कहा कि ऐसी स्थिति में अदालत के लिए यह निर्धारित करना महत्वपूर्ण है कि क्या अभियुक्त जिस पर मुकदमा चलाया जा रहा है वह गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था या सिर्फ एक दर्शक था। ऐसा निर्धारण मामले के सिद्ध तथ्यों के आधार पर अनुमानात्मक है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अपीलकर्ता उसी गांव के निवासी थे, जहां दंगे भड़के थे, इसलिए घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति स्वाभाविक है। कोर्ट ने कहा कि इतना ही नहीं अभियोजन पक्ष का यह मामला नहीं है कि वे हथियार या विध्वंस के उपकरण लेकर आए थे। बेंच ने कहा, "हाईकोर्ट द्वारा लिया गया विपरीत दृष्टिकोण पूरी तरह से अनुचित है।'' Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 37

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- राशन कार्ड को लेकर घिरीं राज्य सरकारें, सब्सिडी का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचना चाहिए

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जब राज्यों से विकास सूचकांक बताने के लिए कहा गया तो उन्होंने प्रति व्यक्ति वृद्धि दर ऊंची दिखाई, लेकिन जब सब्सिडी की बात आई तो उन्होंने दावा किया कि उनकी 75 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) है। अदालत ने कहा कि सब्सिडी का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचने चाहिए। जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा, 'हमारी चिंता यह है कि क्या गरीबों को मिलने वाले लाभ उन लोगों तक पहुंच रहे हैं जो इसके हकदार नहीं हैं? राशन कार्ड अब लोकप्रियता का कार्ड बन गया है।' 75 प्रतिशत आबादी बीपीएल कैसे? पीठ ने कहा, 'ये राज्य सिर्फ इतना कहते हैं कि हमने इतने कार्ड जारी किए हैं। कुछ राज्य ऐसे हैं जो जब अपना विकास दिखाना चाहते हैं तो कहते हैं कि हमारी प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है। फिर जब हम बीपीएल की बात करते हैं तो वे कहते हैं कि 75 प्रतिशत आबादी बीपीएल है। इन तथ्यों को कैसे जोड़ा जा सकता है? विरोधाभास अंतर्निहित है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचे।' जानिए पूरा मामला यह केस कोविड-19 महामारी के दौरान प्रवासी कामगारों की परेशानियों को दूर करने के लिए शुरू किए गए एक स्वत: संज्ञान मामले से संबंधित है। कुछ हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि यह विसंगति लोगों की आय में असमानताओं से उपजी है। उन्होंने कहा कि मुट्ठीभर लोग हैं, जिनके पास अन्य आबादी की तुलना में बहुत अधिक संपत्ति है और प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा राज्य की कुल आय का औसत है। अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि गरीब गरीब ही बने हुए हैं। राशन कार्ड जारी करने में राजनीतिक तत्व न हों शामिल भूषण ने कहा कि सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत गरीब प्रवासी कामगारों को मुफ्त राशन दिए जाने की जरूरत है और यह आंकड़ा लभगग आठ करोड़ है। जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि हमें उम्मीद है कि राशन कार्ड जारी करने में राजनीतिक तत्व शामिल नहीं होंगे। मैं अपनी जड़ों नहीं कटा हूं। मैं हमेशा गरीबों की दुर्दशा के बारे में जानना चाहता हूं। अभी भी ऐसे परिवार हैं जो गरीब हैं। 81 करोड़ लोगों को दिया जा रहा मुफ्त राशन भूषण ने कहा कि केंद्र ने 2021 की जनगणना नहीं कराई और 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर काम कर रही है। इसके परिणामस्वरूप मुफ्त राशन की जरूरत वाले करीब 10 करोड़ लोग बीपीएल श्रेणी से बाहर रह गए। जबकि केंद्र की ओर से एएसजी ऐश्वर्य भाटी ने कहा कि सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत करीब 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रही है और इसी तरह की एक अन्य योजना में 11 करोड़ अन्य लोग शामिल हैं। पीठ ने मामले को स्थगित कर दिया और केंद्र से गरीबों को वितरित मुफ्त राशन की स्थिति पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 61

पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे के निस्तारण का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की

The way is cleared for disposal of Union Carbide’s toxic waste in Pithampur, Supreme Court rejects the petition खबर एक संवेदनशील और पर्यावरणीय रूप से महत्वपूर्ण मुद्दे को दर्शाती है। यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे को पीथमपुर में जलाने की प्रक्रिया, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, सरकार की तैयारियाँ, और सामाजिक कार्यकर्ताओं की चिंताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। मुख्य बिंदु: क्या आगे हो सकता है? आप इस विषय पर अपनी राय या इस मुद्दे से जुड़े किसी विशेष पहलू पर गहराई से चर्चा करना चाहेंगे? Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 100

आपराधिक मामलों में दोषी नेताओं पर ताउम्र चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध सही नहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए नेताओं पर ताउम्र चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं होगा। केंद्र ने कहा कि मौजूदा छह साल का प्रतिबंध ही काफी है। आपराधिक मामलों में दोषी करार दिए गए नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका का विरोध करते हुए केंद्र सरकार ने शीर्ष न्यायालय से ऐसा कहा है। इस याचिका में दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों समेत अन्य नेताओं पर चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत में दाखिल हलफनामे में केंद्र ने कहा कि याचिका में जो अनुरोध किया गया है वह विधान को फिर से लिखने या संसद को एक विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देने के समान है, जो न्यायिक समीक्षा संबंधी उच्चतम न्यायालय की शक्तियों से पूरी तरह से परे है। इसके साथ ही केंद्र ने कहा कि इस तरह की अयोग्यता तय करना केवल संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। हलफनामे में कहा गया है, ‘‘यह सवाल कि आजीवन प्रतिबंध लगाना उपयुक्त होगा या नहीं, यह पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।’’ इसमें कहा गया है कि दंड के क्रियान्वयन को एक उपयुक्त समय तक सीमित कर, रोकथाम सुनिश्चित की गई है और अनावश्यक कठोर कार्रवाई से बचा गया है। केंद्र ने कहा कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि दंड या तो समय या मात्रा के अनुसार निर्धारित होते हैं। हलफनामे में कहा गया है, ‘‘यह दलील दी गई है कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों के व्यापक प्रभाव हैं और वे स्पष्ट रूप से संसद की विधायी नीति के अंतर्गत आते हैं तथा इस संबंध में न्यायिक समीक्षा की रूपरेखा में उपयुक्त परिवर्तन करना पड़ेगा।’’ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर दोषी करार दिये गए नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के अलावा देश में सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के त्वरित निस्तारण का अनुरोध किया है। अपने हलफनामे में, केंद्र ने कहा कि शीर्ष अदालत ने निरंतर यह कहा है कि एक विकल्प या दूसरे पर विधायी विकल्प की प्रभावकारिता को लेकर अदालतों में सवाल नहीं उठाया जा सकता। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (1) के तहत, अयोग्यता की अवधि दोषसिद्धि की तारीख से छह साल या कारावास के मामले में रिहाई की तारीख से छह साल तक है। हलफनामे में कहा गया है कि उक्त धाराओं के तहत घोषित की जाने वाली अयोग्यताएं संसदीय नीति का विषय हैं और आजीवन प्रतिबंध लगाना उपयुक्त नहीं होगा। केंद्र ने कहा कि न्यायिक समीक्षा के मामले में, न्यायालय प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, हालांकि, याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत में अधिनियम की धारा 8 की सभी उप-धाराओं में ‘‘छह वर्ष’’ के प्रावधान को ‘‘आजीवन’’ पढ़े जाने का अनुरोध किया गया है। इसने कहा कि आजीवन अयोग्यता, प्रावधानों के तहत लगाई जा सकती है और ऐसा विवेकाधिकार ‘‘निश्चित रूप से संसद के अधिकार क्षेत्र में’’ है। केंद्र ने कहा कि याचिका अयोग्यता के आधार और अयोग्यता के प्रभावों के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करने में विफल रही है। हलफनामे में कहा गया है कि याचिकाकर्ता का संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 का उल्लेख करना पूरी तरह से गलत है। संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 संसद, विधानसभा या विधानपरिषद की सदस्यता के लिए अयोग्यता से संबंधित हैं। केंद्र ने कहा कि अनुच्छेद 102 और 191 के खंड (ई) संसद को अयोग्यता से संबंधित कानून बनाने की शक्ति प्रदान करते हैं और इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए 1951 का (जन प्रतिनिधित्व) अधिनियम बनाया गया था। इसने कहा कि संविधान ने संसद को अयोग्यता से संबंधित ऐसे अन्य कानून बनाने का अधिकार दिया है, जिसे बनाना वह उचित समझता हो। केंद्र ने कहा, ‘‘संसद के पास अयोग्यता के आधार और अयोग्यता की अवधि, दोनों निर्धारित करने की शक्ति है।’’न्यायालय ने 10 फरवरी को, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा था। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 58

सुप्रीम कोर्ट चुनाव से पहली मुफ्त योजनाओं पर भड़का, फ्रीबीज के कारण लोग काम करने तैयार नहीं हैं,

नई दिल्ली चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जमकर नाराजगी जाहिर की है। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि Freebies की वजह से लोग काम करने को तैयार नहीं है। अदालत बुधवार को शहरी इलाकों में बेघरों से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही थी। फिलहाल, इस मामले पर सुनवाई को 6 हफ्तों के लिए स्थगित कर दिया गया है। शीर्ष न्यायालय में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच शहरी इलाकों में बेघरों को घर के अधिकार से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस गवई ने कहा, 'दुर्भाग्यवश, मुफ्त की इन सुविधाओं के कारण… लोग काम करने को तैयार नहीं हैं। उन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है। उन्हें बिना कोई काम किए ही धनराशि मिल रही है।' बेंच ने कहा, 'हम उनके प्रति आपकी चिंता को समझते हैं, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वह भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ें और उन्हें भी देश के विकास में योगदान का मौका मिले।' अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है, जिसके तहत शहरी क्षेत्रों में बेघरों के लिए आश्रय की व्यवस्था समेत विभिन्न मुद्दों का समाधान किया जाएगा। पीठ ने अटॉर्नी जनरल को केंद्र सरकार से यह पूछने का निर्देश दिया कि शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन कितने समय में लागू किया जाएगा। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 36

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा- फिलहाल EVM से कोई डेटा डिलीट न करें और ना ही रीलोड करें

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ईवीएम के सत्यापन के संबंध में नीति बनाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई की. याचिका में चुनाव आयोग को ईवीएम की मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर की जांच और सत्यापन के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है. इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) से जवाब मांगा है और आदेश दिया है कि फिलहाल EVM से कोई डेटा डिलीट न करें और ना ही कोई डेटा रीलोड करें. दरअसल, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा कोर्ट में ईवीएम के सत्यापन को लेकर याचिका दायर की गई थी. इस पर मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि हम नहीं चाहते कि ईवीएम से छेड़छाड़ हो, हम चाहते हैं कि शायद इंजीनियर यह बता सके कि कोई छेड़छाड़ हुई है या नहीं. हमारी परेशानी यह है कि हमने इसे सही तरीके से नहीं बताया. इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि जिस तरह से आप चाहते हैं, हम उसे पूरा करेंगे. कोर्ट ने आदेश दिया कि वे (ईसीआई) इसे लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. आप में से कौन सही है, हमें नहीं पता. हम सिर्फ पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस मुद्दे पर 15 दिनों में जवाब दाखिल करने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि हम करण सिंह दलाल और एमए 40/2025 की याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं. हम विस्तृत प्रक्रिया भी नहीं चाहते. हम चाहते हैं कि आप आएं और प्रमाणित करें कि देखिए यह किया जा रहा है. डेटा को मिटाएं या फिर से लोड ना करें. आप बस यही करेंगे कि कोई आकर प्रमाणित करेगा. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई हारने वाला उम्मीदवार स्पष्टीकारण चाहता है तो इस पर इंजीनियर ही स्पष्टीकरण दे सकता है कि ईवीएम से छेड़छाड़ हुई है या नहीं. हम चाहते हैं कि अगर किसी को कोई संदेह है तो वो दूर हो. यह विरोधात्मक नहीं है. कई बार धारणाएं अलग-अलग होती हैं, जो हम बताना चाहते हैं, वह हम नहीं बता पाते. हम नहीं चाहते हैं कि ईवीएम से छेड़छाड़ हो, हम चाहते हैं कि शायद इंजीनियरिंग यह बता सके कि कोई छेड़छाड़ हुई है या नहीं. आप में से कौन सही है, हमें नहीं पता. हम सिर्फ पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. सुनवाई के दौरान एडीआर की ओर से पेश हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा, "हम चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार चुनाव आयोग को जो प्रक्रिया अपनानी है, वह उनके मानक संचालन प्रोटोकॉल के अनुरूप हो. हम चाहते हैं कि कोई व्यक्ति ईवीएम के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जांच करे, ताकि यह पता चल सके कि सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में किसी तरह की छेड़छाड़ की गई है या नहीं. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने अपने पहले के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा, "हम नहीं चाहते थे कि मतगणना तक कोई गड़बड़ी हो (पहले के आदेश के माध्यम से) साथ ही, हम यह भी देखना चाहते थे कि क्या किसी को कोई संदेह है. हम नहीं चाहते थे कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की जाए, हम चाहते थे कि शायद इंजीनियरिंग यह बता सके कि क्या कोई छेड़छाड़ हुई है." Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 61

सुप्रीम कोर्ट ने ‘डेड बॉडी के साथ यौन संबंध बनाना ‘बलात्कार’ अपराध की दलील खारिज की

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि दंड कानून नेक्रोफीलिया को अपराध नहीं मानते, इसलिए वह हाईकोर्ट के आंशिक बरी करने के आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, जिसमें आरोपी ने मृतक की हत्या करने के बाद उसके शव के साथ यौन संबंध बनाए थे। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की खंडपीठ कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी को मृत शरीर के साथ यौन संबंध बनाने के लिए बलात्कार के आरोपों से बरी कर दिया गया, लेकिन हत्या के अपराध के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी। यहां राज्य सरकार ने वर्तमान एसएलपी दायर की।  हाई कोर्ट ने शख्स को रेप के आरोप से बरी कर दिया था, लेकिन हत्या की सजा कायम रही। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) में नेक्रोफिलिया (Necrophilia) यानी शव के साथ कामुकता को अपराध नहीं माना गया है। कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में कर्नाटक सरकार की ओर से अडिशनल एडवोकेट जनरल अमन पंवार ने तर्क दिया कि IPC की धारा 375(c) में 'शरीर' शब्द को मृत शरीर भी शामिल माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि रेप की परिभाषा के तहत प्रावधान में कहा गया है कि यदि कोई महिला सहमति नहीं दे सकती है तो इसे बलात्कार माना जाएगा। इसी तर्क के आधार पर मृत शरीर भी सहमति नहीं दे सकता, इसलिए यह अपराध बलात्कार की श्रेणी में आना चाहिए। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि नेक्रोफिलिया भारतीय दंड संहिता के तहत कोई अपराध नहीं है, इसलिए वह हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने को इच्छुक नहीं है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने क्या कहा था? कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि मृत शरीर के साथ यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता, क्योंकि IPC की धारा 375 और 377 केवल जीवित मनुष्यों पर लागू होती है। धारा 375 और 377 का गहराई से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि मृत शरीर को 'व्यक्ति' या 'मानव' नहीं माना जा सकता। इसलिए, इन धाराओं के तहत कोई अपराध नहीं बनता और आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत सजा नहीं दी जा सकती। हाई कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि नेक्रोफिलिया एक गंभीर समस्या है और संसद को इसे अपराध घोषित करने के लिए कानून बनाना चाहिए। एक मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भी दिसंबर में कहा था कि किसी मृत महिला या बच्ची के साथ यौन अपराध किया जाता है तो उसे IPC की धारा 375 (बलात्कार) या POCSO अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कानून में बदलाव की दरकार अस्पतालों और मुर्दाघरों में युवतियों के शवों के साथ यौन संबंध की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन भारत में ऐसे मामलों के लिए कोई विशेष कानून नहीं है। नेक्रोफिलिया एक मनो-यौन विकार (psychosexual disorder) है। यह सही समय है कि केंद्र सरकार मृत व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए IPC की धारा 377 में संशोधन करे और नेक्रोफिलिया को अपराध घोषित करे, जैसा कि यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में किया गया है। यह मामला भारतीय दंड संहिता में संशोधन की आवश्यकता को उजागर करता है ताकि मृत व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों की रक्षा की जा सके। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 58

सुप्रीम कोर्ट जज का दावा- इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर मांग रहे थे बंद कमरे में माफी, बाहर निकलकर पलटे

नई दिल्ली इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव ने एक कार्यक्रम में मुसलमानों के लिए कठमुल्ला शब्द का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा उन्होंने देश में बहुसंख्यकों के हिसाब से व्यवस्था चलने की बात कही थी। उनके इस बयान को लेकर जमकर विवाद हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका संज्ञान लिया। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के सामने जस्टिस यादव व्यक्तिगत तौर पर पेश हुए थे। इस बीच कॉलेजियम के मेंबर रहे जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने कई अहम खुलासे किए हैं। उनका कहना है कि जस्टिस शेखर कुमार यादव ने कॉलेजियम के साथ मीटिंग में कहा था कि मैं आप लोगों से माफी मांग लेता हूं। उन्होंने कहा कि मैं आपसे माफी मांगने के लिए तैयार हूं। इस पर चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि बंद कमरे में माफी मांगने का कोई मतलब नहीं है। ऐसा आपको सार्वजनिक तौर पर करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से 31 जनवरी को रिटायर होने वाले जस्टिस रॉय ने कहा कि जस्टिस शेखर कुमार यादव ने सार्वजनिक माफी की बात को मान लिया था। वह यह कहते हुए मीटिंग से निकले थे, लेकिन आज तक माफी की मांग नहीं की। यही नहीं उन्होंने तो अपने एक जवाब में यहां तक कहा था कि मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा है। जस्टिस रॉय ने कहा कि ऐसा लगता है कि बाद में उनका विचार बदल गया। पहले तो वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने के लिए तैयार हो गए थे। जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने उनके इस व्यवहार को लेकर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा, 'ऐसा एक और वाकया हुआ था, जब एक जज ने ऐसा ही बयान दिया था। तब उन्होंने बाद में माफी मांग ली थी। जस्टिस यादव ने भी पब्लिक में माफी की बात कही, लेकिन अब तक ऐसा नहीं किया है। अब चीफ जस्टिस ने इन-हाउस इन्क्वॉयरी शुरू की है।' जस्टिस रॉय ने कहा, 'उन्होंने कॉलेजियम के सभी 5 जजों के सामने कहा था कि मैं आप सभी लोगों से माफी मांगता हूं। वह उस समय तैयार थे। लेकिन चीफ जस्टिस ने जब पब्लिक में माफी की मांग की तो वह तैयार हो गए। वहां से निकले तो फिर ऐसा नहीं किया।' समान नागरिक संहिता पर एक भाषण देते हुए जस्टिस शेखर कुमार यादव ने विवादित बयान देते हुए कहा था कि देश का सिस्टम बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा। उन्होंने कहा था कि परिवार में आखिर जिस बात को ज्यादा लोग मानते हैं, वही होता है। इसके अलावा उन्होंने मुस्लिमों के लिए कठमुल्ला शब्द का इस्तेमाल किया था। इसी मामले पर उन्हें कॉलेजियम ने समन जारी किया था। बता दें कि जस्टिस शेखर यादव ने इश मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को जवाब दिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि मैं अब भी अपने बयान पर कायम हूं। उनका कहना था कि मैंने अपना बयान जज के तौर पर नहीं बल्कि एक हिंदू के रूप में दिया था। इसलिए अदालत परिसर से बाहर कही गई कोई बात उनके जज रहने की आचार संहिता का उल्लंघन नहीं करती। इसके अलावा हाई कोर्ट की मर्यादा को भी इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचता। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 36

कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को जारी किए गए जीएसटी ‘कारण बताओ नोटिस’ पर रोक लगाई: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को जारी किए गए 1.12 लाख करोड़ रुपये के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) 'कारण बताओ नोटिस' पर रोक लगा दी, जिससे इस सेक्टर को अस्थायी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मामले के अंतिम निपटारे तक डीजीजीआई द्वारा जारी सभी 'कारण बताओ नोटिस' के संबंध में आगे की सभी कार्यवाही पर रोक लगा दी। मामले की अंतिम सुनवाई 18 मार्च को तय की गई है। फैसले के बाद, स्टॉक एक्सचेंजों पर इंट्रा-डे ट्रेड के दौरान डेल्टा कॉर्प और नाजारा टेक जैसी गेमिंग कंपनियों के शेयरों में 7 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। ई-गेमिंग फेडरेशन (ईजीएफ) के सीईओ अनुराग सक्सेना ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई राहत का स्वागत किया। सक्सेना ने कहा, "यह सरकार और गेमिंग ऑपरेटर्स दोनों के लिए फायदेमंद है। गेमिंग ऑपरेटर्स के लिए जो जबरदस्ती की कार्रवाई का सामना कर रहे थे और सरकार के लिए जिसकी समयसीमा अब बढ़ाई जा सकती है। हम इस मुद्दे के निष्पक्ष और प्रगतिशील समाधान को लेकर आश्वस्त हैं, जिसके बाद हम गेमिंग सेक्टर में निवेश, रोजगार और वैल्यूएशन को अपनी पूरी क्षमता तक बढ़ते देखेंगे।" डीजीजीआई ने 2023 में गेमिंग कंपनियों को 71 नोटिस भेजे, जिसमें उन पर 2022-23 और 2023-24 के पहले सात महीनों के दौरान 1.12 लाख करोड़ रुपये के जीएसटी की चोरी करने का आरोप लगाया गया, जिसमें ब्याज और जुर्माना शामिल नहीं है। जीएसटी अधिनियम की धारा 74 के तहत नोटिस जारी किए गए थे, जो विभाग को कर मांग के 100 प्रतिशत तक का जुर्माना लगाने की अनुमति देता है और कुल देयता ब्याज सहित 2.3 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। अगस्त 2023 में, जीएसटी परिषद ने कानून में संशोधन किया, जिसमें कहा गया कि दांव लगाने वाले सभी ऑनलाइन गेम, स्किल या चांस की परवाह किए बिना, उसी वर्ष 1 अक्टूबर से लगाए गए दांव के पूरे मूल्य पर 28 प्रतिशत की जीएसटी दर लगेगी, न कि सकल गेमिंग राजस्व पर।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 83

33% महिला आरक्षण कानून को चुनौती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को निरर्थक बताया

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने 33% महिला आरक्षण कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई से शुक्रवार को इनकार कर दिया। अदालत ने उस याचिका को निरर्थक बताया जिसमें विधेयक को चुनौती दी गई थी, न कि अधिनियम को। दूसरी याचिका में इस मामले को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने सहित अन्य उपाय तलाशने की मांग रखी गई, जिसे नकार दिया गया। एससी की बेंच ने कहा कि पहले भी संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का मुद्दा उठाया गया, मगर इसे कभी लागू नहीं किया जा सका। हालांकि, इस बार इसे परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने की शर्त पर लागू किया जा रहा है। महिला आरक्षण कानून क्या है? महिला आरक्षण अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023) लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी यह नियम लागू होगा। इसका मतलब है कि लोकसभा की 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाएंगी। हालांकि, पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित नहीं होंगी। मालूम हो कि जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद यह आरक्षण लागू होगा। जनगणना के आधार पर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होंगी जिसके लिए परिसीमन किया जाएगा। यह आरक्षण 15 साल की अवधि के लिए मिलेगा। फिलहाल, लोकसभा की 131 सीटें एससी-एसटी के लिए आरक्षित की गई हैं। महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद इनमें से 43 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इन 43 सीटों को सदन में महिलाओं के लिए आरक्षित कुल सीटों का ही हिस्सा माना जाएगा। इसका मतलब है कि महिलाओं के लिए आरक्षित 181 सीटों में से 138 ऐसी होंगी, जिन पर किसी भी जाति की महिला उम्मीदवार होगी। साफ है कि इन सीटों पर उम्मीदवार पुरुष नहीं हो सकते हैं। मालूम हो कि यह गणना लोकसभा में सीटों की मौजूदा संख्या पर की गई है। परिसीमन के बाद इसमें बदलाव हो सकता है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 70

राजद नेता याचिका पर सुनवाई में की टिप्पणी, सुप्रीम कोर्ट ने माननीयों को सिखाया विरोधियों से बात करने का तरीका

नई दिल्ली। विधानसभाओं और संसद में लगातार हो रही कटुतापूर्ण कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को कहा कि ऐसा लगता है कि विधायक यह भूल गए हैं कि कड़ा विरोध जताते समय या विरोधियों की आलोचना करते समय कैसे सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। यह टिप्पणी जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन के सिंह की पीठ ने राजद नेता सुनील कुमार सिंह की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में बिहार विधान परिषद के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें बजट सत्र के दौरान कथित कदाचार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नकल करने के कारण उन्हें सदन से निष्कासित कर दिया गया था। सम्मान के साथ हो कटु आलोचना सुप्रीम कोर्ट ने सिंह की टिप्पणियों को प्रथम दृष्टया अस्वीकार करते हुए कहा कि सम्मानित सदनों के सदस्यों को दूसरों के कटु आलोचक होते हुए भी उनका सम्मान करना चाहिए। सुनील कुमार सिंह के वकील ए एम सिंघवी ने कहा कि भले ही मामला कोर्ट में विचाराधीन है, लेकिन चुनाव आयोग ने सिंह की खाली हुई सीट के लिए उपचुनाव की घोषणा की है और आशंका जताई है कि इससे भ्रम की स्थिति पैदा होगी। चुनाव पर रोक लगाने की मांग सिंघवी ने कहा कि अगर चुनाव होते हैं और कोई और निर्वाचित होता है और उसी समय सुप्रीम कोर्ट सिंह के निष्कासन को रद्द कर देता है, तो इससे एक ही सीट के लिए दो निर्वाचित उम्मीदवारों के होने की असंगत स्थिति पैदा होगी। उन्होंने अनुरोध किया कि सुप्रीम कोर्ट को इस महीने के अंत में होने वाले चुनावों पर रोक लगा देनी चाहिए। 'क्या आप ऐसी भाषा का समर्थन करते हैं?' सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव स्थगित करने से इनकार कर दिया, लेकिन कहा कि वह सिंह की रिट याचिका पर अंतिम सुनवाई 9 जनवरी को करेगा। सिंघवी ने कहा कि सदन के अंदर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापक छूट दी गई है। पीठ ने कहा कि इस तरह से सदन के अंदर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल किया जाता है? आप (सिंघवी) भी संसद सदस्य हैं। क्या आप सदन के अंदर विरोधियों के खिलाफ ऐसी भाषा के इस्तेमाल का समर्थन करते हैं? सिंघवी ने कहा कि वह ऐसी भाषा का समर्थन नहीं करते हैं, लेकिन ऐसी भाषा के इस्तेमाल के लिए निष्कासन से विपक्ष की बेंच खाली हो जाएगी। एक अन्य एमएलसी की तरफ से भी इसी तरह की भाषा के इस्तेमाल के लिए, उन्हें केवल निलंबित किया गया था। लेकिन सिंह के मामले में, यह निष्कासन था। 26 जुलाई को किया गया था निष्कासित विधान परिषद की आचार समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिंह को हटाने की संस्तुति करते हुए कहा था कि "विपक्ष के मुख्य सचेतक होने के नाते उनकी विधायी जिम्मेदारी और नियमों और विनियमों का पालन दूसरों से अधिक होना चाहिए। लेकिन उनका व्यवहार इसके विपरीत था। वेल में आकर उन्होंने अनर्गल नारे लगाए, सदन की कार्यवाही में बाधा डाली। अध्यक्ष के निर्देश का अनादर किया। सदन के नेता के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। उन्हें अपमानित करने की कोशिश की और एक तरह से विधान परिषद की गरिमा को नुकसान पहुंचाया। रिपोर्ट के आधार पर सिंह को 26 जुलाई को निष्कासित कर दिया गया। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 52

निष्पक्ष व्यापार नियामक आयोग करेगा जांच, सुप्रीम कोर्ट ने अमेजन-फ्लिपकार्ट की याचिकाएं कर्नाटक हाईकोर्ट ने कीं ट्रांसफर

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ई-कॉमर्स कंपनियों अमेजन और फ्लिपकार्ट की सीसीआई (कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया) जांच के खिलाफ दायर याचिकाओं को कर्नाटक उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइंया की पीठ ने कहा कि यदि स्थानांतरित याचिकाओं में से कुछ में दलीलें पूरी नहीं हुई हैं, तो मामले को देखते हुए न्यायाधीश दलीलें पूरी करने के लिए उचित समय दिया जाए। सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि निष्पक्ष व्यापार नियामक 'भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई)' द्वारा याचिका दायर किए जाने के बाद, विभिन्न उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर की गई हैं। जिस पर शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि इन याचिकाओं को कर्नाटक हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया जाए। पीठ ने कहा, अगर इसके बाद किसी अन्य उच्च न्यायालय में इसी तरह की याचिकाएं दायर की जाती हैं, तो वे भी इस आदेश के अंतर्गत आएंगी।' पीठ ने माना कि रिट याचिका में जो मामला उठाया गया है, वो ही मामला कर्नाटक उच्च न्यायालय में दायर याचिका में है। ऐसे में पीठ ने सभी याचिकाएं कर्नाटक उच्च न्यायालय को स्थानांतरित करने का आदेश दिया। क्या है ये पूरा मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने जनवरी 2020 में प्रतिस्पर्धा कानून 2002 के तहत एक जांच शुरू की थी। यह जांच दिल्ली व्यापार महासंघ की शिकायत पर शुरू की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों ने चुनिंदा विक्रेताओं को वरीयता दी, जिससे अन्य विक्रेताओं को नुकसान हुआ। महासंघ ने दावा किया कि जिन विक्रेताओं को फायदा पहुंचाया गया, वो ई-कॉमर्स कंपनियों से जुड़े हुए थे। प्रतिस्पर्धा आयोग की जांच के खिलाफ अमेजन और फ्लिपकार्ट ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। हालांकि उच्च न्यायालय ने प्रतिस्पर्धा आयोग की जांच में दखल देने से इनकार कर दिया। अगस्त 2024 में आयोग ने जांच पूरी की और ये पाया कि ई-कॉमर्स कंपनियों  ने प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन किया था। हालांकि इसके बाद अमेजन और फ्लिपकार्ट के विक्रेताओं ने सीसीआई की जांच पर सवाल उठाते हुए देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर कीं। इस पर सीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 24 याचिकाएं लंबित हैं। ऐसे में सुनवाई में देरी से बचने के लिए सभी याचिकाएं दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दी जाएं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 13 दिसंबर की सुनवाई में सभी याचिकाओं को दिल्ली उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को कर्नाटक उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 63

संजीव खन्ना, बीआर गवई के बाद सूर्यकांत 2025 में SC को मिलेंगे तीन चीफ जस्टिस और रिटायर होंगे सात जज

 नई दिल्ली नए साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट तीन मुख्य न्यायाधीशों के नेतृत्व में काम करेगा. इस साल दो चीफ जस्टिस समेत सात जज रिटायर होंगे. मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना 13 मई 2025 को सेवानिवृत्त होंगे. जस्टिस खन्ना दिल्ली हाईकोर्ट से 18 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट में आए थे. चीफ जस्टिस के रूप में उनका कार्यकाल 11 नवंबर 2024 से 13 मई 2025 तक होगा. सीजेआई खन्ना के बाद जस्टिस बी.आर गवई चीफ जस्टिस बनेंगे. वह अगले छह महीने यानी 23 नवंबर तक इस पद पर रहेंगे. इसी साल तीसरे चीफ जस्टिस सूर्यकांत बनेंगे. उनका कार्यकाल करीब सवा साल फरवरी 2027 तक होगा. इस साल 2025 में सेवानिवृत्त होने वाले अन्य पांच जजों में जस्टिस सी.टी. रवि कुमार सबसे पहले हैं. वो तीन साल से अधिक का कार्यकाल पूरा कर 5 जनवरी 2025 को रिटायर होंगे. जस्टिस रवि कुमार 31 अगस्त, 2021 को केरल हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में आए थे. इसके बाद जस्टिस हृषिकेश रॉय चार साल से अधिक का सेवाकाल पूरा कर 31 जनवरी को रिटायर होंगे. जस्टिस हृषिकेश रॉय गुवाहटी हाईकोर्ट और फिर केरल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे. जस्टिस रॉय 23 सितंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट आए थे. न्यायमूर्ति अभय श्रीनिवास ओक 24 मई, 2025 को अपना तीन साल से अधिक का सेवाकाल पूरा कर रिटायर होंगे. वह बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने फिर 2019 में कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनाए. जस्टिस ओक 31 अगस्त 2021 को सुप्रीम कोर्ट आए थे. जस्टिस ओक के रिटायरमेंट के अगले महीने जस्टिस बेला माधुर्य त्रिवेदी 9 जून, 2025 को रिटायर होंगी. वह 31 अगस्त 2021 को गुजरात हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट आईं थीं. इसके बाद जस्टिस सुधांशु धूलिया 9 अगस्त 2025 को सेवानिवृत्त होंगे. ये उत्तराखंड हाईकोर्ट से जनवरी 2021 में गुवाहटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त किए गए थे. जस्टिस धूलिया वहां से 9 मई, 2022 को सुप्रीम कोर्ट आए थे. इसके बाद चीफ जस्टिस पद से जस्टिस बी.आर. गवई 23 नवंबर, 2025 को रिटायर होंगे. जस्टिस गवई बॉम्बे हाईकोर्ट से 24 मई, 2019 को सुप्रीम कोर्ट आए. वो मई में चीफ जस्टिस बनेंगे और छह महीने से ज्यादा वक्त तक देश की सर्वोच्च न्यायपालिका का नेतृत्व करेंगे. सुप्रीम कोर्ट के कितने न्यायाधीश 2025 में होंगे रिटायर? जस्टिस सीटी रविकुमार साल 2025 में सबसे पहले जस्टिस सीटी रविकुमार रिटायर होंगे. उन्होंने 31 अगस्त 2021 में सुप्रीम कोर्ट में बतौर न्यायाधीश के तौर पर सेवा देना शुरू किया था. जस्टिस सीटी रविकुमार इसी हफ्ते 5 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं. उन्होंने केरल राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष, केरल न्यायिक अकादमी के अध्यक्ष और केरल राज्य मध्यस्थता और सुलह केंद्र के अध्यक्ष सहित कई प्रमुख पदों पर काम किया है. बतौर न्यायाधीश उनके कुछ अहम फैसलों में पॉक्सो अधिनियम के अनुपालन से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण फैसले, चुनावी वादों का सरकार के वित्त पर असर और गुरमेल सिंह मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 149 की व्याख्या शामिल है. हाल के फैसलों (2024) में, उन्होंने जुवेनाइल जस्टिस समय-सीमा और बाल हिरासत मामलों पर अहम फैसले लिए हैं. जस्टिस ऋषिकेष रॉय जस्टिस ऋषिकेष रॉय इस साल रिटायर होने पर दूसरे सुप्रीम कोर्ट जज होंगे. 31 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में उनका आखिरी दिन होगा. इससे पहले वह केरल हाईकोर्ट में बतौर चीफ जस्टिस कार्यरत थे. चीफ जस्टिस संजीव खन्ना चीफ जस्टिस संजीव खन्ना इसी साल मई में रिटायर हो जाएंगे. उन्हें साल 2019 में दिल्ली हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया गया था. पिछले साल नवंबर में संजीव खन्ना शीर्ष न्यायालय के चीफ जस्टिस बने थे. उन्होंने एक ऐतिहासिक 7 न्यायाधीशों के बेंच के फैसले में अहम भूमिका निभाई थी. इस फैसले में बिना मुहर वाले मध्यस्थता समझौतों पर कानून को स्पष्ट किया था. बतौर न्यायाधीश चीफ जस्टिस संजीव खन्ना शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन केस (2023) में एक अहम संवैधानिक पीठ के फैसले में शामिल थे. इस फैसले में अनुच्छेद 142 के तहत तलाक के लिए एक वैध आधार की व्याख्या की थी. इसमें तय किसी गया था कि 'जब किसी शादी में जुड़ाव की कोई गुंजाइश न बच जाए' तो वह तलाक का आधार माना जा सकता है. इसके अलावा अन्ना मैथ्यूज बनाम भारत का सर्वोच्च न्यायालय (2023) मामले में, उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों में पात्रता और उपयुक्तता के बीच महत्वपूर्ण अंतर को परिभाषित किया था. यह फैसला देते हुए कि पात्रता न्यायिक समीक्षा के अधीन है, उपयुक्तता इसके दायरे से बाहर है. जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका भी मई में रिटायर होंगे. 24 मई में सुप्रीम कोर्ट में उनका आखिरी दिन होगा. जस्टिस अभय बॉम्बे हाईकोर्ट में न्यायाधीश थे, इसके बाद वह कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने. साल 2021 में जस्टिस अभय सुप्रीम कोर्ट में जज बने थे. जस्टिस बेला एम त्रिवेदी जस्टिस बेला एम त्रिवेदी भी इसी साल रिटायर होंगी. 9 जून 2025 को सुप्रीम कोर्ट में उनका आखिरी कार्यदिवस होगा. जस्टिस बेला 2021 के अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की जज बनी थीं, इससे पहले वह गुजरात हाईकोर्ट में जज रही चुकीं हैं. जस्टिस सुधांशु धुलिया जस्टिस सुधांशु धुलिया 9 अगस्त 2025 को रिटायर होंगे. 9 मई 2022 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बतौर न्यायाधीश पद की शपथ ली थी. इससे पहले वह उत्तराखंड हाईकोर्ट में जज रह चुके हैं. साल 2021 से मई 2022 तक वह गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भी रह चुके हैं. जस्टिस बीआर गवई जस्टिस बीआर गवई इसी साल 23 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो जाएंगे. रिटायरमेंट से पहले मई 2025 में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की जगह ले लेंगे. बीआर गवई उस पीठ का हिस्सा थे जिसने अधिवक्ता प्रशांत भूषण (2020) के खिलाफ अवमानना मामले की सुनवाई की थी और न्यायिक गरिमा बनाए रखने के महत्व पर जोर देते हुए 1 रुपये का प्रतीकात्मक जुर्माना लगाया था. इसके अलावा बीआर गवई ने पट्टाली मक्कल काची मामले (2022) में आरक्षण नीति पर महत्वपूर्ण फैसला दिया था. उन्होंने पुराने डेटा पर निर्भरता के कारण वन्नियार समुदाय के लिए तमिलनाडु सरकार के 10.5% आरक्षण के खिलाफ फैसला सुनाया था. जस्टिस बीआर गवई को न्याय से जुड़े फिलॉस्फी के जानकार के तौर पर माना जाता है. उन्होंने एक बार कहा था, कानून की प्रैक्टिस सीखने की एक शाश्वत प्रक्रिया है … Read more

बताया जाए कि आखिर कितने जजों के परिजनों को वरिष्ठ वकील बनाया गया है, दलील पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, मांग ली लिस्ट

नई दिल्ली जजों के रिश्तेदारों को ही अदालतों में सीनियर वकील का दर्जा दिया जाता है। ऐसा दावा करने वाला एक वकील को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है। अदालत ने गुरुवार को कहा कि ऐसा कहने से पहले यह भी तो बताया जाए कि आखिर कितने जजों के परिजनों को वरिष्ठ वकील बनाया गया है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने एडवोकेट मैथ्यूज जे. नेंदुमपारा और अन्य की अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। यह अर्जी दिल्ली हाई कोर्ट में 70 वकीलों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिए जाने के खिलाफ दायर की गई थी। इस अर्जी में कहा गया है कि इन लोगों को दर्जा देने वाले फैसले को खारिज किया जाए। इसके अलावा जजों के परिजनों को ही सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिए जाने का भी आरोप लगाया गया। इस पर बेंच ने कहा, 'आखिर आप ऐसे कितने जजों के नाम बता सकते हैं, जिनके परिजनों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया गया है।' इस पर याची वकील ने कहा कि मैंने अपने दावे के समर्थन में एक चार्ट पेश किया है। हालांकि अदालत ने वकील के दावों पर असहमति जताई और कहा कि यदि याचिका से इन चीजों को वापस नहीं हटाया गया तो फिर ऐक्शन भी लिया जाएगा। बेंच ने कहा, 'हम आपको यह छूट देते हैं कि याचिका में संशोधन कर लें। यदि आप ऐसा नहीं कर सके तो फिर हम ऐक्शन भी ले सकते हैं।' इस पर वकील ने कहा कि बार एसोसिएशन तो जजों से डरती है। इस पर भी बेंच ने सख्त ऐतराज जताया है। जस्टिस गवई ने वकील की दलील पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'यह कानून के अनुसार चलने वाली अदालत है। मुंबई का आजाद मैदान नहीं है, जहां आप कुछ भी भाषण दे सकते हैं। आप यहां कानूनी आधार पर दलीलें दें, भाषण न करें।' इसके साथ ही अदालत ने वकील को टाइम दिया कि वह अपनी याचिका में संशोधन कर लें। यही नहीं बेंच ने कहा कि इस अर्जी में याची के तौर पर साइन करने वाले एक वकील तो अदालत की अवमानना के दोषी भी हैं। दरअसल दिल्ली हाई कोर्ट में 70 वकीलों को सीनियर एडवोकेट बनाए जाने का फैसला शुरुआत से ही विवादों में है। यहां तक कि परमानेंट कमेटी के एक मेंबर ने तो यह कहते हुए इस्तीफा ही दे दिया कि उनकी सलाह के बिना ही फाइनल लिस्ट तैयार कर दी गई। इसके अलावा फाइनल लिस्ट के साथ छेड़छाड़ के आरोप भी लग रहे हैं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 57

किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल का अनशन खत्म कराने की कोशिश की जा रही है, भ्रम न फैलाएं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के मामले में पंजाब सरकार को फटकार लगाई है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सरकार के अधिकारी और कुछ किसान नेता मीडिया में यह गलत धारणा फैला रहे हैं कि किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल का अनशन खत्म कराने की कोशिश की जा रही है। कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा है कि वह स्पष्ट करती है कि कोर्ट ने कभी भी डल्लेवाल का अनशन खत्म कराने का निर्देश नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि वह सिर्फ उनकी सेहत को लेकर चिंतित है और चाहती है कि उन्हें जल्द से जल्द स्वास्थ्य सहायता दी जाए। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि कोर्ट ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहती लेकिन ऐसा लगता है कि पंजाब सरकार के अधिकारी और कुछ किसान नेता जमीनी स्तर पर स्थिति को और जटिल बनाने के लिए मीडिया में गैरजिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं। पीठ ने कहा, “हमें डल्लेवाल के प्रति कुछ किसान नेताओं की सद्भावना को परखने की जरूरत है।” पीठ ने कहा कि चूंकि पंजाब के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक इस मामले में डिजिटल माध्यम से पेश हो रहे हैं इसलिए उम्मीद है कि अदालत का संदेश निचले स्तर तक जाएगा। कोर्ट ने दोनों अधिकारियों से हलफनामा दाखिल करने को कहा जिसमें यह बताया गया हो कि 20 दिसंबर के उसके आदेश का कितना पालन किया गया है। इस आदेश में कोर्ट ने पंजाब सरकार को डल्लेवाल को नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। वहीं पंजाब के महाधिवक्ता गुरमिंदर सिंह ने स्थिति को जटिल बनाने के किसी भी कोशिश से इनकार किया है। उन्होंने कहा है कि डल्लेवाल को अपना अनशन खत्म किए बिना चिकित्सा सहायता लेने के लिए मनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए छह जनवरी की तारीख तय की है। कोर्ट ने डल्लेवाल की ओर से दायर एक नई याचिका पर केंद्र को नोटिस भी जारी किया है। डल्लेवाल की याचिका में केंद्र सरकार को कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने के बाद 2021 में प्रदर्शनकारी किसानों से किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP की कानूनी गारंटी समेत विभिन्न वादों को पूरा करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 80

क्या है न्यायसंगत गुजारा भत्ता? सुप्रीम कोर्ट ने तय किए नए पैमाने, पति-पत्नी दोनों के लिए राहत

नई दिल्ली ! यह बेहद दुखद है कि बेंगलुरू में 34 साल के अतुल सुभाष ने अपनी पत्नी के साथ तलाक, गुजारा भत्ता और अन्य मामलों को लेकर चल रहे कानूनी विवाद के चलते अपनी जान दे दी. उन्होंने मरने से पहले अपनी पत्नी पर झूठे मुकदमे दर्ज कराने, पैसे ऐंठने और प्रताड़ित करने के आरोप लगाए. अतुल सुभाष ने अपने 24 पेज के सुसाइड नोट और 81 मिनट के वीडियो में आरोप लगाया कि वह पत्नी निकिता सिंघानिया को 40 हजार रुपये महीना गुजारा भत्ता के तौर पर दे रहे थे. फिर भी, पत्नी और उसके परिवार वाले सभी केस खत्म करने के लिए 3 करोड़ रुपये की रकम मांग रहे थे. इतना ही नहीं, बच्चे से मिलने के लिए 30 लाख रुपये की डिमांड की जा रही थी. अतुल सुभाष की आत्महत्या ने यह दिखाया है कि तलाक-गुजारा भत्ता के मामलों में कानूनी प्रक्रिया कितनी मुश्किल और तनावपूर्ण हो सकती है. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले में गुजारा भत्ता को लेकर अहम फैसला सुनाया है. यह मामला दुबई के एक बैंकर, उनकी पत्नी और बच्चे के बीच कानूनी विवाद से जुड़ा था. इस मामले में कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करते समय 8 बातों का ध्यान रखने के लिए कहा है. अब भारत की अदालतें गुजारा भत्ता के मामलों में इसी फैसले को आधार मानकर काम करेंगी. यह मामला दुबई के एक बैंक के सीईओ का है जिनकी साल 1998 में शादी हुई और 2004 में उनका पत्नी से विवाद हो गया. इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई, जिसमें 20 साल तक यह बैंकर पारिवारिक अदालत से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक घूमता रहा. 2004 में बैंकर ने क्रूरता के आधार पर पत्नी से तलाक की अर्जी दायर की. इसके बाद पत्नी ने भी गुजारा भत्ता पाने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत याचिका दायर कर दी. यह केस 20 साल से अदालतों में घूम रहा है. परिवारिक अदालत से शुरू हुआ ये मामला पहले हाईकोर्ट में पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट. मुख्य सवाल यही है कि पत्नी को कितना गुजारा भत्ता मिलना चाहिए. 2015 में बैंकर ने सभी अदालती फैसलों का पालन करते हुए खुद से गुजारा भत्ता बढ़ा दिया. हालांकि, जब उनकी पत्नी ने और भी ज्यादा गुजारा भत्ता मांगना शुरू किया, तो उन्होंने विरोध किया. पति को यह मंजूर नहीं था कि यह रकम बार-बार बढ़ती रहे, खासकर जब उसकी अपनी भी आर्थिक स्थिति ठीक न हो और उसे अपने बच्चों की जिम्मेदारी भी निभानी हो. बैंकर के वकीलों के अनुसार, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26 एक वयस्क बच्चे को गुजारा भत्ता देने की अनुमति नहीं देती है. मगर, पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26 को चुनौती दी और अदालत से अपने और अपने वयस्क बेटे को स्थायी गुजारा भत्ता देने का समाधान मांगा. पत्नी का कहना था कि इस कानून के हिसाब से बच्चों के बड़े होने पर ज्यादा पैसे मिलने चाहिए. उनके बेटा हाल ही में ग्रेजुएट हुआ है और अभी भी उन पर निर्भर है, इसलिए और उन्हें भी ज्यादा पैसे चाहिए. बैंकर को इस बात पर सबसे ज्यादा एतराज था कि उसकी पत्नी हिन्दू मैरिज एक्ट के सेक्शन 26 का गलत इस्तेमाल करके ज्यादा पैसे मांग रही है. हालांकि वो पहले के फैसलों को मानता रहा था और गुजारा भत्ता बढ़ाने को भी तैयार था. यह पारिवारिक विवाद जब कानून का सवाल बन गया, तो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने केस के सभी तथ्यों को ध्यान से समझा. उन्होंने मौजूदा कानून को भी ध्यान में रखा. सुप्रीम कोर्ट ने रजनेश बनाम नेहा (2021) और उसके बाद के फैसलों में दिए गए सिद्धांतों को दोहराया है. फिर कोर्ट ने कुछ बातें बताईं जिनके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि गुजारा भत्ता देना जरूरी है या नहीं और अगर जरूरी है तो कितना. सुप्रीम कोर्ट के नए दिशानिर्देश के अनुसार, गुजारा भत्ता तय करते समय पहले ये देखा जाना चाहिए कि पति-पत्नी दोनों का समाज में क्या स्थान है, उनकी पृष्ठभूमि क्या है, उनके परिवार का क्या रुतबा है, ये सारी बातें शामिल हैं. कई बार सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण भी गुजारा भत्ता की राशि प्रभावित हो सकती है. साथ ही दोनों कितना कमाते हैं और उनकी कितनी संपत्ति है. अगर पति आर्थिक रूप से मजबूत होता है, तो उसे ज्यादा गुजारा भत्ता देने के लिए कहा जा सकता है. अगर पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं और उनकी आय लगभग बराबर है, तो गुजारा भत्ता की राशि कम हो सकती है या फिर शायद किसी को गुजारा भत्ता देने की जरूरत ही नहीं पड़े. लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह सिर्फ एक कारक है. गुजारा भत्ता तय करते समय अदालत बाकी 7 कारकों पर भी विचार करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता तय करते समय पति-पत्नी के जीवन स्तर को भी एक अहम कारक बताया है. गुजारा भत्ता तय करते समय अदालत यह भी देखेगी कि पति-पत्नी का समाज में क्या रुतबा है और वे कैसा जीवन जीते थे. उनके पास कितने मकान और गाड़ियां हैं, उनकी कीमत क्या है? उनका घर कितना बड़ा है, उसमें कितने एसी और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाएं हैं? उनके घर में कितने नौकर-चाकर काम करते हैं? वे कितनी बार छुट्टियां मनाने जाते थे, भारत में या विदेश में? अगर पति-पत्नी अमीर थे और ऐशो-आराम की जिंदगी जीते थे, तो पत्नी को ज्यादा गुजारा भत्ता मिल सकता है ताकि वो भी वैसी ही जिंदगी जी सके. अदालत यह भी देखेगी कि पत्नी की उम्र क्या है, उसने कितनी पढ़ाई की है और क्या वो खुद कमा सकती है. अगर वह बेरोजगार है, तो उसे ज्यादा गुजारा भत्ता मिल सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गुजारा भत्ता तय करते समय पत्नी और बच्चों की जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है. पत्नी को शादी के दौरान जैसा जीवन जी रही थी, वैसा ही जीवन जीने का हक है, लेकिन उसकी मांगें वाजिब होनी चाहिए. पत्नी और बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए, इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन अदालत यह भी देखेगी कि पत्नी की मांगें … Read more

दिल्ली एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी और हरियाणा में भी पटाखों की बिक्री पर लगाया बैन

नई दिल्ली दिल्ली एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एनसीआर में आने वाले यूपी और हरियाणा में भी पटाखों की बिक्री पर बैन लगाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने अगले आदेश तक दोनों राज्यों में पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी है। दरअसल गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली के साथ-साथ अन्य शहरों में भी बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुनवाई हुई। इस दौरान दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राजधानी में पूरे साल पटाखों के स्टॉक और बिक्री पर रोक लगा दी गई है। इस पर कोर्ट ने कहा कि इसका असर तभी होगा, जब NCR के दूसरे शहरों में भी ऐसी ही रोक हो। इसलिए यूपी और हरियाणा भी ऐसा करें। राजस्थान ने भी लगाया है प्रतिबंध: कोर्ट लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने कहा, 'हमारा मानना ​​है कि यह प्रतिबंध तभी प्रभावी होगा, जब एनसीआर क्षेत्र का हिस्सा बनने वाले अन्य राज्य भी इसी तरह के उपाय लागू करेंगे। यहां तक ​​कि राजस्थान राज्य ने भी राजस्थान के उस हिस्से में इसी तरह का प्रतिबंध लगाया है, जो एनसीआर क्षेत्रों में आता है। फिलहाल हम उत्तर प्रदेश और हरियाणा राज्यों को उसी तरह का प्रतिबंध लगाने का निर्देश देते हैं, जैसा कि दिल्ली राज्य ने 19 दिसंबर 2024 के आदेश के तहत लगाया है।' जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दिल्ली वायु प्रदूषण मामले की सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में प्रदूषण से निपटने के उपायों की समीक्षा की। सुनवाई के दौराम पटाखों पर साल भर के प्रतिबंध, ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित किया गया। राज्यों को टीमें गठित करने का निर्देश इसके अलावा प्रदूषण से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के अंतर्गत आने वाले राज्यों को आदेश दिया कि वे सभी ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP-4) के तहत प्रदूषण से बचने वाले उपायों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि इसके क्रियान्वयन के लिए विभिन्न अधिकारियों की टीमें गठित की जानी चाहिए। इन राज्यों में एनसीआर क्षेत्र में आने वाले यूपी और हरियाणा शामिल हैं। पीठ ने निर्देश देते हुए कहा कि हम एनसीआर राज्यों को GARP- IV उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए पुलिस, राजस्व अधिकारियों की टीमों का गठन करने का निर्देश देते हैं। हम यह कहते हैं कि इस टीम में बनाए गए सदस्य इस न्यायालय के अधिकारी के रूप में काम करेंगे। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 50

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नशे की लत देश के युवाओं की चमक को ही खत्म करने वाली चीज है, उनका पूरा तेज इससे छिन जाता है

नई दिल्ली नशे में डूबने का मतलब कूल होना नहीं है और इससे बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक केस की सुनवाई करते हुए देश के युवाओं को यह नसीहत दी। अदालत ने कहा कि दुखद है कि इन दिनों नशा करने या उसकी लत का शिकार होने को कूल होने से जोड़ दिया गया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह ने ड्रग तस्करी के मामले की सुनवाई करते हुए यह बात कही। इस केस की जांच एनआईए कर रही है, जिसमें अंकुश विपिन कपूर पर आरोप है कि वह ड्रग तस्करी का नेटवर्क चलाता था। उसने पाकिस्तान से समुद्र के रास्ते बड़े पैमाने पर हीरोइन की तस्करी भारत में कराई थी। जस्टिस नागरत्ना ने फैसला सुनाते हुए कहा कि नशे की लत का सामाजिक आर्थिक तौर पर और मनोवैज्ञानिक रूप से युवाओं पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह देश के युवाओं की चमक को ही खत्म करने वाली चीज है। उनका पूरा तेज इससे छिन जाता है। अदालत ने कहा कि नशे की लत से युवाओं को बचाने के लिए पैरेंट्स, समाज और सरकारी एजेंसियों को प्रयास करने होंगे। हमें कुछ गाइडलाइंस भी तय करनी चाहिए, जिसके अनुसार ऐक्शन लिया जाए और युवाओं को इससे बचाया जाए। अदालत ने कहा कि यह चिंता की बात है कि पूरे भारत में ड्रग्स का रैकेट चल रहा है। इसका प्रभाव सभी समाज, आयु और धर्म के लोगों में दिख रहा है। अदालत ने कहा कि ड्रग्स तस्करी से पैदा हुई रकम का इस्तेमाल देश के दुश्मन हिंसा और आतंकवाद फैलाने में भी करते हैं। जजमेंट में कहा गया कि आज की युवा पीढ़ी को लेकर कहा जाता है कि वे संगत में, पढ़ाई के तनाव में या फिर परिवेश के चलते ऐसा किया जाता है। अदालत ने कहा कि ऐसा करने वाले लोग अकसर बच निकलते हैं और यह चिंता की बात है। बेंच ने कहा कि यह पैरेंट्स की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को सुरक्षित माहौल में रखें। उन्हें भावनात्मक कवच प्रदान करें। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि बच्चे यदि भावनात्मक रूप से परिवार से जुड़े रहते हैं और उस परिवेश का प्रभाव उन पर रहे तो उनके नशे की लत का शिकार होने की संभावना कम होती है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 42

जस्टिस शेखर यादव ने कहा था कि देश बहुसंख्यक के हिसाब से चलेगा, इस बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान

नई दिल्ली इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के बयान का सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जवाब मांगा है। दरअसल, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के एक कार्यक्रम में जस्टिस शेखर यादव ने कहा था कि देश बहुसंख्यक के हिसाब से चलेगा। एक आधिकारिक बयान में कहा गया, "सुप्रीम कोर्ट ने समाचार पत्रों में छापे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश शेखर कुमार यादव के भाषण का संज्ञान लिया है। उच्च न्यायालय से ब्योरा मंगवाया गया है। मामला विचाराधीन है। वीएचपी के कार्यक्रम में दिया था भाषण आठ दिसंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट के लाइब्रेरी हॉल में विश्व हिंदू परिषद के विधि प्रकोष्ठ ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सद्भाव, लैंगिक समानता और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देना है। एक दिन बाद न्यायाधीश एक वीडियो सामने आया। शाहबानो केस का किया जिक्र जस्टिस शेखर यादव ने कहा कि जब देश और संविधान एक हैं तो कानून एक क्यों नहीं है? अपने भाषण में जस्टिस यादव ने शाहबानो केस का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि तीन तलाक गलत है। मगर उस समय की सरकार को झुकना पड़ा। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 41

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से पूछा किआखिर फ्री की रेवड़ी कब तक बांटी जाएगी? रोजगार के अवसर बनाने की जरूरत

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने  सरकारों की ओर से फ्री में दी जा रही सुविधाओं को लेकर सवाल उठाया है. कोर्ट ने पूछा कि आखिर फ्री की रेवड़ी कब तक बांटी जाएगी? कोर्ट ने कहा कि कोविड महामारी के बाद से मुफ्त राशन प्राप्त कर रहे प्रवासी मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर बनाने की जरूरत है. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने उस वक्त हैरानी जताई जब केंद्र ने अदालत को बताया कि 81 करोड़ लोगों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत मुफ्त या सब्सिडी वाला राशन दिया जा रहा है. इसपर बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा, 'इसका मतलब है कि केवल टैक्सपेयर्स ही बाकी हैं.' एनजीओ की ओर से दायर एक मामले में पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि उन प्रवासी मजदूरों को मुफ्त राशन  मिलना चाहिए जो "ई-श्रमिक" पोर्टल पर पंजीकृत हैं. इसपर बेंच ने कहा, 'फ्रीबीज़ कब तक दिए जाएंगे? क्यों न हम इन प्रवासी मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर, रोजगार और क्षमता निर्माण पर काम करें?' वकील भूषण ने कहा कि अदालत ने समय-समय पर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए हैं कि प्रवासी मजदूरों को राशन कार्ड जारी किया जाए ताकि वे केंद्र द्वारा प्रदान किए गए मुफ्त राशन का लाभ उठा सकें. उन्होंने कहा कि हाल ही में दिए गए आदेश में यह कहा गया है कि जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं, लेकिन वे "ई-श्रमिक" पोर्टल पर पंजीकृत हैं, उन्हें केंद्र द्वारा मुफ्त राशन दिया जाएगा. कोर्ट ने क्या कहा… जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, 'यह समस्या है. जैसे ही हम राज्यों को आदेश देंगे कि वे सभी प्रवासी मजदूरों को मुफ्त राशन दें, कोई भी यहां नहीं दिखाई देगा. वे भाग जाएंगे. राज्यों को यह पता है कि यह जिम्मेदारी केंद्र की है, इसीलिए वे राशन कार्ड जारी कर सकते हैं.' भूषण ने कहा कि यदि 2021 की जनगणना की जाती, तो प्रवासी मजदूरों की संख्या में वृद्धि होती, क्योंकि केंद्र वर्तमान में 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर निर्भर है. इसपर बेंच ने कहा, "हम केंद्र और राज्यों के बीच मतभेद नहीं पैदा करें, क्योंकि ऐसा करने से स्थिति बहुत कठिन हो जाएगी."   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 43

सुप्रीम कोर्ट ने दी किसान आंदोलनकारियों को नसीहत- जनता की सुविधा का भी ख्याल रहे

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा और पंजाब को जोड़ने वाले खनौरी बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों को नसीहत दी है। अदालत ने सोमवार को सुनवाई के दौरान किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल से कहा कि आप प्रदर्शनकारी किसानों को समझाएं कि वे राजमार्गों को बाधित न करें और लोगों को सुविधाओं का ध्यान रखें। डल्लेवाल को पुलिस ने खनौरी बॉर्डर से उठा दिया था, लेकिन अब कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया कि उन्हें पुलिस ने कथित हिरासत से रिहा कर दिया है। इसके बाद वह एक बार फिर से विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं। उनके साथ कई किसान एमएसपी की गारंटी के लिए कानून बनाने समेत कई मांगों को लेकर आमरण अनशन कर रहे हैं। डल्लेवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आप शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं लेकिन लोगों को असुविधा नहीं होने दें। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जवल भुयां की बेंच ने कहा कि 26 नवंबर को खनौरी बॉर्डर से डल्लेवाल को उठाया गया था। अब वह फिर से रिहा हो गए हैं और अपने साथियों को समझाते हुए भी दिखे कि वे आमरण अनशन समाप्त कर दें। बेंच ने डल्लेवाल की ओर से पेश वकील गुनिंदर कौर गिल से अदालत ने कहा कि आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि जनता को आंदोलन से असुविधा न हो। बेंच ने कहा, 'एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में आपको शांतिपूर्ण प्रदर्शन का पूरा अधिकार है, लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जनता को इससे असुविधान हो। आप सभी लोग जानते हैं कि खनौरी बॉर्डर पंजाब के लिए लाइफलाइन की तरह है। हम यह नहीं कह रहे हैं कि प्रदर्शन सही है या गलत, लेकिन जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए।' जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि डल्लेवाल प्रदर्शनकारियोंको यह समझा सकते हैं कि वे शांतिपूर्ण आंदोलन करें। यह ध्यान रखें कि उनके प्रदर्शन से आम लोगों को कोई परेशानी न हो। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 60

ग्राम पंचायत का आरोप है कि इस भूमि पर उनका अधिकार है और वक्फ बोर्ड का दावा गलत, सुप्रीम कोर्ट में करेगी अपील

जालंधर पंजाब के कपूरथला जिले के बुधो पुंदेर गांव की वक्फ बोर्ड जमीन मामले में ग्राम पंचायत ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया है। ग्राम पंचायत का आरोप है कि इस भूमि पर उनका अधिकार है और वक्फ बोर्ड का दावा गलत है। अब ग्राम पंचायत इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है। इस मामले ने उस समय तूल पकड़ा जब उच्च न्यायालय ने वक्फ बोर्ड के दावे को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि यह भूमि मस्जिद, कब्रिस्तान और टाकिया (मुसलमानों के सामान्य उपयोग के लिए भूमि) के लिए दान की गई थी, और बाद में 1971 में वक्फ बोर्ड को सौंप दी गई थी। न्यायालय ने इस भूमि को वक्फ संपत्ति के रूप में वर्गीकृत किया और ग्राम पंचायत की दलीलों को खारिज कर दिया। ग्राम पंचायत के सदस्य रेशम सिंह ने कहा कि इस भूमि पर पिछले 40-50 सालों से गांव के लोग खेती कर रहे हैं और उन्होंने इस भूमि पर कब्जा नहीं किया है, बल्कि इसे जमींदारों ने वक्फ बोर्ड से छुड़वाया था। रेशम सिंह ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड की संपत्ति और मस्जिद मुसलमानों की है, लेकिन भूमि पर जो कब्जा है, वह जमींदारों ने जानबूझकर किया हुआ है। इस पर उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत अब इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी। ग्राम पंचायत के सरपंच कुलवंत सिंह ने भी इस फैसले पर असहमति जताई है। उन्होंने कहा कि गांव में स्थित मस्जिद और गुरुद्वारा दोनों ही खुले हैं, लेकिन मस्जिद में आज तक कोई व्यक्ति नहीं आया है। वहीं, गुरुद्वारे में संगत दर्शन के लिए आती है। सरपंच ने बताया कि यह भूमि करीब 16 से 17 एकड़ में फैली हुई है, और इस पर पिछले 15-20 सालों से मुकदमा चल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह जमीन नगर पंचायत की है और उसी की रहेगी। सरपंच ने बताया कि मस्जिद 1947 से पहले बनी हुई थी, जबकि गुरुद्वारा मस्जिद की जगह पर नहीं, बल्कि उससे अलग एक एकड़ में बनाया गया है। इस मामले में न्यायमूर्ति सुरेश्वर ठाकुर और न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। ग्राम पंचायत ने वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत गठित न्यायाधिकरण के फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें वक्फ बोर्ड के पक्ष में फैसला सुनाया गया था। पंचायत ने तर्क दिया था कि पंजाब अधिनियम, 1953 के तहत इस संपत्ति पर उनका अधिकार बनता है, जो वक्फ अधिनियम, 1995 से प्राथमिकता रखता है। हालांकि, न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और माना कि यह मामला भूमि के वर्गीकरण का है, न कि विभिन्न कानूनों की प्राथमिकता का। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आधिकारिक अभिलेखों में इस भूमि को वक्फ संपत्ति के रूप में वर्गीकृत किया गया है, और इसे मस्जिद, कब्रिस्तान और टाकिया के रूप में पहचान दी गई है। खंडपीठ ने वक्फ अधिनियम के तहत इस भूमि के स्वामित्व का निर्धारण किया और कहा कि यह भूमि धार्मिक उद्देश्यों के लिए है, न कि निजी इस्तेमाल के लिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि पंजाब अधिनियम, 1953 की संवैधानिक सुरक्षा, वक्फ अधिनियम के प्रावधानों पर प्रभाव नहीं डालती है।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 110

सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थलों की सुरक्षा से संबंधित याचिका पर 4 दिसंबर को सुनवाई करेगा

नई दिल्ली देश में विभिन्न धार्मिक स्थलों, खासकर मंदिरों और मस्जिदों को लेकर विवाद बढ़ते जा रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के संभल जिले में स्थित जामा मस्जिद का सर्वेक्षण कोर्ट के आदेश पर हुआ था, जिसके बाद हिंसा की घटनाएं सामने आईं। अब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने 1991 के पूजा स्थल कानून और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा से संबंधित याचिका पर सुनवाई करने का संकेत दिया है। आइए जानते हैं इस मामले के बारे में और कब होगी इसपर सुनवाई। सुप्रीम कोर्ट में कब होगी सुनवाई? सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थलों की सुरक्षा और 1991 के पूजा स्थल कानून से संबंधित याचिका पर 4 दिसंबर 2024 को सुनवाई होगी। इस सुनवाई में भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ शामिल होगी। सुनवाई करने वाले न्यायधीश इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, जस्टिस पी नरसिम्हा, और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच शामिल होगी। यह केस जमीअत उलमा-ए-हिंद और गुलजार अहमद नूर मोहम्मद आजमी की तरफ से दायर किया गया है, और इनके वकील एजाज मकबूल कोर्ट में उनका पक्ष रखेंगे। क्या है 1991 का पूजा स्थल कानून? 1991 का पूजा स्थल कानून भारत में धार्मिक स्थलों के स्वरूप को लेकर एक महत्वपूर्ण कानून है। इसके तहत, यह प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को जिस रूप में धार्मिक स्थल था, उसे उसी रूप में बनाए रखा जाएगा। इसका मतलब है कि स्वतंत्रता संग्राम के समय के बाद से किसी भी धार्मिक स्थल का रूप बदलने पर रोक लगा दी गई है। इस कानून का उद्देश्य धार्मिक स्थलों के स्वामित्व और रूप में बदलाव से होने वाले विवादों को रोकना है। खासतौर पर इसने रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर एक अपवाद रखा था, जिससे विवादित बाबरी मस्जिद को लेकर कोई बदलाव नहीं किया जा सका था। धारा 3 के तहत, यह कानून किसी व्यक्ति या समूह को किसी धार्मिक स्थल को दूसरे धर्म के स्थल में बदलने से रोकता है। क्या बदलाव होगा इस कानून में? इस कानून का उद्देश्य धार्मिक स्थलों के स्वरूप को स्थिर रखना था ताकि किसी भी धार्मिक स्थल में बदलाव या तोड़फोड़ से विवादों की स्थिति पैदा न हो। लेकिन, कई बार इस कानून की व्याख्या को लेकर विवाद उठते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कानून पर सुनवाई होने से भविष्य में इस कानून के प्रभाव और इसकी व्याख्या पर कुछ नया रुख सामने आ सकता है। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका अब जब सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई करेगा, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट पूजा स्थल कानून की परिभाषा और उसके दायरे को कैसे निर्धारित करता है। इसके अलावा, कोर्ट यह भी तय करेगा कि धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कौन से कदम उठाए जाएं। यह मामला धार्मिक स्थलों से जुड़ी संवेदनशीलता को लेकर है, और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि इस कानून में कोई बदलाव किया जाता है, तो वह देशभर में धार्मिक स्थलों के विवादों को प्रभावित कर सकता है। 4 दिसंबर को होने वाली सुनवाई देश भर के लोगों और धार्मिक संगठनों के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकती है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 57

जब रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता, तो पार्टियों के बीच सहमति से बने रिश्ते को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता : SC

नई दिल्ली शादी का झांसा देकर बलात्कार के आरोपों का सामना कर रहे एक युवक को सुप्रीम कोर्ट ने राहत दे दी है। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि सहमति के साथ संबंध में रह रहे जोड़े के बीच सिर्फ ब्रेकअप हो जाने के कारण पुरुष के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चला सकते हैं। शिकायतर्ता महिला ने आरोपी के खिलाफ 2019 में रेप केस दर्ज कराया था। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्न और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच कर रही थी। बार एंड बेंच के अनुसार, कोर्ट ने कहा, 'सहमति से रिश्ते में रह रहे कपल के बीच सिर्फ ब्रेकअप के कारण आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। जब रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता, तो पार्टियों के बीच शुरुआत चरणों में सहमति से बने रिश्ते को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।' कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जाहिर की है कि आरोपी ने शिकायतकर्ता का एड्रेस पता कर लिया था और जबरन उसके साथ शारीरिक संबंध बना रहा था। बेंच ने कहा कि अगर शिकायतकर्ता की तरफ से खुद ही पते की जानकारी नहीं दी जाती, तो आरोपी उसका एड्रेस हासिल नहीं कर सकता था। रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा, 'यह बात समझ से बाहर है कि शिकायतकर्ता अपनी सहमति के बगैर अपीलकर्ता से मिलना जारी रखेगी या लंबे समय तक संपर्क बनाए रखेगी या शारीरिक संबंध बनाएगी।' क्या था मामला साल 2019 में FIR दर्ज कराई गई थी कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसका यौन उत्पीड़न किया है। महिला ने शिकायत में यह भी कहा है कि आरोपी ने उसे यौन संबंध बनाने और ऐसा नहीं कर पर परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी है। महिला की शिकायत के बाद आरोपी के खिलाफ IPC की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज हुआ था। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी उसकी याचिका को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि पार्टियों के बीच संबंध मधुर और सहमति से बने थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर अभियोजन पक्ष की बात को मान भी लिया जाए तो यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिकायतकर्ता सिर्फ शादी के किसी वादे के चलते यौन संबंधों में शामिल रही थी। यह देखते हुए कि दोनों अब अब शादिशुदा हैं और अपने-अपने जीवन में खुश है, तो कोर्ट ने मामले को रद्द कर दिया। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 126

सुप्रीम कोर्ट ने यासीन मलिक मामले में कहा- आतंकवादी कसाब को भी निष्पक्ष सुनवाई का मौका दिया था

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यासीन मलिक से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान निष्पक्ष सुनवाई की जरूरत पर जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आतंकवादी अजमल कसाब को भी निष्पक्ष सुनवाई का मौका दिया गया था। सीबीआई द्वारा एक आदेश के खिलाफ की गई अपील पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी की है। सीबीआई ने कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक को 1989 में भारतीय वायुसेना के चार जवानों की हत्या से संबंधित मामले में जम्मू की एक अदालत में शारीरिक रूप से पेश करने के आदेश के खिलाफ अपील की थी। सीबीआई ने सुरक्षा का हवाला दिया था और यासीन मलिक को शारीरिक रूप से पेश करने के आदेश पर आपत्ति जताई थी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ को बताया कि कश्मीरी अलगाववादी को सुनवाई के लिए दिल्ली की तिहाड़ जेल से जम्मू नहीं लाया जा सकता। उन्होंने कहा, "गवाहों की सुरक्षा भी चिंता का विषय है।" इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि यासीन मलिक से क्रॉस एग्जामिनेशन करने के लिए जेल में एक अस्थायी कोर्ट रूम बनाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, "हमारे देश में अजमल कसाब को भी निष्पक्ष सुनवाई का मौका दिया गया था। जेल में एक कोर्ट रूम बनाया जा सकता है और वहां यह किया जा सकता है।” इस पर तुषार मेहता ने दोहराया कि सीबीआई आतंकवाद के दोषी को जम्मू-कश्मीर में सुनवाई के लिए नहीं ले जाना चाहती है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यासीन मलिक मामूली आतंकवादी नहीं है और केंद्र उसके मामले में कानून के मुताबिक नहीं चल सकता। उन्होंने यासीन मलिक के पाकिस्तान की यात्रा और मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद से मुलाकात का भी हवाला दिया। क्या है मामला? जम्मू की एक विशेष अदालत ने दो मामलों में गवाहों से बातचीत के लिए यासीन मलिक को शारीरिक रूप से पेश होने का आदेश दिया था। इन मामलों में 1989 में पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद का अपहरण और चार भारतीय वायुसेना कर्मियों की हत्या शामिल है। सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी जिसने पिछले साल अप्रैल में मामले में एक नोटिस जारी किया और निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी थी। गौरतलब है कि आतंकवाद के दोषी यासीन मलिक ने जेल अधिकारियों को सूचित किया था कि वह सुनवाई में शारीरिक रूप से शामिल होना चाहता है। जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान शारीरिक रूप से उपस्थित था। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने उस समय मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। पेशी के तुरंत बाद तुषार मेहता ने गृह सचिव अजय भल्ला को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि शीर्ष अदालत में यासीन मलिक की उपस्थिति सुरक्षा में एक गंभीर चूक थी। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 64

मंदिरों के साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली-प्रयागराज स्टेशन को भी बम से उड़ाने की धमकी व्हाट्सएप पर दी गई

अयोध्या यूपी में अयोध्या के राम मंदिर को बम से उड़ाने की धमकी के बाद अब मथुरा समेत कई बड़े मंदिरों को उड़ाने की धमकी दी गई है। मंदिरों के साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली-प्रयागराज स्टेशन को भी बम से उड़ाने की धमकी व्हाट्सएप पर दी गई है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले के वादी आशुतोष पांडेय के व्हाट्सएप पर यह धमकी वाइस मैसेज के जरिए आई है। मैसेज देखते ही आशुतोष पांडेय ने प्रयागराज पुलिस को इसके बारे में जानकारी दी। पुलिस ने सभी स्थानों पर अलर्ट जारी करते हुए चेकिंग अभियान भी चलाया है। जीआरपी ने धमकी देने वाले मोबाइल नंबर के आधार पर केस दर्ज करते हुए जांच भी शुरू कर दी है। हालांकि इससे पहले भी आशुतोष पांडेय के मोबाइल पर इस तरह की धमकियां कई बार मिल चुकी है। प्रयागराज के कई थानों में पहले ही आशुतोष पांडेय ने केस भी दर्ज कराया है। उन केस में अभी तक पुलिस ने कोई गिरफ्तारी या खुलासा नहीं किया है। पुलिस को दी गई शिकायत में आशुतोष पांडेय ने खुद को श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट वृंदावन मथुरा का अध्यक्ष बताते हुए कहा है कि देर रात उनके मोबाइल पर वाइस मैसेज के जरिए दी गई। उसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, मथुरा समेत कई मंदिरों, प्रयागराज और दिल्ली के रेलवे स्टेशन को बम से उड़ाने की बात कही गई। वाइस मैसेज के करीब एक घंटे बाद व्हाट्स पर कॉल भी आई। इसमें दोबारा धमकी को दोहराया गया। कहा कि उस वक्त आशुतोष ब्रह्मपुत्र मेल में सफर कर रहे थे। ऐसे में पूरी कॉल को रिकॉर्ड भी किया और रेलवे के हेल्पलाइन नंबर 139 पर तत्काल इसकी जानकारी दी। धमकी के बाद पुलिस उनकी बोगी में भी आई और चकिंग अभियान चलाया। इसके साथ ही संबंधित स्थानों की पुलिस को अलर्ट किया है। आशुतोष पांडेय के अनुसार +923161832314 नम्बर कॉल और व्हाट्सएप पर धमकी आई है। पुलिस ने नंबर की जांच शुरू कर दी है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 77

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश के बिना ग्रैप-4 की पाबंदियां हटाने से भी रोका

नई दिल्ली दिल्ली-एनसीआर में तेजी बढ़ते प्रदूषण के बीच ग्रैप के तीसरे चरण की पाबंदियां लागू करने में देरी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आज वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को फटकार लगाई है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के अधिकारियों को उसके आदेश के बिना ग्रैप-4 की पाबंदियां हटाने से भी रोक दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा कि दिल्ली-एनसीआर में ग्रैप-3 लागू करने में 3 दिन की देरी क्यों हुई। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह एक आदेश पारित करने का प्रस्ताव कर रहा है कि अधिकारी अदालत की इजाजत के बिना ग्रैप के चरण 4 से नीचे नहीं जाएंगे, भले ही वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 300 से नीचे चला जाए। पीटीआई के अनुसार, जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि राजधानी में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के खतरनाक स्तर पर पहुंचने के बाद भी ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) के चरण 4 के तहत निवारक उपायों के कार्यान्वयन में देरी हुई है। कोर्ट ने इस देरी को लेकर दिल्ली सरकार से सवाल किया और कोर्ट ने दिल्ली सरकार से राजधानी में प्रदूषण के बढ़ते स्तर को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में भी बताने को कहा। इस दौरान दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ग्रैप-4 सोमवार से लागू हो गया है और भारी वाहनों को राजधानी में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। “जब AQI 300 से 400 के बीच पहुंचता है, तो चरण 4 लागू करना होता है। बेंच ने वकील से कहा, "आप ग्रैप के चरण 4 लागू करने में देरी करके इन मामलों में जोखिम कैसे उठा सकते हैं।" कोर्ट ने दिल्ली सरकार से कहा कि अदालत जानना चाहती है कि उसने प्रदूषण के स्तर में खतरनाक वृद्धि को रोकने के लिए क्या कदम उठाए हैं। बेंच ने कहा, "हम चरण 4 के तहत निवारक उपायों को कम करने की अनुमति नहीं देंगे, भले ही एक्यूआई 450 से नीचे चला जाए। चरण 4 तब तक जारी रहेगा, जब तक अदालत अनुमति नहीं देती।" इसके साथ ही बेंच ने कहा कि वह दिन के काम के अंत में मामले की विस्तार से सुनवाई करेगी। बता दें कि, सीएक्यूएम ने रविवार को ग्रैप-4 के तहत दिल्ली-एनसीआर के लिए प्रदूषण नियंत्रण उपायों के तहत सख्त पाबंदिया लागू करने घोषणा की थी, जो सोमवार सुबह 8 बजे से प्रभावी होंगे, जिसमें ट्रकों के प्रवेश पर प्रतिबंध और सार्वजनिक परियोजनाओं पर निर्माण पर अस्थायी रोक शामिल है। सीएक्यूएम ने यह आदेश तब जारी किया, जब दिल्ली का वायु गुणवत्ता (एक्यूआई) गंभीर हो गई, जो शाम 4 बजे 441 पर पहुंच गई और प्रतिकूल मौसम की स्थिति के कारण शाम 7 बजे 457 तक जा पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने 14 नवंबर को याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने पर सहमति व्यक्त की थी, क्योंकि उसे बताया गया था कि बढ़ते प्रदूषण के कारण दिल्ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर नहीं बनना चाहिए। कोर्ट ने पहले कहा था कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट राजधानी दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 61

बुलडोजर संस्कृति पर उच्चतम न्यायालय प्रहार।

Supreme Court attacks bulldozer culture. जब आज से पांच महीने पहले मेने बुलडोजर संस्कृति पर लिखा,,गलत को गलत लिखा, बुलडोजर घर पर नहीं अपराधी पर चले, निरपराधी परिजनों पर कहर नहीं अपराधी को संरक्षण देने वाले पर कहर बरपे।बहुतेरे ने अपने सवाल जवाब किए, पर अब जब उच्चतम न्यायालय ने भी लगभग सुर वहीं छेड़ा तो मुझे लगा,निश्चल भाव मन व सोच का भाव सत्यता की लकीरें हमेशा जीत दिलाती है।अपराधी को सजा मिले कठोर से कठोर मिले, अपराधी के संरक्षकों को भी मिले पर निरपराधी परिजनों को नहीं।चिड़िया जिस तरह तिनका तिनका जोड़कर घोंसला बनाती है बच्चों को सुरक्षित रखने खातिर तो व्यक्ति भी यही करता है, अपराधी तो मेहनत नहीं करता, मेहनत करने वाले परिस्थिति जन्य अपराधी बनते हैं आदतन नहीं होते, परिस्थिति में दुर्भाग्य भी कारक होता है। पर आदतन तो अंधेरी गुफा में स्वयं जाता है। ।।अपराधी का अपराध पहला है, देशद्रोही अपराधी है, समाज या व्यवसाय, महिला शोषणकारी व्यवस्था का अंग है या शोषणकारी, समझने की आवश्यकता है फिर कठोर सजा मिले।बुलडोजर चला आज क्यों, अतिक्रमण दिखा आज क्यों,था तो पहले कौन-कौन दोषी,,, बुलडोजर आज ही क्यों, सुनवाई अवसर क्यों नहीं सबकुछ अधिकारियों को तय करना है।नहीं कानून हैं देश में हिटलरशाही नहीं चलेगी न्यायालय का चाबुक चलेगा न्याय अनुसार चलेगा,।साधुवाद उच्चतम न्यायालयप्रमोद कुमार व्दिवेदी एड्वोकेट Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 123

दोषी-आरोपी है इसलिए घर नहीं गिरा सकते… बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

नई दिल्ली अपराधियों पर बुलडोजर ऐक्शन पर सुप्रीम कोर्ट आज अपना फैसला सुना रहा है। जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस के वी विश्वनाथन की पीठ ने अपनी टिप्पणी में कई अहम बातें कही हैं। कोर्ट ने कहा कि बुलडोजर ऐक्शन कानून नहीं होने का भय दिखाता है। कोर्ट बुलडोजर ऐक्शन पर पूरे देश के लिए गाइडलाइन जारी करेगी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। पिछली सुनवाई में, अदालत ने अपराधों के आरोपियों को निशाना बनाने वाली अवैध विध्वंस कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस तरह की कार्रवाई का एक भी उदाहरण संविधान की भावना के खिलाफ है। साथ ही इस तरह के मामलों में अखिल भारतीय दिशा-निर्देश बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बड़ी बातें ➤कार्यपालिका किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं कर सकती। केवल आरोप के आधार पर यदि कार्यपालिका किसी व्यक्ति का घर तोड़ती है,तो यह कानून के शासन के बुनियादी सिद्धांत पर प्रहार करेगा। कार्यपालिका न्यायाधीश नहीं बन सकती और न ही किसी आरोपी की संपत्ति को ध्वस्त करने का निर्णय ले सकती है ➤कार्यपालिका द्वारा की गई ज्यादतियों से कानून की कड़ी शक्ति से निपटा जाना चाहिए। हमारे संवैधानिक आदर्श ऐसे किसी भी शक्ति के दुरुपयोग की अनुमति नहीं देते। यह कानून के न्यायालय द्वारा सहन नहीं किया जा सकता। ➤जब किसी विशेष संरचना को अचानक से ध्वस्त करने के लिए चुना जाता है और उसी प्रकार की बाकी संपत्तियों को नहीं छुआ जाता, तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि असली उद्देश्य कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि बिना सुनवाई के दंडित करना था। ➤आवास का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। यदि लोगों को उनके घरों से बेदखल करना पड़े,तो अधिकारियों को यह साबित करना चाहिए कि ध्वस्तीकरण ही एकमात्र उपलब्ध विकल्प है। घर के एक हिस्से को ध्वस्त करने के बजाय अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए। ➤रात के समय महिलाओं और बच्चों को सड़कों पर घसीटते देखना सुखद दृश्य नहीं है। बिना पूर्व कारण बताओ नोटिस के कोई ध्वस्तीकरण नहीं किया जाना चाहिए, जो या तो स्थानीय नगरपालिका कानूनों में दिए गए समय के अनुसार या सेवा की तारीख से 15 दिनों के भीतर (जो भी बाद में हो) प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह नोटिस पंजीकृत डाक के माध्यम से मालिक को भेजा जाएगा और संरचना के बाहरी हिस्से पर भी चिपकाया जाएगा। नोटिस में अवैध निर्माण की प्रकृति, विशेष उल्लंघन का विवरण और डेमोलेशन के आधार शामिल होने चाहिए। ➤अथॉरिटी को आरोपी को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देना होगा। ऐसी बैठक के विवरण को रिकॉर्ड किया जाएगा। प्राधिकारी के अंतिम आदेश में नोटिसधारी के पक्षों को शामिल किया जाना चाहिए। डेमोलशन की प्रक्रिया का वीडियो रिकॉर्डिंग किया जाएगा। डेमोलेशन रिपोर्ट को एक डिजिटल पोर्टल पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। ➤किसी भी निर्देश के उल्लंघन से अवमानना कार्यवाही शुरू की जाएगी। अधिकारियों को सूचित किया जाना चाहिए कि यदि ध्वस्तीकरण को निर्देशों के उल्लंघन में पाया जाता है, तो उन्हें ध्वस्त की गई संपत्ति की पुनर्स्थापना के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। अधिकारियों को व्यक्तिगत खर्च पर जवाबदेह ठहराया जाएगा, साथ ही हर्जाने का भुगतान भी करना होगा। मनमाने तरीके से घर नहीं गिरा सकते- सुप्रीम कोर्ट जस्टिस गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ ने फैसला पढ़ते हुए साफ कहा कि प्रशासन मनमाने ढंग से किसी का घर नहीं गिरा सकते। अगर ऐसा कोई भी अधिकारी किसी का भी घर मनमाने या अपनी मर्जी से गिराता है, तो उसपर कार्यवाई भी होनी चाहिए। पीठ ने आगे कहा कि अगर यह पाया गया कि घर अवैध तरीके से गिराया गया है तो, उसके लिए मुआवजा भी मिलेगा। बिना किसी का पक्ष सुने कार्यवाही न की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राशसन जज नहीं बन सकता। अपराध की सजा पूरे परिवार को नहीं- सुप्रीम कोर्ट बुलडोजर ऐक्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आप आरोपी के कारण उसके पूरे परिवार को परेशान नहीं कर सकते। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हमारा यह फैसला किसी एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है। इसके लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि कार्रवाई के लिए नोटिस डीएम को दी जाए। नोटिस में यह भी बताएं कि यह मकान कैसे अवैध है या कौन सा हिस्सा अवैध है। बेंच ने कहा कि 3 महीने में पोर्टल बनाकर नोटिस साझा किए जाएं। यही नहीं, अवैध निर्माण को गिराने के लिए पहले से बताना जरूरी है। कोर्ट न कहा कि हमने आर्टिकल 142 के तहत फैसला सुनाया है। हमने संविधान के तहत गारंटीकृत अधिकारों पर विचार किया है जो व्यक्तियों को मनमाने राज्य कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करते हैं। कानून का शासन यह सुनिश्चित करने के लिए एक ढांचा प्रदान करता है कि व्यक्तियों को पता हो कि संपत्ति मनमाने ढंग से नहीं ली जाएगी। दोष सिद्ध करने के लिए पहले से फैसला मत लें- जस्टिस गवई बुलडोजर ऐक्शन पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि घर होना एक ऐसी चाहत है जो कभी नहीं मिटती,हर परिवार का सपना होता है एक घर। उन्होंने आगे कहा कि एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या कार्यपालिका को सजा के प्रमुख रूप में आश्रय छीनने की अनुमति दी जानी चाहिए। जस्टिस गवई ने आगे कहा कि कानून का शासन लोकतांत्रिक सरकार की नींव है। मसला आपराधिक न्याय प्रणाली में निष्पक्षता का है,जो यह कहती है कि कानूनी प्रक्रिया को आरोपी का दोष सिद्ध करने के लिए पहले से ही निर्णय नहीं करना चाहिए।   क्या हो सकता है क्या नहीं?     सिर्फ इसलिए घर नहीं गिराया जा सकता क्योंकि कोई व्यक्ति आरोपी है. राज्य आरोपी या दोषी के खिलाफ मनमानी कार्रवाई नहीं कर सकता.     बुलडोजर एक्शन सामूहिक दंड देने के जैसा है, जिसकी संविधान में अनुमति नहीं है.     निष्पक्ष सुनवाई के बिना किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.     कानून के शासन, कानूनी व्यवस्था में निष्पक्षता पर विचार करना होगा.     कानून का शासन मनमाने विवेक की अनुमति नहीं देता है.     आरोपी और यहां तक ​​कि दोषियों को भी आपराधिक कानून में सुरक्षा … Read more

आरोपी और पीड़ित के बीच सिर्फ समझौते के आधार पर केस को रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली यौन उत्पीड़न केस पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। गुरुवार को अदालत ने कहा कि आरोपी और पीड़ित के बीच सिर्फ समझौते के आधार पर केस को रद्द नहीं किया जा सकता है। इस संबंद में शीर्ष न्यायालय ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया, जिसमें कोर्ट ने केस को रद्द करने के लिए CrPC की धारा 482 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया था। क्या था मामला दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग छात्रा के यौन उत्पीड़न के दोषी शिक्षक विमल कुमार गुप्ता को राहत दे दी थी। यह मामला 2022 का गंगापुर का है। खबर है कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था, जिसे शुरुआत में निचली अदालत ने मानन से इनकार कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता रामजी लाल बैरवा ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 2022 में नाबालिग दलित लड़की ने सरकारी स्कूल के शिक्षक के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद केस दर्ज हुआ था। जांच के दौरान नाबालिग का बयान भी दर्ज किया गया था। इसके बाद गुप्ता ने लड़की के परिवार का बयान एक स्टांप पेपर पर हासिल कर लिया था। इसमें कहा गया था कि उन्होंने गलतफहमी के चलते पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी थी और अब वह शिक्षक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ अब एपेक्स कोर्ट में इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस पीवी संजय कुमार की बेंच ने हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया। साथ ही आरोपी शिक्षक के खिलाफ मुकदमा चलाने का भी रास्ता साफ कर दिया है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 97

SC ने कहा नौकरियों में भर्ती के नियमों को सेलेक्शन प्रोसेस के बीच में नहीं बदला जा सकता

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को घोषणा की कि सरकारी नौकरियों में सेलेक्शन को कंट्रोल करने वाले नियमों को भर्ती प्रक्रिया के बीच में या उसके शुरू होने के बाद नहीं बदला जा सकता. यह फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया जिसमें जस्टिस ऋषिकेश रॉय, पीएस नरसिम्हा, पंकज मिथल और मनोज मिश्रा शामिल थे. पीठ ने कहा कि भर्ती के लिए रूल्स ऑफ द गेम को चयन प्रक्रिया के बीच में नहीं बदला जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भर्ती करने वाली संस्था अलग-अलग चरणों के लिए अलग-अलग मानक तय कर सकती है, लेकिन वह चरण के खत्म होने के बाद मानदंडों को बदल नहीं सकती. पीठ ने कहा कि आवेदन आमंत्रित करने और रिक्तियों को भरने के लिए विज्ञापन प्रकाशित होने के बाद भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाएगी. अगर मौजूदा नियमों या विज्ञापन के तहत कोई बदलाव स्वीकार्य है, तो उस बदलाव को संविधान के अनुच्छेद 14 की आवश्यकता को पूरा करना होगा और गैर-मनमानापन की कसौटी पर खरा उतरना होगा. 'प्रक्रिया ट्रांसपेरेंट और गैर-मनमानी होनी चाहिए' पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा नियमों के अधीन भर्ती निकाय भर्ती प्रक्रिया को तार्किक निष्कर्ष पर लाने के लिए उचित प्रक्रिया तैयार कर सकते हैं. पीठ ने कहा कि प्रक्रिया के लिए अपनाई गई प्रक्रिया ट्रांसपेरेंट और गैर-मनमानी होनी चाहिए. विस्तृत निर्णय बाद में अपलोड किया जाएगा. पांच न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा था केस इससे पहले तेज प्रकाश पाठक और अन्य बनाम राजस्थान हाई कोर्ट और अन्य (2013) मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इस मुद्दे को पांच न्यायाधीशों की पीठ को सौंप दिया था. तेज प्रकाश मामले में सुप्रीम कोर्ट ने के मंजूश्री बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2008) के पहले के फैसले की सत्यता पर संदेह जताया था. 2008 के फैसले में कोर्ट ने कहा था कि चयन मानदंड को प्रक्रिया के दौरान बीच में नहीं बदला जा सकता. यह स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है. Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 60

निजी संपत्ति अधिग्रहण मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला, कहा कि सरकार निजी संपत्ति का अधिग्रहण नहीं कर सकती

नई दिल्ली  निजी संपत्ति का सरकार सार्वजनिक हितों के लिए अधिग्रहण कर सकती है या नहीं, इस मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत से अपने फैसले में कहा है कि सभी निजी संपत्ति को सरकार नहीं ले सकती है। पीठ ने 8-1 के बहुमत से ये फैसला सुनाया है। 9 जजों की पीठ ने सुनाया फैसला चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने 8-1 के बहुमत से फैसला सुनाया है। पीठ में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस सुधांशु धूलिया, जस्टिस ऋषिकेश रॉय, जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस ए जी मसीह शामिल हैं। सीजेआई ने 9 जजों की बेंच के मामले में बहुमत से फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर के पिछले फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि सभी निजी स्वामित्व वाले संसाधनों को राज्य द्वारा अधिग्रहित किया जा सकता है। जस्टिस अय्यर के विचार से सहमत नहीं सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था का मकसद विकासशील देश की चुनौतियों से निपटना है, ना कि किसी एक आर्थिक ढांचे में बंधे रहना। कोर्ट ने माना कि बीते 30 सालों में बदली हुई आर्थिक नीतियों के कारण भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना है। जस्टिस अय्यर के इस विचार से सुप्रीम कोर्ट सहमत नहीं है कि निजी संपत्ति को भी सामुदायिक संपत्ति माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि भारत की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य किसी खास आर्थिक मॉडल को फॉलो करना नहीं है। बल्कि, उसका उद्देश्य एक विकासशील देश होने के नाते आने वाली चुनौतियों का सामना करना है। सीजेआई बोले- तीन जजमेंट हैं सुप्रीम कोर्ट ने निजी संपत्ति से जुड़ी 16 याचिकाओं पर फैसला सुनाया है। जिसमें मुंबई के प्रॉपर्टी मालिकों की याचिका भी शामिल है। मामला 1986 में महाराष्ट्र में हुए कानून संशोधन से जुड़ा है, जिसमे सरकार को प्राइवेट बिल्डिंग को मरम्मत और सुरक्षा के लिए अपने कब्जे में लेने का अधिकार मिला था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह संशोधन भेदभावपूर्ण है। CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने बताया कि इस मामले में तीन जजमेंट हैं – उनका और छह अन्य जजों का, जस्टिस नागरत्ना का आंशिक सहमति वाला और जस्टिस धुलिया का असहमति वाला। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 74

Supreme Court:निजी संपत्तियां ‘समुदाय के भौतिक संसाधन’ नहीं, राज्य नहीं कर सकता जबरन अधिग्रहण

Supreme Court: Private properties are not ‘physical resources of the community’, the state cannot forcibly acquire them नई दिल्ली ! सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सभी निजी स्वामित्व वाली संपत्तियां सामुदायिक संसाधन नहीं होतीं, जिन्हें राज्य आम भलाई के लिए अपने अधीन कर सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 8-1 के बहुमत से इस विवादास्पद मुद्दे पर फैसला सुनाया। तीन फैसले लिखे गएमुख्य न्यायाधीश ने अपने और छह सहयोगियों के लिए एक फैसला लिखा, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने एक समवर्ती लेकिन अलग फैसला लिखा और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने असहमति जताई। पीठ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति नागरत्ना बीवी, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति एससी शर्मा और न्यायमूर्ति एजी मसीह शामिल थे।यह मामला संविधान के अनुच्छेद 31सी से संबंधित है जो राज्य द्वारा राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को पूरा करने के लिए बनाए गए कानूनों की रक्षा करता है – संविधान सरकारों को कानून और नीतियां बनाते समय पालन करने के लिए दिशा-निर्देश देता है। अनुच्छेद 31सी जिन कानूनों की रक्षा करता है उनमें अनुच्छेद 39बी भी शामिल है। अनुच्छेद 39बी में प्रावधान है कि राज्य अपनी नीति इस प्रकार बनाएगा कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार वितरित हो कि सर्वजन हिताय हो।किसी की निजी संपत्ति नहीं हो सकती पब्लिकइस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “क्या 39बी में इस्तेमाल किए गए समुदाय के भौतिक संसाधन में निजी स्वामित्व वाले संसाधन शामिल हैं? सैद्धांतिक रूप से, इसका उत्तर हां है, इस वाक्यांश में निजी स्वामित्व वाले संसाधन शामिल हो सकते हैं। हालांकि, यह न्यायालय रंगनाथ रेड्डी में न्यायमूर्ति अय्यर के अल्पमत के दृष्टिकोण से सहमत नहीं है। हमारा मानना ​​है कि किसी व्यक्ति के स्वामित्व वाले प्रत्येक संसाधन को केवल इसलिए समुदाय का भौतिक संसाधन नहीं माना जा सकता क्योंकि वह भौतिक आवश्यकताओं की योग्यता को पूरा करता है।”उन्होंने कहा, “39बी के अंतर्गत आने वाले संसाधन के बारे में जांच विवाद-विशिष्ट होनी चाहिए और संसाधन की प्रकृति, विशेषताओं, समुदाय की भलाई पर संसाधन के प्रभाव, संसाधन की कमी और ऐसे संसाधन के निजी लोगों के हाथों में केंद्रित होने के परिणामों जैसे कारकों की एक गैर-संपूर्ण सूची के अधीन होनी चाहिए, इस न्यायालय द्वारा विकसित सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत भी उन संसाधनों की पहचान करने में मदद कर सकता है जो समुदाय के भौतिक संसाधन के दायरे में आते हैं।”46 साल बाद पलटा फैसला1977 में, सात न्यायाधीशों की पीठ ने 4:3 बहुमत से फैसला सुनाया था कि निजी स्वामित्व वाली सभी संपत्ति समुदाय के भौतिक संसाधनों के दायरे में नहीं आती है। हालाँकि, अल्पमत की राय में, न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने माना कि सार्वजनिक और निजी दोनों संसाधन अनुच्छेद 39(बी) के तहत “समुदाय के भौतिक संसाधनों” के दायरे में आते हैं। अपने अलग फैसले में, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने न्यायमूर्ति अय्यर के फैसले पर उनकी टिप्पणियों पर मुख्य न्यायाधीश से असहमति जताई। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 115

मरने से पहले किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता: SC

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि मरने से पहले किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने इस प्रकार के बयानों पर गंभीरता से परीक्षण की जरूरत पर बल देते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी है, जिसमें तीनों आरोपियों को बरी किया गया था। यह मामला एक अक्टूबर 1996 का है, जब नसीम खान की हत्या के आरोप में रमजान खान, मुसफ खान और हबीब खान को मध्यप्रदेश के सेशन कोर्ट ने दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामले में मृतक की मां ने ट्रायल कोर्ट में बयान दिया था कि मरने से पहले उसके बेटे ने आरोपियों के नाम बताए थे, और इसी बयान को ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि का आधार बनाया था। हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ दिया, जिसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सीटी रविकुमार की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि मरने से पहले दिया गया मौखिक बयान अकेले पुख्ता साक्ष्य नहीं हो सकता, खासकर जब उसमें विरोधाभास हो और अन्य प्रमाण कमजोर हों। कोर्ट ने कहा कि संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों को रिहा किया जाना चाहिए। इस फैसले को कानूनी मामलों में एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मृत्यु से पहले दिए गए बयान की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता का गहराई से परीक्षण किया जाना चाहिए।     Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 72

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि मरने से पहले किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने इस प्रकार के बयानों पर गंभीरता से परीक्षण की जरूरत पर बल देते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी है, जिसमें तीनों आरोपियों को बरी किया गया था। यह मामला एक अक्टूबर 1996 का है, जब नसीम खान की हत्या के आरोप में रमजान खान, मुसफ खान और हबीब खान को मध्यप्रदेश के सेशन कोर्ट ने दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामले में मृतक की मां ने ट्रायल कोर्ट में बयान दिया था कि मरने से पहले उसके बेटे ने आरोपियों के नाम बताए थे, और इसी बयान को ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि का आधार बनाया था। हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ दिया, जिसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सीटी रविकुमार की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि मरने से पहले दिया गया मौखिक बयान अकेले पुख्ता साक्ष्य नहीं हो सकता, खासकर जब उसमें विरोधाभास हो और अन्य प्रमाण कमजोर हों। कोर्ट ने कहा कि संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों को रिहा किया जाना चाहिए। इस फैसले को कानूनी मामलों में एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मृत्यु से पहले दिए गए बयान की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता का गहराई से परीक्षण किया जाना चाहिए।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 69

SC ने दहेज हत्या के एक मामले में एक आरोपी को बरी करते हुए कहा- दहेज उत्पीड़न के मामलों में सावधानी बरतें कोर्ट

नई दिल्ली अगर आपसे पूछा जाए कि 2-4 ऐसे कानूनों का नाम बताइए जिसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग होता है। जवाब में दहेज उत्पीड़न से जुड़ा कानून शायद ही किसी की लिस्ट में जगह पाने से छूटे। इस कानून को पति के घरवालों और रिश्तेदारों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। गुनाह किसी का भी हो लेकिन घर के हर बालिग सदस्य को आरोपी बना दिया जाता है। जमानत भी मुश्किल से होती है। कानून के दुरुपयोग को लेकर समय-समय पर अदालतें भी चिंता जताती रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए अदालतों को सलाह दी है कि वे दहेज उत्पीड़न या दहेज हत्या से जुड़े मामलों सावधानी बरतें। ध्यान रखें कि कोई बेगुनाह परेशान न हो। कानून के दुरुपयोग को लेकर सावधानी बरतने की सलाह सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों को दहेज उत्पीड़न के मामलों में सावधानी बरतने को कहा है। अक्सर इन मामलों में पति के रिश्तेदारों को भी फंसा लिया जाता है, जबकि मुख्य आरोपी पति होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के कई मामलों में आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। ऐसे में अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए ताकि निर्दोष परेशान न हों। जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने दहेज मृत्यु के एक मामले में एक व्यक्ति को बरी करते हुए यह बात कही। दहेज हत्या के मामले में ननदोई भी था आरोपी बेंच ने कहा कि आरोपी ने मृतका की ननद से अक्टूबर 2010 में शादी की थी। दहेज उत्पीड़न का आरोप पहली बार लगने के बाद उसने शादी की थी। सिर्फ इसलिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसकी पत्नी को दोषी पाया गया था। बेंच ने कहा कि सामान्य और व्यापक आरोप अभियोजन का आधार नहीं हो सकते। अदालतों को ऐसी शिकायतों से निपटने में सावधानी बरतनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने अपने एक पूर्व के फैसले का हवाला देते हुए कहा, 'कोर्ट ने देखा है कि यह सर्वविदित है कि बड़ी संख्या में शिकायतों में घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। बड़ी संख्या में मामलों में फंसाने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है।' बेंच ने कहा, 'हमारा विचार है कि ऐसी परिस्थितियों में, अदालतों को आरोपियों को फंसाए जाने के मामलों की पहचान करने और ऐसे व्यक्तियों द्वारा अपमान और पीड़ा को टालने के लिए सावधान रहना होगा।' आरोपी की 5 महीने पहले ही हुई थी शादी सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आरोपी ने मुख्य आरोपी (पति) की बहन से अक्टूबर 2010 में शादी की और जिस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण महिला की मृत्यु हुई, वह परिवार का रिश्तेदार बनने के साढ़े पांच महीने के भीतर ही हुई। बेंच ने कहा, 'यह एक सच्चाई है कि सामान्य, अस्पष्ट आरोपों के बावजूद, अपीलकर्ता के खिलाफ कोई विशेष आरोप नहीं लगाया गया था। इसके अलावा, हमारी सूक्ष्म जांच के बावजूद, हम अभियोजन पक्ष द्वारा अपीलाकर्ता के खिलाफ किसी भी गवाह के माध्यम से कोई विशेष सबूत नहीं पा सके। …अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने विशेष रूप से अपीलकर्ता के खिलाफ यह कहते हुए गवाही नहीं दी थी कि उसने कोई क्रूरता की है जो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 498-A के तहत अपराध का मामला बन सके।' 'आरोपी एक दोषी का रिश्तेदार है तो इसका मतलब ये नहीं कि वह भी दोषी' बेंच ने कहा, 'ऐसा भी कोई मामला नहीं है कि इस प्राथमिकी से पहले अपीलकर्ता के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज कराई गई हो। संक्षेप में, हम पाते हैं कि अपीलकर्ता के खिलाफ यह मानने के लिए कोई सबूत नहीं है कि उसने IPC की धारा 498-A के तहत अपराध किया है। दूसरे आरोपी का पति होने के नाते, जिसे निचली अदालतों ने उक्त अपराध के लिए दोषी पाया था, अपीलकर्ता को उक्त अपराध के तहत दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकता है, क्योंकि रिकॉर्ड पर कोई विशेष सामग्री नहीं है।ट सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ इसलिए किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह मामले में दोषी पाई गई महिला का रिश्तेदार है। अदालत ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में सबूतों के आधार पर ही फैसला लिया जाना चाहिए। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 72

बहराइच हिंसा में आरोपियों के खिलाफ डेमोलेशन ऐक्शन पर रोक, सुप्रीम कोर्ट आज करेगा केस की सुनवाई

नई दिल्ली  उच्चतम न्यायालय ने  कहा कि उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में हिंसा और दंगों में कथित रूप से शामिल आरोपियों के खिलाफ 'बुलडोजर' चलाने की प्रस्तावित कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर बुधवार को सुनवाई की जायेगी। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी यू सिंह और अन्य वकीलों की शीघ्र सुनवाई करने की गुहार स्वीकार करते हुए इस मामले को 23 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार कथित रूप से दंगों में शामिल लोगों के खिलाफ तोड़-फोड़ की कार्रवाई इस आधार पर करना चाहती है कि उनका निर्माण अवैध है।इस पर पीठ ने कहा, "आप इस अदालत द्वारा पारित आदेशों से अवगत हैं। यदि वे (राज्य सरकार) इन आदेशों का उल्लंघन करने का जोखिम उठाना चाहते हैं, तो यह उनकी पसंद है।" पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज से कहा कि उसे बुधवार तक कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने सहमति जताते हुए कहा, "हम कुछ नहीं करेंगे।" उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) ने बहराइच जिले के एक गांव में धार्मिक जुलूस के दौरान संगीत बजाने को लेकर कथित रूप से सांप्रदायिक हिंसा में शामिल तीन लोगों की अचल संपत्ति के ध्वस्तीकरण के लिए नोटिस जारी किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अक्टूबर को अपने 17 सितंबर के आदेश को बढ़ा दिया था कि इस न्यायालय की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में शामिल अभियुक्त की संपत्ति को ध्वस्त करने के लिए राज्यों द्वारा बुलडोजर का उपयोग नहीं किया जाएगा शीर्ष अदालत ने हालांकि,तब सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों, रेलवे लाइनों या जल निकायों पर अतिक्रमण से जुड़ी कार्रवाई को छूट दी थी।शीर्ष अदालत ने तब बुलडोजर कार्रवाई के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करने पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अक्टूबर को कहा था कि वह "बुलडोजर न्याय" के विवादास्पद मुद्दे से निपटने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर दिशा-निर्देश तैयार करेगा, जिसका उपयोग कुछ राज्य सरकारें किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगने के तुरंत बाद उसके घर या दुकान को ध्वस्त करने के लिए करती हैं।     Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 98

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल, एक वकील वकालत के पेशे में रहते हुए पत्रकारिता जैसे पेशे की दोहरी भूमिका कैसे निभा सकता है

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि एक वकील वकालत के पेशे में रहते हुए पत्रकारिता जैसे पेशे की दोहरी भूमिका कैसे निभा सकता है, जबकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के मुताबिक दोहरी भूमिका निभाना प्रतिबंधित है। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दो टूक लहजे में कहा कि किसी भी वकील को डबल रोल निभाने की इजाजत नहीं दे सकते हैं। पिछली सुनवाई में भी कोर्ट ने वकील के डबल रोल पर सवाल उठाए थे और इसे व्यावसायिक कदाचार बताया था। आज फिर जब उस मामले की सुनवाई शुरू हुई तो जस्टिस ओका ने कहा, "आप या तो वकालत कर लीजिए या फिर पत्रकारिता। हम इस तरह की प्रैक्टिस की अनुमति नहीं देंगे।" कोर्ट ने आरोपी अधिवक्ता से कहा, जो उस समय एक पत्रकार के तौर पर भी काम कर रहा था, जब बार काउंसिल के नियमों में ऐसी दोहरी भूमिकाएं निभाने पर प्रतिबंध है तो आपको हम इसकी इजाजत कैसे दे सकते हैं। जस्टिस ओका ने कहा, "हम ऐसी दोहरी भूमिका की अनुमति नहीं दे सकते। यह एक नेक पेशा है। आप यह भी नहीं कह सकते कि एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।" इसके बाद पीठ ने अधिवक्ता-सह-पत्रकार की याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नया नोटिस जारी किया। यह मामला मोहम्मद कामरान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य का है। दरअसल, डॉ. मोहम्मद कामरान इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस करते हैं और साथ में ही वह स्वतंत्र पत्रकारिता भी करते हैं। उन्होंने भाजपा के पूर्व सांसद और भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस दर्ज किया था, जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कामरान ने अपनी याचिका में आरोप लगाए थे कि तत्कालीन भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने उन्हें बदनाम करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को सितंबर 2022 में पत्र लिखे थे। जब हाई कोर्ट ने कमरान की मानहानि की अर्जी इस साल मार्च में खारिज हो गई तो उन्होंने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। अपील याचिका में कामरान ने लिखा कि वह वकील और पत्रकार दोनों हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता और नाराजगी जताई और कहा कि नियमों के मुताबिक, एक वकील कोई दूसरा पेशा नहीं अपना सकता। पीठ ने अपीलकर्ता मोहम्मद कामरान के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से भी जवाब मांगा है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 110

सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता के हित में बड़ा और सार्थक कदम उठाया, कोर्ट की सुनवाई को लाइव देख सकेगें

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता के हित में बड़ा और सार्थक कदम उठाया है। अब कोई भी आम आदमी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को लाइव देख सकेगा। इसके लिए तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। अब से, आप सभी अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर देख पाएंगे। इससे पहले तक, सुप्रीम कोर्ट सिर्फ संविधान पीठ और राष्ट्रीय महत्व के अन्य मामलों की सुनवाई को ही यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीम करता था। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में स्वप्निल त्रिपाठी मामले में अपने फैसले में महत्वपूर्ण मामलों में कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग का समर्थन किया था।  इसके बाद, देश के कोने-कोने के नागरिकों को शीर्ष अदालत की कार्यवाही देखने का मौका मिले, इसलिए पूरे न्यायालय ने संविधान पीठों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण करने का फैसला किया। इसके अलावा, महत्वपूर्ण सुनवाई का लाइव ट्रांसक्रिप्शन तैयार करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग तकनीक का भी उपयोग किया जाता है। हाल ही में, नीट-यूजी मामले और आरजीकर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को लोगों ने काफ़ी संख्या में ऑनलाइन देखा। पिछले साल अगस्त में, संविधान के अनुच्छेद 370 पर संविधान पीठ की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश डी।वाई। चंद्रचूड़ ने कहा था कि शीर्ष अदालत देश भर की सभी निचली अदालतों में वर्चुअल सुनवाई को सक्षम बनाने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए अपना खुद का क्लाउड सॉफ्टवेयर स्थापित कर रही है। उन्होंने कहा था कि ईकोर्ट्स (प्रोजेक्ट) के तीसरे चरण में, हमारे पास एक बड़ा बजट है, इसलिए हम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए अपना खुद का क्लाउड सॉफ्टवेयर स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं। मुख्य न्यायाधीश ने बताया था कि महामारी के दौरान, भारत भर की अदालतों ने वर्चुअल माध्यम से 43 मिलियन सुनवाई कीं। औपनिवेशिक छाप और पारंपरिक विशेषताओं को त्यागते हुए एक अन्य पहल में, सीजेआई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुस्तकालय में लेडी जस्टिस की मूर्ति अब एक तलवार के बजाय भारतीय संविधान की एक प्रति रखी है, और उसकी आंखों से पट्टी हटा दी गई है। परंपरागत रूप से, आंखों पर बंधी पट्टी कानून के समक्ष समानता का सुझाव देती थी, जिसका अर्थ है कि न्याय का वितरण पक्षकारों की स्थिति, धन या शक्ति से प्रभावित नहीं होना चाहिए। तलवार ऐतिहासिक रूप से अधिकार और अन्याय को दंडित करने की क्षमता का प्रतीक थी। हालांकि, लेडी जस्टिस के दाहिने हाथ में न्याय के तराजू को बरकरार रखा गया है, जो सामाजिक संतुलन और फैसला सुनाने से पहले दोनों पक्षों के तथ्यों और तर्कों पर सावधानीपूर्वक विचार करने के महत्व का प्रतीक है।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 70

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बाल विवाह रोकथाम कानून जरूरी है, कोई और मजहब का पर्सनल लॉ इस कानून के आड़े नहीं आ सकता

नई दिल्ली बाल विवाह रोकथाम अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून जरूरी है। इसके अलावा किसी भी मजहब का पर्सनल लॉ इस कानून के आड़े नहीं आ सकता। अदालत ने कहा कि बाल विवाह गलत है और इससे किसी के भी मनपसंद जीवनसाथी चुनने का अधिकार प्रभावित होता है। कोर्ट ने कहा कि बचपन में कराए गए विवाह अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का विकल्प छीन लेते हैं। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की पीठ ने देश में बाल विवाह रोकथाम कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कई दिशानिर्देश भी जारी किए। प्रधान न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि बाल विवाह की रोकथाम के कानून को ‘पर्सनल लॉ’ के जरिए प्रभावित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस तरह की शादियां नाबालिगों की जीवन साथी चुनने की स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन हैं। पीठ ने कहा कि अधिकारियों को बाल विवाह की रोकथाम और नाबालिगों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उल्लंघनकर्ताओं को अंतिम उपाय के रूप में दंडित करना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि बाल विवाह निषेध कानून में कुछ खामियां हैं। इसे दूर करने की जरूरत है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 बाल विवाह को रोकने और इसका उन्मूलन सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था। इस अधिनियम ने 1929 के बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम का स्थान लिया। पीठ ने कहा, 'बाल विवाह पर रोकथाम की रणनीति अलग-अलग समुदायों के हिसाब से बनाई जानी चाहिए। यह कानून तभी सफल होगा जब बहु-क्षेत्रीय समन्वय होगा। कानून प्रवर्तन अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता है। हम इस बात पर जोर देते हैं कि इस मामले में समुदाय आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।’ कोर्ट का कहना था कि इन मामलों की रोक के लिए कानून के पालन के साथ ही जागरूकता और शिक्षा की भी जरूरत है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 85

चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की जाने वाली मुफ्त योजनाओं के वादे को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए, SC में एक और याचिका दाखिल

नई दिल्ली  चाहे बस यात्रा हो या फिर राशन की व्यवस्था। हर राज्य में होने वाले चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा ऐसी योजनाओं को फ्री में देने का ऐलान किया जाता है। जब राजनीतिक दल की चुनाव में जीत होती है तो मुफ्त की सरकारी योजनाओं को राज्य में लागू भी किया जाता है। देश के कई राज्य ऐसे हैं, जहां इस समय जनता के लिए फ्री योजनाएं चल रही हैं। हालांकि, अब ऐसी चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है कि देश के कई राज्यों में चल रही सभी मुफ्त की सरकारी योजनाएं बंद हो जाएंगी। आइये जानते हैं क्या सही में ऐसा कुछ होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में चुनाव के दौरान फ्रीबीज (चुनावी रेवड़ियों) के वादे को लेकर एक याचिका दायर की गई है। इस याचिका में मांग की गई है कि चुनावों के दौरान किसी भी तरह के फ्री वादे को रिश्वत करार दिया जाए। साथ ही चुनाव आयोग को इलेक्शन के दौरान राजनीतिक दलों के द्वारा की जाने वाली मुफ्त योजनाओं के वादे को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही पीठ ने इस याचिका को अन्य लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया है। पीठ ने याचिकाकर्ता को छूट देते हुए कहा कि वो सभी याचिकाओं पर जल्द सुनवाई के लिए अनुरोध कर सकता है। देश में बीते कुछ समय में चुनाव के समय फ्री योजनाओं को देने की मांग ने जोर पकड़ा है। लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनावों तक इसकी गूंज सुनाई दी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने कुछ यूनिट फ्री बिजली और मुफ्त पानी देने का वादा किया। इसके अलावा कांग्रेस ने भी कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान इसी तरह के वादे किए। वहीं, भाजपा शासित राज्यों में भी मुफ्त सरकारी योजनाएं चल रही हैं। फ्रीबीज (चुनावी रेवड़ियों) के वादे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही कई याचिकाएं लंबित हैं। पूर्व चीफ जस्टिस एनवी रमना, पूर्व सीजेआई जस्टिस यूयू ललित की पीठ पहले ही फ्रीबीज मामले में सुनवाई कर चुकी है। हाल ही में डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की है।     Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 69

पंजाब और हरियाणा सरकारों को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, पराली जलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर नाराजगी

नई दिल्ली दिल्ली एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण की समस्या का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बुधवार को कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा सरकारों को फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पराली जलाने की घटनाओं के लिए दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं करने के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों को तलब किया है और उन्हें 23 अक्टूबर को अदालत में पेश होकर अपनी सफाई पेश करने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा कि दोनों राज्य प्रदूषण की समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पराली जलाने वाले लोगों पर मामूली जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ दिया जा रहा है। यही वजह है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने में कोई मदद नहीं मिल रही है। कोर्ट ने आगे कहा कि यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। कोर्ट ने एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन को निर्देश दिया है कि वह उन अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करें जो अदालत के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) खतरे के निशान के पार पहुंच गया है। नोएडा ग्रेटर, नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली के कई ऐसे इलाके हैं जहां पर एक्यूआई 300 के आंकड़े को पार कर चुका है। स्थिति को देखते हुए दिल्ली सरकार ने एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पांस सिस्टम यानी ग्रैप का पहला चरण लागू कर दिया है। ग्रैप के पहले चरण के तहत पूरे दिल्ली एनसीआर में आतिशबाजी, होटल रेस्टोरेंट में कोयला और लकड़ी जलाने के उपयोग पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई है। इसके साथ ही खुले में कूड़ा फेंकना और कचरा जलाना भी पूरी तरीके से प्रतिबंधित कर दिया गया है।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 60

सामग्री में संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो प्राथमिकी को रद्द करके जांच को विफल नहीं किया जा सकता: Supreme Court

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जब प्राथमिकी में किसी आरोपी पर बेईमानी का आरोप लगाया जाता है और सामग्री में संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो प्राथमिकी को रद्द करके जांच को विफल नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक कार्यवाही या प्राथमिकी को शुरुआत में ही रद्द कर दिया जाना चाहिए या नहीं, इस पर निर्णय लेते समय जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्रियों सहित प्राथमिकी में लगाए आरोपों पर गौर किया जाना चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ जांच के लिए मामला बनता है या नहीं। पीठ ने  अपने फैसले में कहा, ‘‘इस प्रकार, जब प्राथमिकी में आरोपी पर बेईमान आचरण का आरोप लगाया जाता है, जिसका पता संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली सामग्रियों से चलता है तो प्राथमिकी को रद्द करके जांच को विफल नहीं किया जाना चाहिए।’’ उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला सोमजीत मलिक की अपील पर दिया है जिसने एक आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी रद्द करने के झारखंड उच्च न्यायालय के एक फरवरी के आदेश को चुनौती दी थी। मलिक ने आरोप लगाया था कि उसका ट्रक जुलाई 2014 से आरोपी के पास था लेकिन 12.49 लाख रुपये के बकाये समेत उसका किराया नहीं चुकाया गया। पीठ ने कहा कि प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि आरोपी ने 14 जुलाई 2014 और 31 मार्च 2016 के बीच मलिक के ट्रक को 33,000 रुपये के मासिक किराये पर लिया था लेकिन पहले महीने के बाद किराया नहीं चुकाया और झूठा आश्वासन देता रहा। उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘किराया नहीं चुकाने के आरोप से ही सामान्य तौर पर यह मान लिया जाएगा कि आरोपी ने वाहन पर कब्जा बरकरार रखा है। ऐसी परिस्थितियों में उस ट्रक का क्या हुआ, यह जांच का विषय बन जाता है। यदि इसे आरोपी ने बेईमानी से खुर्द-बुर्द कर दिया था, तो यह आपराधिक विश्वासघात का मामला बन सकता है। इसलिए जांच के दौरान एकत्रित की गयी सामग्रियों पर विचार किए बिना शुरुआत में ही प्राथमिकी रद्द करने का कोई औचित्य नहीं है।’’ उसने कहा, ‘‘हमारी राय में उच्च न्यायालय को प्राथमिकी रद्द करने के अनुरोध पर विचार करने से पहले जांच के दौरान एकत्रित की गयी सामग्रियों पर गौर करना चाहिए था।’’ उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए, शीर्ष अदालत ने कानून के अनुसार और जांच एजेंसी द्वारा एकत्र की गई सामग्री पर विचार करने के बाद याचिका पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मामला वापस उच्च न्यायालय को भेज दिया।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 67

केवल मानक की दिव्यांगता होने के आधार पर अभ्यर्थी को एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए पात्रता के अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा: SC

नई दिल्ली  उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केवल 40 प्रतिशत दिव्यांगता का तय मानक किसी को मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने से नहीं रोकता, जब तक कि विशेषज्ञ की रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख न हो कि अभ्यर्थी एमबीबीएस करने में असमर्थ है। न्यायामूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने अपने 18 सितंबर के आदेश के लिए विस्तृत कारण बताए। इस आदेश में न्यायालय ने एक उम्मीदवार को एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने की अनुमति दी थी क्योंकि मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि वह बिना किसी बाधा के मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने में समर्थ है। पीठ ने कहा कि दिव्यांग उम्मीदवार की एमबीबीएस पाठ्यक्रम में पढ़ाई करने की क्षमता की जांच विकलांगता मूल्यांकन बोर्ड द्वारा की जानी चाहिए। इसने कहा, ‘‘केवल निर्धारित मानक की दिव्यांगता होने के आधार पर अभ्यर्थी को एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए पात्रता के अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। अभ्यर्थी की दिव्यांगता का आकलन करने वाले विकलांगता बोर्ड को सकारात्मक रूप से यह दर्ज करना होगा कि अभ्यर्थी की दिव्यांगता पाठ्यक्रम की पढ़ाई में अभ्यर्थी के लिए बाधा बनेगी या नहीं।’’ शीर्ष अदालत ने कहा कि विकलांगता बोर्ड को यह भी बताना चाहिए कि क्या वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि उम्मीदवार पाठ्यक्रम में पढ़ाई के लिए असमर्थ है। अगर ऐसा है तो उसे कारण बताना चाहिए। न्यायालय ने ओंकार नामक छात्र की याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसने 1997 के स्नातक चिकित्सा शिक्षा विनियमन को चुनौती दी है जो 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता वाले अभ्यर्थी को एमबीबीएस करने से रोकता है।     Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 64

बोइनपल्ली को शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत

नई दिल्ली दिल्ली के कथित शराब घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हैदराबाद के कारोबारी अभिषेक बोइनपल्ली को जमानत दे दी। बोइनपल्ली को शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में जस्टिस एमएम सुंदरेश और अरविंद कुमार की बेंच ने जमानत दी है। ईडी की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने जमानत का विरोध नहीं किया। बेंच ने कहा, 'हम जमानत देने के पक्ष में हैं।' सर्वोच्च अदालत ने 13 अगस्त को बोइनपल्ली को मिली अंतरिम जमानत को बढ़ा दिया था। 20 मार्च को कोर्ट ने यह कहते हुए उन्हें पांच सप्ताह की जमानत दी थी कि वह 18 महीनों से जेल में बंद हैं। इसके बाद लगातार उनकी जमानत अवधि बढ़ती रही। अंतरिम जमानत देते हुए सर्वोच्च अदालत ने बोइनपल्ली को अपना पासपोर्ट जमा कराने को कहा था। उन्हें हैदराबाद के अलावा एनसीआर से बाहर कहीं और नहीं जाने को कहा गया था।कारोबारी ने दिल्ली हाई कोर्ट के तीन जुलाई 2023 के आदेश को चुनौती दी है जिसमें 2022 में उनकी गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल उठाने वाली याचिका खारिज कर दी गई थी। उन्होंने पीएमएलए की धारा 19 का पालन न करने के आधार पर गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। उनका कहना है कि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। दिल्ली सरकार ने 2021-22 के लिए बनी शराब नीति 17 नवंबर, 2021 को लागू की थी लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच सितंबर, 2022 के अंत में इसे रद्द कर दिया था। केंद्रीय जांच एजेंसियों सीबीआई और ईडी का आरोप है कि इस नीति के तहत शराब कारोबारियों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाया गया और बदले में उनसे रिश्वत ली गई। इस मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, राज्यसभा सांसद संजय सिंह जैसे बड़े नेता भी आरोपी हैं। तीनों सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर निकले हैं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 60

कोरोना वैक्सीन के साइड इफेक्ट वाली याचिका हुई खारिज, कहा- यह सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए है: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने कोविड वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स वाली याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में दावा किया गया था कि कोविड वैक्सीन के इस्तेमाल के बाद से इंसानों के ऊपर साइड इफेक्ट्स (रक्त का थक्का जमना, हार्ट अटैक) दिखाई दे रहे हैं, जिसे लेकर यूके की एक कोर्ट में भी मुकदमा दायर किया गया है। चीफ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़, जस्टिस जे बी पादरीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए है। हमें उस स्थिति के बारे में भी सोचना चाहिए कि अगर वैक्सीन ना ली जाती तो क्या साइड इफेक्ट्स होते। जस्टिस पादरीवाला ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या आपने वैक्सीन ली है? आपको कुछ हुआ है, जिस पर याचिकाकर्ता के वकील ने वैक्सीन लेने की बात को स्वीकार किया लेकिन किसी भी तरह के साइड इफेक्ट से इंकार किया। इस पर बेंच की तरफ से कहा गया कि यह याचिका केवल सनसनी फैलाने का प्रयास लग रही है, इसलिए हम इसे खारिज कर रहे हैं। प्रिया मिश्रा और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर की गई इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने मांग की गई थी कि वह मेडिकल विशेषज्ञों की एक समिति से एस्ट्राजेनेका की कोविडशील्ड वैक्सीन और उसके साइड इफेक्ट और जानलेवा जोखिम की जांच करवाएं। इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मांग की रखी गई थी कि इस समिति में दिल्ली एम्स के निदेशक और रिटायर सुप्रीम कोर्ट के जज हों ताकि वैक्सीन के जोखिमों का अध्ययन किया जा सके। इसके अलावा याचिका में यह भी मांग की गई थी कि इस वैक्सीन से जिन लोगों को भी नुकसान हुआ है उनके लिए वैक्सीन डैमेज पेमेंट सिस्टम स्थापित किया जाए, जिसमें मुआवजे की व्यवस्था हो। दरअसल, कोविड वैक्सीन बनाने वाली ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका ने अप्रैल में कोर्ट में माना था कि वैक्सीन से इंसानों को ऊपर खतरनाक साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। उन्होंने माना कि वैक्सीन से रक्त के थक्के और प्लेटलेट्स की कमी हो सकती है, हालांकि इसके चांसेज बहुत कम हैं। भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ने भी जो कोविडशील्ड वैक्सीन बनाई थी वह एस्ट्राजेनेका के फॉर्मूला पर ही आधारित थी। इसी वैक्सीन की करीब 175 करोड़ से ज्यादा खुराकें तो भारत में दी जा चुकी हैं और करोड़ों की संख्या में यह विदेशों को भी भेजी जा चुकी हैं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 59

थरूर की “शिवलिंग पर बिच्छू” वाली टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट सोमवार को कांग्रेस सांसद शशि थरूर की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है। उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाकर की गई थरूर की कथित “शिवलिंग पर बिच्छू” वाली टिप्पणी के लिए उनके खिलाफ मानहानि की कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया था। थरूर की याचिका पर सुनवाई करते हुए 10 सितंबर को उच्चतम न्यायालय ने कांग्रेस सांसद के खिलाफ दायर मानहानि मामले में निचली अदालत में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने इस मामले में शिकायतकर्ता भाजपा नेता राजीव बब्बर और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर याचिका पर जवाब तलब किया था। न्यायालय की वेबसाइट पर 14 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध वाद सूची के अनुसार, न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ थरूर की याचिका पर सुनवाई करेगी। थरूर ने उच्च न्यायालय के 29 अगस्त के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया है, जिसमें उनके खिलाफ मानहानि की कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।  थरूर के वकील ने 10 सितंबर को सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय से कहा कि शिकायतकर्ता को मामले में पीड़ित पक्ष नहीं कहा जा सकता और राजनीतिक दल के सदस्यों को भी पीड़ित पक्ष नहीं कहा जा सकता। वकील ने दलील दी थी कि थरूर की टिप्पणी मानहानि कानून के प्रतिरक्षा खंड के तहत संरक्षित है, जो यह निर्धारित करता है कि अच्छी सोच के साथ दिया गया बयान आपराधिक नहीं है। वकील ने कहा कि थरूर ने टिप्पणी करने से छह साल पहले कारवां पत्रिका में प्रकाशित एक लेख का संदर्भ दिया था। शीर्ष न्यायालय ने हैरानी जताई थी कि 2012 में उस वक्त यह बयान अपमानजनक नहीं था जब आलेख मूल रूप से प्रकाशित हुआ था। न्यायमूर्ति रॉय ने सुनवाई के दौरान कहा था, “आखिरकार यह एक रूपक है। मैंने समझने की कोशिश की है। यह संदर्भित व्यक्ति (मोदी) की अपराजेयता को दर्शाता है। मुझे नहीं पता कि यहां किसी ने आपत्ति क्यों जताई है।” थरूर के खिलाफ कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था कि प्रथम दृष्टया, प्रधानमंत्री के खिलाफ “शिवलिंग पर बिच्छू” जैसे आरोप “घृणित एवं निंदनीय” हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मानहानि की शिकायत में तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद थरूर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर 16 अक्टूबर 2020 को रोक लगा दी थी और पक्षकारों को 10 सितंबर को निचली अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था। उसने कहा था कि प्रथम दृष्टया, टिप्पणी से प्रधानमंत्री, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ-साथ इसके पदाधिकारियों और सदस्यों की मानहानि हुई है।     Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 80

सुप्रीम कोर्ट जल्द सुनाएगा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे पर फैसला

नई दिल्ली अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट जल्द फैसला सुना सकता है। इसकी संभावना इसलिए है क्योंकि मामले की सुनवाई करने वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ की अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने की थी जो 10 नवंबर को सेवानिवृत हो रहे हैं। फैसले का अल्पसंख्यक राजनीति पर भी होगा असर 10 नवंबर तक सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ 15 कार्य दिवस बचे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक फरवरी को फैसला सुरक्षित रखा था। अभी तक आठ महीने से ज्यादा बीत चुके हैं। इस मामले में जो फैसला आएगा वह एएमयू का भविष्य तय करने वाला होगा। इससे तय होगा कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान माना जाएगा या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा उसका अल्पसंख्यक राजनीति पर भी असर होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती इस मामले में एएमयू ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पांच जनवरी 2006 के फैसले को चुनौती दी है। हाई कोर्ट ने उस फैसले में एएमयू में पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रम में मुसलमानों को 50 फीसद आरक्षण रद्द करते हुए कहा था कि एएमयू कभी भी अल्पसंख्यक संस्थान नहीं था, इसलिए पीजी पाठ्यक्रम में मुस्लिम छात्रों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता। हाई कोर्ट ने मुस्लिम छात्रों को दिये जाने वाले आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के अजीज बाशा मामले में 1968 में दिए फैसले को आधार बनाया था, जिसमें कहा गया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। हाईकोर्ट ने अजीज बाशा फैसले के बाद एएमयू कानून में 1981 में संशोधन कर इसे अल्पसंख्यक दर्जा देने के प्रविधानों को भी रद्द कर करते हुए संशोधन को इसलिए गलत ठहराया था कि इससे सुप्रीम कोर्ट का फैसला निष्प्रभावी किया गया है।   बड़ी पीठ के पास विचार के लिए भेजा गया 12 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ को विचार के लिए भेज दिया था। इसके अलावा, 1981 में भी अल्पसंख्यक दर्जे का एक मामला सात न्यायाधीशों को भेजा गया था, उसमें अजीज बाशा फैसले का मुद्दा भी शामिल था। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, संजीव खन्ना, सूर्यकांत, जेबी पार्डीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा की सात सदस्यीय पीठ ने आठ दिनों तक दोनों पक्षों की बहस सुनी। क्या है एएमयू की दलील? एएमयू ने अल्पसंख्यक दर्जे का दावा करते हुए दलील दी थी कि एएमयू की स्थापना मुसलमानों ने की थी। एएमयू ने 1968 के अजीज बाशा फैसले पर भी पुनर्विचार का अनुरोध किया जबकि केंद्र सरकार ने एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे की मांग का विरोध करते हुए कहा था कि न तो एएमयू की स्थापना मुसलमानों द्वारा की गई है और न ही उसका प्रशासन अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित होता है। केंद्र की दलील थी कि एएमयू की स्थापना 1920 में ब्रिटिश कालीन कानून के जरिए हुई थी और उस समय एएमयू ने अपनी मर्जी से अल्पसंख्यक दर्जा छोड़ कर इंपीरियल कानून के जरिए विश्वविद्यालय बनना स्वीकार किया था। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 64

चुनावी बॉन्ड फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना 2018 को असंवैधानिक करार देने वाले संविधान पीठ के फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। समीक्षा याचिकाओं पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि "रिकॉर्ड को देखने पर कोई त्रुटि नजर नहीं आती। इसलिए समीक्षा याचिकाएं खारिज की जाती हैं।" पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया था। पीठ ने कहा था कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों के चंदे का विवरण जानने के अधिकार से वंचित नहीं क‍िया जा सकता। राजनीतिक दलों को म‍िलने वाले चंदे को चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के चंदे से अलग नहीं माना जा सकता। 15 फरवरी के अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को चुनावी बॉन्ड जारी करने पर तुरंत रोक लगाने का आदेश दिया था। साथ ही भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर राजनीतिक दलों का विवरण प्रकाशित करने का आदेश दिया था। जिन्होंने अप्रैल 2019 से चुनावी बॉन्ड के माध्यम से योगदान प्राप्त किया है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की राय से न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा ने भी सहमति जतायी थी। पीठ ने कहा था कि, चुनावी प्रक्रिया में काले धन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से मतदाताओं के सूचना के अधिकार के उल्लंघन को उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा, पीठ ने कहा था कि, चुनावी बॉन्ड योजना चुनावी वित्तपोषण में "काले धन पर अंकुश लगाने का एकमात्र साधन नहीं है" और ऐसे अन्य विकल्प भी हैं जो उद्देश्य को काफी हद तक पूरा करते हैं। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने एक अलग लेकिन सहमति वाला फैसला लिखा। न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, "मैंने भी आनुपातिकता के मानकों को लागू किया है, लेकिन थोड़े अलग बदलावों के साथ। मेरे निष्कर्ष एक जैसे हैं।" समीक्षा याचिकाओं में से एक में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड योजना को “इस बात पर ध्यान दिए बिना रद्द कर दिया कि ऐसा करते हुए वह संसद पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य कर रहा है, तथा ऐसे मामले में अपने विवेक का प्रयोग कर रहा है जो विधायी और कार्यकारी नीति के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है।” हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने पुनर्विचार याचिकाओं के साथ ही इन याचिकाओं को खुली अदालत में सूचीबद्ध करने के आवेदन को भी खारिज कर दिया। इस साल अगस्त में, शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें चुनावी बॉन्ड का उपयोग करके चुनावी चंदे में कथित घोटाले की सेवानिवृत्त शीर्ष अदालत के न्यायाधीश की देखरेख में विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच की मांग की गई थी। सीजेआई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जब तक जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे पर पहले से ही एफआईआर दर्ज नहीं हो जाती, तब तक “क्विड प्रो क्वो” की जांच के लिए एसआईटी का गठन नहीं किया जा सकता है। साथ ही पीठ ने कहा कि कानून के सामान्य तरीके से याचिका में उठाए गए आरोपों का समाधान किया जा सकता है। गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज और सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया था कि, शीर्ष अदालत के निर्देश पर जारी चुनावी बॉन्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि अधिकांश बॉन्ड कॉरपोरेट द्वारा राजनीतिक दलों को सरकारों या प्राधिकारों से अनुबंध, लाइसेंस और पट्टे प्राप्त करने के लिए बदले में दिए गए हैं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 71

SC ने एक अप्रैल 2021 के बाद जारी 90,000 आईटी पुनर्मूल्यांकन नोटिसों की वैधता बरकरार, समझें मामला

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने आयकर विभाग को राहत देते हुए पुराने प्रावधानों के तहत एक अप्रैल 2021 के बाद राजस्व विभाग द्वारा जारी करीब 90,000 पुनर्मूल्यांकन नोटिस की वैधता बरकरार रखी है। शीर्ष अदालत ने  कई उच्च न्यायालयों के फैसलों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि कराधान व अन्य कानून (कुछ प्रावधानों में छूट और संशोधन) अधिनियम (टीओएलए) 2021 आयकर अधिनियम के तहत पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की समय सीमा नहीं बढ़ाएगा। टीओएलए को कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान आयकर अनुपालन की समय सीमा बढ़ाने के लिए लाया गया था। प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने तीन संसदीय कानूनों आयकर अधिनियम, टीओएलए और वित्त अधिनियम के परस्पर प्रभाव से संबंधित दो कानूनी प्रश्नों पर विचार किया। शीर्ष अदालत ने इस सवालों पर गौर किया, ‘‘क्या टीओएलए तथा इसके तहत जारी अधिसूचनाएं एक अप्रैल 2021 के बाद जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन नोटिस पर भी लागू होंगी और क्या जुलाई तथा सितंबर 2022 के बीच नई व्यवस्था की धारा 148 के तहत जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन नोटिस वैध हैं।’’ प्रधान न्यायाधीश ने 112 पृष्ठों का फैसला लिखते हुए कहा, ‘‘हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एक अप्रैल 2021 के बाद आयकर अधिनियम को प्रतिस्थापित प्रावधानों के साथ पढ़ा जाना चाहिए और यदि आयकर अधिनियम के प्रतिस्थापित प्रावधानों के तहत निर्दिष्ट कोई कार्रवाई या कार्यवाही 20 मार्च 2020 तथा 31 मार्च 2021 के बीच पूरी होनी है… तो टीओएलए एक अप्रैल 2021 के बाद भी आयकर अधिनियम पर लागू होता रहेगा।’’ पीठ ने कहा कि टीओएलए का प्रावधान ‘‘ आयकर अधिनियम की धारा 149 को केवल आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की समय सीमा में छूट देने तक ही सीमित है।’’ पुनर्मूल्यांकन नोटिस को चुनौती देते हुए विभिन्न उच्च न्यायालयों में 9,000 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं और करदाताओं के पक्ष में कई फैसले पारित किए गए। इसके बाद ही राजस्व विभाग को सर्वोच्च न्यायालय का रुख करना पड़ा था। केंद्र ने मार्च 2020 में कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रसार को रोकने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी और टीओएलए लेकर आया था। 2021 के इस अधिनियम ने पूर्वव्यापी प्रभाव से ‘‘ निर्दिष्ट अधिनियमों के तहत कार्यों को पूरा करने या अनुपालन करने’’ की समय सीमा 20 जून 2020 तक बढ़ा दी। इसके बाद 24 जून 2020 को केंद्र ने टीओएलए के तहत एक अधिसूचना जारी की जिसमें निर्दिष्ट अधिनियमों के तहत कार्रवाई को पूरा करने या अनुपालन करने की समय सीमा 31 मार्च 2021 तक बढ़ा दी गई। शीर्ष अदालत ने आयकर विभाग की अपील स्वीकार कर ली। आयकर विभाग द्वारा जारी किए गए पुनर्मूल्यांकन नोटिस 2013-14 से 2017-18 तक के कर निर्धारण वर्षों से संबंधित हैं। इसमें शामिल राशि हजारों करोड़ रुपये तक हो सकती है। पीठ को यह निर्धारित करना था कि क्या वैश्विक महामारी के दौरान विशिष्ट अधिनियमों के तहत समय सीमा में छूट देने वाले टीओएलए का लाभ पुनर्मूल्यांकन के लिए समय सीमा को नियंत्रित करेगा। बंबई, गुजरात और इलाहाबाद उच्च न्यायालयों ने विभिन्न आधारों पर सभी पुनर्मूल्यांकन नोटिस रद्द कर दिए थे। उनका मुख्य तर्क यह था कि नए प्रावधान अधिक लाभकारी थे और करदाताओं के अधिकारों तथा हितों की रक्षा के लिए थे। इन उच्च न्यायालयों ने कहा था कि टीओएलए पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की समय सीमा नहीं बढ़ाएगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि एक अप्रैल 2021 के बाद आयकर अधिनियम के प्रतिस्थापित प्रावधान पूर्वव्यापी रूप से लागू होंगे, यहां तक कि पिछले मूल्यांकन वर्षों के लिए भी.. परिणामस्वरूप नई पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था को टीओएलए के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जिसने वैश्विक महामारी के कारण अस्थायी रूप से समय सीमा बढ़ा दी थी। वैश्विक महामारी से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए आयकर विभाग को 20 मार्च 2020 और 31 मार्च 2021 के बीच जारी किए गए नोटिस के लिए विस्तारित समय सीमा का लाभ उठाने की अनुमति दी गई। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि टीओएलए पुरानी पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था के संचालन को संशोधित धारा 149 में निर्दिष्ट समय-सीमा से आगे नहीं बढ़ा सकता। आयकर अधिनियम की धारा 149 करदाताओं को आयकर नोटिस जारी करने की समय-सीमा से संबंधित है। इसके तहत ‘‘ संबंधित कर समीक्षाधीन वर्ष के लिए धारा 148 के तहत कोई नोटिस जारी नहीं किया जाएगा।’’     Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 66

सुप्रीम कोर्ट ने SC और ST को मिलने वाले आरक्षण में उप-वर्गीकरण के अपने फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति को मिलने वाले आरक्षण में उप-वर्गीकरण के अपने फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने 1 अगस्त को ही इस संबंध में फैसला दिया था और कहा था कि यदि राज्य सरकारों को जरूरी लगता है कि एससी और एसटी कोटे के भीतर ही कुछ जातियों के लिए सब-कोटा तय किया जा सकता है। इसका एक वर्ग ने विरोध किया था और आंदोलन भी हुआ था। इसके अलावा याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इन पर ही शुक्रवार को सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने विचार करने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 7 जजों की बेंच ने कहा कि उस फैसले में ऐसी कोई त्रुटि नहीं थी, जिस पर पुनर्विचार किया जाए। अदालत ने कहा, 'हमने पुनर्विचार याचिकाओं को देखा है। ऐसा लगता है कि पुराने फैसले में ऐसी कोई खामी नहीं है, जिस पर फिर से विचार किया जाए। इसलिए पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज किया जाता है।' जस्टिस बीआर गवई, विक्रम नाथ, बेला एम. त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा इस बेंच में शामिल थे। अदालत ने कहा कि याचिकाओं में कोई ठोस आधार नहीं दिया गया कि आखिर क्यों 1 अगस्त के फैसले पर कोर्ट को पुनर्विचार करना चाहिए। इन याचिकाओं पर अदालत ने 24 सितंबर को ही सुनवाई की थी, लेकिन फैसला आज के लिए सुरक्षित रख लिया था। इन याचिकाओं को संविधान बचाओ ट्रस्ट, आंबेडकर ग्लोबल मिशन, ऑल इंडिया एससी-एसटी रेलवे एम्प्लॉयी एसोसिएशन समेत कई संस्थाओं की ओर से दायर किया गया था। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 1 अगस्त को ही 6-1 के बहुमत से फैसला दिया था। इसमें राज्य सरकारों को एससी और एसटी कोटे के सब-क्लासिफिकेशन की मंजूरी दी गई थी। इसके तहत कहा गया था कि यदि इन वर्गों में किसी खास जाति को अलग से आरक्षण दिए जाने की जरूरत पड़ती है तो इस कोटे के तहत ही उसके लिए प्रावधान किया जाता है। अदालत के इस फैसले को दलितों और आदिवासियों के एक वर्ग ने आरक्षण विरोधी करार दिया था। वहीं एक वर्ग इसके समर्थन में भी आया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि दलितों में भी कई जातियां और इस वर्ग को समरूप नहीं माना जा सकता। इसलिए आरक्षण के लिए यदि किसी जाति को खास प्रावधान देने की जरूरत पड़ती है तो वह भी करना चाहिए। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 74

वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया गया, मैरिटल रेप अपराध नहीं: केंद्र सरकार

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया गया है। केंद्र ने कहा कि यौन संबंध पति-पत्नी के बीच संबंधों के कई पहलुओं में से एक है, जिस पर उनके विवाह की नींव टिकी होती है। ये मुद्दा कानूनी से अधिक सामाजिक केंद्र सरकार ने जोर देकर कहा कि यह मुद्दा कानूनी से अधिक सामाजिक है। इसका समाज पर सीधा असर पड़ता है। इसके साथ ही केंद्र ने यह तर्क भी दिया कि अगर 'वैवाहिक बलात्कार' को भी अपराध घोषित किया जाता है, तो ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। संबंध को साबित करना चुनौतीपूर्ण केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि तेजी से बढ़ते और लगातार बदलते सामाजिक एवं पारिवारिक ढांचे में संशोधित प्रावधानों के दुरुपयोग से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि किसी व्यक्ति के लिए यह साबित करना मुश्किल और चुनौतीपूर्ण होगा कि संबंध के लिए सहमति थी या नहीं। बलात्कार विरोधी कानून शादी में जीवनसाथी से उचित यौन संबंध की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन ऐसी अपेक्षाएं पति को अपनी पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं देती हैं। केंद्र ने कहा कि बलात्कार विरोधी कानूनों के तहत किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए दंडित करना असंगत हो सकता है। क्रूरता पर दंडात्मक कानून संसद ने पहले ही विवाहित महिला की सहमति को सुरक्षित रखने के लिए उपाय प्रदान किए हैं। केंद्र ने कहा कि इन उपायों में विवाहित महिलाओं के साथ क्रूरता करने पर दंडात्मक कानून शामिल हैं। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 कानून है, जो विवाहित महिलाओं की मदद कर सकता है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 65

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हत्या, रेप और आतंक के केस के आधार पर भी दोषी की किसी संपत्ति को तोड़ा जा नहीं सकती

नई दिल्ली देशभर में चल रहे बुलडोजर एक्शन के खिलाफ दाखिल जमीयत उलेमा ए हिंद की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है. इस मामले की सुनवाई जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस के वी विश्वनाथन की बेंच कर रही है. पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई  पर रोक लगाते हुए कहा था कि सिर्फ सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण को हटाने की ही छूट होगी. इस मामले में यूपी, एमपी और राजस्थान की ओर से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता पेश हुए. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई में पूछा कि क्या दोषी करार देने पर भी किसी की संपत्ति तोड़ी जा सकती है? जिस पर एसजी तुषार ने कहा कि नहीं, यहां तक कि हत्या, रेप और आतंक के केस के आधार पर भी नहीं. मेरे कुछ सुझाव हैं, नोटिस को रजिस्टर्ड एडी से भेजा जाए. हम सबके लिए गाइडलाइन जारी करेंगे सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं, हम सब नागरिकों के लिए गाइडलाइन जारी करेंगे. अवैध निर्माण हिंदू, मुस्लिम कोई भी कर सकता है. हमारे निर्देश सभी के लिए होंगे, चाहे वे किसी भी धर्म या समुदाय के हों. बेशक, अतिक्रमण के लिए हमने कहा है कि अगर यह सार्वजनिक सड़क या फुटपाथ या जल निकाय या रेलवे लाइन क्षेत्र पर है, तो हमने स्पष्ट कर दिया है. अगर सड़क के बीच में कोई धार्मिक संरचना है, चाहे वह गुरुद्वारा हो या दरगाह या मंदिर, यह सार्वजनिक बाधा नहीं बन सकती. जस्टिस गवई ने कहा कि चाहे मंदिर हो, दरगाह हो,  उसे जाना ही होगा क्योंकि ⁠सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने हाल ही में यूपी, मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुई घटनाओं का हवाला देते हुए बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस याचिका में जमीयत ने अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया है। याचिका में सरकार को आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलाने से रोकने की मांग की गई है. जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि यदि  2 संरचनाओं में उल्लंघन हुआ है और केवल 1 के खिलाफ कार्रवाई की जाती है और आप पाते हैं कि पृष्ठभूमि में कोई अपराध है. यह समझौता करने योग्य या गैर समझौता करने योग्य अपराध हो सकता है. यदि आप शुरू में किसी व्यक्ति की जांच कर रहे हैं और आपको जल्द ही उसका आपराधिक इतिहास पता चलता है तो? दो गलतियां एक सही नहीं बनाती हैं. इस बारे में हमारी सहायता करें. न्यायिक निगरानी होनी चाहिए जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि इसके लिए कुछ समाधान तो खोजना ही होगा, कुछ न्यायिक निगरानी होनी चाहिए. एसजी तुषार मेहता ने कहा कि मैं यूपी, एमपी, राजस्थान की ओर से पेश हुआ हूं. हमने पहले भी कहा है. हमने यूपी मामले में पहले ही हलफनामा दाखिल कर दिया था कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है, किसी संपत्ति को गिराने का आधार नहीं हो सकता. नगर निगम कानून, नगर नियोजन नियमों का उल्लंघन होना चाहिए. साथ ही कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए. नोटिस जारी किए जाने चाहिए, पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए. हम यह स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है या यहां तक ​​कि बलात्कार, हत्या या आतंकवाद में भी दोषी है, उसे गिराने का आधार नहीं माना जा सकता. कानून किसी खास धर्म के लिए नहीं… इस मामले में जो भी नियम बनाए जाएं, उन्हें पूरे भारत में लागू किया जाना चाहिए. ⁠जब ​​याचिकाकर्ता कहते हैं कि चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया जा रहा है. मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है, तो इसमें कुछ संवेदनशीलताएं शामिल हैं. अदालत को आरोपों से बाहर आना चाहिए और तय करना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत. जस्टिस गवई ने कहा कि हम सभी के लिए कानून बनाएंगे, किसी खास धर्म के लिए नहीं. अवैध निर्माणों को सभी धर्मों से अलग किया जाना चाहिए. नोटिस की सही सर्विस होनी चाहिए, पंजीकृत ए.डी. के माध्यम से नोटिस हो. नोटिस चिपकाने की यह प्रक्रिया चले, डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए. इससे अधिकारी भी सुरक्षित रहेंगे, हमारे पास भारत से पर्याप्त विशेषज्ञ है. एसजी ने कहा कि ऐसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बुलडोजर मामले बहुत कम होंगे, ये मामले दो फीसदी होंगे. लेकिन बिल्डरों से जुड़े इस तरह के मामले बहुत हैं. जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि जब तक नगर निगम के अधिकारी इन पर फैसला नहीं ले लेते, तब तक कोई अर्ध न्यायिक निगरानी भी नहीं है. ये मामला दो फीसदी का नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि साढ़े चार लाख मामले तोड़फोड़ के हैं. हिंदू-मुस्लिम की बात क्यों आती है? सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि हिंदू-मुस्लिम की बात क्यो आती है. वे हमेशा अदालत में जा सकते हैं  इसमें भेदभाव कहां है. जस्टिस विश्वनाथ ने कहा कि इसके लिए कुछ समाधान खोजना होगा. जैसे न्यायिक निरीक्षण किया जाए. इसपर SG ने कहा कोर्ट मीडिया में प्रचारित कुछ घटनाओं को छोड़कर इसके लिए एक सामान्य कानून बनाए जाने पर विचार करें. तुषार मेहता ने कहा कि मैं यूपी, एमपी, राजस्थान  की ओर से पेश हुआ हूं. हमने पहले भी कहा है, हमने यूपी मामले में पहले ही हलफनामा दाखिल कर दिया था कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है, किसी संपत्ति को गिराने का आधार नहीं हो सकता. ⁠नगर निगम कानून, नगर नियोजन नियमों का उल्लंघन होना चाहिए. ⁠साथ ही कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए. ⁠नोटिस जारी किए जाने चाहिए. ⁠पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए. ⁠हम यह स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपी है या यहां तक ​​कि बलात्कार, हत्या या आतंकवाद में भी दोषी है, उसे गिराने का आधार नहीं माना जा सकता. तुषार मेहता ने आगे कहा कि⁠ जो भी नियम बनाए जाएं, उन्हें पूरे भारत में लागू किया जाना चाहिए. ⁠जब ​​याचिकाकर्ता कहते हैं कि चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया जा रहा है. ⁠मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है, तो इसमें कुछ संवेदनशीलताएं शामिल हैं. ⁠अदालत को आरोपों से बाहर आना चाहिए.⁠ तय करना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत.  ⁠जस्टिस गवई ने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं. ⁠हम सभी के … Read more

खनिज कंपनियों और केंद्र को ‘सुप्रीम’ झटका, नौ जजों की बेंच ने कहा- खनिज संपदा पर टैक्स पहली अप्रैल, 2005 से लागू होगा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने केंद्र और खनिज कंपनियों को बड़ा झटका दिया है। संविधान बेंच ने कहा है कि खनिज संपदा पर टैक्स 1 अप्रैल, 2005 से लागू होगा। संविधान बेंच ने कहा कि 1 अप्रैल, 2005 से कोई ब्याज या जुर्माना नहीं लगेगा। राज्य सरकारें 12 साल की अवधि में टैक्स ले सकेंगी। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह आदेश सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई को इस सवाल पर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने इस बात का विरोध किया था कि राज्य सरकारें खनिज संपदा पर केंद्र की ओर से लगाए गए रॉयल्टी का रिफंड मांग सकती हैं। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि अगर टैक्स का रिफंड मांगा जाएगा तो इसके बहुआयामी प्रभाव होंगे। मेहता ने कहा था कि मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकार का कहना है कि इस फैसले को आगे से लागू किया जाए। सुनवाई के दौरान विपक्ष शासित प्रदेशों ने मांग की थी कि इस आदेश को पूर्ववर्ती प्रभाव से लागू किया जाए ताकि वे केंद्र से रिफंड मांग सकें। इस दौरान खनन गतिविधियों जुड़ी कंपनियों और फर्मों ने केंद्र के रुख का समर्थन किया था। 25 जुलाई को नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने 8:1 के बहुमत से फैसला सुनाया था कि राज्य सरकारों को खनिज संपदा पर टैक्स लगाने का अधिकार है । राज्यों के इस अधिकार को केंद्रीय कानून माइंस एंड मिनिरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ समेत आठ जजों ने ये फैसला दिया था, जबकि जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इस फैसले के उलट फैसला दिया था। इस मामले की शुरुआत इंडिया सीमेंट्स लिमिटेड और तमिलनाडु सरकार के बीच विवाद से हुई थी। इंडिया सीमेंट्स खनन लीज लेने के बाद तमिलनाडु सरकार को रॉयल्टी दे रही थी। तमिलनाडु सरकार ने इस रॉयल्टी के अलावा इंडिया सीमेंट्स पर एक और सेस लगा दिया। इसके बाद इंडिया सीमेंट्स ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इंडिया सीमेंट्स का कहना था कि रॉयल्टी पर सेस लगाना रॉयल्टी पर टैक्स लगाना है जो कि राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। तमिलनाडु सरकार का कहना था कि सेस भू-राजस्व के तहत है और ये खनिज संपदा के अधिकार की बात है जो राज्य सरकार लगा सकती है। सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने 1989 में इंडिया सीमेंट्स के पक्ष में फैसला दिया। सात जजों की बेंच ने कहा था कि खनिज संपदा वाली जमीन पर टैक्स लगाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। इस बेंच ने कहा था कि राज्य सरकार रॉयल्टी लगा सकती है लेकिन उस पर टैक्स नहीं लगा सकती है। नौ सदस्यीय संविधान बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस ह्रषिकेश राय, जस्टिस एएस ओका, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस उज्जल भुईंया, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एजी मसीह शामिल रहे।     Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 80

सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को मऊ से विधायक अब्बास अंसारी की विशेष अनुमति याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी की जमानत याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। कोर्ट ने अब्बास की जमानत याचिका पर ईडी को नोटिस भी जारी किया है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और संदीप मेहता की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को नोटिस जारी करते हुए उत्तर प्रदेश के मऊ से विधायक अब्बास अंसारी की विशेष अनुमति याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा है। इससे पहले, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 9 मई के अपने आदेश में अब्बास की जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। हालांकि, उसने निचली अदालत को निर्देश दिया था कि वह जल्द से जल्द सुनवाई पूरी करे। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जसप्रीत सिंह की पीठ ने कहा था, “यह अदालत पीएमएलए की धारा 45 के संदर्भ में पहली नजर में यह संतुष्टि देने में असमर्थ है कि आवेदक दोषी नहीं है या फिर वह जमानत पर रहते समय कोई अपराध नहीं कर सकता।” कोर्ट ने अब्बास अंसारी के खिलाफ मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पेश किए गए मनी ट्रेल का भी संज्ञान लिया। बयान में कहा गया है कि मनी ट्रेल अंसारी को दो कंपनियों- मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शन और मेसर्स आगाज से धन के लेनदेन से जोड़ता है। ईडी का आरोप है कि अंसारी ने इन कंपनियों का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया था। ईडी ने धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत तीन अलग-अलग एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की है। पहले आपराधिक मामले में, यह आरोप लगाया गया था कि एक निर्माण कंपनी के भागीदारों ने रिकॉर्ड में हेराफेरी कर सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण किया था। वहीं, दूसरी एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि मुख्तार अंसारी ने एक स्कूल बनाने के लिए विधायक कोष से धन लिया था। लेकिन, कोई स्कूल नहीं बनाया गया और जमीन का इस्तेमाल कृषि के लिए किया गया। तीसरी एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि अंसारी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सरकारी जमीन हड़प ली और एक अवैध मकान बना लिया। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 78

सुप्रीम कोर्ट शंभू बॉर्डर पर किसानों के चक्का जाम पर सख्त, कहा- हाईवे ट्रैक्टरों की पार्किंग के लिए नहीं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट शंभू बॉर्ड  को आंशिक रूप से खोले जाने को लेकर गंभीर हो गया है। अदालत ने आदेश दिया की इसे जल्द खोला जाए। इसके लिए पंजाब और हरियाणा के डीजीपी को एक सप्ताह के भीतर बैठक करने और समाधान निकालने को कहा है। दरअसल, किसान एमएसपी को लेकर पिछले कई सालों से आंदोलन पर हैं। केंद्र सरकार से कई राउंड की उनकी वार्ता भी हो चुकी है, मगर समाधान नहीं निकल सका। इस साल फरवरी में एक बार फिर किसानों ने दिल्ली की ओर रुख किया तो उन्हें रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने शंभू बॉर्डर पर बैरिकेड लगा दिए। तब से किसान वहीं बैठे हैं। । इसके अलावा एम्बुलेंस, आवश्यक सेवाओं और स्थानीय यात्रियों की आवाजाही के लिए शंभू बॉर्डर पर सड़क को आंशिक रूप से खोलने की आवश्यकता है। अदालत ने पंजाब सरकार से यह भी कहा है कि वह किसानों से बात करे और उन्हें शंभू बॉर्डर से ट्रैक्टरों को हटाने के लिए राजी करे। बेंच ने पंजाब सरकार से प्रदर्शनकारी किसानों को शंभू बॉर्डर पर सड़क से ट्रैक्टर हटाने के लिए समझाने को कहा। न्यायालय ने कहा कि राजमार्ग वाहन पार्किंग के लिए नहीं हैं। इस तरह शीर्ष अदालत ने प्रदर्शनकारी किसानों पर भी तीखी टिप्पणी की, जो कई महीने से ट्रैक्टरों को लेकर शंभू बॉर्डर पर डटे हैं। अदालत ने शंभू बॉर्डर पर सड़कों को आंशिक रूप से फिर से खोलने के लिए पंजाब, हरियाणा के पुलिस महानिदेशकों से एक सप्ताह में पड़ोसी जिलों के पुलिस अधीक्षकों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया। बेंच ने इस दौरान शंभू बॉर्डर पर प्रदर्शनकारी किसानों से बातचीत करने के वास्ते प्रस्तावित समिति के लिए गैर-राजनीतिक नाम सुझाने के लिए पंजाब, हरियाणा सरकारों की सराहना की। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह शंभू बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों से बातचीत करने के लिए गठित की जाने वाली समिति की शर्तों पर संक्षिप्त आदेश पारित करेगा।  यात्रियों के लिए एक-एक लेन खोली जा सकती सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हुई सुनवाई में कहा कि शंभू बॉर्डर पर यात्रियों के लिए एक-एक लेन खोली जा सकती है। अदालत ने पंजाब और हरियाणा के डीजीपी को पटियाला और अंबाला जिलों के पुलिस अधीक्षकों के साथ एक सप्ताह के भीतर बैठक करने को कहा है। इसके अलावा, कोर्ट ने पंजाब सरकार से कहा कि वह किसानों को सड़क से ट्रैक्टर हटाने के लिए राजी करे। पंजाब और हरियाणा सरकार की सराहना न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने एक समिति गठित करने के लिए गैर-राजनीतिक नाम सुझाने के लिए पंजाब और हरियाणा सरकार की सराहना की, जो प्रदर्शनकारी किसानों के साथ बैठक करेगी। कोर्ट ने कहा कि एम्बुलेंस, आवश्यक सेवाओं और स्थानीय यात्रियों की आवाजाही के लिए शंभू बॉर्डर पर सड़क को आंशिक रूप से खोलने की आवश्यकता है। उच्चतम न्यायालय ने पंजाब सरकार से प्रदर्शनकारी किसानों को शंभू बॉर्डर पर सड़क से ट्रैक्टर हटाने के लिए समझाने को कहा। न्यायालय ने कहा कि राजमार्ग वाहन पार्किंग के लिए नहीं हैं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 99

सांसदों ने एसटी/एससी के लिए क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संबंध में संयुक्त रूप से एक ज्ञापन सौंपा

नई दिल्ली / हरिद्वार एसटी/एससी समुदाय से जुड़े करीब 100 भाजपा सांसदों ने  शुक्रवार को संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान सांसदों ने एसटी/एससी के लिए क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संबंध में संयुक्त रूप से एक ज्ञापन सौंपा और मांग की कि इस फैसले को एसटी/एससी समाज में नहीं लागू किया जाना चाहिए। सांसदों के मुताबिक पीएम मोदी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह इस मामले को देखेंगे। पीएम मोदी से मुलाकात के बाद भाजपा राज्यसभा सांसद  एवं गुरु रविदास विश्व महापीठ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो.सिकंदर कुमार ने बताया कि  प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि सरकार सांसदों के पक्ष में काम करेगी। दोनों सदनों के करीब 100 सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज पीएम मोदी से मुलाकात कर अपनी मांगे रखीं। गुरु रविदास विश्व महापीठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविदास आचार्य एवं उत्तराखंड के पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ और महापीठ के संगठन महामंत्री सूरज भान कटारिया ने स्पष्ट कहा है की एससी/एसटी से क्रीमी लेयर (पहचानने) (और आरक्षण लाभ से उन्हें बाहर करने) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया जाना चाहिए। इससे पहले केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर असहमति जताई थी और कहा कि लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) इस फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करेगी। बता दें कि 1 अगस्त को एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यों के पास एससी और एसटी में उप-वर्गीकृत करने का अधिकार होगा। इसके साथ ही संबंधित प्राधिकरण को यह सुनिश्चत करना होगा कि क्या उस वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है, मात्रात्मक प्रतिनिधित्व के बजाय प्रभावी प्रतिनिधित्व के आधार पर पर्याप्तता की गणना करनी चाहिए।  हालांकि देशभर के कई संगठनों ने 21 अगस्त को बंद का आह्वान भी किया है। क्या था मामला … सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण के लिए राज्यों को दी थी अनुमति गौरतलब है कि 1 अगस्त को शीर्ष अदालत ने 6:1 के बहुमत से फैसला सुनाया कि एससी और एसटी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति है। यह फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली सात जजों की बेंच ने सुनाया, जिसने ईवी चिन्नैया मामले में पहले के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उप-वर्गीकरण की अनुमति नहीं है क्योंकि एससी/एसटी समरूप (होमोजेनस) वर्ग बनाते हैं। सीजेआई चंद्रचूड़ के अलावा बेंच में जस्टिस बीआर गवई, विक्रम नाथ, बेला एम त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे। सुनवाई के दौरान जस्टिस बीआर गवई ने सुझाव दिया था कि राज्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में से भी क्रीमी लेयर की पहचान करने के लिए एक नीति विकसित करें। हालांकि जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दिए जाने के पक्ष में असहमति जताई। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 74

आज SC में CJI करेंगे आमिर खान का स्‍वागत! जजों के साथ देखेंगे बॉलीवुड स्‍टार की ये मूवी, वजह बेहद खास

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में आज एक खास इनीशिएटिव के तहत ‘लापता लेडीज’ फिल्म दिखाई जाएगी। यह फिल्म जजों, उनके परिवार के सदस्यों और रजिस्ट्री अधिकारियों के लिए यह फिल्म दिखायी जाएगी। समीक्षकों ने इस फिल्म की काफी प्रशंसा की है और यह लैंगिक समानता के विषय पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक अनुभाग द्वारा जारी संदेश के अनुसार, प्रसिद्ध अभिनेता एवं निर्माता आमिर खान के अलावा फिल्म की निर्देशक किरण राव भी स्क्रीनिंग के दौरान उपस्थित रहेंगी। फिल्म देखने का यह आइडिया जस्टिस चंद्रचूड़ की पत्नी कल्पना दास का था। उन्होंने अपने स्टाफ के साथ यह फिल्म देखी थी। सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक अनुभाग द्वारा जारी संदेश में कहा गया है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 75वें वर्ष के दौरान आयोजित गतिविधियों के तहत लैंगिक समानता के विषय पर आधारित फिल्म 'लापता लेडीज' शुक्रवार, नौ अगस्त 2024 को प्रशासनिक भवन परिसर के सी-ब्लॉक स्थित सभागार में प्रदर्शित की जाएगी। तय कार्यक्रम के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश अपने परिवार के लोगों के साथ फिल्म देखने पहुंचेंगे। फिल्म अपराह्न सवा चार बजे से शाम छह बजकर 20 मिनट तक दिखाई जाएगी। जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि यह सुप्रीम कोर्ट के स्टाफ को सेंसिटाइज करने की मेरी कोशिश है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है, जिसकी बहुत ज्यादा पब्लिसिटी नहीं हो रही है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट स्टाफ मेंबर्स के लिए आयुर्वेदिक क्लीनिक चलाई जा रही है। यहां पर 24 घंटे सुप्रीम कोर्ट स्टाफ मेंबर्स का इलाज किया जाता है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 83

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आरक्षण का लाभ सिर्फ पहली पीढ़ी तक ही सीमित होना चाहिए, ए राजा ने टिप्पणी की आलोचना की

नई दिल्ली लोकसभा में डीएमके सांसद ए राजा ने मंगलवार को सरकार से दलित आरक्षण को बचाने का अनुरोध किया है। उन्होंने केंद्र सरकार से कहा है कि वह दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाएं। ए राजा ने हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी की आलोचना की है जिसमें कोर्ट ने कहा है कि आरक्षण का लाभ सिर्फ पहली पीढ़ी तक ही सीमित होना चाहिए। इस फैसले पर असहमति जताते हुए ए राजा ने लोकसभा में एक सत्र के दौरान कहा, “दलित लोगों में आशंका है कि सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से उनके अधिकार छीन जायेंगे। उन्होंने आगे हरियाणा की एक घटना का उदाहरण देते हुए कहा, “हरियाणा में एक आईपीएस अधिकारी को भी अपनी शादी में घोड़े पर बैठने की अनुमति नहीं थी।” हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है कि राज्य सरकार एससी और एसटी कोटे में उपवर्गीकरण करने का अधिकार है। भारत के मुख्य न्यायधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड सहित 7 जजों की पीठ ने यह भी कहा कि एससी एसटी के कोटे में भी क्रीमी लेयर की पहचान कर उन्हें आरक्षण के दायरे से हटाने की जरूरत है। उपवर्गीकरण की इजाजत देकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के लिए एससी/एसटी श्रेणियों के अंदर सबसे वंचित समूहों की पहचान करने और उन्हें लक्षित लाभ प्रदान करने का रास्ता खोल दिया है। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 96

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 2006 एनकाउंटर मामले में उनकी भूमिका अब भी संदेह में है, आप चुनाव नहीं लड़ सकते

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पुलिस के पूर्व एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा को चुनाव लड़ने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2006 एनकाउंटर मामले में उनकी भूमिका अब भी संदेह में है। ऐसे में उन्हें आरोप मुक्त नहीं किया जा सकता है। जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा, आपकी अभी वह स्थिति नहीं है कि संदेह की स्थिति में फायदा दिया जाए। पर्याप्त ऐसे सबूत हैं जो कि आपके खिलाफ संदेह पैदा करते हैं। इसके अलावा आप जमानत पर हैं। सीनियर वकील मुकल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा शर्मा की तरफ से कोर्ट में पेश हुए थे। उन्होंने कहा कि पहली बार नहीं है जब वह चुनाव लड़ने की इजाजत मांग रहे हैं। रोहतगी ने कहा, याचिकाकर्ता एक एनजीओ भी चलाते हैं और एक रिटायर्ड पुलिस अधइकारी हैं। ऐसे में इन तथ्यों पर ध्यान देते हुए उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाए। 1k लोगों ने हिस्सा लिया बेंच ने कहा, आपको बहुत-बहुत शुभकामना। लेकिन ये जमानत पर बाहर रहकर चुनाव नहीं लड़ सकते। इसके बाद बेंच ने रोहतगी को ऐप्लिकेशन वापस लेने की अनुमति दे दी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 19 मार्च को सुनाए फैसले में उन्हें राम नारायण गुप्ता उर्फ लखन भैया की हत्या का दोषी ठहराया था। आरोप था कि वह छोटा राजन गैंग से था। उसका 2006 में प्रदीप शर्मा ने ही एनकाउंटर किया था। इसके बाद इसी साल प्रदीप शर्मा ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सबसे पहले ट्रायल कोर्ट ने शर्मा को बरी किया था लेकिन हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटकर उन्हें दोषी ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने शर्मा को जमानत देते हुए एक सप्ताह में ही सरेंडर करने का आदेश दिया था। वहीं ट्रायल कोर्ट को भी निर्देश दिए थे कि स्थितियां देखकर ही उन्हें जमानत दी जाए। शर्मा ने अपनी यचिका में सीआरपीसी की धारा 389 का जिक्र किया था जिसके तहत कोर्ट किसी दोषी व्यक्ति को भी जमानत दे सकता है या फिर सजा रद्द कर सकता है। 2010 में प्रदीप शर्मा को गिरफ्तार किया गया था। पाया गया था कि मृत व्यक्ति के शरीर में जो गोली मिली थी वह शर्मा के ही सर्विस रिवॉल्वर की थी। 2013 में ट्रायल कोर्ट ने शर्मा को बरी कर दिया। इसे बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। इस मामले में शर्मा के साथ 6 अन्य पुलिसवालों को भी दोषी करार दिय गया था। इसके अलावा प्रदीप शर्मा अन्य मामलों में भी आरोपी हैं। इसमें एंटीलिया बम धमकी केस भी शामिल है।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 106

‘डेथ चैंबर्स हैं दिल्ली के कोचिंग संस्थान’, राजेंद्र नगर हादसे पर SC की सख्त टिप्पणी

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके में एक निजी कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में गत 27 जुलाई को पानी में डूबकर तीन विद्यार्थियों की मौत मामले में सोमवार को स्वत: संज्ञान और नोटिस जारी किया।न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर उनसे सुरक्षा मानदंडों पर जवाब मांगा। पीठ ने उनसे पूछा है कि सभी कोचिंग सेंटरों में किस तरह के पर्याप्त सुरक्षा मानदंडों का पालन किया जा रहा। शीर्ष अदालत ने दिल्ली में तीन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अभ्यर्थियों की दुखद मौत का हवाला देते हुए कोचिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा दायर एक अन्य याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को (बेसमेंट में हुई) घटना के बाद अग्निशमन विभाग से वैध अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के बिना राज्य में चल रहे कोचिंग सेंटरों को बंद करने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने दो अगस्त को घटना की जांच दिल्ली पुलिस से लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी थी। एक निजी कोचिंग सेंटर के के बेसमेंट में 27 जुलाई को अचानक बारिश का पानी घुसने के बाद वहां तीन विद्यार्थियों की डूबकर मृत्यु हो गई थी। इस घटना के बाद दिल्ली के राजेंद्र नगर और मुखर्जी नगर क्षेत्र में यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी कर रहे सैकड़ों विद्यार्थी लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 96

बंगाल में 77 जातियों को ओबीसी दर्जे पर SC का बंगाल को नोटिस

नई दिल्ली बंगाल में 77 मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण दिए जाने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। ममता सरकार के फैसले पर हाई कोर्ट ने रोक लगाई थी, जिस पर राज्य ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अब अदालत ने पूछा है कि आखिर राज्य सरकार ने किस आधार पर 77 जातियों को ओबीसी का दर्जा दिया था। इन जातियों में से ज्यादातर मुस्लिम धर्म को मानने वाली हैं। बता दें कि कलकत्ता हाई कोर्ट ने मई में ही इस आरक्षण को अवैध करार दिया था और 77 जातियों को ओबीसी की सूची से बाहर करने का आदेश दिया था। इस केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प बहस भी हुई है। बंगाल सरकार के वकील ने उच्च न्यायालय पर ही तीखा हमला बोल दिया। ओबीसी कोटे को लेकर बनी जातिवार सूची पर उच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणियों पर राज्य सरकार ने ऐतराज जताया। यही नहीं दलीलों के दौरान बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि क्या उच्च न्यायालय ही राज्य को चलाना चाहता है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में सुनवाई की। इस दौरान बंगाल सरकार की वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपनी सीमा से आगे जाकर फैसला दिया है। इसी साल मई में उच्च न्यायालय ने 77 मुस्लिम जातियों को ओबीसी सूची में शामिल करने के फैसले को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक हितों को साधने के लिए एक कमोडिटी के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी पर ऐतराज जताते हुए बंगाल सरकार की वकील ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि आप इसमें दखल दीजिए। बंगाल सरकार ने कहा, 'ऐसा क्यों हो रहा है। इसलिए क्योंकि वे मुस्लिम हैं? वे कहते हैं कि ये धर्म का मामला है। जो पूरी तरह से गलत है। यह कहा जा रहा है कि उन लोगों को इसलिए आरक्षण दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम हैं। हमारे पास रिपोर्ट्स हैं कि सभी समुदायों पर विचार किया गया है। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर काम हुआ है। सरकार राज्य चलाना चाहती है। लेकिन अदालत ऐसा करना चाहती है तो फिर करे। आखिर हम क्या कर सकते हैं। कृपया बताएं।' इन दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने याचिका पर सुनवाई को लेकर सहमति जताई।सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि जातियों की पहचान बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग का जिक्र किए बिना हुई। यह दलील है। ऐक्ट को खारिज करने के गंभीर असर हैं। फिलहाल बंगाल में कोई आरक्षण लागू नहीं हो पा रहा है। यह मुश्किल स्थिति है। इस पर इंदिरा जयसिंह ने कहा कि राज्य में पूरी आरक्षण व्यवस्था ही अटक गई है। दरअसल हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि किस जाति को कौन सा दर्जा देना है, यह आयोग का काम है। राज्य सरकार का नहीं है। आयोग 1993 में बना था और राज्य सरकार की ओर से 2012 में ऐक्ट लाया गया। इसमें बताया गया कि कैसे जाति प्रमाण पत्र मिलेगा और उसका आधार क्या होगा।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 102

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को अलग-अलग समय पर अवकाश दिए जाने की सिफारिशों पर हो विचार- सरकार

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को अलग-अलग समय पर अवकाश दिए जाने की सिफारिशों को विचार के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और 25 उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार के समक्ष भेजा है। शुक्रवार को एक लिखित जवाब में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कानून और कार्मिक संबंधी स्थायी समिति ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढ़ा के सुझाव का उल्लेख किया था कि सभी न्यायाधीशों को एक ही समय पर छुट्टी पर नहीं जाना चाहिए। इसकी बजाय वर्ष जजों को वर्ष के अलग-अलग समय पर अपनी छुट्टी लेनी चाहिए ताकि अदालतें लगातार खुली रहें और वे मामलों की सुनवाई के लिए हमेशा मौजूद रहें। समिति की राय थी कि न्यायालयों की छुट्टियों पर न्यायमूर्ति लोढ़ा के सुझाव पर न्यायपालिका को विचार करना चाहिए। मेघवाल ने सदन को बताया, 'अब सरकार ने इन सिफारिशों को उचित विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और संबंधित उच्च न्यायालयों के सभी रजिस्ट्रार जनरलों को भेज दिया है।' फरवरी में संसद में पेश की गई अपनी कार्रवाई रिपोर्ट मेंदिवंगत सुशील मोदी की अध्यक्षता वाली समिति ने सरकार से कहा था कि वह सर्वोच्च न्यायालय और 25 उच्च न्यायालयों पर दबाव डाले कि वे इस सिफारिश पर जल्द से जल्द अपनी प्रतिक्रिया साझा करें। वे विचार करें कि कैसे लंबित मामलों की बड़ी संख्या देखते हुए न्यायाधीश 'चरणबद्ध' अवकाश पर जा सकते हैं। संसद की स्थायी समिति ने अपनी पिछली सिफारिश में बताया था कि वर्ष के अलग-अलग समय पर अलग-अलग न्यायाधीशों द्वारा चरणबद्ध अवकाश यह सुनिश्चित करेगा कि अदालतें हर साल लगभग दो महीने तक बंद न रहें। गौरतलब है कि गर्मियों और सर्दियों के दिनों में अदालतों में लंबी छुट्टियां होती रही हैं। एक तरफ सर्दियों में क्रिसमस से लेकर नए साल के पहले सप्ताह तक अदालती अवकाश रहता है तो वहीं करीब डेढ़ महीने का ग्रीष्मावकाश रहता है। इसे लेकर चर्चा होती रही है कि आखिर एक साथ अदालतों में इतनी लंबी छुट्टियों का क्या तुक है और इसके चलते नुकसान हो रहा है।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 111

कोर्ट ने कहा कि एनडीपीएस केसेज में गांजा, चरस तक जमानत दे सकती है, लेकिन हेरोइन केस में नहीं

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने हेरोइन रखने की आरोपी महिला को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह एनडीपीएस केसेज में गांजा और चरस तक तो जमानत दे सकती है। लेकिन हेरोइन के मामले में वह ऐसा बिल्कुल भी नहीं करेगी। कोर्ट के इसके पीछे की वजह भी स्पष्ट की और कहा कि यह ऐसा नशा है जो सब खत्म कर देता है। युवा पीढ़ी पूरी तरह से बर्बाद हो जाती है। जस्टिस सीटी रविकुमार और संजय करोल की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि जब भी गांजा या चरस से जुड़े मामले होते हैं तो हम जमानत के पक्षधर होते हैं। लेकिन हेरोइन के मामले में हम ऐसा ऐसा नहीं कर सकते हैं। हमें इसको लेकर सख्त रवैया अपनाना ही होगा। मामला 61 साल की महिला से जुड़ा है, जिसके ऊपर 500 ग्राम हेरोइन रखने का आरोप है। महिला उसी कार में यात्रा कर रही थी, जिसमें प्रतिबंधित पदार्थ पाया गया था। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद यह मामला शीर्ष अदालत तक पहुंचा था। यहां पर महिला आरोपी की तरफ से पेश वकील ने उसकी उम्र का हवाला देते हुए जमानत मांगी थी। इसके साथ ही उन्होंने दलील दी कि महिला के पास से कुछ भी नहीं मिला था। इसके बाद जस्टिस रविकुमार ने वकील को याद दिलाया कि महिला के ऊपर 500 ग्राम हेरोइन लेकर चलने का आरोप है। जस्टिस करोल ने आगे कहा कि हेरोइन सबकुछ तबाह कर देती है। उन्होंने कहा कि यह युवा पीढ़ी को पूरी तरह से खत्म कर देती है। हम इस मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। महिला की तरफ से एडवोकेट श्रेय कपूर सुप्रीम कोर्ट में दलील रख रहे थे।   Pushpendra“माय सीक्रेट न्यूज़” यह एक ऑनलाइन वेबसाइट है, जो आपको देश – दुनिया और आपके आसपास की हर छोटी-बड़ी खबरों को आप तक पहुंचाती है। इस वेबसाइट का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र जी कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारिता में BJC (बेचलर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) और MJC (मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री 2011 में हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मप्र से हासिल की है। उन्होंने भोपाल के स्वदेश, राज एक्सप्रेस, राष्ट्रीय हिंदी मेल, सांध्य प्रकाश, नवदुनिया और हरिभूमि जैसे बड़े समाचार पत्र समूहों में काम किया है।  और पढ़ें इस वेबसाइट का संचालन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से हो रहा है, जहाँ से प्रदेश की राजनीति से लेकर विकास की योजनाएं तैयार होती हैं।दे श व प्रदेश जिले की ताजा अपडेट्स व राजनीतिक प्रशासनिक खबरों के लिए पढ़ते रहिए हमारी वेबसाइट (my secret news. Com )👈 ✍️ पुष्पेन्द्र , (वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल, मप्र  mysecretnews.com recent visitors 154