बच्चा होने के 7 महीने बाद विधवा महिला ने लिखाई दुष्कर्म की रिपोर्ट, हाईकोर्ट ने किया खारिज

जबलपुर  बच्चा पैदा होने के सात महीने बाद विधवा महिला द्वारा युवक पर दुष्कर्म का आरोप लगाया गया. इस मामले को हाईकोर्ट जस्टिस संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने खारिज कर दिया. मामले में जो तथ्य सामने आए उन्हें ध्यान में रखते हुए एफआईआर को निरस्त करने के आदेश दिए गए. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि भौतिक परिस्थितियों पर विचार करते हुए ऐसा नहीं माना जा सकता है कि दोनों के बीच विवाह के झूठे वादे के आधार पर संबंध बने थे. दोनों पति-पत्नी की रहते थे और एक बच्चे को जन्म दिया है. भरण-पोषण व अन्य राहत का दावा करने के लिए महिला उचित कार्यवाही कर सकती है. पति की मौत के बाद बने संबंध दरअसल, जबलपुर निवासी आवेदक की ओर से याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि महिला की शिकायत पर अधारताल थाने में उसके खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया है. एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ता महिला की आयु 32 साल है और उसके पति की मृत्यु साल 2021 में हो गई थी. पति का दोस्त होने के कारण आवेदक का महिला के घर में आना जाना था और मोबाइल पर बातचीत होने लगी. पति की मृत्यु के लगभग तीन महीने बाद मई 2021 में दोनों ने शादी करने का फैसला किया और इस तरह दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए और दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे. शिकायतकर्ता महिला ने बताया कि इस संबंध से वह गर्भवती हो गई और उसने बच्चे को जन्म दिया, लेकिन आवेदक ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया. शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि शादी का झूठा आश्वासन देकर आवेदक पिछले तीन वर्षों से उसका शारीरिक शोषण कर रहा है. लंबे समय तक सहमति से बने संबंध, ये दुष्कर्म नहीं महिला की शिकायत पर आवेदक युवक की ओर से तर्क दिया गया कि उसने कभी शादी का कोई झूठा वादा नहीं किया. उसने बताया कि दोनों के बीच आपसी सहमति से वर्षों तक संबंध स्थापित रहे. कोर्ट में तर्क दिया गया कि परिस्थितियों को देखकर स्पष्ट है कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां एक या दो बार शारीरिक संबंध विकसित हुए हों. दोनों के बीच संबंध कई वर्षों तक जारी रहे. इतने लंबे समय के बाद अगर ऐसी शिकायत दर्ज की जाती है, तो वह दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता है. हाईकोर्ट के आदेश में सुप्रीमकोर्ट का हवाला एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि मौजूदा तथ्यात्मक परिस्थितियों के आधार पर संबंध को विवाह के झूठे वादे पर विकसित होना नहीं माना जा सकता है. ऐसे आरोपों को कार्रवाई शुरू करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है. ऐसे आरोप पक्षों के बीच संबंधों में कड़वाहट के कारण हो सकते हैं. इस तरह बिना किसी ठोस सबूत के आपराधिक अभियोजन शुरू नहीं किया जा सकता है. एकलपीठ ने एफआईआर को निरस्त करते हुए महिला को आगे स्वतंत्रता प्रदान की है, कि वह जीवन यापन भत्ते आदि के लिए अपना पक्ष रख सकती है. क्या है मामला जबलपुर निवासी वीरेंद्र वर्मा ने उसके ऊपर दर्ज हुए केस के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। उसने बताया कि अधारताल थाने में उसके खिलाफ बलात्कार की एफआईआर दर्ज की गई है। याचिका में कहा गया था कि एफआईआर के अनुसार शिकायत करने वाली महिला की आयु 32 साल है। उसके पति की साल 2021 में मृत्यु हो गयी थी। पति का दोस्त होने के कारण आवेदन का महिला के घर आना जाना था और मोबाइल पर बातचीत प्रारंभ हो गयी। सहमति से साथ रहने का लिया फैसला पति की मृत्यु के लगभग तीन महीने बाद आवेदन के उसके समक्ष शादी का प्रस्ताव भी रखा। दोनों ने सहमति से मई 2021 में शादी करने का निर्णय लिया था। इस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए। दोनों पति-पत्नी की तरह लंबे समय तक साथ रहे और इस दौरान एक बच्चे का जन्म हुआ, जो लगभग सात माह का है। लेकिन आवेदक ने शादी करने से इनकार कर दिया। महिला ने आरोप लगाया कि शादी का झूठा आश्वासन देकर कई सालों से उसका शारीरिक शोषण करता रहा। महिला ने दर्ज कराई एफआईआर शिकायतकर्ता महिला ने शारीरिक शोषण करने का आरोप लगाते हुए उसके खिलाफ जनवरी 2025 में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। आवेदक की तरफ से तर्क दिया गया कि उसने शादी का कोई झूठा वादा नहीं किया। उसने बताया कि दोनों के बीच आपसी सहमति से वर्षों तक संबंध स्थापित रहे। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियों को देखकर स्पष्ट है कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां एक या दो बार शारीरिक संबंध विकसित हुए हों। दोनों के बीच संबंध कई वर्षों तक जारी रहे। इतने लंबे समय के बाद अगर ऐसी शिकायत दर्ज की जाती है, तो वह दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने इस तर्क से खारिज की याचिका एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा तथ्यात्मक परिस्थितियों के आधार पर संबंध को विवाह के झूठे वादे पर विकसित होना नहीं माना जा सकता है। ऐसे आरोपों को कार्रवाई शुरू करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। पक्षों के बीच संबंधों में कड़वाहट के कारण ऐसा हो सकते हैं। इस तरह बिना किसी ठोस सबूत के आपराधिक अभियोजन शुरू नहीं किया जा सकता है। एकलपीठ ने एफआईआर को निरस्त करते हुए महिला को उक्त स्वतंत्रता प्रदान की है। recent visitors 44

विवादित टिप्पणी करने वाले मंत्री विजय शाह के खिलाफ आज SC में सुनवाई, कोर्ट के रुख पर BJP की निगाहें

भोपाल  मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री विजय शाह (Vijay Shah Controversial Remark) की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कर्नल सोफिया पर विवादित बयान देने के बाद से वो कानूनी चंगुल में फंस गए हैं। आज सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनावई होनी है। विजय शाह ने कर्नल सोफिया (Colonel Sophia Qureshi) पर विवादित टिप्पणी की तो मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विजय शाह के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दे दिया। विजय शाह ने जब इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसपर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी फटकार बीते दिन सीजेआई बीआर गवई ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। साथ ही उन्होंने मंत्री कुवंर विजय सिंह को भी जमकर फटकार लगाई। मंत्री विजय शाह ने सुप्रीम कोर्ट से अर्जेंट हियरिंग की मांग की थी, जिसे ठुकराते हुए आज (16 मई) की तारीख दे दी गई थी। विजय शाह को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था-     राज्य के कैबिनेट मंत्री जैसे संवैधानिक पद पक बैठे व्यक्ति को बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए। आपसे इस तरह के बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती है। आप मंत्री होकर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या यह आपको शोभा देता है? जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई FIR बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद एमपी सरकार में मंत्री विजय शाह ने कर्नल सोफिया को 'आतंकवादियों की बहन' कहा था। उनके इस बयान पर सख्त रुख अपनाते हुए एमपी हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 152, 196 (1)(b) और 197(1)(c) के तहत केस दर्ज करने का आदेश दिया था। विजय शाह ने मांगी माफी मामला गंभीराने के बाद मंत्री विजय शाह ने अपने बयान पर माफी भी मांगी थी। उनका कहना था कि मैं सपने में भी कर्नल सोफिया के बारे में गलत नहीं सोच सकता। सोफिया ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर देश की सेवा की है। मैं उन्हें सलाम करता हूं। अगर जोश में मेरे मुंह से कुछ गलत निकल गया हो तो उसके लिए मैं माफी चाहता हूं। इस्तीफे का बन रहा है दबाव विजय शाह का यह बयान सियासी गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया है। एमपी सरकार पर विजय शाह को मंत्री पद से हटाने का दबाव बन रहा है। खबरों की मानें तो मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने विजय शाह से मुलाकात की थी। मगर, उन्होंने इस्तीफा देने से साफ मना कर दिया है। अब सबकी नजर आ सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है। recent visitors 37

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज का ऑडिट करने की बात कही

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि कुछ जज जरूरत से ज्यादा ब्रेक लेते हैं। कोर्ट ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज का ऑडिट करने की बात कही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ कई शिकायतें मिल रही हैं। अब यह देखने का समय है कि उन पर कितना खर्च हो रहा है और वे कितना काम कर रहे हैं। 'हाई कोर्ट के जज ले रहे बहुत ब्रेक' सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच ने हाई कोर्ट के जजों के कामकाज पर टिप्पणी की। जस्टिस कांत ने कहा कि यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा, 'कुछ जज बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन कुछ जज बेवजह कॉफी ब्रेक लेते हैं, कभी यह ब्रेक तो कभी वह ब्रेक। हम हाई कोर्ट के जजों के बारे में बहुत सारी शिकायतें सुन रहे हैं। यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। हाई कोर्ट के जजों का प्रदर्शन कैसा है? हम कितना खर्च कर रहे हैं और आउटपुट क्या है? यह उच्च समय है कि हम एक प्रदर्शन ऑडिट करें।' झारखंड हाई कोर्ट से जुड़ा है मामला यह टिप्पणी चार लोगों की याचिका पर आई। इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि झारखंड हाई कोर्ट ने 2022 में एक आपराधिक अपील पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। यह अपील सजा और आजीवन कारावास के खिलाफ थी, लेकिन फैसला नहीं सुनाया गया। उनके वकील फौजिया शकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कहने के बाद हाई कोर्ट ने 5 और 6 मई को फैसला सुनाया। फैसले में चार में से तीन लोगों को बरी कर दिया गया। आखिरी मामले में अलग-अलग फैसला आया और इसे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को भेज दिया गया। याचिकाकर्ता को जमानत मिल गई। शकील ने कहा कि फैसले के बाद भी बरी किए गए लोगों को जेल से रिहा नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने फैसले में यह नहीं बताया कि आदेश कब सुरक्षित रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताई और झारखंड सरकार के वकील को दोपहर के भोजन के ब्रेक से पहले उन्हें तुरंत रिहा करने के लिए कहा। कोर्ट ने मामले को दोपहर 2 बजे के बाद पोस्ट कर दिया। वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दोषियों को रिहा कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट से रिहाई के आदेश नहीं मिलने के कारण देरी हुई। 'फैसले सुनाने की समयसीमा का पालन करना होगा' बेंच ने कहा कि इस अदालत द्वारा पहले निर्धारित फैसले सुनाने की समयसीमा का पालन करना होगा। इसके साथ ही, इस अदालत द्वारा प्रस्तावित तंत्र का भी पालन करना होगा। बेंच ने रजिस्ट्री को हाई कोर्ट से डेटा एकत्र करने और मामले को जुलाई में पोस्ट करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि पहले जो समय तय किया गया था, फैसले सुनाने के लिए, उसका पालन करना होगा। कोर्ट एक तरीका भी बताएगा जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके। कोर्ट ने रजिस्ट्री को कहा कि वह सभी हाई कोर्ट से जानकारी जुटाए और मामले को जुलाई में फिर से सुनेगा।   recent visitors 43

प्रदेश के लाखों पेंशनर्स को 1 मई 2023 से 7% ब्याज के साथ एक वेतनवृद्धि सहित सभी अनुषांगिक लाभों का भुगतान 6 सप्ताह में जाए

इंदौर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पक्ष में राहतकारी आदेश दिए हैं। चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत व जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने कहा है कि पेंशनर्स को 1 मई 2023 से 7% ब्याज के साथ एक वेतनवृद्धि सहित सभी अनुषांगिक लाभों का भुगतान 6 सप्ताह में जाए। 2024 में पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर दायर की गई थी याचिका पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन, भोपाल के अध्यक्ष आमोद सक्सेना और नर्मदापुरम के दिनेश कुमार चतुर्वेदी ने 2024 में याचिका दायर की। कोर्ट को बताया कि सेवानिवृत्ति की आयु पूरी करने से पहले वे सभी एक वार्षिक वेतन वृद्धि पाने के हकदार हैं। हाई कोर्ट से पेंशनर्स को मिली बड़ी राहत हाई कोर्ट ने इस मामले में पेंशनर्स (MP Pensioners) को राहत देते हुए अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया कि वित्तीय लाभ केवल 1 मई 23 से 7% ब्याज के साथ दिया जाएगा। वहीं ये लाभ पेंशनर्स को तय की गई समय सीमा के अंदर ही दिया जाना चाहिए। बता दें कि कोर्ट के इस फैसले से एमपी के लाखों पेंशनर्स को राहत मिल गई है। recent visitors 32

MP हाइकोर्ट ने INC और एमपी नर्सिंग काउंसिल के अफसरों को किया तलब

 जबलपुर नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता में हुए फर्जीवाड़े मामले में लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन की जनहित याचिका के साथ सभी अन्य नर्सिंग मामलों की सुनवाई हाई कोर्ट की स्पेशल बेंच में  जस्टिस संजय द्विवेदी और जस्टिस अचल कुमार पालीवाल के समक्ष हुई, जिसमें इंडियन नर्सिंग काउंसिल की सचिव और एमपी नर्सिंग काउंसिल के रजिस्ट्रार व चेयरमैन को हाई कोर्ट में हाजिर होने के आदेश दिए है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आवेदन पेश कर कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट के तीन बार आदेश देने के बावजूद इण्डियन नर्सिंग काउंसिल और एमपी नर्सिंग काउंसिल के ज़िम्मेदार अधिकारी मान्यता से जुड़े पूरे रिकॉर्ड पेश नहीं कर रहे हैं, आरोप लगाया गया कि वे दोषियों को बचाने के उद्देश्य से हाई कोर्ट के आदेश की लगातार अवहेलना कर रहे हैं जिस कारण से उनके विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाये। काउंसिल के ज़िम्मेदार अधिकारियों को अगली सुनवाई में हाजिर होने के निर्देश हाई कोर्ट ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करना और रिकॉर्ड पेश नहीं कर दोषियों को बचाने का एक प्रयास करना, न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने के समान है इसलिए काउंसिल के ज़िम्मेदार अधिकारियों को अगली सुनवाई में हाई कोर्ट के समक्ष पेश होकर इस मामले में स्पष्टीकरण देना होगा कि आख़िर हाई कोर्ट के आदेश का पालन क्यों नहीं किया गया? HC के निर्देश पर गठित कमेटी की भूमिका पर सवाल   याचिकाकर्ता ने एक अन्य आवेदन पेश कर हाई कोर्ट को बताया कि नर्सिंग मामलों हेतु हाई कोर्ट द्वारा गठित उच्च स्तरीय कमेटी के द्वारा 30 अपात्र कॉलेजों के छात्रों को दूसरे कॉलेजों में ट्रांसफ़र कर दिया गया है और इसके लिए कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है और ना ही छात्रों को मनपसंद कॉलेजों को चुनने का विकल्प दिया गया । 31 मई तक अंतिम कार्यवाही का प्रतिवेदन हाई कोर्ट में सौंपने के आदेश इस मामले में हाई कोर्ट ने नर्सिंग काउंसिल को आदेश दिया है कि सभी अनसुटेबल कॉलेजों के छात्रों को पारदर्शीपूर्ण तरीक़े से छात्रों को विकल्प चुनने का अवसर देते हुए सुटेबल कॉलेजों में ट्रांसफ़र किया जाए साथ ही इस पूरी प्रक्रिया से नोडल अधिकारी को दूर रखा जाये। हाई कोर्ट ने यह भी आदेश दिए हैं कि चूँकि कमेटी को हाई कोर्ट के द्वारा सौंपे गये कार्य संपन्न हो चुके हैं इसलिए अब कमेटी को 31 मई तक अंतिम कार्यवाही का प्रतिवेदन हाई कोर्ट में सौंपना होगा। recent visitors 46

HC ने टाइगर रिजर्व की सीमा से 10 किलोमीटर के भीतर संचालित आरा मशीनों को हटाने के निर्देश किए जारी

जबलपुर मध्यप्रदेश के विश्वप्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर जबलपुर उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने टाइगर रिजर्व की सीमा से 10 किलोमीटर के भीतर संचालित सभी आरा मशीनों और अन्य काष्ठ आधारित उद्योगों को हटाने के निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश उमरिया निवासी सीमांत रैकवार द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया गया है। याचिका में कहा गया था कि उमरिया शहर के विनायक टाउन क्षेत्र में संतोष गुप्ता नामक व्यापारी द्वारा संचालित आरा मशीन से न केवल ध्वनि और वायु प्रदूषण फैल रहा है, बल्कि यह वन क्षेत्र के समीप नियमों का उल्लंघन कर संचालित हो रही है। सीमांत रैकवार ने इसकी शिकायत वन विभाग और जिला प्रशासन से की थी, लेकिन कोई सकारात्मक कार्रवाई न होने के कारण उन्होंने उच्च न्यायालय की शरण ली। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि न केवल संबंधित आरा मशीन नियमों का उल्लंघन कर रही है, बल्कि इस प्रकार के अन्य काष्ठ उद्योग भी बफर जोन के भीतर चल रहे हैं, जो पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देशित किया कि टाइगर रिजर्व की सीमा से 10 किलोमीटर के भीतर स्थापित सभी आरा मशीनों और काष्ठ उद्योगों की जांच कर 90 दिनों के भीतर उन्हें बंद किया जाए। इसके साथ ही वन विभाग, पार्क प्रबंधन और जिला प्रशासन को कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायालय ने इस मामले में वन विभाग की निष्क्रियता पर भी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "आप जंगलों को समाप्त करना चाहते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे।" यह टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि वन संरक्षण को लेकर न्यायपालिका कितनी गंभीर है। यह आदेश भारत सरकार द्वारा 16 नवंबर 2016 को जारी नोटिफिकेशन के आधार पर दिया गया है, जिसमें टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिबंध के स्पष्ट निर्देश हैं। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जितेंद्र तिवारी और उनके सहायक रुद्र प्रताप द्विवेदी ने प्रभावशाली पैरवी की।   recent visitors 40

CM ने लॉयर्स चैंबर और मल्टीलेवल पार्किंग का किया भूमिपूजन, 117 करोड़ की लागत से होगा निर्माण

जबलपुर हाईकोर्ट में 117 करोड़ की लागत से लॉयर्स चेम्बर और मल्टी लेवल पार्किंग बनेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार को उच्च न्यायालय परिसर में प्रोजेक्ट का भूमिपूजन किया। मुख्यमंत्री(CM Mohan Yadav) ने कहा कि अधिवक्ताओं की वर्षों पुरानी मांग आज पूरी हो रही है। इससे न केवल पार्किंग की दिक्कतें कम होगी बल्कि अधिवक्ताओं को बैठने की समुचित व्यवस्था हो सकेगी। ये रहे मौजूद भूमिपूजन कार्यक्रम के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी, जस्टिस एससी शर्मा तथा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत, हाईकोर्ट जज संजीव सचदेवा, संजय द्विवेदी, जस्टिस विवेक कुमार जैन, महाधिवक्ता प्रशांत सिंह सहित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन एवं एडवोकेट्स बार एसोसिएशन से भी अन्य न्यायाधीश उपस्थित रहे। चार मंजिला होगी पार्किंग अधिवक्ताओं में इस परियोजना को लेकर खासा उत्साह देखा गया। चार मंजिला बनने वाली मल्टी लेवल पार्किंग के ऊपर के फ्लोर्स पर लायर्स चेम्बर्स की सुविधा होगी। उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट में करीब 6 हजार अधिवक्ता कार्यरत हैं। इनको वाहनों की पार्किंग और बैठने को लेकर समस्या से जूझना पड़ता है। लंबे समय से चेम्बर्स और पार्किंग की मांग की जा रही थी। सर्किट हाउस में की मुलाकात मुख्यमंत्री डॉ. यादव सुबह साढ़े दस बजे डुमना एयरपोर्ट पहुंचे। वे सीधे सर्किट हाउस पहुंचे। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों से मझौली और पाटन के दौरे की तैयारियों के संबंध में चर्चा भी की। हाईकोर्ट परिसर में कार्यक्रम में शामिल होने के बाद मुख्यमंत्री रीवा के लिए रवाना हुए। recent visitors 40