सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हुक्म : अब पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना आसान नहीं

सुप्रीम कोर्ट का आदेश, पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का संरक्षण सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पत्रकारों की स्वतंत्रता को मिला संरक्षण सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हुक्म : अब पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना आसान नहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना के आधार पर किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अहम है। नई दिल्ली  पत्रकारों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार की आलोचना के आधार पर किसी भी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इस अधिकार के तहत किसी भी पत्रकार को सरकार की आलोचना करने का पूरा हक है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सरकार के खिलाफ बोलने या नीतियों पर सवाल उठाने के आधार पर किसी पत्रकार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, “स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि सरकार की आलोचना करने पर पत्रकारों को प्रताड़ित किया जाएगा तो इससे प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। सरकार को आलोचना सहन करने की क्षमता विकसित करनी होगी।” पत्रकारों की स्वतंत्रता पर सकारात्मक संदेश सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। इस फैसले से साफ संकेत मिलता है कि सरकार की आलोचना करना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इस अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। भारतीय प्रेस परिषद (PCI) ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। PCI ने कहा कि यह फैसला प्रेस की स्वतंत्रता को मजबूत करेगा और पत्रकारों को बिना डर के सच को सामने लाने की प्रेरणा देगा। राजनीतिक हलकों में हलचल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी हलचल मच गई है। विपक्षी दलों ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे लोकतंत्र के लिए सकारात्मक कदम बताया है। वहीं, सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा है कि वे इस फैसले का सम्मान करते हैं और कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की रणनीति तैयार करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता को नया आयाम देगा। इससे पत्रकारों को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और जनहित के मुद्दों को उठाने का हौसला मिलेगा। अभिव्यक्ति की आज़ादी का यह संरक्षण न केवल लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करेगा, बल्कि सरकार को भी अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएगा। recent visitors 51

SC ने HC के देश पर रोक लगा दी जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ और पजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार का प्रयास नहीं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित आदेश पर रोक लगा दी जिसमें कहा गया था कि 'ब्रेस्ट पकड़ना' और पजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार या बलात्कार का प्रयास नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश का स्वत: संज्ञान लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फैसले में संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती है. जस्टिस भूषण आर गवई ने सुनवाई के दौरान कहा कि हमें एक जज द्वारा ऐसे कठोर शब्दों का प्रयोग करने के लिए खेद है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने हाईकोर्ट के आदेश को देखा है. हाईकोर्ट के आदेश के कुछ पैराग्राफ जैसे 24, 25 और 26 में जज द्वारा संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाता है. ऐसा भी नहीं है कि फैसला जल्द में लिया गया है. इस मामले में सुनवाई पूरी होकर निर्णय रिजर्व होने के 4 महीने बाद निर्णय सुनाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मां ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. उसकी याचिका को भी इसके साथ ही जोड़ा जाए. उससे दोनों पर साथ सुनवाई आगे बढ़ेगी. दरअसल,  इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च को दिए विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई. जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज की कुछ टिप्पणियों पर रोक लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल और अटॉर्नी जनरल को सुनवाई के दौरान कोर्ट की सहायता करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम केंद्र, उत्तर प्रदेश को नोटिस जारी करते हैं. कोर्ट ने कहा कि हम दो हफ्ते बाद मंगलवार को इस पर सुनवाई करेंगे. इलाहाबाद कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पीड़ित के ब्रेस्ट को पकड़ना, और पाजामे के नाड़े को तोड़ने के आरोप के चलते ही आरोपी के खिलाफ रेप की कोशिश का मामला नहीं बन जाता. फैसला देने वाले जज जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने 11 साल की लड़की के साथ हुई इस घटना के तथ्यों को रिकॉर्ड करने के बाद यह कहा था कि इन आरोप के चलते यह महिला की गरिमा पर आघात का मामला तो बनता है. लेकिन इसे रेप का प्रयास नहीं कह सकते. पहले क‍िया था इनकार इससे पहले नाबालिग लड़की के साथ रेप की कोशिश से जुड़े फैसले को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया था. याचिका में जजमेंट के उस विवादित हिस्से को हटाने की मांग की गई है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि ‘इस केस में पीड़ित के ब्रेस्ट को पकड़ना,और पजामे के नाड़े को तोड़ने के आरोप के चलते ही आरोपी के खिलाफ रेप की कोशिश का मामला नहीं बन जाता’. याचिका में क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च को दिए विवादित फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित में सुप्रीम कोर्ट से जजमेंट के विवादित हिस्से को हटाने की मांग की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि कोर्ट केन्द्र सरकार/ हाई कोर्ट रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दे कि वो फैसले के इस विवादित हिस्से को हटाया जाए। इसके साथ ही याचिका में मांग की गई थी कि जजों की ओर से की जाने वाली ऐसी विवादित टिप्पणियों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट अपनी ओर से दिशानिर्देश जारी करें। क्यों की खारिज समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय इस पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील ने "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" योजना का हवाला देते हुए अपनी दलीलें शुरू कीं, तो न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने उन्हें बीच में ही रोक दिया। उन्होंने कहा कि इस विषय पर अपने मामले पेश करने वाले वकीलों को "लेक्चरबाजी" नहीं करनी चाहिए। इसके बाद न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। क्या है मामला यह फैसला पवन और आकाश नामक दो लोगों से जुड़े एक मामले पर आया है, जिन्होंने कथित तौर पर नाबालिग के स्तनों को पकड़ा, उसके पायजामे का नाड़ा फाड़ दिया और उसे एक पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की। शुरुआत में, उन पर आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि उनका कृत्य बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के रूप में योग्य नहीं था, बल्कि यह गंभीर यौन हमले के कम गंभीर आरोप के अंतर्गत आता है, जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (बी) और पोक्सो अधिनियम की धारा 9 (एम) के तहत दंडनीय है।   recent visitors 39

अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद भी जैन कपल हिन्दू मैरिज एक्ट के तहत तलाक ले सकते हैं?

इंदौर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने सोमवार को अपने एक फैसले के जरिये स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद भी जैन समुदाय हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के दायरे में बरकरार है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणियों के साथ इंदौर के फैमिली कोर्ट के एक अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के आठ फरवरी के बहुचर्चित फैसले को रद्द कर दिया। इस फैसले में अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने जैन समुदाय के 37 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर और उसकी 35 वर्षीय पत्नी के आपसी सहमति से तलाक लेने की अर्जी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। फैमिली कोर्ट ने किया था खारिज अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा था कि जैन समुदाय को 2014 में अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद इस धर्म के किसी अनुयायी को ‘‘उसके धर्म से विपरीत मान्यताओं वाले किसी धर्म’’ से संबंधित व्यक्तिगत कानून का लाभ दिया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में अपील दायर करके चुनौती दी थी। अपील पर सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस संजीव एस. कलगांवकर ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर की अपील मंजूर कर ली। इस मामले में हाईकोर्ट ने क्या कहा? हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के इस निष्कर्ष को ‘‘गंभीर रूप से अवैध’’ और ‘‘स्पष्ट तौर पर अनुचित’’ करार दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान जैन समुदाय के लोगों पर लागू नहीं होते हैं। बेंच ने अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश को निर्देश भी दिया कि वह जैन समुदाय के दम्पति की तलाक की याचिका पर कानून के अनुसार कार्यवाही करें। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जैन समुदाय को अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता देने के लिए 11 साल पहले जारी की गई अधिसूचना किसी भी मौजूदा कानून के प्रावधानों को न तो संशोधित या अमान्य करती है, न ही इन प्रावधानों का स्थान लेती है। बेंच ने कहा कि भारतीय संविधान के संस्थापकों और विधायिका ने अपने साझा विवेक के जरिये हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में रखकर एकता के सूत्र में पिरोया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि जैन समुदाय के दम्पति के मौजूदा मामले में फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त अपर प्रधान न्यायाधीश के लिए कानून के स्पष्ट प्रावधानों के विरुद्ध अपने विचार और धारणाएं प्रस्तुत करने का कोई अवसर नहीं था। बेंच ने यह भी कहा कि अगर फैमिली कोर्ट ने इस सवाल पर विचार किया था कि जैन समुदाय के लोगों पर हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं, तो वह इस मामले को हाई कोर्ट भेजकर अदालत की राय जान सकता था। यह है मामला इंदौर फैमिली कोर्ट के सामने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की तरफ से तलाक की याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता की शादी 2017 में हुई थी। साल 2024 में दंपती ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम (हिंदू मैरिज एक्ट) की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की मांग की। महिला ने अपने पति के खिलाफ क्रूरता का आरोप लगाया था। हालांकि, सुनवाई में कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका वापस कर दी कि वर्ष 2014 में जैन समाज अल्पसंख्यक हो चुका है ऐसे में हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत अब जैन समाज इसका लाभ नहीं ले सकता। फैमिली कोर्ट ने कहा कि 27 जनवरी 2014 को केंद्र सरकार जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की अधिसूचना जारी कर चुकी है। इस धर्म के अनुयायियों को अब हिंदू विवाह अधिनियम के तहत राहत पाने का कोई अधिकार नहीं है। जैन समुदाय परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 7 के तहत अपने वैवाहिक विवादों को समाधान के लिए पेश करने के लिए स्वतंत्र है। recent visitors 36

सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा, जिससे लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा, अतिक्रमण के कारण राज्यमार्ग की चौड़ाई हुई कम

जबलपुर  सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किये जाने के कारण राजमार्ग की चौड़ाई कम होने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी. मामले में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की डबल बेंच ने बुरहानपुर कलेक्टर को याचिकाकर्ता के दावे की जांच कर चार सप्ताह में अतिक्रमण हटाने के आदेश जारी किए हैं. बुरहानपुर निवासी समाजिक कार्यकर्ता हर्ष चौकसे ने दायर की है याचिका बुरहानपुर निवासी समाजिक कार्यकर्ता हर्ष चौकसे की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया है कि बुरहानपुर-अमरावती मार्ग पर डायफूडिया ग्राम की शासकीय भूमि पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है. जिसकी वजह से राजमार्ग की चौड़ाई काफी कम हो गई है और राहगीरों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. याचिका में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायाल का स्पष्ट आदेश है कि अतिक्रमणकारियों को किसी प्रकार का बिजली कनेक्शन न दिया जाए. इसके बावजूद बिजली कंपनी ने अतिक्रमणकारियों को बिजली कनेक्शन दे दिए हैं. इस संबंध में जिला कलेक्टर व बिजली कंपनी के अधिकारियों से शिकायत की गई थी. शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण उक्त याचिका दायर की गई है. जिला कलेक्टर होते हैं जिला स्तर पर गठित सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ के चेयरमैन युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अतिक्रमण संबंधी मामले के लिए जिला स्तर पर सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ (पीएलपीसी) का गठन किया गया है, जिसके चेयरमैन जिला कलेक्टर होते हैं. युगलपीठ ने कलेक्टर को निर्देश दिया है वह आवेदक के अभ्यावेदन पर जांच करें और यदि अतिक्रमण पाया जाता है तो उसे चार सप्ताह के भीतर हटाएं. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता धर्मेन्द्र सोनी ने पैरवी की. recent visitors 43

हाई स्कूल शिक्षक भर्ती को लेकर HC का बड़ा फैसला, 2 महीने के अंदर होगी टीचरों की भर्ती!

जबलपुर  मध्य प्रदेश में हाई स्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा 2018 को दोबारा कराने के निर्देश हाईकोर्ट ने दिए हैं। हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने यह अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सरकार को नियमों को संशोधन कर दोबारा भर्ती करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि पद नहीं है तो अतिरिक्त पद क्रिएट कर याचिकाकर्ताओं की भर्ती की जाए। 2 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश बता दें कि हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग को 2 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए। दरअसल,हाई स्कूल शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में SC, ST, OBC और हैंडिकैप्ड को कोई भी छूट नहीं दी गई थी। जबकि ऐसा प्रावधान नियमों में था। इसी को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। नियमों का उल्लंघन इसके अलावा याचिका में ये भी आरोप लगाया गया था कि SC, ST और OBC उम्मीदवारों को शैक्षणिक योग्यता में छूट नहीं दी गई थी जो कि संविधान और संबंधित नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। याचिका में यह भी कहा गया कि NCT के नियमों का उल्लंघन किया गया है। जिनके अनुसार 2011 से पहले पास होने वाले उम्मीदवारों के लिए 45% अंक का प्रावधान है जबकि SC, ST और OBC उम्मीदवारों को 5% की छूट दी जानी चाहिए। recent visitors 45

बिलासपुर कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट बस वाले किस टैरिफ पर चला रहे , बसों में किराया भी डिस्प्ले करने को कहा

बिलासपुर प्रदेश में संचालित इंटर सिटी बसों और सिटी बसों के मामले में  हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। शासन ने बताया कि सभी रूट्स पर किराया राउंड फिगर में कर दिया गया है। डीबी ने शासन को सिटी बसों की वर्तमान स्थिति की जानकारी देने के भी निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि बिलासपुर में सिटी बसों की जर्जर स्थिति और प्रदेश में चल रही अंतर नगरीय बस सेवा की खराब हालत पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था। इसके बाद से जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू कर दी गई थी। काफी पहले हुई सुनवाई में कोर्ट ने पूछा था कि खटारा होती जा रही बसों को लेकर शासन क्या कर रहा है? शासन की ओर से कहा गया था कि केंद्र से ई-बसें बहुत बड़ी संख्या में आ रहीं हैं, इससे खस्ताहाल बसों की समस्या नहीं रह जाएगी। कोर्ट ने इस बात की पूरी जानकारी देने को कहा था कि प्राइवेट बस वाले किस टैरिफ पर चला रहे हैं। बसों में किराया भी डिस्प्ले करने को कहा गया था। सोमवार को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई सुनवाई में अतिरिक्त महाधिवक्ता ने बताया कि पूर्व में न्यायालय ने राउंड फिगर में जाने का निर्देश दिया था। शासन ने उस पर अमल करते हुए सभी बसों का किराया राउंड फिगर में कर दिया है। इससे अब किसी भी रूट पर किराया दशमलव में नहीं होगा और यात्रियों को भी परेशानी नहीं होगी। डिवीजन बेंच ने शासन से कहा कि अभी सिटी बसों की स्थिति क्या है, इसमें कितनी सही और कितनी जर्जर हैं, इसकी जानकारी अगली सुनवाई में दें। recent visitors 41

मदद प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षकों को प्रबंधन सरकार की अनुमति बगैर नौकरी से नहीं हटा सकते

 इंदौर  अनुदान प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षकों को स्कूल प्रबंधन शासन की अनुमति बगैर नौकरी से नहीं हटा सकते। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने माहेश्वरी हायर सेकंडरी स्कूल की अपील निरस्त कर दी। मामला जीवविज्ञान संकाय के शिक्षक एसके व्यास का है। नवंबर 1974 में उन्हें स्कूल में उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिली थी। वर्ष 1991 में उन्हें शासन के नियमों के तहत लेक्चरर पद पर पदोन्नति दे दी गई। नौकरी से हटा दिया था व्यास को यह पदोन्नति मप्र अशासकीय शिक्षण संस्था अधिनियम के तहत दी गई थी। वर्ष 2005 में स्कूल ने अचानक व्यास को यह कहते हुए नौकरी से हटा दिया कि स्कूल में कक्षा 11वीं और 12वीं में जीवविज्ञान संकाय में कोई एडमिशन नहीं हुआ है, इसलिए स्कूल को उनकी आवश्यकता नहीं है। स्कूल प्रबंधन के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की व्यास ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। वर्ष 2007 में इसका निराकरण करते हुए कोर्ट ने व्यास को दोबारा नियुक्ति के आदेश दिए, लेकिन स्कूल ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील कर दी। न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति गजेंद्रसिंह की युगलपीठ ने स्कूल की अपील को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि स्कूल प्रबंधन ने बगैर शासन से अनुमति प्राप्त किए शिक्षक को नौकरी से हटाया, यह सही नहीं है। recent visitors 38