मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि नर्सिंग परीक्षा तिथियों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाए

जबलपुर प्रदेश में नर्सिंग कॉलेजों में फर्जीवाड़े को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने नर्सिंग परीक्षाओं को घोषित समय सारिणी के अनुसार ही आयोजित करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति संजय द्विवेदी एवं न्यायमूर्ति ए.के. पालीवाल की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि परीक्षा तिथियों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाए। याचिका लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल बघेल की ओर से दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्रदेश में कई नर्सिंग कॉलेज नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे हैं। कोर्ट को बताया गया कि कॉलेजों की जांच प्रक्रिया के चलते पिछले कुछ वर्षों में परीक्षाएं लगातार टलती रही हैं और कई बार घोषित तारीखों को रद्द या संशोधित भी किया गया है, जिससे विद्यार्थियों को भारी असुविधा हुई है। उल्लेखनीय है कि घोषित कार्यक्रम के अनुसार नर्सिंग परीक्षाएं 28 और 29 अप्रैल को आयोजित की जानी हैं। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पात्र कॉलेजों के छात्रों के लिए विशेष परीक्षा आयोजन के मुद्दे पर न्यायालय आगे सुनवाई करेगा। हाई लेवल कमेटी की भूमिका समाप्त हाईकोर्ट ने पहले सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की थी, जिसका उद्देश्य सीबीआई जांच में दोषी पाए गए कॉलेजों की कमियों की सुनवाई कर उन्हें 'सूटेबल' अथवा 'अनसूटेबल' की श्रेणी में सूचीबद्ध करना था। अब कोर्ट ने इस कमेटी की भूमिका समाप्त कर दी है। मध्यप्रदेश नर्सिंग काउंसिल ने नए सत्र की मान्यता प्रक्रिया शुरू कर दी है। सभी कॉलेजों को अब विधिवत आवेदन प्रस्तुत कर मान्यता के लिए पुनः प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिस पर आवश्यक जांच के बाद निर्णय लिया जाएगा। याचिका की सुनवाई के दौरान शासन की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी, याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आलोक बागरेचा और विशाल बघेल ने पक्ष रखा। अगली सुनवाई 9 मई को निर्धारित की गई है।   recent visitors 33

केंद्र सरकार ने वक्फ संशोधन एक्ट पर जवाबी हलफनामा दाखिल किया, धार्मिक अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं…

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने वक्फ संशोधन एक्ट पर जवाबी हलफनामा दाखिल किया है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में सरकार ने कानून का बचाव करते हुए यानी इसे सही ठहराते हुए कहा है कि पिछले 100 साल से वक्फ बाई यूजर को केवल पंजीकरण के आधार पर मान्यता दी जाती है ना कि मौखिक रूप से. केंद्र सरकार ने हलफनामे में कहा कि वक्फ मुसलमानों की कोई धार्मिक संस्था नहीं बल्कि वैधानिक निकाय है. वक्फ संशोधन कानून के मुताबिक मुतवल्ली का काम धर्मनिरपेक्ष होता है न कि धार्मिक. ये कानून चुने गए जनप्रतिनिधियों की भावनाओं को दर्शाता है. उन्होंने ही बहुमत से इसे पारित किया है. केंद्र सरकार ने कोर्ट में वक्फ को लेकर जो हलफनामा दाखिल किया है, उसमें कहा गया है कि संसद द्वारा पारित कानून को संवैधानिक रूप से वैध माना जाता है, विशेष रूप से संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिशों और संसद में व्यापक बहस के बाद बना हुए कानून को. केंद्र ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह अभी किसी भी प्रावधान पर अंतरिम रोक नहीं लगाए. इस संशोधन कानून से किसी भी व्यक्ति के वक्फ बनाने के धार्मिक अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं होता. केवल प्रबंधन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इस कानून में बदलाव किया गया है. बता दें कि इस बिल को पारित करने से पहले संयुक्त संसदीय समिति की 36 बैठकें हुई थीं और 97 लाख से ज्यादा हितधारकों ने सुझाव और ज्ञापन दिए थे. समिति ने देश के दस बड़े शहरों का दौरा कर जनता के बीच जाकर उनसे उनके विचार जाने थे.   recent visitors 42

निशिकांत दुबे के बयान पर बढा विवाद, SC बोला आपको हमारी अनुमति की नहीं, आपको अटॉर्नी जनरल से मंजूरी लेनी होगी

नई दिल्ली बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के सुप्रीम कोर्ट पर दिए बयान से बवाल मचा है. सोमवार को दुबे के खिलाफ अवमानना कार्यवाही की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान वकील ने कहा, इस कोर्ट के बारे में और CJI के खिलाफ बयान दिए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निशिकांत दुबे के बयानों का भी उल्लेख किया गया. इस पर जस्टिस बीआर गवई ने पूछा कि आप क्या चाहते हैं? इस पर वकील ने कहा, मैं अवमानना ​​का केस दर्ज करवाना चाहता हूं. जस्टिस गवई ने दोटूक जवाब दिया और कहा, तो आप इसे दाखिल कीजिए. आपको हमारी अनुमति की जरूरत नहीं है. आपको अटॉर्नी जनरल से मंजूरी लेनी होगी. इससे पहले अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा की तरफ से CJI और सुप्रीम कोर्ट के जजों को पत्र लिखा गया था. इस याचिका में निशिकांत के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की गई थी. पत्र में कहा गया था कि दुबे द्वारा देश के सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ दिए गए सार्वजनिक बयान अपमानजनक और भड़काऊ हैं. ये बयान झूठे, लापरवाह और दुर्भावनापूर्ण हैं, और ये आपराधिक अवमानना ​​के बराबर हैं. ये बयान न्यायपालिका को डराने, सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काने और संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को बदनाम करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है. दुबे ने शीर्ष अदालत को निशाना बनाते हुए कहा था कि यदि सुप्रीम कोर्ट को ही कानून बनाना है तो संसद एवं विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना पर निशाना साधते हुए उन्हें देश में ‘सिविल वॉर’ के लिए जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि बीजेपी ने दुबे के बयान से खुद को अलग कर लिया। लेकिन कानून के जानकार इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के तौर देख रहे हैं। बहरहाल, इस मामले में सुप्रीम का रुख चाहे जो भी हो, लेकिन शीर्ष कोर्ट के अवमानना के मामले पहले भी सामने आए हैं जिसमें कोर्ट ने एक्शन लिया। आइए जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के पांच हाई प्रोफाइल मामले कौन से हैं? 1. बाबा रामदेव मामला (2024) बाबा रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद ने एलोपैथी और आधुनिक चिकित्सा के खिलाफ कई विवादित विज्ञापन दिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें विज्ञापन और बयान रोकने का आदेश दिया। रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया और निगेटिव विज्ञापन देना जारी रखा। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अवमानना का नोटिस जारी किया। रामदेव और बालकृष्ण ने अदालत में बिना शर्त माफी मांगने का हलफनामा दाखिल किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। 2. प्रशांत भूषण मामला (2020) सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और सोशल एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने जुलाई 2020 में ट्विटर पर दो ट्वीट किए। एक में उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बिना हेलमेट और मास्क के हार्ले डेविडसन बाइक पर बैठे हुए दिखाया और लिखा कि जब देश में लॉकडाउन था, तब CJI छुट्टी पर हैं। दूसरे ट्वीट में उन्होंने कहा कि पिछले 6 वर्षों में भारत की शीर्ष कोर्ट ने लोकतंत्र को कमजोर करने में भूमिका निभाई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और प्रशांत भूषण के खिलाफ क्रिमिनल कंटेम्प्ट की कार्यवाही शुरू की। प्रशांत भूषण ने माफी मांगने से इनकार कर दिया और कहा कि यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा और विश्वास बनाए रखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को दोषी पाया और ₹1 जुर्माना लगाया। प्रशांत भूषण ने बाद में जुर्माना भर दिया। 3. विजय माल्या मामला (2017) विजय माल्या किंगफिशर एयरलाइंस और कई बैंकों से लिए गए हजारों करोड़ रुपये के कर्ज़ विवाद के बाद भारत से भाग गया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि माल्या किसी भी तरह की संपत्ति का हस्तांतरण नहीं करेंगे। इसके बावजूद, माल्या ने अपने बच्चों के बैंक अकाउंट में 40 मिलियन डॉलर ट्रांसफर कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने विजय माल्या को जानबूझकर आदेश की अवहेलना करने का दोषी माना। कोर्ट ने माल्या को अवमानना का अपराधी करार दिया था। 4. जस्टिस सी. एस. कर्णन मामला (2017) कलकत्ता हाई कोर्ट के तत्कालीन जज सी.एस. कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए सार्वजनिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाए और अदालत के समन को नज़रअंदाज़ किया। सुप्रीम कोर्ट ने सात सीनियर जजों की बेंच गठित कर कर्णन के खिलाफ अवमानना की सुनवाई की। कर्णन लगातार कोर्ट में पेश नहीं हुए और सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बयान देते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 6 महीने जेल की सजासुनाई। 5. अरुंधति रॉय मामला (2002) प्रसिद्ध लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट अरुंधति रॉय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थन में बयान देते हुए सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की, जिसमें नर्मदा डैम परियोजना को हरी झंडी दी गई थी। उन्होंने एक लेख और प्रेस वक्तव्य में कहा कि कोर्ट ने गरीबों के अधिकारों की अनदेखी की है। सुप्रीम कोर्ट ने अरुंधति रॉय के बयान को 'न्यायपालिका की अवमानना' माना और उन्हें तलब किया। रॉय ने अपने बयान पर खेद नहीं जताया और अपने विचारों को सही बताया। कोर्ट ने अरुंधति रॉय को एक दिन जेल और ₹2000 जुर्माना की सजा दी। पत्र में CJI से बयानों का स्वतः संज्ञान लेने और आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने का आग्रह किया गया था. recent visitors 34

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आपसी रजामंदी से तलाक के बाद भी पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण

बिलासपुर  पति पत्नी आपसी सहमति से तलाक ले रहे है तो भी पति को पत्नी का भरण पोषण देना होगा। ये फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल ने तलाक और भरण पोषण के मामले में सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जब तक तलाकशुदा पत्नी की दूसरी शादी नहीं हो जाती, वह भरण-पोषण की हकदार होती है। यह पति की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी पूर्व पत्नी को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करे। इस आदेश के साथ ही कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति के बाद भी पति को भरण-पोषण के लिए भत्ता देना होगा। हाईकोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पति की याचिका को खारिज कर दी है। पीड़िता ने लगाई थी याचिका दरअसल, मुंगेली जिले के एक युवक और युवती की शादी 12 जून 2020 को हुई थी। कुछ ही समय बाद उनके बीच विवाद शुरू हो गया। जिसके बाद महिला ने आरोप लगाया कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है और घर से निकाल दिया गया है। 27 जून 2023 को महिला ने मुंगेली के फैमिली कोर्ट में 15,000 प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग करते हुए परिवाद दायर की। उसने बताया कि उसका पति ट्रक ड्राइवर है और खेती से भी सालाना दो लाख रुपए की कमाई होती है। प्रतिमाह 3000 गुजारा भत्ता देने फैमिली कोर्ट का आदेश युवक ने कोर्ट में दावा किया कि पत्नी बिना कारण ससुराल छोड़ चुकी है। जिसके बाद दोनों का आपसी सहमति से तलाक 20 फरवरी 2023 को हो चुका है। इसलिए वह किसी भी तरह से भत्ता देने का हकदार नहीं है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैमिली कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में महिला को प्रतिमाह 3,000 रुपए भरण-पोषण देने का आदेश दिया। फैमिली कोर्ट के आदेश को दी चुनौती, याचिका खारिज युवक ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि महिला ने दूसरी शादी कर ली है और अब भत्ते की हकदार नहीं है। इसके समर्थन में प्रकाश ने एक कथित पंचनामा और कवरिंग लेटर दाखिल किया, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे कानूनी रूप से अप्रासंगिक बताया, क्योंकि वह अभिप्रमाणित नहीं है। जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि, तलाकशुदा पत्नी, जब तक वह पुनर्विवाहित नहीं हो जाती, वह भरण-पोषण की हकदार होती है। recent visitors 37

मध्य प्रदेश में अब जमानत मिलने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई, अब अपराधियों को आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी

इंदौर  मध्य प्रदेश में अब जमानत मिलने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है. अब अपराधियों को आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट समेत सभी खंडपीठ के लिए फार्मेट जारी किया है. हाईकोर्ट में अब जमानत याचिका लगाने वाले संबंधित व्यक्ति को अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी भी कोर्ट के सामने रखनी पड़ेगी. सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश से जुड़े जमानत के मामलों में यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है. 1 मई से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी. जमानत देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर समेत इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ को जमानत याचिका या अलग-अलग तरह के मामलों की सुनवाई करने को लेकर एक फॉर्मेट जारी किया है. इसके चलते जिस भी व्यक्ति को किसी मामले में सजा हो गई है या फिर वह जमानत या अग्रिम जमानत को लेकर कोर्ट के समक्ष याचिका लगता है, तो उसे अपने पिछले आपराधिक रिकॉर्ड की पूरी जानकारी जमानत याचिका के साथ कोर्ट के सामने प्रस्तुत करनी होगी. इसके बाद कोर्ट उस पूरे मामले में सुनवाई कर तय करेगा कि जमानत दी जाए या नहीं. अपराधियों को ऐसे मिल जाता था फायदा अभी तक जो भी व्यक्ति अग्रिम जमानत, जमानत या सजा पर रोक के लिए याचिका कोर्ट के सामने प्रस्तुत करता है तो कोर्ट संबंधित थाना पुलिस को निर्देश जारी कर उनसे संबंधित जानकारी मांगती है. जिसके चलते पुलिस कई बार इस तरह की जानकारी कोर्ट के समक्ष तय समय में उपलब्ध नहीं करवा पाती है. जिसका फायदा संबंधित आरोपी को हो जाता है और उसे कई बार आसानी से जमानत मिल जाती है. ऐसे में कई अपराधी ऐसे भी होते हैं जिनके पिछले आपराधिक रिकॉर्ड में गंभीर मामले दर्ज होते हैं. इंदौर के कुख्यात गुंडे को मिल गई थी जमानत बता दें कि पिछले दिनों इंदौर के एक कुख्यात गुंडे हेमंत यादव पर तकरीबन एक दर्जन से अधिक प्रकरण दर्ज थे लेकिन पुलिस ने हेमंत यादव से संबंधित जानकारियां कोर्ट के सामने प्रस्तुत नहीं की. जिसके चलते उसे आसानी से सजा के एक मामले में जमानत मिल गई. इस तरह की घटनाओं को देखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर समेत इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ को नए फॉर्मेट पर सुनवाई करने के आदेश दिए हैं. 1 मई से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी. यह व्यवस्था लागू होने के बाद कुख्यात आरोपियों को हाईकोर्ट से आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी. recent visitors 33

मध्यप्रदेश में 9 साल बाद भी स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए उपकरण खरीदी नहीं होने पर हाईकोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया

 जबलपुर मध्यप्रदेश में 9 साल बाद भी स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए उपकरण खरीदी नहीं होने पर हाईकोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया है। हाईकोर्ट ने तुरंत टेंडर जारी कर कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए उपकरण खरीदी के निर्देश दिए हैं। शासन की ओर से 6 मई को टेंडर खोलने की अंडरटेकिंग दी गई है। मेडिकल एजुकेशन विभाग के प्रमुख सचिव और मध्य प्रदेश लोक स्वास्थ्य सेवा निगम के एमडी कोर्ट में हाजिर हुए। पिछली सुनवाई में हाइकोर्ट ने स्वास्थ्य सेवा निगम के एमडी और चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव को तलब किया था। बता दें कि 84 करोड रुपए मिलने के बाद भी 9 साल में जबलपुर स्थित स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में उपकरण नहीं आ पाए है। तीन बार टेंडर बुलाकर निरस्त कर दिया गया था। जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की बैंच में सुनवाई हुई हैं। अब 13 मई को मामले की अगली सुनवाई होगी। जबलपुर निवासी एडवोकेट विकास महावर ने मामले में याचिका लगाई है। याचिका में जबलपुर स्थित स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में पर्याप्त साधन नहीं होने की बात कही है। याचिका में कहा गया उपकरण के अभाव में पीड़ितों को पर्याप्त इलाज नहीं मिल पा रहा है। खरीदी के लिए 84 करोड़ रुपए मिलने के बाद खरीदी नहीं की गई। उपकरण खरीदी के लिए साल 2016 में 84 करोड़ रुपए मिले थे। पिछली सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से बताया गया था कि तकनीकि कारण से दो-तीन बार टेंडर प्रक्रिया को निरस्त किया गया है। उपकरण खरीदी मप्र लोक सेवा स्वास्थ्य निगम के द्वारा की जानी है। युगलपीठ ने मप्र लोक सेवा स्वास्थ्य निगम के एमडी को अनावेदक बनाने के निर्देश याचिकाकर्ता को दिए थे। टेंडर किन कारणों से निरस्त किये गये थे, इस संबंध में जानकारी प्रदान करने लिए स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव मप्र लोक सेवा स्वास्थ्य निगम के एमडी को युगलपीठ ने व्यक्तिगत रूप से तलब किया गया था। याचिका की सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव संदीप यादव ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर युगलपीठ को बताया कि पूर्व में जारी टेंडर में एक-दो प्रतिभागी ने हिस्सा लिया था। जिसके कारण उन्हें निरस्त किया गया है। तकनीकी बोली 29 अप्रैल को खोली जानी है, जिसमें जबलपुर केन्द्र के लिए उपकरण एवं मशीन भी जोड़ दी गई है। लोक स्वास्थ्य सेवा निगम के प्रबंध निदेशक की तरफ से बताया गया कि टेंडर 6 मई को खोलना संभव हो पाएगा। युगल पीठ ने सुनवाई के बाद अपने आदेश में उक्त बोली में अंतिम निर्णय लेने के आदेश जारी करते हुए अगली सुनवाई 13 मई को निर्धारित की गई है। recent visitors 29

ग्वालियर : हाईकोर्ट ने नगर निगम के तत्कालीन आयुक्त विवेक कुमार सिंह का गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया

ग्वालियर ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने नगर निगम के तत्कालीन आयुक्त विवेक कुमार सिंह का गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया है। यदि 5 मई को उपस्थित नहीं होते हैं तो उनको गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करना होगा। लोकायुक्त पुलिस ने नगर निगम के जल प्रदाय घोटाले में दोषमुक्त हुए आरोपियों के खिलाफ अपील दायर की है, जिसमें 8 आरोपी उपस्थित हो गए, लेकिन तत्कालीन नगर निगम आयुक्त उपस्थित नहीं हुए हैं। कोर्ट ने तीन आरोपियों को सजा सुनाई विशेष सत्र न्यायालय ने 29 नवंबर 2021 को नगर निगम के जल प्रदाय विभाग में हुए घोटाले के मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने तीन आरोपियों को सजा सुनाई। तत्कालीन निगमायुक्त विवेक सिंह, केके श्रीवास्तव, आरके बत्रा, कुशलता शर्मा, हरि सिंह खेनवार, सत्येंद्र सिंह भदौरिया, मोहित जैन, सुनील गुप्ता, रजत जैन को दोषमुक्त कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की है। हाईकोर्ट ने अपील सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है, नोटिस जारी कर आरोपियों को तलब किया है। लोकायुक्त पुलिस के अधिवक्ता सुशील चतुर्वेदी ने बताया कि विचारण न्यायालय ने साक्ष्य व गवाही को नहीं देखा है। निगमायुक्त ने अपने अधिकारों का हस्तांतरण कर दिया था, लेकिन उनके संज्ञान में पूरा मामला था। इस पूरे घोटाले में वह भी जिम्मेदार है। विचारण न्यायालय ने फैसला देने में गलती की है। इसे निरस्त किया जाए। क्या है मामला दरअसल नगर निगम के जल प्रदाय विभाग में 2004-05 में 2 करोड़ रुपए से अधिक व्यय किया गया। 1805 नस्तियां बनाई गई। इन नस्तियों में 1.69 करोड़ रुपए भुगतान शेष पाया गया। इसकी शिकायत सुधीर कुशवाह ने लोकायुक्त में की। पुलिस ने इस मामले की जांच की तो जल प्रदाय विभाग में घोटाला सामने आया। अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज कर तत्कालीन निगमायुक्त विवेक सिंह सहित 12 आरोपियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित अन्य धाराओं में केस दर्ज किया गया। recent visitors 30