हाईकोर्ट ने कविता रैकवार की पार्षदी पुनः बहाल करने के आदेश दिए

जबलपुर  मध्य प्रदेश के जबलपुर से भाजपा की महिला पार्षद कविता रैकवार के पार्षदी शून्य करने के मामले में नया मोड़ आ गया है। हाईकोर्ट ने डिविजनल कमिश्नर के आदेश को रद्द करते हुए कविता रैकवार की पार्षदी पुनः बहाल करने के आदेश दिए हैं। दरअसल 29 अप्रैल को संभागीय कमिश्नर अभय वर्मा ने भाजपा की महिला पार्षद कविता रैकवार की पार्षदी सिर्फ इस आधार पर रद्द कर दी थी कि उनका जाति प्रमाण पत्र फर्जी है। आपको बता दें कि संभागीय कमिश्नर ने यह आदेश भोपाल की उच्च स्तरीय जांच कमेटी के रिपोर्ट के आधार पर सुनाया था। एक दिन पहले ही उच्च स्तरीय आदेश को हाई कोर्ट कर चुका था खारिज 29 अप्रैल को संभागीय कमिश्नर के आदेश के पहले यानी की 28 अप्रैल को हाई कोर्ट भोपाल की उच्च स्तरीय जांच को खारिज कर चुका था। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इस तरह से किसी के आरोप मात्र लगा देने से किसी का जाति प्रमाण पत्र फर्जी नहीं हो जाता। हाई कोर्ट ने इसमें कहा था कि आप इस मामले में पहले जांच कर ले और जांच में जो बिंदु निकले उस आधार पर आगे की कार्रवाई की जाए। लेकिन 28 तारीख को हाई कोर्ट का फैसला आया और उसके एक दिन बाद ही संभागीय कमिश्नर ने भोपाल की उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कविता रैकवार की पार्षदी रद्द कर दी। जिसके बाद कविता रैकवार ने मामले को दोबारा हाईकोर्ट में चुनौती दी।   हाईकोर्ट ने एक बार फिर से मामले की सुनवाई करते हुए कहा की जब पिछले आदेश में ही यह बात क्लियर हो चुकी थी, कि किसी के आरोप मात्र के आधार आप किसी का जाति प्रमाण पत्र रद्द नहीं किया जा सकता। फिर दोबारा क्यों इस मामले की जांच नहीं कराई गई और कैसे महिला की पार्षदी रद्द कर दी गई। हाई कोर्ट ने दोबारा महिला की पार्षदी बहाल करने के निर्देश दिए। हाई कोर्ट में इस मामले में की टिप्पणी हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि जांच कमेटी का ये दायित्व बनता है कि वो जिस पर आरोप लगाए गए है उससे सुबूत न मांगते हुए आरोप लगाने वाले से सबूत मांगे जाने चाहिए। लेकिन यहां उल्टी गंगा बह रह रही है। कोर्ट ने कहा कि महिला पार्षद ने सक्षम अधिकारी के समक्ष ही दस्तावेज जमा करवाकर कास्ट सर्टिफिकेट बनवाया होगा। जब महिला ने दस्तावेज जमा किए होंगे तो सक्षम अधिकारी द्वारा उसकी जांच करके ही यह सर्टिफिकेट जारी हुआ होगा। फिर ऐसे में कैसे उस सक्षम अधिकारी की कलम को बिना जांच के ही खारिज किया जा सकता है। क्या है पूरा मामला दरअसल 29 अप्रैल को संभागीय कमिश्नर अभय वर्मा ने जबलपुर से भाजपा से महिला पार्षद कविता रैकवार की पार्षदी सिर्फ इसलिए शून्य कर दी थी क्योंकि महिला पर फर्जी तरीके से जाति प्रमाण पत्र बनाने का आरोप लगा था। जबलपुर के वार्ड क्रमांक 24 हनुमानताल वार्ड  पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिला के लिए आरक्षित था, जहां से साल 2022 के नगर निगम चुनाव में बीजेपी की कविता रैकवार चुनाव जीती थी। चुनाव जीतने के बाद किसी ने कविता रैकवार के जाति प्रमाण पत्र को लेकर शिकायत कर दी थी। शिकायत में कहा गया था कि कविता रैकवार सामान्य वर्ग से आती है, लेकिन उसने ओबीसी का फर्जी सर्टिफिकेट बना चुनाव लड़ा था। शिकायत पर भोपाल की उच्च स्तरीय कमेटी ने जांच कर महिला से उसके ओबीसी होने की सबूत मांगे और उसके बाद उसके सर्टिफिकेट को ही फर्जी बता दिया। इसी आधार पर संभागीय कमिश्नर ने महिला की पार्षदी को शून्य कर दिया। दरअसल कविता रैकवार महाराष्ट्र की रहने वाली है और उनकी शादी जबलपुर में हुई थी जो कि ओबीसी वर्ग से आते हैं। लेकिन शिकायतकर्ता कहना है की कविता रैकवार के पति ओबीसी से है लेकिन कविता रैकवार सामान्य वर्ग से आती है। recent visitors 58

सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व अवकाश को महिलाओं का संवैधानिक अधिकार बताया, अब तीसरे बच्चे के जन्म पर भी पूरा मातृत्व अवकाश मिलेगा

नई दिल्ली देशभर की कामकाजी महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राहत भरा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने  साफ किया कि मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) केवल सामाजिक न्याय या सद्भावना का विषय नहीं, बल्कि महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है. अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें एक सरकारी शिक्षिका को तीसरे बच्चे के जन्म पर मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) देने से इनकार कर दिया गया था. जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि मातृत्व अवकाश का मकसद महिला कर्मचारियों को सामाजिक न्याय दिलाना है ताकि वे बच्चे को जन्म देने के बाद न केवल जीवित रह सकें, बल्कि अपनी ऊर्जा दोबारा प्राप्त कर सकें, शिशु का पालन-पोषण कर सकें और अपने कार्यकौशल को बनाए रख सकें. तमिलनाडु की एक महिला सरकारी कर्मचारी के उमादेवी की अर्जी पर जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह आदेश पारित किया है. महिला ने पुनर्विवाह के बाद बच्चे को जन्म दिया था. लेकिन उसके महकमे के आला अधिकारियों ने उसे मातृत्व अवकाश से वंचित रखने का आदेश दिया, जिसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. कोर्ट ने तमिलनाडु की एक सरकारी महिला कर्मचारी की याचिका पर यह फैसला सुनाया. महिला का अपनी दूसरी शादी से एक बच्चा था. महिला को यह कहकर मैटरनिटी लीव नहीं दी गई थी कि उसके अपनी पहली शादी से पहले से ही दो बच्चे थे. तमिलनाडु राज्य में नियम है कि मातृत्व लाभ केवल पहले दो बच्चों के लिए ही होगा. याचिका में महिला ने कहा था कि पहली शादी से पैदा हुए बच्चों को लेकर भी उन्हें मैटरनिटी लीव का लाभ नहीं मिला था. उनके वकील केव मुथुकुमार ने कहा कि उन्होंने दूसरी शादी के बाद ही सरकारी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था. बता दें कि मातृत्व अवकाश से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में मातृत्व लाभ अधिनियम में संशोधन कर 12 सप्ताह की छुट्टी को बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया था. सभी महिला कर्मचारियों कोपहले और दूसरे बच्चे के लिए मैटरनिटी लीव दी जाती है. बच्चा गोद लेने वाली माताएं भी 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश की हकदार हैं. यह बच्चे को सौंपे जाने की तारीख से शुरू होता है. सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में मातृत्व अवकाश के अधिकार पर जोर दिया है. एक मामले में यह कहा गया है कि मातृत्व अवकाश सभी महिला कर्मचारियों का अधिकार है, चाहे उनकी नौकरी कैसी भी हो. recent visitors 58

न्यायाधीश अपने विदाई समारोह में ही नहीं गए बल्कि 11 फैसले सुनाए, शनिवार को लास्ट डे रहेगा, आज आखिरी कार्यदिवस था

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के दिन आमतौर पर कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन जस्टिस एएस ओका ने इस पुरानी रवायत को बदल दिया है। उन्होंने शुक्रवार को अपने आखिरी कार्यदिवस पर कई बेंचों में हिस्सा लिया और 11 फैसले दिए। ऐसा उन्होंने तब किया है, जब उनकी मां का एक दिन पहले ही निधन हुआ था। वह गुरुवार को ही अपनी मां के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए मुंबई गए थे और फिर लास्ट वर्किंग डे पर काम करने के लिए दिल्ली लौट आए। शुक्रवार को शीर्ष अदालत में उनका आखिरी दिन था और इस मौके पर भी वह सिर्फ विदाई समारोह के आयोजनों में ही नहीं रहे बल्कि 11 फैसले सुनाए। उनका शनिवार को लास्ट डे रहेगा, लेकिन आज आखिरी कार्यदिवस था। उन्होंने पहले ही कहा था कि वह रिटायरमेंट शब्द से नफरत करते हैं। इसके अलावा उनका कहना था कि जजों को आखिरी दिन भी फैसले सुनाने चाहिए और बेंच का हिस्सा बनना सही रहता है। इसी के तहत उन्होंने कई सुनवाई में हिस्सा लिया और फिर अंत में प्रतीकात्मक बेंच का भी हिस्सा बने, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे। किसी भी जज के रिटायरमेंट पर प्रतीकात्मक जज चीफ जस्टिस के नेतृत्व में बैठती है। ऐसा जस्टिस को सम्मानजनक विदाई के लिए किया जाता है और यह परंपरा शीर्ष अदालत में दशकों से चली आ रही है। जस्टिस ओका बोले- आखिरी दिन भी करना चाहिए पूरा काम बता दें कि 21 मई को जस्टिस ओका के लिए फेयरवेल समारोह आयोजित हुआ था। इसका आयोजन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से किया गया था। इस दौरान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं इस परंपरा को सही नहीं मानता कि रिटायरमेंट के दिन जज काम ही न करें। मैं पसंद करूंगा कि आखिरी कार्यदिवस पर भी काम करूं और कुछ फैसलों का हिस्सा बनूं। इसके अलावा उनका कहना था कि रिटायर होने वाले जज के लिए गार्ड ऑफ ऑनर 1:30 बजे दिया जाता है, जिसमें थोड़ी देरी की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिरी दिवस पर कम से कम शाम को 4 बजे तक तो काम करना ही चाहिए। जिला अदालत से की थी शुरुआत और SC तक आ पहुंचे उन्होंने कहा था कि मैं तो रिटायरमेंट शब्द से ही नफरत करता हूं। बता दें कि जस्टिस ओका ने यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे से लॉ की पढ़ाई करने के बाद जून 1983 से वकालत शुरू की थी। उन्होंने अपने पिता श्रीनिवास ओका के ठाणे जिला अदालत स्थित चेंबर से वकालत शुरू की थी और वहां से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक का सफर तय किया। उनकी 29 अगस्त, 2003 को बॉम्बे हाई कोर्ट में एंट्री हुई थी। तब वह अस्थायी जज थे और फिर 2005 में परमानेंट हुए। वह कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस 10 मई, 2019 को बने थे। फिर वह 31 अगस्त, 2021 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर आए। उनका कार्य़काल शीर्ष अदालत में करीब 4 साल का रहा है। recent visitors 74

अदालत ने आदेश में कहा पत्नी के पास पति से अलग रहने का कोई ठोस कारण नहीं, भरण-पोषण की हक़दार नहीं

इंदौर कुटुंब न्यायालय ने एक महिला की तरफ से लगाई गई भरण-पोषण की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पत्नी के पास अपने पति से अलग रहने का कोई पर्याप्त वैधानिक कारण नहीं है. इसलिए वह भरण-पोषण पाने की अधिकारी नहीं है. हालांकि धीरेंद्र सिंह की कोर्ट ने अवयस्क बच्चों को भरण-पोषण दिए जाने के आदेश दिए हैं. अधिवक्ता डॉ. रूपाली राठौर ने कहा कि अदालत ने अपने फैसले में एक तरह ये माना कि पत्नी स्वयं का भरण पोषण करने में सक्षम नहीं है और पति अपनी पत्नी का भरण पोषण करने में उपेक्षा कर रहा है. लेकिन दूसरी तरफ़ ये भी माना कि पत्नी के पास अपने पति से अलग रहने का कोई पर्याप्त वैधानिक कारण नहीं है. महिला ने मई 2022 में पति के खिलाफ थाने में दर्ज कराई थी शिकायत बताया कि सुलोचना(परिवर्तित नाम) का विवाह सन 2013 में अमन(परिवर्तित नाम) से हुआ था. सन 2022 में सुलोचना ने पति के खिलाफ विवाह के बाद से ही कम दहेज लाने को लेकर ताने मारना, पांच लाख रुपये दहेज की मांग करना, गाली-गलौच व मारपीट करना, डिलीवरी का खर्चा उठाने से मना करने, घर से निकालने को लेकर मई 2022 में पुलिस थाने में शिकायत की. जिसके आधार पर पत्नी ने स्वयं और बच्चों के लिए पति से भरण-पोषण की मांग करते हुए कुटुंब न्यायालय, इन्दौर में याचिका लगाई. पति की और से जवाब पेश करते हुए वकील कृष्ण कुमार कुन्हारे ने कोर्ट को बताया कि पत्नी ने झूठे आधारों पर केस लगाया था. कोर्ट में पत्नी के बयानों एवं पति के वकील के द्वारा पत्नी से पूछे गये सवाल-जवाब के दौरान महत्वपूर्ण बातें उजागर हो गईं. कोर्ट ने माना कि पत्नी खुद और अवयस्क बच्चे का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है कुटुंब न्यायालय ने अपने फैसले में यह तो माना कि पत्नी खुद और अवयस्क बच्चे का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है. और पति भरण -पोषण करने में उपेक्षा कर रहा है. लेकिन माननीय न्यायालय में अपने फैसले में यह भी कहा कि पत्नी ने 2013 में शादी के पश्चात कोई शिकायत नहीं की. पत्नी ने सिर्फ मई 2022 में मामले की शिकायत दर्ज कराई. मई 2022 के पूर्व पत्नी द्वारा प्रताड़ना की कोई रिपोर्ट क्यों नहीं की गई. महिला द्वारा इसका स्पष्टीकरण नहीं देने पर कोर्ट ने विवाह के बाद पैसों के लिए उसको परेशान करने के बयानो को संदेहास्पद माना. ये महत्वपूर्ण फैसला उनके लिए नजीर है जो बिना पर्याप्त वैधानिक कारण पति से अलग रहती हैं और कोर्ट में ख़ुद के भरण-पोषण के लिए गलत आधार पर केस लगाती हैं. recent visitors 47

प्रेम संबंध खराब होने के बाद अपराध के लिए अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा-HC

जबलपुर  मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में पदस्थापना के दौरान न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) के खिलाफ दुष्कर्म व दहेज एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर को हाई कोर्ट ने निरस्त कर दिया. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने आदेश में कहा है "दो साल तक चले संबंध के बाद पीड़िता ने शिकायत दर्ज करवाई. पीड़िता शिक्षित है और सरकारी कर्मचारी है. प्रेम संबंध खराब होने के कारण कथित अपराध के लिए अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा." युवती रिश्वत के केस में फंसी तो शादी से इंकार पन्ना निवासी मनोज सोनी की तरफ से दायर याचिका में कहा गया "वर्ष 2015 में उसके परिवार ने आरोप लगाने वाली युवती के साथ शादी का प्रस्ताव रखा. उसने 14 फरवरी 2018 को युवती को सगाई की अंगूठी पहनाई. लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि युवती के खिलाफ रिश्वत लेने का आपराधिक प्रकरण दर्ज है तो उसने शादी से इंकार कर दिया. इसके बाद युवती ने उसके खिलाफ पन्ना जिले के अजयगढ़ थने में दुष्कर्म व दहेज एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करवा दी." दहेज मांगने के साक्ष्य नहीं मिले एफआईआर में युवती ने आरोप लगाया "शादी का वादा कर उसके साथ जबरन संबंध बनाए और दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर शादी से इनकार कर दिया." सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने कहा "प्रेम संबंध खराब के होने के कारण दुष्कर्म के कथित अपराध के लिए अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना गैरकानूननी है. प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दहेज की मांग के संबंध में भी विश्वसनीय साक्ष्यों का अभाव है. स्पष्ट है कि युवती द्वारा अनावश्यक रूप से उत्पीड़न करने का प्रयास किया गया." रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ बनेगी एसआईटी रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न मामले की जांच में लापरवाही पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की 3 सदस्यीय विशेष जांच टीम के गठित करने आदेश जारी किये हैं. जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने आदेश में कहा है "एसआईटी की अध्यक्षता आईजी स्तर के अधिकारी करेंगे और इसमें एसपी स्तर की महिला अधिकारी को शामिल किया जाएगा. समिति में जबलपुर जिले से किसी को शामिल नहीं किया जाएगा. एकल पीठ ने डीजीपी को 3 दिन के भीतर एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया है." मीटिंग के दौरान अश्लील इशारे करने का आरोप गौरतलब है कि जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय में पदस्थ एक महिला अधिकारी ने कुलपति राजेश कुमार वर्मा के खिलाफ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत पर कार्रवाई न होने पर पीड़ित महिला अधिकारी ने उच्च न्यायालय की शरण ली थी. याचिका में कहा गया है "21 नवंबर 2024 को बैठक के दौरान कुलपति ने अपने कार्यालय में अभद्र हरकतें की. उन्होंने सबके सामने अनुचित टिप्पणियां और इशारे किए. उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत कुलपति कार्यालय से घटना वाले दिन की सीसीटीवी फुटेज मांगे, लेकिन उपलब्ध नहीं कराए गए." याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता आलोक बागरेचा ने किया. recent visitors 44

SC ने मोहन सरकार के उस आदेश को “अवमाननापूर्ण” करार देते हुए रद्द कर दिया, जाने क्या है मामला

भोपाल नौकरशाहों के बीच कामकाज के मूल्यांकन के विवाद का सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पटाक्षेप कर दिया। चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया। इसमें भारतीय वन सेवा (IFS) अफसरों की वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट (ACR) भरने का अधिकार आइएएस अफसरों को देने का 2024 में जारी किया था। कोर्ट ने कहा एपीसीसीएफ के पद तक एसीआर उसके वरिष्ठ को भरनी चाहिए।  केवल पीसीसीएफ के संबंध में रिपोर्टिंग प्राधिकरण वह व्यक्ति होगा, जिसे वह रिपोर्ट करता है या उससे सीनियर है। आवश्यक हो तो जिला प्रशासन द्वारा वित्तपोषित कार्यों के कार्यान्वयन के संबंध में उनके प्रदर्शन की एक अलग शीट पर अपनी टिप्पणियां दर्ज कर सकते हैं। इस पर भी विचार वरिष्ठ आइएफएस के सीनियर अधिकारी ही करेंगे। पत्रिका ने प्रमुखता से उठाया था मुद्दा श्रेष्ठता को लेकर छिड़े विवाद को पत्रिका ने प्रमुखता से उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले की सुनवाई में मौखिक टिप्पणी की थी कि आइएएस अधिकारी आइपीएस और आइएफएस अधिकारियों पर श्रेष्ठता दिखाना चाहते हैं। राज्य के आदेश को आइएफएस एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। एमपी सरकार ने किया आदेश का उल्लंघन बेंच ने दोहराया कि उसके आदेश को केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय ने सही तरीके से समझा था, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार ने कोर्ट के पूर्व आदेशों का उल्लंघन करते हुए आदेश जारी किया। हालांकि अवमानना की कार्यवाही को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने इस फैसले तक पहुंचने के लिए एमिकस क्यूरी एडवोकेट के परमेश्वर व सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता के प्रयासों की सराहना की। recent visitors 43

न्यायालयों में तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को एक की जगह अब दो सप्ताह का अवकाश

जबलपुर मध्य प्रदेश में कार्यरत न्यायालयीन कर्मचारियों के अच्छी खबर है, जबलपुर उच्च न्यायालय ने सभी न्यायालयों में पदस्थ तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के ग्रीष्मकालीन अवकाश में वृद्धि की है, उच्च न्यायालय ने इसके लिए अलग अलग आदेश जारी किये हैं मध्य प्रदेश के न्यायालयों में काम करने वाले कर्मचारियों  के लिए अभी तक एक सप्ताह के ग्रीष्मकालीन अवकाश की सुविधा प्रदान की गई थी यानि न्यायालयों में ग्रीष्मकालीन अवकाश की अवधि में कर्मचारी एक सप्ताह का अवकाश ले सकता था लेकिन अब इसमें बदलाव करते हुए वृद्धि की गई है। तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को एक की जगह अब दो सप्ताह का अवकाश   हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि  05 जुलाई 2018 की कंडिका-4 में दिए आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए, जिला स्थापना एवं कुटुम्ब न्यायालय की स्थापना पर कार्यरत ऐसे कर्मचारी जिनका वेतनमान छठवे वेतन आयोग के अनुसार ग्रेड-पे रुपये 3600/- एवं उससे अधिक है, ऐसे कर्मचारियों को एक सप्ताह के स्थान पर अब दो सप्ताह का ग्रीष्मकालीन अवकाश स्वीकृत किया जाता हैं एवं रुपये 3600/- ग्रेड पे से कम वेतनमान प्राप्त करने वाले समस्त कर्मचारियों को (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को छोड़कर) एक सप्ताह के स्थान पर 10 दिवस का ग्रीष्मकालीन अवकाश स्वीकृत किया जाता है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के अवकाश में भी वृद्धि इसी तरह उच्च न्यायालय ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के अवकाश में भी वृद्धि की है, कोर्ट ने अपने आदेश में बताया कि समस्त नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारीगण, उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश जबलपुर द्वारा 17 मई 2025 को दिए गए आवेदन को स्वीकार करते हुए मुख्यपीठ जबलपुर ने 09 मई 2025 को दिए आदेश मेंआंशिक संशोधन करते हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को स्वीकृत 1 सप्ताह के ग्रीष्मकालीन अवकाश को बढ़ाकर 10 दिवस का ग्रीष्मकालीन अवकाश स्वीकृत किया जाता है। recent visitors 39