सुप्रीम कोर्ट ने बाल तस्करी रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किये, यदि कोई नवजात शिशु चोरी होता है तो अस्पतालों का लाइसेंस रद्द

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी नवजात बच्चे को हॉस्पिटल से चुराया जाता है तो सबसे पहले उस अस्पताल का लाइसेंस सस्पेंड होना चाहिए. कोर्ट ने यह टिप्पणी दिल्ली- एनसीआर में नवजात बच्चों की तस्करी के गैंग के पर्दाफाश से जुड़ी खबर पर संज्ञान लेते हुए की. सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के बच्चों की तस्करी के मामले में आदेश सुनाया और दिल्ली में इस गैंग के पकड़े जाने की घटना का जिक्र किया है. कोर्ट ने कहा कि दिल्ली गैंग के पर्दाफाश की घटना अपने आप मे हतप्रभ कर देने वाली है और कोर्ट के दखल की जरूरत है. कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से इस बारे में स्थिति जांच रिपोर्ट भी तलब की है. कोर्ट ने पुलिस से पूछा है कि दिल्ली के अंदर और बाहर से सक्रिय इस तरह के बच्चा चोर गिरोहों से निपटने के लिए उनकी ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं? कोर्ट ने स्वतः संज्ञान के मामले पर अगली सुनवाई 21 अप्रैल को तय कर दी है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच अस्पतालों से बच्चा चोरी करने वाले गिरोह से जुड़े एक मामले में जमानत को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सभी आरोपियों को निचली अदालत में सरेंडर करने को कहा. साथ ही सीजेएम वाराणसी और एसीजेएम वाराणसी को निर्देश दिया कि दो सप्ताह के भीतर सत्र न्यायालय में मामले दर्ज किया जाए और एक सप्ताह के भीतर चार्ज फ्रेम किया जाए. इसके अलावा इस मामले से जुड़े कुछ आरोपी फरार हैं तो उनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट गैर जमानती वारंट जारी किया जाए. साथ ही कोर्ट ने तस्करी किए गए बच्चों को RTE के तहत स्कूल में भर्ती कराया जाता है और उन्हें शिक्षा प्रदान करना जारी रखता है. ट्रायल कोर्ट बीएनएसएस और यूपी राज्य कानून के तहत मुआवजे के संबंध में आदेश पारित करने के लिए भी निर्देश दिया. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट को बाल तस्करी के मामलों में लंबित मुकदमे की स्थिति की जानकारी लेने का निर्देश देते हुए कहा कि लंबित मुकदमों को छह महीने में परीक्षण पूरा करने और मामलों के प्रतिदिन सुनवाई के आधार पर किए जाएंगे. कोर्ट ने यह भी कहा कि हमारे द्वारा जारी निर्देशों को लागू करने में बरती गई किसी भी ढिलाई को गंभीरता से लिया जाएगा और उसे अवमानना के रूप में माना जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बाल तस्करी के मामलों से निपटने के तरीके को लेकर यूपी के प्रशासन की आलोचना की और ऐसे अपराधों को रोकने के लिए राज्यों को सख्त दिशा-निर्देश दिए. बेंच ने निचली अदालतों को ऐसे मामलों की सुनवाई छह महीने के भीतर पूरी करने का आदेश दिया. साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि किसी नवजात की तस्करी होती है तो अस्पतालों के लाइसेंस निलंबित कर दिए जाएं. शीर्ष अदालत ने कहा, देश भर के हाई कोर्ट को बाल तस्करी के मामलों में लंबित मुकदमों की स्थिति के बारे में जानकारी देने का निर्देश दिया जाता है. इसके बाद 6 महीने में मुकदमे को पूरा करने और दिन-प्रतिदिन सुनवाई करने के निर्देश जारी किए जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें तस्करी करके लाए गए एक बच्चे को उत्तर प्रदेश के एक दंपत्ति को सौंप दिया गया था जो बेटा चाहते थे. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी थी. आरोपियों की जमानत रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले से निपटने के तरीके को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों को फटकार लगाई. बेंच ने कहा, आरोपी को बेटे की चाहत थी और उसने 4 लाख रुपये में बेटा खरीद लिया. अगर आप बेटे की चाहत रखते हैं तो आप तस्करी किए गए बच्चे को नहीं खरीद सकते. वो जानता था कि बच्चा चोरी हुआ है. शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने जमानत आवेदनों पर ऐसी कार्रवाई की, जिसके कारण कई आरोपी फरार हो गए. अदालत ने कहा, ये आरोपी समाज के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं. जमानत देते समय हाई कोर्ट से कम से कम यह अपेक्षित था कि वो हर सप्ताह पुलिस थाने में उपस्थिति दर्ज कराने की शर्त लगाता. पुलिस सभी आरोपियों का पता लगाने में विफल रही. सरकार की खिंचाई करते हुए जजों ने कहा, हम पूरी तरह से निराश हैं… कोई अपील क्यों नहीं की गई? कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई. 'अस्पतालों का लाइसेंस रद्द होगा' बाल तस्करी के मामलों को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई नवजात शिशु चोरी होता है तो अस्पतालों का लाइसेंस रद्द कर दिया जाना चाहिए. अदालत ने आदेश दिया, यदि किसी अस्पताल से नवजात शिशु की तस्करी की जाती है तो पहला कदम ऐसे अस्पतालों का लाइसेंस निलंबित करना होना चाहिए. यदि कोई महिला अस्पताल में बच्चे को जन्म देने आती है और बच्चा चोरी हो जाता है, तो पहला कदम लाइसेंस निलंबित करना होना चाहिए. बेंच ने चेतावनी दी कि किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा. इसे न्यायालय की अवमानना ​​माना जाएगा.   recent visitors 39

CG हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, संविदा कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता

बिलासपुर  संविदा कर्मियों के लिए हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है. कोर्ट ने आदेश दिया कि केवल संविदा कर्मचारी होने के आधार पर मातृत्व अवकाश (Maternity leave) का वेतन देने से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्टाफ नर्स को अवकाश अवधि का वेतन देने के निर्देश दिए हैं. न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने राज्य प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता द्वारा दायर मातृत्व अवकाश के वेतन संबंधी दावा पर तीन माह के भीतर नियमानुसार निर्णय लें. न्यायालय ने कहा कि मातृत्व और शिशु की गरिमा के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है. इसे प्रशासनिक अधिकारियों की इच्छा पर निर्भर नहीं किया जा जा सकता. कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा मातृत्व अवकाश वेतन की मांग पर नियमानुसार तीन माह के माह के भीतर निर्णय लिया जाए. याचिकाकर्ता राखी वर्मा, जिला अस्पताल कबीरधाम में स्टाफ नर्स के रूप में संविदा पर कार्यरत हैं. उन्होंने 16 जनवरी 2024 से 16 जुलाई 2024 तक मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था. इसे स्वीकृत कर लिया गया. उन्होंने 21 जनवरी 2024 को एक कन्या को जन्म दिया और 14 जुलाई 2024 को पुनः ड्यूटी ज्वाइन की. इसके बावजूद, उन्हें मातृत्व अवधि का वेतन नहीं दिया गया. इससे उन्हें और उनके नवजात को आर्थिक कठिनाई का सामना करना पड़ा. उन्होंने 25 फरवरी 2025 को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को वेतन की मांग का आवेदन प्रस्तुत किया. कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत कौशिक ने तर्क दिया कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 2010 के नियम 38 के अंतर्गत मातृत्व अवकाश एक विधिक अधिकार है, जो संविदा कर्मचारियों पर भी समान रूप से लागू होता है. याचिकाकर्ता की ओर से पूर्व में दिए गए कोर्ट के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें संविदा कर्मचारियों को मातृत्व लाभ दिये जाने की पुष्टि की गई थी. उन्होंने यह भी तर्क रखा कि वेतन न देना अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि यह स्थायी व अस्थायी कर्मचारियों के मध्य अनुचित भेदभाव को जन्म देता है. राज्य की ओर से महाधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता संविदा पर नियुक्त थीं और उन्हें स्थायी कर्मचारियों की भांति लाभ प्राप्त करने का अधिकार नहीं है. कोर्ट ने कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य मातृत्व की गरिमा की रक्षा करना है, ताकि महिला व उसके बच्चे का पूर्ण व स्वस्थ विकास हो हो सके. संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मातृत्व का अधिकार और प्रत्येक बच्चे के पूर्ण विकास का अधिकार भी सम्मिलित है.सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है. और इसे केवल नियमित कर्मचारियों तक सीमित नहीं रखा जा सकता. कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा अवकाश नियम, 2010 के नियम 38 एवं अन्य लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार शासन को विचार करने और आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से तीन माह के भीतर इस संबन्ध में उपयुक्त निर्णय पारित करने के निर्देश दिए. recent visitors 41

दुष्कर्म पीड़िता के नाम की तरह दुष्कर्म के आरोपी का नाम क्यों नहीं गुप्त रखते: MP हाई कोर्ट

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने राज्य शासन से पूछा कि दुष्कर्म पीड़िता के नाम की तरह दुष्कर्म के आरोपी का नाम क्यों नहीं गुप्त रखते। शासन को चार सप्ताह में हर हाल में जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही साफ शब्दों में हिदायत दी है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो 15 हजार रुपये जुर्माने के साथ ही जवाब स्वीकार किया जाएगा। यह राशि हाई कोर्ट विधिक सहायता कमेटी में जमा कराई जाएगी। इसे लैंगिक भेदभाव बताया गया याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी डॉ. पीजी नाजपांडे व डॉ. एमए खान की ओर से अधिवक्ता अजय रायजादा ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि आपराधिक नियम के अंतर्गत दुष्कर्म पीड़िता का नाम गुप्त रखने का प्रविधान है। ऐसा करना लैंगिक भेदभाव है, जो कि संविधान की मंशा के विपरीत है। कानून में यह कहा गया है कि जब तक आरोप साबित नहीं हो जाता, तब तक आरोपी निर्दोष होता है। ऐसे गंभीर प्रकरणों में आरोपी का नाम सार्वजनिक करने से उसकी छवि प्रभावित होती है। सार्वजनिक प्रतिष्ठा धूमिल होती है याचिका में कहा गया कि फिल्मी हस्ती मधुर भंडारकर जैसे कई ऐसे नाम हैं, जो ऐसे आरोपों से बरी हुए हैं, लेकिन सार्वजनिक प्रतिष्ठा धूमिल हो गई। इसीलिए याचिका के जरिए मांग की गई है कि उक्त अधिनियम के तहत ट्रायल पूरी होने तक दुष्कर्म के मामलों में आरोपी का नाम भी गुप्त रखा जाए। recent visitors 41

’90 दिनों के भीतर बिल पर फैसला लेना जरूरी’, पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय की

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट का राज्यपाल के मामले में फैसला शुक्रवार को ऑनलाइन अपलोड हो गया है। इस फैसले में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित किया है कि राष्ट्रपति को राज्यपाल की तरफ से उनके विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना चाहिए। शीर्ष अदालत की तरफ से तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि की तरफ से राष्ट्रपति के विचार के लिए रोके गए और आरक्षित किए गए 10 विधेयकों को मंजूरी देने और राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए सभी राज्यपालों के लिए समयसीमा निर्धारित की थी। फैसला करने के चार दिन बाद, 415 पृष्ठों का निर्णय शुक्रवार को रात 10.54 बजे शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया गया। देरी पर राज्य को देनी होगी जानकारी शीर्ष अदालत ने कहा कि हम गृह मंत्रालय की तरफ से निर्धारित समय-सीमा को अपनाना उचित समझते हैं… और निर्धारित करते हैं कि राष्ट्रपति को राज्यपाल की तरफ से उनके विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है। इस अवधि से परे किसी भी देरी के मामले में, उचित कारणों को दर्ज करना होगा और संबंधित राज्य को सूचित करना होगा। राज्यों को भी सहयोगात्मक होना चाहिए और उठाए जा सकने वाले प्रश्नों के उत्तर देकर सहयोग करना चाहिए और केंद्र सरकार द्वारा दिए गए सुझावों पर शीघ्रता से विचार करना चाहिए।' अनुच्छेद 200 का किया गया जिक्र जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने 8 अप्रैल को राष्ट्रपति के विचार के लिए दूसरे चरण में 10 विधेयकों को आरक्षित करने के फैसले को अवैध और कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण करार देते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा था कि जहां राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है और राष्ट्रपति उस पर अपनी सहमति नहीं देते हैं, तो राज्य सरकार के लिए इस न्यायालय के समक्ष ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार खुला रहेगा। संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को अपने समक्ष प्रस्तुत विधेयकों पर अपनी सहमति देने, सहमति नहीं देने या राष्ट्रपति के विचार के लिए उसे आरक्षित रखने का अधिकार देता है। recent visitors 44

सिवनी मालवा में मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म कर हत्या मामले में कोर्ट नेफैसला सुनाया और बच्ची को केवल 88 दिन में न्याय दिला दिया

सिवनी मालवा . सिवनी मालवा स्थित नयापुरा में 6 साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म कर हत्या मामले में कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया और बच्ची को केवल 88 दिन में न्याय दिला दिया। महिला जज ने आरोपी को फांसी सजा सुनाई। इस घटना ने रिकॉर्ड करते हुए महज् 88 दिन में फैसला सुना दिया और आरोपी पर 3 हजार रुपए जुर्माना और बच्ची के माता-पिता को 4 लाख रुपए का प्रतिकर स्वरूप दिए जाने का आदेश दिया। बच्ची को सोता हुआ ले गया था आरोपी 2 जनवरी 2025 की रात एक 6 वर्षीय मासूम के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना सामने आई है। आरोपी अजय बाडिवा, जिसे धुर्वे के नाम से भी जाना जाता है, उसने इस वारदात को अंजाम दिया। वह पीड़ित बच्ची के मामा के घर में पलंग के नीचे सो रहा था, जहां बच्ची आई हुई थी। जब बच्ची की मां और मामा ने उसे घर से भगा दिया, तो वह रात में फिर से घर में घुस आया और सोती हुई बच्ची को जंगल में ले गया। वहां उसने नहर किनारे बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और उसकी हत्या कर दी। जिला अभियोजन अधिकारी राजकुमार नेमा ने इस मामले की जानकारी दी है। 2 जनवरी की रात घर में सो रही बच्ची को आरोपी अजय बाडिवा (धुर्वे) जंगल में ले गया था। नहर किनारे दुष्कर्म किया और मुंह दबाकर उसकी हत्या कर दी। जिला अभियोजन अधिकारी राजकुमार नेमा ने बताया 2 जनवरी 2025 को बच्ची अपने मामा के घर आई थी। आरोपी उसी घर में पलंग के नीचे सो रहा था, जिसे बच्ची की मां और मामा ने भगा दिया था। अजय जाते-जाते कहकर गया कि एक लड़की मुझे दे दो। इसके बाद बच्ची को मां ने सुला दिया। कुछ देर बाद बच्ची को आरोपी उठाकर ले गया। जंगल में ले जाकर दुष्कर्म किया और हत्या कर दी। बच्ची की मां ने आरोपी पर शंका जताई थी। पुलिस ने उसी रात आरोपी को गांव से गिरफ्तार किया। उसने दुष्कर्म कर हत्या करना कबूल किया। जज ने फैसले में बच्ची के दर्द पर कविता भी लिखी… शासन की ओर से पक्ष विशेष लोक अभियोजक मनोज जाट ने रखा। सिवनीमालवा के अधिवक्ताओं ने आरोपी का केस नहीं लड़ने का ऐलान किया था। आरोपी को फांसी की सजा दिलाने लोगों ने प्रदर्शन भी किया था। जज की कविता… हां, फिर एक निर्भया 2 और 3 जनवरी की थी वो दरमियानी रात जब कोई नहीं था मेरे साथ। इठलाती, नाचती छः साल की परी थी, मैं अपने मम्मी-पापा की लाडली थी। सुला दिया था उस रात बड़े प्यार से मां ने मुझे घर पर, पता नहीं था नींद में मुझे ले जाएगा।। “वो” मौत का साया बनकर। जब नींद से जागी तो बहुत अकेली और डरी थी मैं, सि​सकियां लेकर मम्मी-पापा को याद बहुत कर रही थी मैं। न जाने क्या-क्या किया मेरे साथ, मैं चीखती थी, चिल्लाती थी, लेकिन किसी ने न सुनी मेरी आवाज़। थी गुड़ियों से खेलने की उम्र मेरी, पर उसने मुझे खिलौना बना दिया। “वो” भी तो था तीन बच्चों का पिता, फिर मुझे क्यों किया अपनों से जुदा। खेल-खेलकर मुझे तोड़ दिया, फिर मेरा मुंह दबाकर, मसला हुआ झाड़ियों में छोड़ दिया। हां मैं हूं निर्भया, हां फिर एक निर्भया, एक छोटा सा प्रश्न उठा रही हूं जो नारी का अपमान करे क्या इंसाफ निर्भया को मिला वह मुझे मिल सकता है। -तबस्सुम खान, विशेष न्यायाधीश जज ने लिखी बच्ची के दर्द पर कविता बताया जा रहा है कि बच्ची की मां और मामा ने आरोपी अजय को भगा दिया था, लेकिन वो जाते-जाते कहकर गया था कि लड़की मुझे दे दो। इसके बाद बच्ची को मां ने सुला दिया और कुछ देर बाद बच्ची को आरोपी उठाकर ले गया और जंगल में ले जाकर दुष्कर्म किया कर हत्या कर दी। बच्ची की मां ने आरोपी पर शंका जताई थी। पुलिस ने उसी रात आरोपी को गांव से गिरफ्तार किया। उसने दुष्कर्म कर हत्या करना कबूल किया। जज ने फैसले में बच्ची के दर्द पर कविता भी लिखी… शासन की ओर से पक्ष विशेष लोक अभियोजक मनोज जाट ने रखा। सिवनी मालवा के अधिवक्ताओं ने आरोपी का केस नहीं लड़ने का ऐलान किया था। आरोपी को फांसी की सजा दिलाने लोगों ने प्रदर्शन भी किया था। recent visitors 32

हाईकोर्ट ने कहा है सरकार किसी कर्मचारी की पेंशन, ग्रेच्युटी या लीव एनकैशमेंट को बिना कानूनी प्रावधान के नहीं ले सकती

रायपुर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार किसी कर्मचारी की पेंशन, ग्रेच्युटी या लीव एनकैशमेंट को बिना कानूनी प्रावधान के नहीं ले सकती। यह फैसला जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार इसे 'प्रशासनिक निर्देशों' के नाम पर भी नहीं ले सकती। कोर्ट ने यह फैसला राजकुमार गोनेकर नाम के एक दिवंगत सरकारी कर्मचारी के मामले में दिया। गोनेकर की पेंशन से 9.2 लाख रुपए की वसूली के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया। पेंशन कोई दान नहीं जस्टिस गुरु ने अपने फैसले में कहा कि ग्रेच्युटी और पेंशन कोई दान नहीं हैं। कर्मचारी इन्हें अपनी लंबी, लगातार, वफादार और बेदाग सेवा से कमाता है। यह एक कर्मचारी का हक है और यह उसकी संपत्ति है। वहीं, जस्टिस गुरु ने संविधान के अनुच्छेद 300-A का हवाला देते हुए कहा कि संपत्ति के इस अधिकार को कानून के उचित प्रक्रिया के बिना नहीं छीना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का पेंशन, ग्रेच्युटी या लीव एनकैशमेंट का हिस्सा बिना किसी कानूनी प्रावधान के और प्रशासनिक निर्देश के तहत लेने का प्रयास स्वीकार्य नहीं है। वसूली के आदेश को रद्द कर दिया इसके साथ ही कोर्ट ने यह फैसला मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा के रहने वाले राजकुमार गोनेकर के मामले में दिया। गोनेकर की पेंशन से 9.2 लाख रुपए की वसूली के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया। गोनेकर के वकील ने कोर्ट को बताया कि गोनेकर को 29 मार्च 1990 को सहायक निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में 2000 में उन्हें उप निदेशक के पद पर पदोन्नत किया गया। हालांकि, ग्रेडेशन लिस्ट में कुछ सुधारों के कारण, उन्हें सहायक निदेशक के पद पर पदावनत कर दिया गया। कोर्ट के आदेश के बाद, उन्होंने उप निदेशक के रूप में काम किया और 31 जनवरी 2018 को सेवानिवृत्त हो गए। गबन का लगा था आरोप अपनी सेवा के दौरान, गोनेकर को गबन के आरोप का नोटिस मिला। उन्होंने अपने जवाब में आरोपों से इनकार किया और कहा कि उन्होंने कानून के अनुसार काम किया। सेवानिवृत्ति के बाद, 13 दिसंबर 2018 को उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उन्होंने 25 जनवरी 2019 को अपना जवाब दाखिल किया और फिर से आरोपों का खंडन किया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि गोनेकर की पेंशन से 9.23 लाख रुपए की वसूली का आदेश इन तथ्यों पर ठीक से विचार किए बिना और उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित किया गया था। राज्य ने इसका विरोध किया और कहा कि प्रक्रिया का पालन किया गया था। राज्य ने यह भी कहा कि गोनेकर का जवाब मिलने और सरकार द्वारा राशि वसूलने की अनुमति दिए जाने के बाद ही कार्रवाई की गई थी। HC ने कहा कि मूल याचिकाकर्ता, गोनेकर की मृत्यु 20 जून 2024 को हो गई थी। इसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को याचिका में शामिल किया गया। राज्यपाल के पास है अधिकार कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 9 का हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि राज्यपाल के पास पेंशन रोकने या वापस लेने या सरकार को हुए नुकसान की वसूली का आदेश देने का अधिकार है। यह तब हो सकता है जब पेंशनर को विभागीय या न्यायिक कार्यवाही में गंभीर कदाचार या लापरवाही का दोषी पाया जाए। कोर्ट ने पहले के फैसलों का उल्लेख किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने पेंशन में कटौती करने से पहले सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करने के महत्व पर जोर दिया था। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करता है। HC ने निष्कर्ष निकाला कि नियम 9 के अनुसार, पेंशन से वसूली का आदेश तभी दिया जा सकता है जब कर्मचारी को विभागीय या न्यायिक कार्यवाही में दोषी पाया जाए। गोनेकर को दोषी पाए जाने का कोई सबूत नहीं था। केवल कारण बताओ नोटिस और उनके जवाब थे। इसलिए, वसूली के आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता। 45 दिनों के भीतर राशि लौटाने के निर्देश कोर्ट ने आदेश दिया कि गोनेकर की पेंशन से काटी गई राशि 45 दिनों के भीतर उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को वापस कर दी जाए। recent visitors 53

महिला और पुरुष वयस्क हैं और उनकी आपस में शादी नहीं हुई है, तब भी वे साथ रह सकते हैं, यह उनका अधिकार है :HC

प्रयागराज यदि महिला और पुरुष वयस्क हैं और उनकी आपस में शादी नहीं हुई है, तब भी वे साथ रह सकते हैं। यह उनका अधिकार है और पुलिस को उन्हें सुरक्षा प्रदान करनी होगी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अलग-अलग मजहबों से ताल्लुक रखने वाले महिला पुरुष के लिव इन में रहने के मामले में यह फैसला सुनाया है। अदालत ने यह फैसला महिला और पुरुष के एक साल 4 महीने के बच्चे की अर्जी पर दिया। बच्चे के माता-पिता का धर्म अलग है और दोनों ही 2018 से साथ रह रहे हैं। याचिका में बच्चे की ओर से कहा गया कि मेरी मां संबंधित व्यक्ति के साथ रह रही है क्योंकि उनके पहले पति की मौत हो गई थी। अब वे दोनों साथ हैं और उनसे ही मेरा जन्म हुआ है। ऐसी स्थिति में उनका साथ रहना मेरे लिए जरूरी है। इस पर जस्टिस शेखर सर्राफ और जस्टिस विपिन चंद्र दीक्षित की बेंच ने कहा, 'हमारे विचार से संविधान में जो पैरेंट्स की परिभाषा है, उसके तहत दो वयस्क लोग साथ रह सकते हैं। भले ही उन लोगों की शादी न हुई हो।' दरअसल याचिका में कहा गया कि महिला और युवक को परेशान किया जा रहा है, लेकिन पुलिस ने अब तक एफआईआर भी दर्ज नहीं की है। इस पर अदालत ने संभल के एसपी को आदेश दिया कि एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। इसके अलावा बेंच ने कहा कि यदि ये दोनों पुलिस के पास पहुंचते हैं तो उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए। उनके बच्चे को भी जरूरी सिक्योरिटी मिलनी चाहिए। बेंच ने कहा कि पुलिस को हमारे फैसले के अनुसार ही काम करना होगा। दरअसल इस मामले में महिला का आरोप है कि उसके ससुराल पक्ष की ओर से धमकियां मिल रही हैं। उन्हें कई बार मारने-पीटने का प्रयास भी किया गया, लेकिन प्रशासन ने कोई ऐक्शन नहीं लिया। इसके अलावा पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। पति की मौत के बाद शुरू हुआ लिव इन और बच्चे का जन्म अर्जी में कहा गया कि पति की मौत के बाद महिला नए रिश्ते में आई और अब लिव इन रिलेशनशिप में रह रही है। इसी रिलेशनशिप के दौरान बच्चे का जन्म हुआ। अब बच्चे के आधार पर ही महिला और पुरुष ने साथ रहने का अधिकार मांगा है। इसके अलावा धमकी देने वालों से सुरक्षा दिलाने की भी गुहार की है। इस मामले में हाई कोर्ट का यह फैसला कई अन्य मसलों के लिए भी नजीर बन सकता है। recent visitors 43