मध्यप्रदेश : जनता परेशान और जनप्रतिनिधि मालामाल – लोकतंत्र का बदलता चेहरा

मध्यप्रदेश : जनता परेशान और जनप्रतिनिधि मालामाल – लोकतंत्र का बदलता चेहरा

Madhya Pradesh: People are troubled and public representatives are rich – the changing face of democracy भोपाल ! मध्यप्रदेश की राजनीति एक बार फिर चर्चा में है—इस बार कारण है 102 विधायकों के लिए बनने जा रहे आलीशान फ्लैट्स, जिनकी लागत 159.13 करोड़ रुपये आंकी गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 21 जुलाई को इन फ्लैट्स का भूमिपूजन करेंगे। दस मंजिला इमारतें, तीन बेडरूम, हॉल, किचन, बालकनी, पार्किंग, स्विमिंग पूल, जिम, कैंटीन और फायर अलार्म जैसी सुविधाएं… ये सब सुनकर मन में सवाल उठना स्वाभाविक है: क्या सचमुच हमारे जनप्रतिनिधियों की ज़रूरतें जनता की परेशानियों से ज्यादा जरूरी हो गई हैं? प्रदेश की सड़कों की हालत, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति और बेरोजगारी जैसे मुद्दे अभी भी आम नागरिक की सबसे बड़ी चिंता बने हुए हैं। गांवों में पीने के पानी की किल्लत है, किसान कर्ज से त्रस्त हैं, युवाओं को रोजगार नहीं, और शहरों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। वहीं दूसरी ओर, राज्य के खजाने से करोड़ों खर्च करके विधायकों को “विश्राम” देने की तैयारी चल रही है। यह सच है कि जनप्रतिनिधियों को काम करने के लिए बेहतर सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन जब जनता महंगाई और बदहाल व्यवस्था से जूझ रही हो, तब इतनी विलासिता क्या उचित है? क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ शासकों की सुविधा रह गया है, और जनता की तकलीफों को नजरअंदाज कर देना अब परंपरा बन गई है? अतीत में जिन जमीनों पर ये फ्लैट बनने थे, वहां पेड़ों की कटाई का विरोध हुआ। इसका हल निकाला गया, लेकिन जनता की समस्याओं का हल कौन निकालेगा? सवाल यह नहीं है कि विधायकों को आवास मिलना चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि क्या यह प्राथमिकता होनी चाहिए जब राज्य की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की स्थिति दोनों ही संकट में हैं? आज जरूरत है कि सरकारें दिखावे और सुविधाओं की राजनीति से ऊपर उठकर जन सरोकारों को प्राथमिकता दें। नहीं तो धीरे-धीरे लोकतंत्र केवल “वोट लेकर सुविधाएं पाने का माध्यम” बनकर रह जाएगा। जनता सब देख रही है, और उसका फैसला समय आने पर बहुत साफ़ होता है। recent visitors 106

मंत्री पटेल ने देखा गो-पुनर्वास केन्द्र हिंगोनिया गो-शाला परिसर में किया वृक्षारोपण

Minister Patel visited the cow rehabilitation center Hingonia Tree plantation was done in the cow shelter premises भोपाल। पशुपालन एवं डेयरी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) लखन पटेल ने गो-पुनर्वास केन्द्र हिंगोनिया, जयपुर का भ्रमण किया. इस दौरान उन्होंने गो-शाला परिसर में बहुउद्धेशीय पशु चिकित्सालय, आईओसीएल के गैस प्लांट, मिल्क पार्लर आदि को देखा. उन्होंने बाड़ों में गायों की देखभाल एवं साफ सफाई व्यवस्था का अवलोकन भी किया. मंत्री पटेल द्वारा गो-शाला परिसर में वृक्षा रोपण भी किया गया. भ्रमण के दौरान मंत्री पटेल के साथ राजस्थान पशुपालन विभाग के निदेशक, संयुक्त निदेशक, उप निदेशक और गो शाला के प्रबंधक थे. गो-शाला का संचालन कृष्ण बलराम सेवा ट्रस्ट द्वारा किया जाता है. गो-पुनर्वास केन्द्र हिंगोनिया लगभग 3 हजार 200 बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 70 बाड़े हैं, जिनमें एक हजार 300 नंदी सहित कुल 17 हजार 500 गो-वंश है. गो-शाला में गोबर से संवर्धित सीएनजी गैस प्लांट स्थापित है, जिसकी उत्पादन क्षमता 400 किलोग्राम सीएनजी प्रतिदिन है. गो-शाला के 200 बीघा क्षेत्र में नेपियर घास का उत्पादन किया जाता है. गो-शाला का दुग्ध उत्पादन 2 हजार लीटर प्रतिदिन है. यहां गोबर से गो-काष्ठ, दीपक, गमले, जैविक खाद्य तथा दूध से दही, पनीर घी और मिठाई को निर्माण किया जाता है. गो-शाला परिसर में ग्रामीण बहुउद्धेशीय आधुनिक पशु चिकित्सालय स्थापित है, जो 24 घंटे संचालित रहता है. recent visitors 122

इंसानियत वाली दुकान की सच्ची कहानी: जब एक बच्ची की भूख ने जगा दी मानवता,,पढ़िए प्रेरणादायक कहानी

इंसानियत वाली दुकान की सच्ची कहानी: जब एक बच्ची की भूख ने जगा दी मानवता,,पढ़िए प्रेरणादायक कहानी

The true story of a humane shop: When a girl’s hunger awakened humanity, read this inspiring story The true story of a humane shop वह रोज़ की तरह अपनी किराने की दुकान बंद करके गली में थोड़ी देर टहलने निकले ही थे कि पीछे से एक मासूम सी आवाज़ आई — “अंकल… अंकल…”वे पलटे। एक लगभग 7-8 साल की बच्ची हांफती हुई उनके पास आ रही थी।“क्या बात है… भाग कर आ रही हो?” उन्होंने थोड़े थके मगर सौम्य स्वर में पूछा।“अंकल पंद्रह रुपए की कनियाँ (चावल के टुकड़े) और दस रुपए की दाल लेनी थी…” बच्ची की आंखों में मासूमियत और ज़रूरत दोनों झलक रहे थे।उन्होंने पलट कर अपनी दुकान की ओर देखा, फिर कहा —“अब तो दुकान बंद कर दी है बेटा… सुबह ले लेना।”“अभी चाहिए थी…” बच्ची ने धीरे से कहा।“जल्दी आ जाया करो न… सारा सामान समेट दिया है अब।” उन्होंने नर्म मगर व्यावसायिक अंदाज़ में कहा।बच्ची चुप हो गई। आंखें नीची कर के बोली —“सब दुकानें बंद हो गई हैं… और घर में आटा भी नहीं है…”उसके ये शब्द किसी हथौड़े की तरह उनके सीने पर लगे।वे कुछ देर चुप रहे। फिर पूछा, “तुम पहले क्यों नहीं आई?”“पापा अभी घर आए हैं… और घर में…” वो रुकी, शायद आँसू रोक रही थी।उन्हें कुछ और पूछने की ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने बच्ची की आंखों में देखा और बिना कुछ कहे, ताले की चाबी जेब से निकाल ली। दुकान का ताला खोला, अंदर घुसे, और समेटे हुए सामान को हटाते हुए कनियाँ और दाल बिना तोले ही थैले में डाल दी।बच्ची ने थैला पकड़ते हुए कहा — “धन्यवाद अंकल…”“कोई बात नहीं। अब घर ध्यान से जाना।”इतना कह कर उन्होंने दुकान फिर से बंद कर दी।उस रात वह जल्दी सो नहीं पाए। मन में बच्ची की उदासी, उसका मासूम चेहरा और वो शब्द “घर में आटा भी नहीं है…” गूंजते रहे। उन्हें अपना बचपन याद आ गया। The true story of a humane shop वे भी कभी ऐसे ही हालात से गुजरे थे। पिता रिक्शा चलाते थे, मां दूसरों के घरों में काम करती थीं। कई बार तो रात को पानी में रोटी भिगो कर खाना पड़ता था। तब किसी ने मदद की होती तो कितना सुकून मिलता था। “अब मेरे पास दुकान है, कमाई है, लेकिन क्या मैंने इंसानियत भी कमा ली है?” उन्होंने खुद से सवाल किया। सुबह जब उन्होंने दुकान खोली, तो सबसे पहले एक बोर्ड बनाया — “यदि आपको ज़रूरत हो और पैसे न हों, तो बेहिचक बताइए। कुछ सामान उधार नहीं, हक़ से मिलेगा।”पास में ही एक डब्बा रख दिया, जिस पर लिखा था —“अगर आप किसी के लिए मदद करना चाहें, तो इसमें पैसे डाल सकते हैं।”गली के लोग पहले तो हैरान हुए। लेकिन धीरे-धीरे लोग समझने लगे कि ये कोई पब्लिसिटी स्टंट नहीं, ये उस इंसान का दिल था जो अपने अतीत से सबक लेकर किसी का आज सुधारना चाहता था Read more: तबादला-पोस्टिंग: अधिकारी ही रहे बॉस, गिड़गिड़ाते रह गए मंत्री, चांस खत्म एक हफ्ते बाद वही बच्ची फिर से आई, इस बार अपने छोटे भाई के साथ।“अंकल, पापा ने कुछ पैसे दिए हैं… पिछली बार जो आपने दिया था उसका भी जोड़ लें।” वह मासूमियत से बोली।“नहीं बेटा, उस दिन जो दिया था वो इंसानियत का कर्ज़ था। उसका कोई हिसाब नहीं होता।”बच्ची मुस्कुरा दी। उसने दुकान में रखा वो बोर्ड पढ़ा और बोली — “पापा ने कहा है कि जब वे मज़दूरी करके लौटेंगे, तो इस डब्बे में पैसे डालेंगे… ताकि किसी और को भी मदद मिल सके।”उस दिन उस दुकानदार की आंखें भर आईं। किसी ने सच ही कहा है — “नेकी कभी बेकार नहीं जाती।” धीरे-धीरे इस दुकान का नाम गली में फैलने लगा — “इंसानियत वाली दुकान।” The true story of a humane shop गली की बुज़ुर्ग महिलाएं, अकेले रहने वाले बुज़ुर्ग, और दिहाड़ी मज़दूर अब यहां से इज़्ज़त से सामान लेते।जो सक्षम होते, वे उस डब्बे में कुछ न कुछ डालते जाते।कई स्कूल के बच्चे भी अपनी गुल्लक से पैसे लाकर उसमें डालते।यह दुकान अब सिर्फ व्यापार का स्थान नहीं थी, यह एक भरोसे का मंदिर बन गई थी।कुछ ही समय में इस दुकान की चर्चा सोशल मीडिया पर हुई। एक स्थानीय पत्रकार ने इस कहानी को अपने अख़बार में छापा —“जहां मुनाफा ज़रूरी नहीं, ज़रूरत की कीमत ज़्यादा है – पढ़िए इस दुकान की कहानी”यह लेख वायरल हो गया। कई सोशल मीडिया पेजों ने इस दुकान का वीडियो बनाया। लोग दूर-दूर से इस ‘इंसानियत वाली दुकान’ को देखने आने लगे।पर दुकानदार ने कभी उसका फ़ायदा नहीं उठाया। उन्होंने कहा —“अगर एक बच्ची की भूख ने मुझे बदल दिया, तो शायद ये दुकान किसी और को भी बदल दे।”वो बच्ची अब रोज़ स्कूल जाती है। दुकानदार ने उसके स्कूल की फ़ीस भी गुप्त रूप से भर दी।उसके पिता ने दुकानदार से कहा —“आपने उस दिन सिर्फ चावल और दाल नहीं दी थी, आपने मेरी बेटी को भरोसा दिया था कि दुनिया में अच्छे लोग अब भी ज़िंदा हैं।”आज भी उस दुकान के बाहर वो बोर्ड लगा है — “यदि आपको ज़रूरत हो और पैसे न हों, तो बेहिचक बताइए।” और उस डब्बे में हर दिन कोई न कोई चुपचाप कुछ न कुछ डाल कर चला जाता है।यह कहानी उस छोटी सी बच्ची की है, लेकिन यह बदलाव की बड़ी लहर बन चुकी है।एक व्यक्ति, एक दुकान, और एक मासूम सी आवाज़ ने यह सिद्ध कर दिया कि —“बदलाव की शुरुआत बाहर से नहीं, दिल के भीतर से होती है।” recent visitors 225

तबादला-पोस्टिंग: अधिकारी ही रहे बॉस, गिड़गिड़ाते रह गए मंत्री, चांस खत्म

तबादला-पोस्टिंग: अधिकारी ही रहे बॉस, गिड़गिड़ाते रह गए मंत्री, चांस खत्म

Transfer-Posting: Officers remained the bosses, ministers kept pleading, chances over भोपाल। प्रदेश में एक महीना 17 दिन ट्रांसफर और पोस्टिंग का सीजन चला। सरकार ने मंत्रियों को छूट दी थी, लेकिन ट्रांसफर-पोस्टिंग में विभाग के एसीएस-पीएस ने अपनी मनमार्जी चलाई और उन्होंने ही अपनी रणनीति के तहत अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले किए। चिंताजनक पहलू यह है कि गंभीर बीमारी से जुड़े प्रकरणों में कर्मचारियों को ट्रांसफर का लाभ नहीं मिला। जबकि नीति में गंभीर बीमारी, परिवार में बीमार और पति-पत्नी को एक ही जिले में पदस्थ करने का प्रावधान किया गया था। वन विभाग ने तो ‘ए-प्लसÓ की नोटशीट तक की सिफारिशों को दरकिनार कर दिया है। आखिरी दिन तक वन मंत्रालय में तबादला सूची में मैनेजमेंट कोटे के आधार देर रात तक नाम कटते और जुड़ते रहे। तबादला सीजन में मंत्रियों और प्रमुख सचिवों के बीच तालमेल की कमी भी खुलकर सामने आई है। तबादले के लिए तमाम मनुहार कर बैन हटवाने वाले मंत्रियों को अपने मिलने-जुलने वालों के तबादले और पोस्टिंग करने का मौका नहीं मिल सका है। वरिष्ठ अफसरों ने इसके लिए सरकार के नियमों को भी दरकिनार किया है। एसीएस और मंत्रियों के बीच खींचतान की वजह से कई विभागों में 8 फीसदी तक तबादले नहीं हो पाए हैं। वहीं कई विभागों द्वारा अब बैकडेट में तबादला आदेश जारी किए जा रहे हैं। राजस्व विभाग ने 509 पटवारियों का तबादला किए। इसके बाद 89 पटवारियों के आधी रात को आदेश जारी कर दिए गए हैं। अभी कुछ सूची जारी करने की तैयारी विभाग कर रहा है। वह भी बैकडेट में होने की तैयारी चल रही है। वन विभाग में फारेस्ट गार्ड, प्रभारी रेंजर से लेकर एसडीओ तक के ट्रांसफर 17 और 18 जून तक जारी किए गए हैं। सीएम के विभागों को लेकर खासी माथा-पच्चीमुख्यमंत्री के पास गृह, जेल, उद्योग, नर्मदा घाटी, विमानन, वन जैसे करीबन 10 से ज्यादा विभाग हैं। इन विभागों में जितने भी ट्रांसफर किए गए हैं, उसमें सीएम मॉनिट के नाम पर एसीएस-पीएस ने अपनी मनमानी की है। वन विभाग में दीगर मंत्रियों को डस्टबिन में डाल दिया गया। इससे मंत्रियों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। साथ ही स्थानांतरित हुए अधिकारियों-कर्मचारियों में असंतोष व्याप्त है। कई अधिकारियों का मैनेजमेंट कोटे से मनपसंद पोस्टिंग कराने की सिफारिश मंत्रियों और शीर्षस्थ अधिकारियों से की थी। उनके नाम सूची में आए, लेकिन चाही गई जगह नहीं मिली। यहां भी देर रात तक नाम कटते और जुड़ते रहे हैं। यही वजह रही कि एक रेंजर स्वस्ति श्री जैन की पोस्टिंग 2 जगह कर दी गई। कुछ मामलों में जहां जगह ही नहीं, वहां भी तबादले किए गए हैं। वन विभाग में चर्चा है कि मंत्रालय के अधिकारियों ने जमकर मनमानी की, क्योंकि वन विभाग सीएम के पास है और उनके पास गृह जेल उद्योग और आईएएस की पोस्टिंग संबंधित महत्वपूर्ण कार्य हैं। इसके कारण उनका वन विभाग पर फोकस कम रहा और इसका फायदा नौकरशाह और शीर्ष अफसरों ने जमकर उठाया। यही स्थिति जेल विभाग में भी रही। उद्योग विभाग की सूची का तो कर्मचारियों को पता ही नहीं चला। एमएसएमई विभाग में मंत्री चेतन्य काश्यप के प्रस्तावों को तवज्जो ही नहीं दी गई। उधर, पीएचई में किए गए तबादलों में विभागीय मंत्री द्वारा की गई अनुशंसाओं को दरकिनार कर ट्रांसफर किए गए। यह सब मुख्यमंत्री के नाम पर विभागों के अफसरों ने खेल खेला है। इस मामले में तो कर्मचारियों ने विभागाध्यक्षों पर लेनदेन के भी आरोप लगाए हैं। मंत्री प्रहलाद पटेल की तबादलों में नहीं चलीकैबिनेट में प्रहलाद पटेल कद्दावर मंत्रियों में गिने जाते हैं, लेकिन तबादलों में अफसरों ने उनकी नहीं सुनी। तबादला आदेश जारी करने के दौरान अफसरों ने यह कहकर मंत्री के नाम रिजेक्ट किए कि यह तीन फार्मूले में फिट नहीं बैठते हैं। ये फार्मूला है-पारस्परिक तबादला, गंभीर बीमारी जैसे कैंसर या ब्रेन ट्यूमर तथा तीसरा महिला का अपने परिवार से दूर पदस्थ होना बताया गया। यही वजह है कि मंत्री के यहां से गए प्रस्तावों पर तबादले नहीं किए गए। उधर, आजीविका मिशन, आरईएस, पंचायत राज सहित अन्य विभागाध्यक्ष कार्यालयों में ट्रांसफर खुलकर किए गए हैं। राजस्व विभाग के पीएस विवेक पोरवाल ने मंत्री करण सिंह वर्मा की भी नहीं सुनी, ऐसी चर्चा है। मंत्री ने जो सूची भेजी, उसमें भारी काट-छांट करते हुए प्रमुख सचिव और सीएलआर ने नामात्र के तबादले किए हैं। recent visitors 147

भगवान जगन्नाथ को क्यों लगता है कड़वे नीम का भोग? जानें इसके पीछे का रहस्य

भगवान जगन्नाथ को क्यों लगता है कड़वे नीम का भोग? जानें इसके पीछे का रहस्य

Kyon Lagate Hain Bhagwan Jagnnath Ko Neem Ka Bhog: पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा हिंदू धर्म की सबसे भव्य, प्रसिद्ध और श्रद्धा से ओत-प्रोत यात्राओं में से एक मानी जाती है। यह यात्रा हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। लाखों श्रद्धालु इस पावन अवसर पर पुरी पहुँचते हैं और भगवान के रथ को खींचकर पुण्य प्राप्त करते हैं। यह न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और भक्तिभाव का अद्वितीय प्रतीक भी है। इस वर्ष यह दिव्य यात्रा 27 जून 2025 को शुरू होगी। रथ यात्रा से जुड़ी कई पुरानी और विशेष परंपराएं हैं, जिनमें से एक परंपरा भगवान जगन्नाथ को कड़वे नीम की पत्तियों का भोग अर्पित करने की भी है। यह परंपरा सुनने में भले ही विचित्र लगे, लेकिन इसके पीछे गहरी धार्मिक भावना और ऐतिहासिक महत्व छिपा हुआ है। भगवान को मीठे के स्थान पर कड़वा नीम क्यों चढ़ाया जाता है, यह जानना भक्तों के लिए हमेशा जिज्ञासा का विषय रहा है। आइए, जानते हैं इस विशेष परंपरा के पीछे की पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यता। क्यों चढ़ाया जाता है भगवान जगन्नाथ को नीम का भोग?भगवान जगन्नाथ को 56 भोग लगाने के बाद नीम के चूर्ण का भोग चढ़ाने की परंपरा के पीछे एक बेहद मार्मिक कथा जुड़ी है। कहा जाता है कि जगन्नाथ पुरी मंदिर के पास एक वृद्धा महिला रहती थी, जो भगवान को अपने पुत्र के रूप में मानती थी। वह प्रतिदिन देखती थी कि भगवान को 56 प्रकार के विविध और भारी भोजन चढ़ाए जाते हैं। एक दिन उसने सोचा कि इतना सारा भोग ग्रहण करने के बाद उसके बेटे को पेट दर्द हो सकता है, इसलिए वह नीम का औषधीय चूर्ण बनाकर मंदिर पहुंची, ताकि उसे भगवान को भोग स्वरूप अर्पित कर सके। सैनिकों ने किया चूर्ण का अपमान, भक्त हुई व्यथितजब वह महिला भगवान को वह चूर्ण देने मंदिर पहुंची, तो द्वार पर तैनात सैनिकों ने उसे अंदर नहीं जाने दिया। इतना ही नहीं, उसके हाथ से नीम का चूर्ण भी छीनकर फेंक दिया और उसे अपमानित कर मंदिर से भगा दिया। यह देखकर वह स्त्री अत्यंत दुःखी हो गई कि वह अपने पुत्र भगवान को प्यार से बनाई हुई औषधि नहीं दे सकी। भगवान ने लिया भक्त की पीड़ा का संज्ञानउस रात भगवान जगन्नाथ ने पुरी के राजा के स्वप्न में दर्शन दिए और पूरी घटना की जानकारी दी। भगवान ने राजा से कहा कि उन्होंने एक सच्ची भक्त का अपमान सहन किया है और यह अनुचित है। उन्होंने राजा को आदेश दिया कि वह स्वयं उस महिला के घर जाकर क्षमा मांगे और उसी नीम के चूर्ण को फिर से बनवाकर भगवान को अर्पित करे।, तभी से शुरू हुई यह परंपराअगले दिन राजा ने भगवान की आज्ञा का पालन किया। वह महिला के घर गए, माफी मांगी और उससे दोबारा चूर्ण बनवाया। उस मां ने बड़े प्रेम से वह नीम का चूर्ण तैयार किया और राजा ने उसे भगवान जगन्नाथ को भोग के रूप में अर्पित किया। भगवान ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। तभी से यह परंपरा चल पड़ी कि 56 भोग के बाद भगवान को नीम के चूर्ण का भोग भी लगाया जाता है, जो आज तक पूरी श्रद्धा और प्रेमभाव के साथ निभाई जाती है। recent visitors 206

चालान: ट्रैफिक नियमों की आड़ में कैमरा चालान तंत्र, जनता की जेब काटने की सरकारी स्कीम!

चालान: ट्रैफिक नियमों की आड़ में कैमरा चालान तंत्र, जनता की जेब काटने की सरकारी स्कीम!

Challan: Camera challan system under the guise of traffic rules, a government scheme to fleece public! संपादकीय टीमgovernment scheme to fleece public देशभर में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के नाम पर आज जिस तरह चालान प्रणाली को डिजिटल और कैमरा आधारित किया गया है, वह सुधार से ज्यादा व्यापार नजर आता है। सरकारें दावा करती हैं कि उनका उद्देश्य सड़क सुरक्षा और नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। लेकिन असल तस्वीर कुछ और ही है। चालान या शोषण? ट्रैफिक नियमों की आड़ में जनता की जेब पर हमला हर चौराहे पर कैमरे, हर राज्य में करोड़ों का चालान government scheme to fleece publicआजकल हर राज्य और हर जिले में CCTV कैमरे लगाए जा रहे हैं। इन कैमरों के ज़रिए लाखों गाड़ियों के चालान रोज़ काटे जाते हैं – वो भी बिना किसी चेतावनी, सुधार या विकल्प के। ना सड़कों की हालत सुधरी, ना ट्रैफिक लाइट्स की स्थिति। कहीं लाइट काम नहीं करती, तो कहीं संकेत पूरी तरह अदृश्य होते हैं। बावजूद इसके, चालान तय है – जुर्माना तय है! नियम टूटते हैं, लेकिन वजह कौन समझे?कई बार ट्रैफिक सिग्नल काम नहीं करते। सड़कें गड्ढों में बसी होती हैं। दिशा सूचक बोर्ड गायब होते हैं। ऐसी स्थिति में नियमों का पालन असंभव हो जाता है, लेकिन जुर्माना फिर भी भुगतना पड़ता है – क्योंकि कैमरा देखता है, व्यवस्था नहीं। Read More: शोक की घड़ी में भाजपा का पचमढ़ी आयोजन नैतिकता का उल्लंघन: विभा पटेल क्या चालान अब राजस्व का नया स्रोत बन गया है?सवाल यह है – क्या चालान वाकई सुधार का जरिया है, या सिर्फ़ जनता की जेब से कमाई का साधन बन गया है? सरकारें तो जानती हैं कि लोग सुधरेंगे नहीं, इसीलिए तकनीक का इस्तेमाल जनता की नज़रों से नहीं, उसकी जेब से जोड़ने के लिए किया जा रहा है। जनता अभी भी चुप है – लेकिन कब तक? government scheme to fleece publicहैरानी की बात है कि जनता अभी तक इस खेल को समझ नहीं पा रही है। या शायद समझकर भी चुप है। लेकिन यदि जनता एक दिन जाग गई, तो सवाल करेगी कि ट्रैफिक नियमों की आड़ में वसूली कब तक चलेगी? चालान एक जरिया होना चाहिए था व्यवस्था सुधार का। लेकिन आज यह सरकारी खजाना भरने का आसान और एकतरफा तरीका बन गया है। सुधार सड़क पर नहीं दिखते, लेकिन जुर्माने की पर्ची हर घर पहुंचती है। सवाल यही है – क्या ये चालान व्यवस्था के लिए हैं, या व्यवस्था की विफलता को ढकने का तरीका? recent visitors 142

शोक की घड़ी में भाजपा का पचमढ़ी आयोजन नैतिकता का उल्लंघन: विभा पटेल

BJP’s Panchmarhi event in the hour of mourning Violation of ethics: Vibha Patel भोपाल। मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती विभा पटेल ने आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा संवेदनशील नहीं है। उसका करुणा, वेदना, पीड़ा और मानवीयता से कोई सरोकार नहीं है। इसकी मिसाल अहमदाबाद विमान हादसे के चलते पचमढ़ी प्रशिक्षण शिविर स्थगित नहीं करना है।  श्रीमती विभा पटेल ने कहा कि अहमदाबाद से लंदन जा रही एयर इंडिया की अंतरराष्ट्रीय उड़ान दुर्घटनाग्रस्त होने से इस अकल्पनीय हादसे में सिर्फ यात्री और क्रू मेंबर्स ही नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेज के कई छात्र, आम नागरिक समेत 275 लोग असमय काल के गाल में समा गए। इस शोक की घड़ी में वैश्विक नेताओं समेत देश-दुनिया में शोक की लहर है। लेकिन उत्सवप्रेमी भाजपा संगठनात्मक आयोजन के नाम पर विधायकों-सांसदों का तीन दिनी प्रशिक्षण सत्र का आयोजन कर रही है। यह आश्चर्यजनक है क्योंकि इस दुर्घटना में भाजपा के पूर्व सीएम विजय रूपाणी की भी मृत्यु हुई है। इसके बावजूद भाजपा का कार्यक्रम को स्थगित नहीं करना और उद्घाटन के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को आमंत्रित करना उसके मानवता विरोधी चेहरे को प्रदर्शित करता है। यह सामाजिक मानदंडों, सामान्य शिष्टाचार और नैतिक सीमाओं का सीधा उल्लंघन है।  श्रीमती विभा पटेल ने केंद्रीय गृह मंत्री शाह के उस बयान की भी निंदा की है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ” ये एक्सीडेंट है.. एक्सीडेंट को कोई रोक नहीं सकता..’। श्रीमती विभा पटेल ने कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को कुछ भी बोलने से सोचना चाहिए। अभी देश अहमदाबाद विमान हादसे के सदमे से उबरा नहीं है। कई परिवार शोक और सदमे से घिरे है। यह हादसा न जाने कितने परिवारों के लिए विनाश का कारण बन गया, कितनों की दुनिया उजड़ गई। इसको समझते हुए भाजपा का अपने आयोजन को लेकर हठधर्मी वाला रवैया रखना उसके अमानवीय व्यवहार, आचरण और चरित्र को प्रदर्शित करता है। श्रीमती विभा पटेल ने शोक संतप्त परिवारों के प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा कि इस कठिन समय में भाजपा को सद् बुद्धि मिले, वह यही ईश्वर से प्रार्थना करती है। recent visitors 256