केंद्र सरकार ने PMGKAY योजना में फोर्टिफाइड चावल का वितरण रोका, न्यूट्रिशन में कमी की वजह से लिया फैसला

नई दिल्ली  केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) और अन्य सरकारी योजनाओं के तहत दिए जाने वाले 'फोर्टिफाइड चावल' के वितरण को फिलहाल रोक दिया है. सरकार ने यह कदम चावल के लंबे समय तक भंडारण के दौरान पोषक तत्वों के खराब होने की चिंताओं के बीच उठाया है. क्यों लिया गया यह फैसला? खाद्य मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, आईआईटी खड़गपुर को एक विशेष अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. इस स्टडी में यह जांचना था कि अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों में फोर्टिफाइड चावल के दाने कितने समय तक अपनी गुणवत्ता बनाए रखते हैं. रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. अध्ययन के अनुसार, नमी, तापमान और गोदामों में रखने के तरीके का चावल की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ रहा है. रिपोर्ट में कहा गया कि लंबे समय तक रखे रहने और सामान्य रखरखाव के दौरान इन चावलों में मौजूद जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व कम हो जाते हैं. इससे जिस मकसद के लिए चावल में पोषण मिलाया गया था, वह पूरा नहीं हो पा रहा है. भंडारण की समस्या सबसे बड़ी चुनौती भारत के सरकारी गोदामों में चावल की उपलब्धता जरूरत से कहीं ज्यादा है. आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय पूल में लगभग 674 लाख मीट्रिक टन चावल उपलब्ध है, जबकि सालाना जरूरत सिर्फ 372 लाख मीट्रिक टन की है. इस कारण चावल को गोदामों में 2 से 3 साल तक रखा जाता है. इतने लंबे समय तक फोर्टिफाइड चावल में मिलाए गए विटामिन और आयरन अपनी शक्ति खो देते हैं. आम जनता पर क्या होगा असर? सरकार ने साफ किया है कि इस फैसले से राशन कार्ड धारकों को मिलने वाले अनाज की मात्रा में कोई कमी नहीं आएगी.     राशन मिलता रहेगा: लाभार्थियों को उनके हक का पूरा चावल मिलेगा, बस वह अब फोर्टिफाइड (मिश्रित) नहीं होगा.     इन योजनाओं पर असर: यह फैसला PDS (राशन दुकान), आंगनवाड़ी (ICDS) और स्कूलों में मिलने वाले मिड-डे मील (PM POSHAN) पर लागू होगा.     राज्यों को छूट: खरीफ सीजन 2025-26 के लिए राज्यों को छूट दी गई है कि वे अपनी सुविधा के अनुसार फोर्टिफाइड या सामान्य चावल बांट सकते हैं. क्या है फोर्टिफाइड चावल? बता दें कि कुपोषण और एनीमिया (खून की कमी) को दूर करने के लिए सामान्य चावल में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे पोषक तत्व मिलाए जाते हैं. इसे 2019 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया था और मार्च 2024 तक इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया था. आगे क्या? खाद्य मंत्रालय के अनुसार, यह रोक स्थायी नहीं है. सरकार अब एक ऐसी नई तकनीक या सिस्टम पर काम कर रही है जिससे चावल के पोषक तत्व लंबे समय तक खराब न हों. जैसे ही कोई बेहतर तरीका मिल जाएगा, इस योजना को फिर से शुरू किया जा सकता है. recent visitors 56

यूपी में जनगणना 2027 की तैयारियां तेज, पहले चरण के लिए अधिकारियों को मिले कड़े आदेश

लखनऊ  उत्तर प्रदेश में जनगणना 2027 की तैयारियां तेज हो गई हैं. पहले चरण में मकानों की सूची तैयार करने और उनकी गणना का काम किया जाएगा. इस चरण में स्व-गणना की प्रक्रिया 7 मई से 21 मई तक चलेगी. इसके बाद 22 मई से 20 जून तक अधिकारी घर-घर जाकर फील्ड कार्य पूरा करेंगे. राज्य में तय समय सीमा के अंदर काम हो सके इसके लिए प्रशिक्षण व्यवस्था को भी चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है.  राज्य में जनगणना के लिए अधिकारियों को सभी काम तय समय-सीमा के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं. ये प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और बिना त्रुटि के पूरी की जाए इसके लिए भी अधिकारियों को निर्देशित किया गया है. जनगणना की प्रक्रिया पूरी तरह से डिजिटल तरीके से की जाएगी. इसमें डेटा संग्रह, प्रविष्टि और निगरानी सब कुछ ऑनलाइन होगा.  छह लाख कर्मचारियों की लगेगी ड्यूटी उत्तर प्रदेश में जनगणना 2027 के लिए क़रीब छह लाख से ज्यादा कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाएगी. यही नहीं इस बार पहली बार ऐसा होगा जब लोगों को मोबाइल एप के ज़रिए ख़ुद गणना करने का ऑप्शन भी मिलेगा. इसका मतलब ये होगा कि लोग ख़ुद भी अपनी जानकारी ऑनलाइन या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के जरिए जमा कर सकेंगे.  डिजिटल तरीके से की जाएगी जनगणना राज्य में जनगणना का काम काफी बड़ा है जिसे देखते हुए बड़ी संख्या में कर्मचारियों को लगाया जाएगा. जो घर-घर जाकर लोगों की गिनती और आवास की संख्या का डेटा जुटाएंगे. डेटा इकट्ठा करने और उसे सत्यापित करने का काम डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किया जाएगा. इसके लिए राज्य स्तर प एक राज्य नोडल कार्यालय भी स्थापित किया जाएगा, जहां पूरी प्रक्रिया की निगरानी रखी जाएगी और ये सुनिश्चित किया जाएगा कि काम तय योजना के अनुसार हो रहा है.  नियमों के मुताबिक इस साल होने वाली जनगणना के कार्यक्रम को देखते हुए एक जनवरी 2026 से 31 मार्च 2027 तक राज्य में नए तहसीलों, शहरी निकायों, ग्राम पंचायतों आदि के गठन पर रोक लगा दी जाएगी. ताकि जनगणना के दौरान किसी तरह का बदलाव न हो जिससे डेटा पर कोई प्रभाव न आए.  recent visitors 50

अवैध कॉलोनियों पर कड़ी कार्रवाई, तीन महीने में नया कानून आएगा, 10 साल की सजा और 1 करोड़ का जुर्माना

भोपाल  प्रदेश में तेजी से बढ़ रही अवैध कॉलोनियों पर रोक लगाने के लिए राज्य सरकार सख्त रुख अपनाने जा रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में नगरीय क्षेत्र (कॉलोनी विकास) अधिनियम-2021 में संशोधन का मसौदा तैयार किया जा रहा है। प्रस्तावित बदलावों के तहत अवैध कॉलोनाइजरों के खिलाफ दंड और जुर्माने को कई गुना बढ़ाने की तैयारी है। इसमें अवैध कॉलोनियों की शिकायत मिलने पर 90 दिन में एफआईआर दर्ज करने, अधिकतम सजा 10 साल तक करने और एक करोड़ रुपये जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है। हालांकि, नया कानून पुरानी कॉलोनियों पर लागू होगा या नई कॉलोनियों, पर इसको लेकर निर्णय लिया जाना है। शनिवार को विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अधिकारियों के साथ संशोधित मसौदा की समीक्षा बैठक करेंगे।  विस में मंत्री विजयवर्गीय ने दिए सख्त संदेश शुक्रवार को अवैध कॉलोनियों को लेकर विधायक रीति पाठक के प्रश्न के जवाब में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने विधानसभा में कहा कि अब अवैध कॉलोनियों पर कड़ा कानून लागू किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ तेज कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश में तीन महीने के भीतर सख्त नियम लागू होंगे।  90 दिन में दर्ज करनी होगी एफआईआर जानकारी के अनुसार नए प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार यदि किसी अवैध कॉलोनी को लेकर थाने में शिकायत मिलती है, तो 90 दिनों के भीतर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य होगा। समय सीमा का पालन नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शिकायतों को लंबित रखने से  दोषियों को मिलने वाली राहत न मिल सके। हालांकि, अभी यह प्रस्तावित है।  बहुत कम मामलों में केस हुए दर्ज बता दें, आंकड़ों के अनुसार, अब तक अवैध कॉलोनियों के  खिलाफ हजारों शिकायतें मिलने के बावजूद बहुत कम मामलों में एफआईआर दर्ज हो पाई है। कार्रवाई की धीमी गति को देखते हुए जवाबदेही तय करने की जरूरत महसूस की गई है। सजा और जुर्माने में बड़ा इजाफा जानकारी के अनुसार मौजूदा कानून में अवैध कॉलोनी विकसित करने पर तीन से सात वर्ष तक की सजा और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। संशोधन के बाद इसे बढ़ाकर अधिकतम 10 वर्ष की सजा और एक करोड़ रुपये तक के आर्थिक दंड में बदलने की तैयारी है। इससे अवैध प्लॉटिंग और बिना अनुमति कॉलोनी काटने वालों को कड़ा संदेश जाएगा। अधिकारियों की जिम्मेदारी भी होगी तय  नए कानून में केवल कॉलोनाइजर ही नहीं, बल्कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी शिकंजा कसा जाएगा। प्रस्तावित कानून में यह व्यवस्था की गई है कि शिकायत मिलने के बावजूद कार्रवाई नहीं करने वाले प्रशासनिक या नगरीय निकाय के अधिकारी दोषी पाए जाने पर दंडित किए जा सकेंगे। इसमें एक वर्ष तक की सजा और आर्थिक दंड का प्रावधान शामिल है।  4 हजार से अधिक अवैध कॉलोनियां  बता दें, प्रदेश में चार हजार से अधिक अवैध कॉलोनियां हैं। इन कॉलोनियों में सड़क, सीवरेज, पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी है। सरकार को इनसे संबंधित 5 हजार से अधिक शिकायतें प्राप्त हो चुकी है। इनमें से 600 से ज्यादा के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है।  recent visitors 35

उज्जैन में महापौर चुनाव पर कोर्ट का फैसला, 2022 चुनाव से कुर्सी पर मंडराया संकट

उज्जैन  मध्य प्रदेश के उज्जैन महापौर चुनाव को लेकर एक बड़ा फैसला आया है।  उज्जैन महापौर चुनाव 2022 को लेकर कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए चुनाव याचिका को सुनवाई के काबिल माना है। अब इस फैसले से महापौर की कुर्सी पर संकट गहरा सकता है। दरअसल ये फैसला उज्जैन नगर निगम महापौर चुनाव 2022 से जुड़े विवाद को लेकर आया है। फैसले से सियासी हलचल भी तेज है। प्रधान जिला न्यायाधीश की अदालत ने चुनाव याचिका को सुनवाई योग्य मानते हुए महापौर, निर्दलीय प्रत्याशी के साथ ही जिला निर्वाचन अधिकारी की आपत्तियों को खारिज कर दिया है। इस फैसले से अब चुनाव याचिका पर सुनवाई का रास्ता भी साफ हो गया है। चुनाव में वैध मतों को अस्वीकृत करने का लगा था गंभीर आरोप दरअसल ये सारा विवाद 60 वैध मतों को लेकर है जो अनुचित रूप से अस्वीकृत कर दिए गए थे। याचिका के अनुसार रिटर्निंग ऑफिसर ने पहले तो आश्वासन दिया कि यदि आंकड़े गलत पाए गए तो दोबारा से गिनती होगी।  लेकिन बाद में मांग नहीं मानी गई और कोई गिनती नहीं कराई गई।  सबसे गंभीर और बड़े आरोप मतदान केंद्र क्रमांक 274 को लेकर है। दावा किया गया है  कि वहां परमार को 277 मत मिले थे, लेकिन रिकॉर्ड में 217 मत दर्शाए गए। जिसको लेकर काफी विवाद हुआ था। कांग्रेस प्रत्याशी महेश परमार की  923 मतों से हुई थी हार महापौर चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी महेश परमार ने परिणाम को चुनौती दी है। नतीजों के अनुसार परमार को 1,33,317 तो भाजपा प्रत्याशी मुकेश टटवाल को 1,34,240 मत मिले थे। कांग्रेस प्रत्याशी परमार ने आरोप लगाया कि मतगणना के बाद घोषित आंकड़े असत्य थे और उन्होंने लिखित रूप से पुनर्मतगणना की मांग की थी। महापौर मुकेश टटवाल, निर्दलीय प्रत्याशी बाबूलाल चौहान के साथ ही जिला निर्वाचन अधिकारी एवं रिटर्निंग ऑफिसर ने आवेदन देकर याचिका को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करने की मांग की थी। अदालत ने इन दलीलों को अस्वीकार कर दिया है और कहा है कि साक्ष्यों के आधार पर ही असलियत का पता लगेगा।अदालत ने साफ किया कि बिना साक्ष्य के यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि याचिका झूठी है या निराधार है। लिहाजा इस फैसले के बाद महापौर की कुर्सी पर सियासी संकट गहराने लगा है। recent visitors 47

मार्च में अवकाश के सभी दिनों में बिजली बिल भुगतान केंद्र खुले रहेंगे

मार्च में सभी अवकाश दिनों में बिजली बिल भुगतान केन्द्र खुलेंगे भोपाल  मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत 07 मार्च, 14 मार्च, 21 मार्च, 28 मार्च शनिवार एवं 01 मार्च, 08 मार्च, 15 मार्च, 22 मार्च, तथा 29 मार्च रविवार, 03 मार्च होली, 19 मार्च गुड़ी पड़वां, 20 मार्च जमात- उल-विदा/ ईद उल-फितर के ठीक पूर्व का दिवस/ रानी अवंती बाई का बलिदान दिवस, 27 मार्च रामनवमीं तथा 31 मार्च महावीर जयंती को बिल भुगतान केन्द्र सामान्य कार्य दिवसों की तरह कार्य करते रहेंगे। भोपाल शहर वृत्त के अंतर्गत चारों शहर संभाग यथा पश्चिम, पूर्व, दक्षिण तथा उत्तर संभाग के अंतर्गत सभी जोनल कार्यालय और दानिश नगर, मिसरोद, मण्डीदीप में बिल भुगतान केन्द्र उक्त अवकाश के दिन भी सामान्य कार्य दिवस की तरह खुले रहेंगे। बिजली उपभोक्ता राजधानी के जोनल आफिस में पीओएस (pos) मशीन से कैश के जरिए बिल भुगतान तथा ऑनलाइन माध्यम से भी बिल भुगतान कर सकते हैं। कंपनी ने यह भी निर्देश दिए हैं कि कंपनी कार्यक्षेत्र के सभी 16 जिलों में बिजली वितरण केन्द्र/बिल भुगतान केन्द्र अवकाश के दिनों में खुले रहेंगे। इसके लिए सभी मैदानी महाप्रबंधकों को निर्देशित किया गया है। ऑनलाइन भुगतान करें और पाएं छूट मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा निम्नदाब घरेलू उपभोक्ताओं को ऑनलाइन भुगतान करने पर उनके कुल बकाया बिल पर 0.50 प्रतिशत की छूट प्रदान की जा रही है। साथ ही अधिकतम छूट के लिए कोई सीमा बंधन नहीं है। इसी प्रकार उच्चदाब उपभोक्ताओं को प्रति बिल कैशलेस भुगतान पर 100 रूपये से 1000 रुपये तक की छूट दी जा रही है। मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने उपभोक्ताओं से बिजली का बिल ऑनलाइन भुगतान करने की अपील की है। कंपनी ने कहा है कि उपभोक्ताओं को एम.पी.ऑनलाईन, कॉमन सर्विस सेन्टर, कंपनी पोर्टल portal.mpcz.in (नेट बैंकिंग, क्रेडिट/डेबिट कार्ड, यूपीआई, ईसीएस, बीबीपीएस, कैश कार्ड एवं वॉलेट आदि) फोन पे, अमेजान पे, गूगल पे, वॉट्सऐप पे, पेटीएम एप एवं उपाय मोबाइल एप के माध्यम से बिल भुगतान की सुविधा उपलब्ध है।   recent visitors 38

इंदौर में शराब ठेकों का रिकॉर्ड ऑक्शन, 50 करोड़ में बिके सबसे महंगे ठेके, टॉप-10 दुकानें जानें

इंदौर नई आबकारी नीति लागू होते ही इंदौर सहित आसपास के जिलों में वर्षों से सक्रिय बड़े शराब ठेकेदारों को बड़ा झटका लगा है। शासन ने शराब दुकानों की ग्रुप व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए इंदौर में ग्रुपों की संख्या 60 से घटाकर 56 कर दी है। साथ ही गुजरात सीमा से जुड़े जिलों में लंबे समय से चली आ रही सिंगल ठेकेदार व्यवस्था समाप्त कर प्रतिस्पर्धात्मक सिस्टम लागू कर दिया गया है। इस बार इंदौर जिले को 2102 करोड़ रुपए की रिकॉर्ड राजस्व वसूली का लक्ष्य दिया गया है। दुकानों की संरचना नए सिरे से तैयार वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए घोषित नई आबकारी नीति के तहत पूरे संभाग में शराब दुकानों की संरचना नए सिरे से तैयार की गई है। इंदौर के अलावा धार जिले में अब 21 ग्रुप बनाकर शराब ठेके दिए जाएंगे, जबकि झाबुआ जिले में 9 ग्रुप संचालित होंगे। खास बदलाव यह है कि गुजरात बॉर्डर से लगे धार, झाबुआ और आलीराजपुर जिलों में अब किसी एक ठेकेदार का वर्चस्व नहीं रहेगा। आबकारी विभाग ने सिंगल ठेकेदार मॉडल खत्म कर सभी दुकानों को ग्रुपिंग सिस्टम में शामिल कर दिया है, जिससे हर ग्रुप के लिए ई-टेंडर और खुली बोली प्रक्रिया अपनाई जाएगी। शराब दुकानों की कीमतें आसमान छू रही शहर में शराब कारोबार का बाजार इस बार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। शराब दुकानों की कीमतें आसमान छू रही हैं और हालात ऐसे हैं कि इंदौर में एक शराब दुकान की सालाना कीमत 50 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह केवल न्यूनतम आरक्षित मूल्य है, जबकि नीलामी के दौरान इससे कहीं अधिक बोली लगने की संभावना जताई जा रही है। आबकारी विभाग द्वारा आज से नई नीति के तहत शराब दुकानों की नीलामी प्रक्रिया शुरू की जा रही है। 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले वित्तीय वर्ष के लिए आबकारी विभाग ने जिले की 173 शराब दुकानों की नीलामी की तैयारी पूरी कर ली है। नई आबकारी नीति 2026-27 के तहत राज्यभर की शराब दुकानों की कीमतों में 20 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। इसी आधार पर विभाग ने पिछले वर्ष की नीलामी दरों में 20 प्रतिशत बढ़ोतरी करते हुए नए सेल लेटर जारी किए हैं। इंदौर जिले की सभी 173 दुकानों को 56 समूहों में बांटा गया है, जिनका कुल न्यूनतम आरक्षित मूल्य 2102 करोड़ रुपए रखा गया है। शहर की कई प्रमुख दुकानों की कीमत 40 से 50 करोड़ रुपए के बीच पहुंच गई है। 60 करोड़ तक पहुंच सकती है बोली जिले की सबसे महंगी शराब दुकान एमआर-9 घोषित की गई है, जिसका आरक्षित मूल्य 49.94 करोड़ रुपए तय किया गया है। आबकारी विभाग के अनुसार इसकी व्यावसायिक लोकेशन और भारी बिक्री क्षमता को देखते हुए इस पर 10 से 20 प्रतिशत तक अधिक बोली लग सकती है, जिससे कीमत 60 करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है। यह दुकान जिले की सबसे ज्यादा कमाई वाली दुकानों में शामिल मानी जाती है। सबसे महंगा समूह स्कीम-54 आबकारी विभाग द्वारा जारी सेल पेपर के अनुसार स्कीम-54 समूह जिले का सबसे महंगा समूह बनकर सामने आया है, जिसका कुल आरक्षित मूल्य 134.95 करोड़ रुपए रखा गया है। इस समूह में स्कीम-54, स्कीम-78, लसूड़िया गोदाम-1, लसूड़िया मोरी और निरंजनपुर की कुल पांच शराब दुकानें शामिल हैं। इसके बाद एमआर-9 समूह दूसरे स्थान पर है, जिसमें चार दुकानों का कुल मूल्य करीब 130 करोड़ रुपए निर्धारित किया गया है। सबसे ज्यादा बिक्री भी इन्हीं क्षेत्रों में जिले में शराब की सर्वाधिक खपत एमआर-9 क्षेत्र में दर्ज की गई है। इसके बाद स्कीम-54 और द्वारकापुरी क्षेत्र प्रमुख बिक्री केंद्र रहे हैं। व्यावसायिक गतिविधियों, उच्च आबादी और लगातार आवागमन के कारण इन क्षेत्रों की दुकानें जिले की कुल बिक्री का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करती हैं। हर दुकान करोड़ों में नहीं हालांकि सभी शराब दुकानें करोड़ों में नहीं बिकेंगी। ग्रामीण क्षेत्रों की कई दुकानें अभी भी लाखों रुपए की श्रेणी में हैं। जिले की सबसे सस्ती दुकान बोरसी क्षेत्र की है, जिसका आरक्षित मूल्य 23.46 लाख रुपए रखा गया है। आबकारी विभाग के अनुसार जिन दुकानों में ठेकेदार रुचि नहीं दिखाएंगे, उनकी कीमतें नीलामी में ऑफर नहीं मिलने की स्थिति में कम भी की जा सकती हैं, जैसा हर वर्ष कुछ दुकानों के मामले में होता है। आज से नीलामी, 2 मार्च को खुलेंगे टेंडर इंदौर सहायक आबकारी आयुक्त अभिषेक तिवारी ने बताया कि 'जिले की 173 दुकानों को 56 समूहों में विभाजित किया गया है। पहले चरण में 19 समूहों की 58 दुकानों की नीलामी प्रक्रिया आज से शुरू हो रही है। इच्छुक व्यापारी 2 मार्च तक टेंडर जमा कर सकेंगे और उसी दिन टेंडर खोले जाएंगे। इसके बाद शेष समूहों की नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।' टॉप-10 सबसे महंगी शराब दुकानें एमआर-9 — 49.94 करोड़ स्कीम नं.-54 — 49.45 करोड़ द्वारकापुरी — 42.87 करोड़ एमआईजी — 40.42 करोड़ कनाड़िया चौराहा — 36.80 करोड़ राऊ क्रमांक-1 — 36.66 करोड़ चंद्रगुप्त चौराहा — 34.26 करोड़ पीपल्यापाला — 33.73 करोड़ आनंद बाजार — 31.54 करोड़ मूसाखेड़ी-1 — 31.11 करोड़ टॉप-5 सबसे महंगे समूह स्कीम-54 — 134.95 करोड़ एमआर-9 — 130.09 करोड़ एमआर-10 — 99.38 करोड़ एमआईजी — 98.03 करोड़   recent visitors 49

8th Pay Commission में फैमिली यूनिट बढ़ाने से 66% तक बढ़ेगी सैलरी, फिटमेंट फैक्टर और पेंशन पर भी असर

नई दिल्ली  आठवें वेतन आयोग में फैमिली यूनिट बढ़ाने की मांग से केंद्रीय कर्मचारियों की बेसिक सैलरी में 66% तक उछाल आ सकता है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अगर परिवार की गणना 3 की जगह 5 यूनिट पर की जाए, तो न्यूनतम वेतन, फिटमेंट फैक्टर और पेंशन (8th Pay Commission salary and pension hike) तीनों में बड़ा बदलाव संभव है। दरअसल, नेशनल काउंसिल (स्टाफ साइड) जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) की ड्राफ्टिंग कमेटी ने आठवें केंद्रीय वेतन आयोग के लिए एक साझा मांग पत्र तैयार करने को राष्ट्रीय राजधानी में हफ्ते भर की बैठक बुलाई है। यह मांग देश के 50 लाख से ज्यादा केंद्रीय कर्मचारियों और करीब 69 लाख पेंशनर्स से जुड़ी है। चर्चा का सबसे अहम मुद्दा है- फैमिली यूनिट (8th Pay Commission family unit) का विस्तार। सातवें वेतन आयोग में कैसे काउंट हुआ था वेतन? 7वें वेतन आयोग में न्यूनतम वेतन की गणना 3 कंजम्प्शन यूनिट के आधार पर की गई थी। इसमें कर्मचारी, जीवनसाथी और दो बच्चों को शामिल किया गया। यह गणना डॉ. वालेस एक्रोयड के फॉर्मूले पर आधारित थी, जिसमें 2,700 कैलोरी प्रति वयस्क, सालाना 72 गज कपड़ा और मकान का खर्च जैसे मानक तय किए गए थे। मकसद था- एक परिवार को सम्मानजनक जीवन के लिए कितनी आय चाहिए, इसका अंदाजा लगाना। फैमिली यूनिट में माता-पिता भी हों शामिल! ऑल इंडिया एनपीएस एप्लॉईज फेजरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह पटेल (Dr Manjeet Singh Patel) का कहना है कि असल में कई कर्मचारी अपने आश्रित माता-पिता का खर्च भी उठाते हैं। इसलिए फैमिली यूनिट 3 से बढ़ाकर 5 की जाए। चूंकि न्यूनतम वेतन सीधा-सीधा यूनिट की संख्या से जुड़ा होता है, इसलिए 3 से 5 यूनिट होने पर बेस कैलकुलेशन वैल्यू में गणितीय रूप से 66.67% की बढ़ोतरी हो सकती है। यूनियनों का दावा है कि इससे न्यूनतम बेसिक सैलरी में करीब 66% तक उछाल आ सकता है। फैमिली यूनिट फॉर्मूला क्या है? 7वें वेतन आयोग में न्यूनतम वेतन की गणना 3 यूनिट के आधार पर हुई थी. कर्मचारी, जीवनसाथी और दो बच्चे. यह गणना डॉ. वॉलेस अयक्रॉयड के फॉर्मूले पर आधारित थी, जिसमें परिवार की बुनियादी जरूरतें शामिल थीं.     रोजाना 2700 कैलोरी भोजन     सालाना कपड़ों की जरूरत     रहने का खर्च     इसका मकसद था सम्मानजनक जीवन के लिए जरूरी न्यूनतम आय तय करना.     अब क्या मांग की जा रही है?     कर्मचारी यूनियन चाहती हैं कि फैमिली यूनिट 3 से बढ़ाकर 5 की जाए, जिसमें आश्रित माता-पिता को भी शामिल किया जाए. सीधे शब्दों में     पहले गणना = 3 यूनिट     नया प्रस्ताव = 5 यूनिट गणित के हिसाब से     5 ÷ 3 = 1.66     यानी बेसिक गणना में लगभग 66.67% बढ़ोतरी.     न्यूनतम वेतन पर असर     अभी 7वें वेतन आयोग के तहत न्यूनतम बेसिक वेतन ₹18,000 है. कर्मचारी संगठन मांग कर रहे हैं.     फिटमेंट फैक्टर 3.25 तक (पहले 2.57)     हर साल 7% वेतन वृद्धि     पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली     अगर बेस सैलरी बढ़ती है, तो पूरी सैलरी स्ट्रक्चर ऊपर चला जाएगा. फिटमेंट फैक्टर क्यों बढ़ सकता है? फिटमेंट फैक्टर वही गुणांक है जिससे पुरानी सैलरी नई सैलरी में बदली जाती है. फैमिली यूनिट बढ़ने से न्यूनतम वेतन की गणना बड़ी हो जाएगी, जिससे ज्यादा फिटमेंट फैक्टर की मांग मजबूत हो जाती है. पेंशनर्स पर क्या असर? पेंशन आखिरी बेसिक सैलरी का 50% होती है. इसलिए अगर नई बेसिक सैलरी बढ़ती है, तो पेंशन भी उसी अनुपात में बढ़ेगी. यही वजह है कि पेंशनर्स संगठन भी इस पर नजर बनाए हुए हैं. कर्मचारी संगठन क्यों जरूरी बता रहे बदलाव?     यूनियनों का कहना है:     महंगाई तेजी से बढ़ी है     कई कर्मचारी माता-पिता की जिम्मेदारी उठाते हैं     3 यूनिट मॉडल आज के परिवार की हकीकत नहीं दिखाता     उनका मानना है कि सिर्फ छोटी बढ़ोतरी नहीं, बल्कि सैलरी ढांचे में बड़ा बदलाव जरूरी है. अभी स्थिति क्या है? NC-JCM अलग-अलग विभागों की मांगों को जोड़कर सरकार को अंतिम प्रस्ताव देगा. इसमें फैमिली यूनिट विस्तार, न्यूनतम वेतन, पेंशन समानता और भत्तों से जुड़े सुझाव शामिल होंगे. सरकार 5-यूनिट प्रस्ताव मानती है या नहीं, यह अभी साफ नहीं है. लेकिन अगर मंजूरी मिलती है, तो सैलरी, पेंशन और भत्तों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. कर्मचारियों के लिए सबसे अहम बात 66% बढ़ोतरी का आंकड़ा कोई अनुमान नहीं, बल्कि वेतन गणना के फॉर्मूले में बदलाव से जुड़ा गणित है.अगर फैमिली यूनिट 3 से 5 हुई तो बेस सैलरी लगभग 66.67% बढ़ेगी. फिटमेंट फैक्टर बढ़ाने का आधार मजबूत होगा. न्यूनतम वेतन ₹54,000 तक मांग की जा सकती है. पेंशन भी उसी अनुपात में बढ़ेगी अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या सरकार फैमिली यूनिट फॉर्मूला बदलने को मंजूरी देगी? तो ऊपर खिसक जाएगी सैलरी मैट्रिक्स? फिलहाल 7वें वेतन आयोग के तहत न्यूनतम बेसिक वेतन 18,000 रुपए है। अगर बेसिक पे बढ़ता है, तो पूरी सैलरी मैट्रिक्स ऊपर खिसक जाएगी। यूनियनें 3.25 या उससे ज्यादा फिटमेंट फैक्टर की भी मांग कर रही हैं। साथ ही सालाना इंक्रीमेंट दर 3% से बढ़ाकर 7% करने की मांग है। पुरानी पेंशन योजना (OPS) की पूरी बहाली, NPS और UPS को खत्म करने की मांग भी उठ रही है। यह मांग पेंशनर्स के लिए भी अहम है, क्योंकि बेसिक पेंशन आखिरी बेसिक सैलरी का 50% होती है। अगर 5 यूनिट फॉर्मूला लागू होता है, तो पेंशन में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होगी। अब नजर सरकार के फैसले पर है कि क्या आठवां वेतन आयोग सिर्फ इंक्रीमेंट देगा या ढांचा बदलकर बड़ी सैलरी हाइक? खैर, ये आने वाले दिनों में क्लियर हो सकता है।   recent visitors 46