प्रदेश में स्वीकार नहीं होगा दूसरे राज्यों का ‘जाति प्रमाण-पत्र’, हाईकोर्ट का फैसला

इंदौर  किसी अन्य राज्य से जारी जाति प्रमाण-पत्र मध्यप्रदेश में उस जाति से जुड़े लाभ के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। न ही अन्य राज्य के जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर मप्र में किसी तरह की पात्रता उसे मिलती है। मप्र हाईकोर्ट जस्टिस विवेक रुसिया की खंडपीठ ने ये अहम फैसला सुनाया।  वर्ष 2015 में उज्जैन नगर निगम महापौर पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। यहां महापौर पद के लिए प्रीति गेहलोद ने नामांकन दाखिल किया था। उन्होंने नामांकन के साथ राजस्थान से जारी अनुसूचित जाति वर्ग का प्रमाणपत्र लगाया था। इसे निर्वाचन अधिकारी ने अमान्य करते हुए उनका फॉर्म निरस्त कर दिया था। इस पर उन्होंने उज्जैन जिला न्यायालय में याचिका लगाई थी। कोर्ट ने निर्वाचन अधिकारी के फैसले को सही बताते हुए उसे खारिज कर दिया था। इस पर गेहलोद ने हाईकोर्ट में अपील की थी। नहीं मिलेगी सुविधा तर्क दिया था कि चूंकि बैरवा जाति राजस्थान और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में अनुसूचित जाति वर्ग में है, इसलिए उनका जाति प्रमाण-पत्र सही नहीं मानना गलत निर्णय है। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा 2014 में जारी आदेश के आधार पर ये बात मानी कि आरक्षण सुविधा उसी राज्य में उपलब्ध होगी, जहां से जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि मप्र द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र के अभाव में मप्र में आरक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं होगी। इस आधार पर कोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज किए जाने के फैसले को सही बताया। recent visitors 46

सुप्रीम कोर्ट ने OBC वर्ग के 27 फीसदी रिजर्वेशन के खिलाफ स्पेशल लीव पिटीशन खारिज कर दी

भोपाल  मध्य प्रदेश में लंबे समय से ओबीसी को आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। इस पर अब बड़ी खबर सामने आई है। एमपी ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला लागू रहेगा सुप्रीम कोर्ट ने एमपी हाई कोर्ट के फैसले को सही माना है। साथ ही यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में लगाई स्पेशल लीव पिटीशन खारिज कर दी है। दरअसल, साल 2019 में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी वर्ग का आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया था। विधानसभा में इसका विधेयक पास हो गया। 2 सितंबर 2021 के दिन सामान्य प्रशासन विभाग ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का सर्कुलर जारी कर दिया। हालांकि इसके साथ ही यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। हाईकोर्ट ने निरस्त की चुनौती वाली याचिका यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन की तरफ से लगाई याचिका में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 28 जनवरी 2025 को याचिका खारिज कर दी। इसके बाद इस संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की। इस पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। उन्होंने याचिका खारिज करते हुए कहा कि 27 फीसदी ओबीसी को आरक्षण लागू होने में मध्य प्रदेश में कोई न्यायिक अड़चन नहीं है। 27 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ इस मामले में हाईकोर्ट भी यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका खारिज कर चुका है। हाईकोर्ट ने 28 जनवरी को दो याचिकाएं खारिज की थीं। यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण के सर्कुलर को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में लगी एसएलपी खारिज कराने के लिए ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन ने अपना पक्ष दमदारी से रखा। यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका खारिज होने के साथ ही एमपी में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ हो गया है। आरक्षण पर कोई कानूनी रोक नहीं ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ की याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई में मध्यप्रदेश सरकार की ओर से पक्ष प्रस्तुत करने कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं हुआ। इससे सरकार द्वारा मामले को जानबूझकर लटकाने की कोशिश करने की आशंका उत्पन्न हुई। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने न केवल याचिका को खारिज कर दिया बल्कि ये भी साफ कर दिया है कि ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण पर कोई कानूनी रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने मामले की सुनवाई की। एडवोकेट वरुण ठाकुर एवं एडवोकेट रामकरण ने ओबीसी महासभा की ओर से पक्ष रखा। ओबीसी महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में यह केस लड़ने के लिए समुदाय ये एक-एक रुपए एकत्रित किए थे। ओबीसी को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण एमपी में कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया गया था। 2019 में लिए गए इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका लगाई गई थी जिसे खारिज कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में यह एसएलपी यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन द्वारा दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में एमपी हाईकोर्ट के आदेश को उचित बताते हुए स्पष्ट किया कि ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण में कोई न्यायिक अड़चन नहीं हैं। गौरतलब है कि फरवरी माह में ही एमपी हाईकोर्ट जबलपुर के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैथ और न्यायाधीश विवेक जैन की युगलपीठ ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण के कानून का पालन करने का आदेश दिया था। पीठ ने यह भी कहा था कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर किसी प्रकार की रोक नहीं है। वायरल हुआ पूर्व सीएम कमलनाथ का बयान मध्यप्रदेश में ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने में कोई न्यायिक अड़चन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को सही मानते हुए यह स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर कोई रोक नहीं हैं। उन्होंने आगे लिखा कि अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में 2019 में मैंने प्रदेश के ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का कानून बनाया था। उसके बाद से बनी भाजपा की सरकार असंवैधानिक रूप से षडयंत्र रचकर लगातार ओबीसी को आरक्षण से वंचित कर रही है। पहले माननीय मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है कि OBC को 27 प्रतिशत आरक्षण देने वाले क़ानून पर कोई रोक नहीं है। बीजेपी को अब मध्य प्रदेश के ओबीसी समाज से माफी मांगनी चाहिए और तत्काल प्रभाव से प्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण देना चाहिए। recent visitors 48

भोज विश्वविद्यालय में नियुक्तियों के मामले में HC ने नियुक्तियां कीं निरस्त का दिए आदेश

भोपाल मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय में की गई नियुक्तियों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने मनमानी और दूषित करार देते हुए निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश श्री सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने चयनित अभ्यर्थियों के पक्ष में जारी एकलपीठ के आदेश को रद्द करते हुए नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। मध्य प्रदेश शासन और भोज मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा दायर अपील में कहा गया था कि वर्ष 2015 में प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर समेत अन्य पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी। लेकिन चयन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं बरती गईं। अपील में यह भी बताया गया कि चयन समिति में संबंधित विषयों के विशेषज्ञों को शामिल नहीं किया गया था, बल्कि अन्य विषयों के विशेषज्ञों से चयन कराया गया, जो नियमों के खिलाफ था। इसके अलावा, चयन समिति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया। अपील में यह भी उल्लेख किया गया कि अभ्यर्थियों के शैक्षणिक दस्तावेजों की न तो ठीक से जांच की गई और न ही उनका निष्पक्ष मूल्यांकन किया गया। अंकों के कई कॉलम बिना किसी स्पष्टीकरण के खाली छोड़ दिए गए थे। साक्षात्कार में कुछ अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक देकर अन्य अधिक योग्य उम्मीदवारों की अनदेखी की गई, जिससे चयन प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती है। इसके साथ ही, विज्ञापनों में महिलाओं और दिव्यांगों के लिए आरक्षण का उल्लेख नहीं किया गया था और न ही आरक्षण रोस्टर उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार तैयार किया गया था। इन अनियमितताओं के कारण चयन प्रक्रिया को निरस्त कर दिया गया था। इसके विरुद्ध चयनित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर एकलपीठ ने उनके पक्ष में राहतकारी आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए यह अपील दायर की गई थी। recent visitors 38

उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश घोषित करेंगे अपनी संपत्ति, ‘सभी जज पब्लिक करेंगे अपनी संपत्ति का ब्योरा’

नई दिल्ली  न्यायपालिका में पारदर्शिता और लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने पदभार ग्रहण करने के दौरान ही अपनी संपत्ति का ब्योरा पब्लिक करने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से यह फैसला 1 अप्रैल को की गई फुल कोर्ट मीटिंग में लिया गया है। इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया और यह भावी जजों पर भी लागू होगा। जजों ने यह भी कहा कि संपत्तियों से जुड़ी जानकारी सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड की जाएगी। हालांकि, वेबसाइट पर संपत्ति की घोषणा करना स्वैच्छिक होगा। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर कहा गया है, ‘सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर संपत्ति की घोषणा करना स्वैच्छिक आधार पर होगा।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना समेत सुप्रीम कोर्ट के 30 जजों ने अपनी संपत्ति का घोषणा पत्र कोर्ट में दिया है। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत वरिष्ठ वकील आदिश अग्रवाल ने समाचार न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत करता हूं जिसमें जजों को अपनी संपत्ति आधिकारिक वेबसाइट पर घोषित करने को कहा गया है। इसकी वजह से जनता का भरोसा बहाल होगा, जो पिछली घटनाओं के कारण थोड़ा कम हुआ है। मुझे उम्मीद है कि हाई कोर्ट के जज भी इसका अनुसरण करेंगे। इससे न्यायपालिका में पारदर्शिता और विश्वास सुनिश्चित होगा। जबकि 1977 में इसी तरह के प्रस्ताव पर विचार किया गया था, लेकिन इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था।’ जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े विवाद के बाद में आया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल साफ किया कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के तौर पर अपना नया पदभार संभालने के बाद कोई ज्यूडिशियल काम नहीं सौंपा जाएगा। बता दें कि भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पहले जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने की सिफारिश की थी। कॉलेजियम ने साफ किया कि यह ट्रांसफर उनके खिलाफ चल रही जांच से बिल्कुल अलग है। कमेटी ने पुलिस अधिकारियों के बयान दर्ज किए पिछले हफ्ते सीजेआई खन्ना ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों की कमेटी का गठन किया है। टॉइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आयोग ने कथित तौर पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा और कुछ अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का बयान दर्ज किया है। ऐसा माना जा रहा है कि अरोड़ा ने आयोग को बताया कि स्टोर रूम एक गार्ड रूम से सटा हुआ था, जहां सीआरपीएफ के जवान तैनात थे और स्टोर रूम को बंद रखा जाता था। अरोड़ा ने आयोग को यह भी बताया कि उन्होंने 15 मार्च को शाम करीब 4.50 बजे सुप्रीम कोर्ट को घटना के बारे में सूचित किया था। उन्होंने आयोग को बताया कि जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने दिल्ली हाई कोर्ट के नाम से रजिस्टर फोन नंबर से पीसीआर कॉल की थी और सचिव ने कहा कि उन्हें जज के आवास पर मौजूद एक नौकर ने आग के बारे में सूचित किया था। recent visitors 58

रीवा गैंगरेप केस :नवविवाहित महिला से हुई थी हैवानियत; गैंगरेप के आठों दरिंदो को उम्रकैद

रीवा  रीवा जिला न्यायालय ने एक बहुचर्चित गैंगरेप के मामले में 8 आरोपियों को कठोर सजा से दंडित करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. 6 माह पहले नवदंपती को बंधक बनकर आरोपियों ने गैंगरेप की हैवानियत की थी. इस अपराध को अदालत ने जघन्य माना. सभी आरोपियों को आजीवन कारावास के साथ 2 लाख 30 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया है. पूरा मामला नवदंपती से हुई हैवानियत से जुड़ा हुआ है. रीवा जिले के गुढ़ थाना इलाके में 21 अक्टूबर 2024 को एक नवदंपति भैरव बाबा की पहाड़ी स्थित मंदिर के दर्शन कर लौट रहा था. तभी आरोपियों ने पति-पत्नी को बंधक बना लिया. आरोपी घटनास्थल पर शराब पार्टी कर रहे थे. आरोपियों ने नवदंपती के साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी देकर महिला से गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया था. वारदात को अंजाम देने की बाद सभी आरोपी फरार हो गए थे. जानकारी मिलते ही पुलिस ने 8 आरोपियों पर BNS 70(1), 127(2), 115, 190, 351(3), 238 का मामला दर्ज किया. पुलिस की अलग-अलग टीमों ने आरोपियों की धरपकड़ के लिए कई जगह दबिश देकर सभी आरोपियों को हिरासत में लिया. लोक अभियोजक अधिवक्ता विकास द्विवेदी ने बताया कि इस मामले को फास्ट ट्रैक में चलाया गया था. 6 महीने के अंदर जिला न्यायालय में चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश पदमा जाटव की अदालत ने तथ्य प्रमाणित पाए जाने के बाद गैंगरेप के सभी 8 आरोपी रामकिशन, गरुड़ कोरी, राकेश गुप्ता, सुशील कोरी, रजनीश कोरी, दीपक कोरी, राजेंद्र कोरी और लवकुश कोरी आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. साथ ही प्रत्येक आरोपियों को 2 लाख 30 हजार के अर्थदंड से भी दंडित किया है. इन्हें आखिरी सांस तक जेल की सलाखों के पीछे रहना होगा. recent visitors 49

राजस्थान: हाईकोर्ट ने सरकार से 6,759 ग्राम पंचायतों के चुनावों के स्थगन पर लगाई फटकार

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने भजनलाल सरकार से 6,759 ग्राम पंचायतों के चुनावों के स्थगन को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि राज्य में पंचायत चुनाव आखिर कब कराए जाएंगे? जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं।  दरअसल, जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि 4 फरवरी 2025 के आदेश की पालना करते हुए पंचायत चुनाव का स्पष्ट शेड्यूल प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 7 अप्रैल 2025 तय की है। याचिकाकर्ता ने सरकार के जवाब को बताया अपूर्ण याचिकाकर्ता गिरिराज सिंह देवंदा की ओर से पेश अधिवक्ता प्रेमचंद देवंदा ने अदालत में आपत्ति जताई कि सरकार ने पिछले आदेशों के बावजूद पंचायत चुनावों की कोई स्पष्ट समय-सीमा तय नहीं की है। उन्होंने कहा कि सरकार को कोर्ट के आदेश का अनुपालन करना चाहिए था, लेकिन इसके हलफनामे में किसी निश्चित चुनाव कार्यक्रम का उल्लेख नहीं किया गया। सरकार ने चुनाव स्थगित करने के लिए दिए तीन तर्क राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में प्रस्तुत अपने जवाब में चुनाव स्थगन को उचित ठहराने के लिए तीन प्रमुख कारण बताए हैं। पहला तो ये कि प्रदेश में नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव एक साथ कराने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाएगा, जो यह अध्ययन करेगी कि एक साथ चुनाव कराने से धन, श्रम और समय की कितनी बचत होगी और इससे स्थानीय निकायों को कैसे सशक्त किया जा सकता है। वहीं, दूसरा तर्क बताया कि पिछली सरकार ने कई नए जिले बनाए थे, जिनमें से 9 जिलों को वर्तमान सरकार ने समाप्त कर दिया। अब पूरे प्रदेश में पंचायतों का पुनर्गठन और नगरीय निकायों का परिसीमन किया जा रहा है, इसलिए चुनावों को अभी स्थगित किया गया है। इसके अलावा सरकार का कहना है कि उसने राजस्थान पंचायत राज अधिनियम, 1994 की धारा 95 के तहत प्रशासकों की नियुक्ति की है। यह प्रावधान वैकल्पिक है, जिससे सरकार यह तय कर सकती है कि प्रशासकों की नियुक्ति कैसे की जाए। बताते चलें कि हाईकोर्ट का रुख अब और सख्त हो सकता है, क्योंकि सरकार ने पूर्व आदेशों का स्पष्ट अनुपालन नहीं किया है। यदि अगली सुनवाई 7 अप्रैल को सरकार चुनावों की कोई निश्चित तिथि प्रस्तुत नहीं करती, तो कोर्ट द्वारा कड़ा रुख अपनाया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप- संविधान का उल्लंघन याचिकाकर्ताओं के वकील प्रेमचंद देवंदा का कहना है कि राज्य सरकार ने 16 जनवरी 2025 को एक अधिसूचना जारी कर 6,759 पंचायतों के चुनाव स्थगित कर दिए, जो संविधान के अनुच्छेद 243ई, 243के और राजस्थान पंचायत राज अधिनियम 1994 की धारा 17 का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार ने लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई और ग्रामीण संस्थाओं को अस्थिर कर दिया है और राज्य में ग्राम पंचायतों के चुनाव रोककर लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया है। सरपंचों को प्रशासक बनाने का फैसला विवादों में सरकार ने जनवरी में चुनाव कराने की जगह मौजूदा सरपंचों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया। पंचायतों में प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरपंचों की सहायता हेतु एक प्रशासकीय समिति गठित की गई, जिसमें उप सरपंच और वार्ड पंच सदस्य शामिल होंगे। यह मॉडल भाजपा शासित मध्य प्रदेश की तर्ज पर लागू किया गया है, जहां पहले भी इसी तरह से सरपंचों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। हालांकि, इस फैसले के बाद विपक्ष और पूर्व पंचायत प्रतिनिधियों ने कड़ी आपत्ति जताई है। recent visitors 43

एमपी हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में आरोपी की मां को मन सह-आरोपी, जाने काया कहा

भोपाल भोपाल रेप के एक मामले पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस फैसले में उकसावे की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा कि भले ही कोई महिला रेप की आरोपी नहीं हो सकती लेकिन वह रेप के लिए उकसाने की आरोपी हो सकती है। ऐसे में रेप के लिए उकसाने वाली महिला को आईपीसी की धारा 109 के तहत बलात्कार के लिए उकसाने के अपराध में दोषी ठहराया जा सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि यह पूरा मामला भोपाल के छोला मंदिर इलाके का है। इसमें रेप की वारदात को अंजाम देने वाला आरोपी के साथ उकसाने के मामले में उसकी मां और भाई के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया। वर्ष 2022 में दर्ज करवाया रेप का मामला पीड़िता ने 21 अगस्त 2022 में भोपाल के छोला मंदिर थाने में रेप की शिकायत दर्ज करवाई थी। पीड़िता ने शिकायत में बताया कि उसके पड़ोसी ने उसके परिवार में शादी का प्रस्ताव रखा था। उसी पर सहमति देने के लिए वह उनके घर गई थी। युवक की मां और उसके भाई ने उसे जबरन आरोपी के कमरे में भेज दिया, जहां उसने पीड़िता के साथ संबंध बनाए। पीड़िता ने बताया कि सगाई के बाद कई बार आरोपी ने उसके साथ संबंध बनाए और उसके बाद शादी करने से इनकार कर दिया। आरोपी की मां पर रेप के लिए उकसाने का आरोप पीड़िता ने अपनी शिकायत में यह भी बताया कि आरोपी की मां ने कहा था कि शादी से पहले संबंध बनाना आम बात है। पीड़िता के अनुसार, पहली बार आरोपी ने 8 जुलाई 2021 को अपने घर पर पीड़िता का रेप किया था। रेप के लिए उकसावे को बताया अपराध मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में रेप मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल और जस्टिस प्रशांत गुप्ता ने अपने निर्णय में कहा है कि भले ही कोई महिला रेप नहीं कर सकती लेकिन आईपीसी धारा 109 के तहत रेप के लिए उकसाने का अपराध कर सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि आईपीसी धारा 376 एक पुरुष से शुरू होती है। लेकिन अपराध केवल एक पुरुष द्वारा नहीं किया जा सकता। इसलिए आईपीसी की धारा 109 के तहत रेप के लिए उकसाने के लिए महिला को दोषी ठहराया गया है। इसके साथ ही जानबूझकर अपराध में सहायता करने को आईपीसी धारा 107 के तहत परिभाषित करते हुए महिला और पुरुष दोनों रेप के लिए उकसाने का दोषी ठहराया। पीड़िता का आरोप पीड़िता ने 21 अगस्त 2022 को भोपाल के छोला मंदिर थाने में रेप की शिकायत दर्ज करवाई थी. उसने आरोप लगाया था कि आरोपी अभिषेक गुप्ता ने शादी का झांसा देकर उसके साथ रेप किया. इतना ही नहीं, आरोपी की मां और भाई भी इस घटना में शामिल थे. पीड़िता के अनुसार, 8 जुलाई 2021 को पहली बार उसे आरोपी के घर बुलाया गया, जहां उसके साथ रेप किया गया. सगाई के बाद भी आरोपी ने कई बार शारीरिक संबंध बनाए और फिर शादी से मुकर गया. पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी की मां ने उसे समझाया था कि शादी से पहले संबंध बनाना आम बात है. MP हाईकोर्ट का रुख हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रेप के लिए उकसाने वाले भी उतने ही दोषी हैं, जितना कि मुख्य आरोपी. इस आधार पर आरोपी की मां और भाई पर भी कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं. कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और साफ किया कि रेप के मामलों में उकसाने वालों के खिलाफ भी कठोर दंड दिया जाएगा. हाईकोर्ट में आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती बता दें कि पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने धारा 376 (बलात्कार), 376 (2) (एन), 190, 506 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी पाया था। सरकारी वकील सीएम तिवारी ने बताया की आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जिसमें आरोपी के साथ कोर्ट ने परिवार के लोगों भी रेप के लिए उकसाने का दोषी ठहराया है औरयाचिका खारिज कर दी। recent visitors 52