अगर कोई व्यक्ति किसी की आय पर निर्भर था, तो वह मुआवजा पाने का अधिकारी होगा, चाहे वह रिश्ते में कोई भी हो- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि सड़क हादसे में मुआवजा मृतक पर आर्थिक तौर पर निर्भर हर मेंबर को मिलेगा। इस मामले में कानूनी रिप्रेजेंटेटिव की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती है। जो लोग आर्थिक तौर पर मृतक पर निर्भर थे उन्हें दावेदारों की कैटिगरी से बाहर नहीं किया जा सकता है। अदालत ने हाल के फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि कानूनी प्रतिनिधि वह व्यक्ति होता है जो सड़क दुर्घटना में किसी शख्स की मृत्यु के कारण पीड़ित होता है और यह जरूरी नहीं कि केवल पत्नी, पति, माता-पिता या संतान ही हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal – MACT) ने मुआवजा प्रदान करते समय मृतक के पिता और बहन को आश्रित नहीं माना था। MACT ने माना कि मृतक के पिता उनकी आय पर निर्भर नहीं थे और चूंकि पिता जीवित थे, इसलिए छोटी बहन को भी आश्रित नहीं माना जा सकता था। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने MACT के इस फैसले को बरकरार रखा जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द करते हुए माना कि निचली अदालतों ने अपीलकर्ताओं को मृतक का आश्रित मानने से इनकार करके गलती की थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजा केवल पति-पत्नी, माता-पिता या बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी व्यक्तियों तक विस्तार होता है जो मरने वाले के कारण प्रभावित हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा राशि 17 लाख 52 हजार 500 तय कर दी। क्या है मामला? ग्वालियर में 25 सितंबर 2016 को 24 साल के धीरज सिंह तोमर ऑटो में जा रहे थे। ड्राइवर तेज रफ्तार से ऑटो चला रहा था। लापरवाही के कारण ऑटो दुर्घटनाग्रस्त हो गया और धीरज की मौके पर ही मृत्यु हो गई। एमएसीटी ने मामले में कुल 9,77,200 मुआवजे भुगतान का आदेश दिया गया। मृतक के परिजनों को यह रकम भुगतान किए जाने का निर्देश दिया। लेकिन साथ ही कोर्ट ने मृतक के पिता और बहन को दावेदार नहीं माना और अन्य दावेदारों को यह रकम दिए जाने को कहा गया था। यह फैसला आगे का रास्ता तय करेगा सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं जिनमें मृतक के पिता और बहन को मृतक का आश्रित माना और उन्हें मुआवजा प्रदान किया। यह फैसला भविष्य के मामलों में महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं में मुआवजा केवल मृतक के पारंपरिक उत्तराधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन सभी लोगों को मिलेगा जो उसकी आय पर निर्भर थे।   recent visitors 53

हाईकोर्ट ने किया बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण, मां के साथ बेटियां तो अवैध हिरासत नहीं

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने कहा कि बेटियां अपनी मां के साथ हैं, तो अवैध हिरासत नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ पिता की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निरस्त कर दी। कोर्ट ने साफ किया कि यह प्रकरण अवैध हिरासत का नहीं, बल्कि वैवाहिक विवाद का है। राजधानी भोपाल अंतर्गत नवीन नगर निवासी लोकेश पटेल ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष से रूपेश चौरसिया सहित अन्य ने पत्नी नेहा पटेल व दो नाबालिग बेटियों को बंधक बना लिया है। लिहाजा, मुक्त कराया जाए। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान भोपाल पुलिस को दोनों नाबालिग बेटियों को पेश करने के निर्देश दिए थे। पुलिस ने दोनों नाबालिग बेटियों को उनकी मां के साथ न्यायालय में पेश किया। पत्नी नेहा ने हाई कोर्ट को बताया कि कुछ व्यक्तिगत मुद्दों के कारण वह याचिकाकर्ता पति के साथ रहने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने खुद ही दोनों बेटियों के साथ पति का घर छोड़ दिया है। वह अपने पति के घर नहीं जाना चाहती हैं। हाई कोर्ट ने अनावेदक पत्नी के जवाब को रिकॉर्ड में लेते हुए अपने आदेश में कहा कि यह अवैध हिरासत का नहीं, बल्कि वैवाहिक विवाद का मामला है। याचिकाकर्ता को वैवाहिक मुद्दों के लिए कानून के अनुसार उचित कार्यवाही की स्वतंत्रता है। recent visitors 52

हाईकोर्ट का आदेश बिना मान्यता के छात्रों को एडमिशन देने वाली यूनिवर्सिटी-कॉलेज पर केस दर्ज करो

जबलपुर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के अंतर्गत सेंट्रल लॉ कॉलेज के छात्रों को मान्यता न होने के चलते बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन ना होने के मामले में अब कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी गाज गिर सकती है। हाईकोर्ट ने इसे छात्रों के साथ धोखाधड़ी करार देते हुए भोपाल कमिश्नर को जांच के लिए आदेशित किया है। बार काउंसिल में एनरोलमेंट ना होने का मामला जबलपुर हाईकोर्ट में व्योम गर्ग,रागिनी गर्ग, शिखा पटेल एवं अन्य के ने स्टेट वॉर काउंसिल में होने वाले स्टूडेंट्स के एनरोलमेंट नहीं किए जाने पर याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में बताया कि स्टेट वॉर काउंसिल और यूनिवर्सिटी ने एफिलेटेड कॉलेज से लॉ की डिग्री प्राप्त किए जाने के बावजूद भी एनरोलमेंट नहीं किए। साथ ही याचिकार्ताओं ने हाईकोर्ट से मामले में दखल दिए जाने की गुहार लगाई। कोर्ट के द्वारा पिछली सुनवाई के दौरान लगाई गई थी फटकार इस याचिका में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की मुख्य बेंच ने राज्य सरकार को याचिका में मौजूद कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी समेत उन सभी कॉलेजों पर जो बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं उन पर कार्रवाई कर उसकी रिपोर्ट को अगली सुनवाई में पेश करने के निर्देश दिए गए थे। जिस पर राज्य सरकार के द्वारा रिपोर्ट पेश नहीं किए जाने पर कोर्ट ने फटकार लगाई। राज्य सरकार में उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना का नोटिस भी कोर्ट ने जारी किया। राज्य सरकार ने अपना पल्ला झाड़ा इस याचिका में हुई पूर्व की सुनवाई में सभी प्रतिवादियों की ओर से जवाब दाखिल किया गए। जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कॉलेज(सेंट्रल इंडिया लॉ कॉलेज) के द्वारा मान्यता शुल्क न दिए जाने की वजह से उसे मान्यता नहीं दिए जाने की बात कही गई है। जिस पर सरकार की तरफ से कोर्ट में बताया गया कि इस पूरे मामले में संबंधित यूनिवर्सिटी के द्वारा गलती की गई है। यूनिवर्सिटी ने कॉलेज का वेरिफिकेशन क्यों नहीं किया। जिस पर यूनिवर्सिटी ने यह तर्क दिया गया की बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा 2021-22 के लिए जारी कॉलेज की सूची में इस कॉलेज को व्यक्तिगत तौर पर अमान्य नहीं बताया गया था। कोर्ट ने बताया एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर अमान्य घोषित नहीं होने की वजह से इसे पोर्टल पर अपलोड किया गया और कॉलेज के द्वारा खुद को एफिलेटेड बताते हुए बच्चों के एडमिशन किए जाने का जवाब कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट के द्वारा सभी तर्कों के आधार पर इस पूरे मामले को एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर माना। हालांकि फिर भी राज्य की तरफ से खुद को गलत ना ठहराते हुए मामले से पल्ला झाड़ता की कोशिश की गई। चीफ जस्टिस की बेंच ने की सुनवाई इस याचिका पर सुनवाई चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने की। जिसमें सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आए कि नियम अनुसार नए कॉलेजों को प्रोविजनल मान्यता 3 सालों के लिए एवं रेगुलर कॉलेज को यह मान्यता 5 सालों के लिए दी जा सकती है। इसके बाद भी वार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कई मामलों में 20 साल बाद भी पूर्वाधार पर मान्यता दी गई है। जिसे कोर्ट ने छात्रों के साथ सीधी तौर पर धोखाधड़ी बताया। उच्च शिक्षा विभाग की ओर से कोर्ट में वीसी के माध्यम से प्रस्तुत हुए उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुपम राजन को भी कोर्ट ने फटकार लगाई। भोपाल कमिश्नर को जांच के आदेश कोर्ट ने कहा कि अब तक आप लोग क्या कर रहे थे। इसके साथ ही को कोर्ट ने भोपाल कमिश्नर को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए हैं और इस जांच में बार काउंसिल को भी भोपाल कमिश्नर की पूरी सहायता करने साथ ही जांच की रिपोर्ट को कोर्ट के समक्ष दो हफ्तों में पेश किए जाने के निर्देश जारी करते हुए इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को तय की गई है। इसके बाद जांच रिपोर्ट के आधार पर कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जा सकता है। recent visitors 55

राजस्थान :हाईकोर्ट का फैसला, 13 साल की रेप पीड़िता को मिला गर्भपात का अधिकार

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने 13 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की इजाजत दे दी है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि पीड़िता को जबरन बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया गया तो उसे जीवन भर मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी. इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जस्टिस सुदेश बंसल की अदालत ने महिला चिकित्सालय सांगानेर (जयपुर) की अधीक्षक को निर्देश दिया है कि मेडिकल बोर्ड गठित कर गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की जाए. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भ्रूण जीवित मिलता है तो उसे जिंदा रखने की पूरी व्यवस्था की जाएगी और उसका पालन-पोषण राज्य सरकार के खर्च पर होगा. वहीं, अगर भ्रूण जीवित नहीं पाया जाता है तो उसकी डीएनए रिपोर्ट के लिए टिश्यू को संरक्षित किया जाएगा. 13 साल की रेप पीड़िता को गर्भपात की इजाजत पीड़िता की वकील सोनिया शांडिल्य ने बताया कि पीड़िता 27 हफ्ते 6 दिन की गर्भवती थी और उसके माता-पिता भी गर्भपात के पक्ष में थे. उन्होंने कोर्ट में तर्क दिया कि इससे पहले भी देश में ऐसे कई मामलों में गर्भपात की अनुमति दी गई है, यहां तक कि 28 हफ्ते की गर्भवती पीड़िताओं को भी कोर्ट ने राहत दी है. पीड़िता के माता-पिता भी गर्भपात के पक्ष में थे पिछली सुनवाई में कोर्ट ने तीन विशेषज्ञों की मेडिकल रिपोर्ट मंगवाई थी, जिसमें बताया गया था कि गर्भपात में जोखिम जरूर है, लेकिन इसे किया जा सकता है. कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 का हवाला देते हुए कहा कि बलात्कार के कारण हुए गर्भ से पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुंचेगी. इसलिए गर्भपात की अनुमति दी जाती है. recent visitors 63

मध्य प्रदेश में 62 प्रजाति के पेड़ काटने पर जबलपुर हाईकोर्ट का बैन

जबलपुर  हाईकोर्ट की लार्जर बेंच ने 62  प्रजातियों के पेड़ों की कटाई और परिवहन के लिए प्रदान की गई छूट को निरस्त कर दिया है. चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत,जस्टिस एस ए धर्माधिकारी और जस्टिस विवेक जैन की लार्जर बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि साल 2015 में जारी विवादित अधिसूचना और साल 2017 में किए गए संशोधन वन अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है. इसके अलावा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 48-ए का उल्लंघन करते हैं. लार्जर बेंच ने विवादित अधिसूचना तथा उसमें किये गये संशोधन को निरस्त करते हुए ट्रांजिट पास नियम 2000 में छूट प्राप्त सभी पेड़ों की प्रजातियों पर तत्काल प्रभाव से लागू की जाये. लार्जर बैंच ने पेड़ों की कटाई को लेकर पुष्पा फिल्म समेत कई उदाहरण देते हुए कार्यपालिका को कड़ी फटकार लगाई. आम आदमी से समन्वय स्थापित करने के लिए वन विभाग ने साल 2015 और 2017 में 62 प्रजातियों पर टीपी की अनिवार्यता समाप्त कर दी थी। इसके बाद से मध्य प्रदेश में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई चल रही थी। सड़क किनारे खेतों में खड़े आम, बबूल, शू-बबूल, इमली, जामुन, अमरूद सहित अन्य प्रजातियों के पेड़ों को धड़ल्ले काटा जा रहा था। साल 2024 में अवैध रूप से पेड़ काटने के 10 हजार 688 प्रकरण दर्ज हुए हैं। साल 2023 में 50 हजार 180 प्रकरण दर्ज हुए थे। यह स्थिति तब है। जब हाईकोर्ट साल 2019 में 62 प्रजातियों को टीपी मुक्त करने की अधिसूचना पर स्थगन दे चुका है। जिस पर अब फैसला आया है। स्थगन के दौरान नहीं दिया ध्यान 62 प्रजातियों को टीपी मुक्त करने की अधिसूचना पर 5 साल पहले स्थगन आया था, पर वन विभाग के अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तभी तो अभी तक सड़क किनारे या दूरदराज के इलाकों में निजी भूमि पर खड़े पेड़ों को काटा जा रहा था। अकेले भोपाल की बात करें तो आरा-मशीनों पर रोज 50 गाड़ियां लकड़ी आती हैं। प्रदेश के अन्य शहरों में भी ऐसे ही हालात हैं। 10 हजार के जुर्माने पर छोड़ रहे इस मामले में हालत यह है कि, पहले तो मैदानी वन अधिकारी और कर्मचारी लकड़ी परिवहन करने वालों को पकड़ ही नहीं रहे और जिन्हें पकड़ते हैं। उनका 10 हजार रुपए का चालान बनाकर छोड़ देते हैं। जबकि ऐसे मामलों में वाहन में मौजूद लकड़ी के बाजार मूल्य की दो गुनी राशि लेने का प्रावधान है। हाईकोर्ट में 2 लोगों ने की थी याचिका दायर गढ़ा जबलपुर निवासी विवेक कुमार शर्मा और एक अन्य की तरफ से दायर अलग-अलग याचिका में कहा गया था कि प्रदेश सरकार ने सितम्बर 2015 में जारी अधिसूचना के माध्यम से वृक्षों की 53 प्रजातियों को हटाने के अलावा मध्य प्रदेश परिवहन (वनोपज) नियम, 2000 के नियम 4(2) का प्रावधान भी हटा दिया गया है. जिसके परिणामस्वरूप निजी भूमि पर स्थित वृक्षों को काटने या परिवहन करने के लिए कोई अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है. लोगों के द्वारा उपयोग के लिए अधिक वृक्षों को काटने से पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ेगा. पर्यावरण संतुलन बिगड़ने से मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्कपाद बनाम भारत संघ के मामले में जारी आदेश के विपरीत है. लार्जर बेंच ने फैसले में पुष्पा फिल्म का किया जिक्र लार्जर बेंच ने अपना फैसला सुनाते हुए पुष्पा फिल्म का जिक्र किया. बेंच ने कहा कि "फिल्म पुष्पा में व्यापारियों और सिंडिकेट को उजागर किया है. जो आंध्र प्रदेश के शेषाचलम के घने हरे-भरे जंगलों में लाल चंदन के अवैध परिवहन, व्यापार और बिक्री में लगे हुए हैं. तस्करों और व्यापारियों का सिंडिकेट इतना प्रभाव और दबदबा बनाने लगता है कि पुलिस ,वन विभाग, नीति निर्माताओं और अंततः विधायकों तक शासन का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रह जाता. यह दर्शाता है कि कैसे वन उपज के अवैध व्यापार का परिवहन कर माफिया घने जंगलों में घुस सकता है और राज्य मशीनरी के साथ मिलीभगत करके जंगल की प्राकृतिक संपदा को लूट सकता है. कार्यपालिका वन उपज के ऐसे विक्रेताओं के प्रभाव और दबदबे के आगे झुक जाती है." 'एक जलाशय दस कुएं के समान और दस पुत्र एक पेड़ के समान' लार्जर बेंच ने अपने आदेश में कहा कि "1 जलाशय 10 कुएं के समान होते हैं और 10 जलाशय 1 पुत्र के समान होते हैं और 10 पुत्र 1 पेड़ के समान होता है. लार्जर बेंच ने 2019 से 2023 तक की एफएसआई रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र में 420 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध कमी आई है." 'ऐसे ही पेड़ कटे तो 50 साल में आधा वन क्षेत्र हो जाएगा खत्म' इस आंकड़े में अति सघन वन क्षेत्र में 363 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि और इसी अनुपात में लगभग 630 वर्ग किलोमीटर की भारी और तीव्र कमी और मध्यम सघन वन एवं खुले वन क्षेत्र में लगभग 104 वर्ग किलोमीटर की कमी शामिल है. जिससे शुद्ध आंकड़ा 420 वर्ग किलोमीटर हो जाता है. ये आंकड़े इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि हर वर्ष वन क्षेत्र तेजी से कम हो रहे है. मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र में कमी इसी गति से होती रही तो अगले 50 वर्षों में अधिसूचित वनों से वर्तमान वन क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा मिट जाएगा. 'कोर्ट ने कहा इंदौर वन विभाग के पत्रों ने चौंकाया' वर्तमान मामलों के 1500 से ज्यादा पेजों में दस्तावेज रिकॉर्ड का हवाला देते हुए लार्जर बैंच ने अपने आदेश में कहा है कि "पर्यावरणविद राजवीर सिंह हुरा और एनजीओ पर्यावरण प्रहरी के पदाधिकारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. जिसमें पेश किये गये दस्तावेजों ने हमें चौंका दिया. दस्तावेज में इंदौर के वन प्रभाग के अधिकारियों और वन विभाग के भीतर आंतरिक रूप से आदान-प्रदान किए गए पत्राचार शामिल हैं. वन संरक्षक इंदौर द्वारा अप्रैल 2017 में वन मंडल अधिकारी, इंदौर को संबोधित पत्र में बड़े पैमाने पर हरे-भरे और फलों से लदे पुराने पेड़ों की अवैध कटाई और इंदौर की मंडी में भारी मात्रा में उनके व्यापार का उल्लेख किया गया है. इसके अलावा यह भी कहा गया कि रोजाना लगभग 100-150 वाहन बाजारों में 1000-1500 टन लकड़ी और वन उपज अवैध रूप लेकर पहुंच रहे हैं. … Read more

हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया, शहडोल संभाग आयुक्त को लगाई फटकार

जबलपुर.  मध्य प्रदेश के जबलपुर हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. इतना ही नहीं उमरिया की रहने वाली माधुरी तिवारी के जिला बदर करने का आदेश भी निरस्त कर दिया है. दरअसल, जिला बदर करने के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. इसके साथ ही शहडोल संभागायुक्त को भी फटकार लगाई है. पूरा मामला 2024 का है. दरअसल, उमरिया कलेक्टर ने माधुरी तिवारी के खिलाफ जिला बदर का आदेश जारी किया गया था. बताया जा रहा है कि माधुरी पर 6 आपराधिक मामले दर्ज थे. इनमें से 2 धारा 110 के तहत थे. फिर 2 मामले मारपीट और 2 एनडीपीएस से जुड़ा केस था. हालांकि किसी भी मामले में महिला को सजा नहीं हुई थी. फिर जिला बदर के आदेश को माधुरी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. कोर्ट ने क्यों रद्द किया आदेश जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकल बेंच में इस मामले की सुनवाई हुई. इसके बाद कोर्ट ने जिला बदर का आदेश भी निरस्त कर दिया है. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि शहडोल संभागायुक्त अपने विवेक का प्रयोग करें. डाक घर की ओर से काम नहीं करें. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि कलेक्टर ने एसएसओ के बयान के आधार पर आदेश जारी कर दिया था. जांच में सामने आया कि माधुरी को 1 एनडीपीएस के केस में महज 1 दूसरे आरोपी के बयान के आधारपर फंसाया गया था. उनके कब्जे से कोई प्रतिबंधित पदार्थ बरामद नहीं किया गया था. इतना ही नहीं एसएचओ ने भी माना कि महिला से किसी का कोई विवाद नहीं था. इतना ही नहीं पाली के किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं कहा था कि माधुरी के यहां रहने से उन्हें कोई खतरा है. फिर हाईकोर्ट ने कलेक्टर और संभाग आयुक्त के आदेश को गलत बताया. फिर कलेक्टर पर जुर्माना भी लगाने का निर्देश दिया. recent visitors 85

आईएएस शिल्पा गुप्ता की बढ़ी मुश्किलें, गिरफ्तारी वारंट जारी, कोर्ट के आदेशों का नहीं किया पालन

जबलपुर  आईएएस अधिकारी और मध्य प्रदेश लोकशिक्षण संचनालय की कमिश्नर शिल्पा गुप्ता की मुश्किलें बढ़ गईं हैं. कन्टैंप्ट ऑफ कोर्ट के मामले में जबलपुर हाईकोर्ट ने डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता के खिलाफ जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया है. हाईकोर्ट ने शिल्पा गुप्ता को 23 मार्च को कम्प्लाइंस रिपोर्ट के साथ कोर्ट में हाजिर होने के निर्देश दिए हैं. दरअसल जबलपुर हाईकोर्ट ने डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता को 4 महीने पहले याचिकाकर्ताओं को शिक्षा विभाग में नियुक्ति देने के आदेश दिए थे, लेकिन उन्होने कोर्ट के इस आदेश का पालन करना तो दूर अपना जवाब भी नहीं दिया. हाईकोर्ट ने शिक्षक भर्ती परीक्षा में आरक्षित वर्ग के मैरिटोरियस उम्मीदवारों को उनकी चॉइस फिलिंग के मुताबिक शिक्षा विभाग में नियुक्ति देने के आदेश दिए थे, लेकिन शिक्षा विभाग ने उन्हें ट्राइलब वैलफेयर विभाग में ही बरकरार रखा. ऐसे में उम्मीदवारों की ओर से दायर अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट ने सुनवाई की. आईएएस शिल्पा गुप्ता की बढ़ीं मुश्किलें कोर्ट को बताया गया कि आईएएस शिल्पा गुप्ता के खिलाफ हाईकोर्ट में कंटैंप्ट ऑफ कोर्ट के करीब 200 मामले लंबित हैं, जिनसे समझा जा सकता है कि वो अदालत के आदेशों का पालन नहीं करतीं. ऐसे में हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता के खिलाफ 10 हजार रुपयों का जमानती गिरफ्तारी वारेंट जारी कर दिया. हाईकोर्ट ने शिल्पा गुप्ता को ये आदेश दिया है कि वो 23 मार्च को कोर्ट के आदेश का पालन करने की रिपोर्ट के साथ हाईकोर्ट में हाजिर रहें. recent visitors 60