आपराधिक मामलों में दोषी नेताओं पर ताउम्र चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध सही नहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए नेताओं पर ताउम्र चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं होगा। केंद्र ने कहा कि मौजूदा छह साल का प्रतिबंध ही काफी है। आपराधिक मामलों में दोषी करार दिए गए नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका का विरोध करते हुए केंद्र सरकार ने शीर्ष न्यायालय से ऐसा कहा है। इस याचिका में दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों समेत अन्य नेताओं पर चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत में दाखिल हलफनामे में केंद्र ने कहा कि याचिका में जो अनुरोध किया गया है वह विधान को फिर से लिखने या संसद को एक विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देने के समान है, जो न्यायिक समीक्षा संबंधी उच्चतम न्यायालय की शक्तियों से पूरी तरह से परे है। इसके साथ ही केंद्र ने कहा कि इस तरह की अयोग्यता तय करना केवल संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। हलफनामे में कहा गया है, ‘‘यह सवाल कि आजीवन प्रतिबंध लगाना उपयुक्त होगा या नहीं, यह पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।’’ इसमें कहा गया है कि दंड के क्रियान्वयन को एक उपयुक्त समय तक सीमित कर, रोकथाम सुनिश्चित की गई है और अनावश्यक कठोर कार्रवाई से बचा गया है। केंद्र ने कहा कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि दंड या तो समय या मात्रा के अनुसार निर्धारित होते हैं। हलफनामे में कहा गया है, ‘‘यह दलील दी गई है कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों के व्यापक प्रभाव हैं और वे स्पष्ट रूप से संसद की विधायी नीति के अंतर्गत आते हैं तथा इस संबंध में न्यायिक समीक्षा की रूपरेखा में उपयुक्त परिवर्तन करना पड़ेगा।’’ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर दोषी करार दिये गए नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के अलावा देश में सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के त्वरित निस्तारण का अनुरोध किया है। अपने हलफनामे में, केंद्र ने कहा कि शीर्ष अदालत ने निरंतर यह कहा है कि एक विकल्प या दूसरे पर विधायी विकल्प की प्रभावकारिता को लेकर अदालतों में सवाल नहीं उठाया जा सकता। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (1) के तहत, अयोग्यता की अवधि दोषसिद्धि की तारीख से छह साल या कारावास के मामले में रिहाई की तारीख से छह साल तक है। हलफनामे में कहा गया है कि उक्त धाराओं के तहत घोषित की जाने वाली अयोग्यताएं संसदीय नीति का विषय हैं और आजीवन प्रतिबंध लगाना उपयुक्त नहीं होगा। केंद्र ने कहा कि न्यायिक समीक्षा के मामले में, न्यायालय प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, हालांकि, याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत में अधिनियम की धारा 8 की सभी उप-धाराओं में ‘‘छह वर्ष’’ के प्रावधान को ‘‘आजीवन’’ पढ़े जाने का अनुरोध किया गया है। इसने कहा कि आजीवन अयोग्यता, प्रावधानों के तहत लगाई जा सकती है और ऐसा विवेकाधिकार ‘‘निश्चित रूप से संसद के अधिकार क्षेत्र में’’ है। केंद्र ने कहा कि याचिका अयोग्यता के आधार और अयोग्यता के प्रभावों के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करने में विफल रही है। हलफनामे में कहा गया है कि याचिकाकर्ता का संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 का उल्लेख करना पूरी तरह से गलत है। संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 संसद, विधानसभा या विधानपरिषद की सदस्यता के लिए अयोग्यता से संबंधित हैं। केंद्र ने कहा कि अनुच्छेद 102 और 191 के खंड (ई) संसद को अयोग्यता से संबंधित कानून बनाने की शक्ति प्रदान करते हैं और इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए 1951 का (जन प्रतिनिधित्व) अधिनियम बनाया गया था। इसने कहा कि संविधान ने संसद को अयोग्यता से संबंधित ऐसे अन्य कानून बनाने का अधिकार दिया है, जिसे बनाना वह उचित समझता हो। केंद्र ने कहा, ‘‘संसद के पास अयोग्यता के आधार और अयोग्यता की अवधि, दोनों निर्धारित करने की शक्ति है।’’न्यायालय ने 10 फरवरी को, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा था। recent visitors 66

सुप्रीम कोर्ट चुनाव से पहली मुफ्त योजनाओं पर भड़का, फ्रीबीज के कारण लोग काम करने तैयार नहीं हैं,

नई दिल्ली चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जमकर नाराजगी जाहिर की है। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि Freebies की वजह से लोग काम करने को तैयार नहीं है। अदालत बुधवार को शहरी इलाकों में बेघरों से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही थी। फिलहाल, इस मामले पर सुनवाई को 6 हफ्तों के लिए स्थगित कर दिया गया है। शीर्ष न्यायालय में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच शहरी इलाकों में बेघरों को घर के अधिकार से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस गवई ने कहा, 'दुर्भाग्यवश, मुफ्त की इन सुविधाओं के कारण… लोग काम करने को तैयार नहीं हैं। उन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है। उन्हें बिना कोई काम किए ही धनराशि मिल रही है।' बेंच ने कहा, 'हम उनके प्रति आपकी चिंता को समझते हैं, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वह भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ें और उन्हें भी देश के विकास में योगदान का मौका मिले।' अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है, जिसके तहत शहरी क्षेत्रों में बेघरों के लिए आश्रय की व्यवस्था समेत विभिन्न मुद्दों का समाधान किया जाएगा। पीठ ने अटॉर्नी जनरल को केंद्र सरकार से यह पूछने का निर्देश दिया कि शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन कितने समय में लागू किया जाएगा। recent visitors 44

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा- फिलहाल EVM से कोई डेटा डिलीट न करें और ना ही रीलोड करें

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ईवीएम के सत्यापन के संबंध में नीति बनाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई की. याचिका में चुनाव आयोग को ईवीएम की मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर की जांच और सत्यापन के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है. इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) से जवाब मांगा है और आदेश दिया है कि फिलहाल EVM से कोई डेटा डिलीट न करें और ना ही कोई डेटा रीलोड करें. दरअसल, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा कोर्ट में ईवीएम के सत्यापन को लेकर याचिका दायर की गई थी. इस पर मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि हम नहीं चाहते कि ईवीएम से छेड़छाड़ हो, हम चाहते हैं कि शायद इंजीनियर यह बता सके कि कोई छेड़छाड़ हुई है या नहीं. हमारी परेशानी यह है कि हमने इसे सही तरीके से नहीं बताया. इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि जिस तरह से आप चाहते हैं, हम उसे पूरा करेंगे. कोर्ट ने आदेश दिया कि वे (ईसीआई) इसे लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. आप में से कौन सही है, हमें नहीं पता. हम सिर्फ पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस मुद्दे पर 15 दिनों में जवाब दाखिल करने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि हम करण सिंह दलाल और एमए 40/2025 की याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं. हम विस्तृत प्रक्रिया भी नहीं चाहते. हम चाहते हैं कि आप आएं और प्रमाणित करें कि देखिए यह किया जा रहा है. डेटा को मिटाएं या फिर से लोड ना करें. आप बस यही करेंगे कि कोई आकर प्रमाणित करेगा. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई हारने वाला उम्मीदवार स्पष्टीकारण चाहता है तो इस पर इंजीनियर ही स्पष्टीकरण दे सकता है कि ईवीएम से छेड़छाड़ हुई है या नहीं. हम चाहते हैं कि अगर किसी को कोई संदेह है तो वो दूर हो. यह विरोधात्मक नहीं है. कई बार धारणाएं अलग-अलग होती हैं, जो हम बताना चाहते हैं, वह हम नहीं बता पाते. हम नहीं चाहते हैं कि ईवीएम से छेड़छाड़ हो, हम चाहते हैं कि शायद इंजीनियरिंग यह बता सके कि कोई छेड़छाड़ हुई है या नहीं. आप में से कौन सही है, हमें नहीं पता. हम सिर्फ पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. सुनवाई के दौरान एडीआर की ओर से पेश हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा, "हम चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार चुनाव आयोग को जो प्रक्रिया अपनानी है, वह उनके मानक संचालन प्रोटोकॉल के अनुरूप हो. हम चाहते हैं कि कोई व्यक्ति ईवीएम के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जांच करे, ताकि यह पता चल सके कि सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में किसी तरह की छेड़छाड़ की गई है या नहीं. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने अपने पहले के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा, "हम नहीं चाहते थे कि मतगणना तक कोई गड़बड़ी हो (पहले के आदेश के माध्यम से) साथ ही, हम यह भी देखना चाहते थे कि क्या किसी को कोई संदेह है. हम नहीं चाहते थे कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की जाए, हम चाहते थे कि शायद इंजीनियरिंग यह बता सके कि क्या कोई छेड़छाड़ हुई है." recent visitors 65

सुप्रीम कोर्ट ने ‘डेड बॉडी के साथ यौन संबंध बनाना ‘बलात्कार’ अपराध की दलील खारिज की

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि दंड कानून नेक्रोफीलिया को अपराध नहीं मानते, इसलिए वह हाईकोर्ट के आंशिक बरी करने के आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, जिसमें आरोपी ने मृतक की हत्या करने के बाद उसके शव के साथ यौन संबंध बनाए थे। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की खंडपीठ कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी को मृत शरीर के साथ यौन संबंध बनाने के लिए बलात्कार के आरोपों से बरी कर दिया गया, लेकिन हत्या के अपराध के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी। यहां राज्य सरकार ने वर्तमान एसएलपी दायर की।  हाई कोर्ट ने शख्स को रेप के आरोप से बरी कर दिया था, लेकिन हत्या की सजा कायम रही। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) में नेक्रोफिलिया (Necrophilia) यानी शव के साथ कामुकता को अपराध नहीं माना गया है। कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में कर्नाटक सरकार की ओर से अडिशनल एडवोकेट जनरल अमन पंवार ने तर्क दिया कि IPC की धारा 375(c) में 'शरीर' शब्द को मृत शरीर भी शामिल माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि रेप की परिभाषा के तहत प्रावधान में कहा गया है कि यदि कोई महिला सहमति नहीं दे सकती है तो इसे बलात्कार माना जाएगा। इसी तर्क के आधार पर मृत शरीर भी सहमति नहीं दे सकता, इसलिए यह अपराध बलात्कार की श्रेणी में आना चाहिए। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि नेक्रोफिलिया भारतीय दंड संहिता के तहत कोई अपराध नहीं है, इसलिए वह हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने को इच्छुक नहीं है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने क्या कहा था? कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि मृत शरीर के साथ यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता, क्योंकि IPC की धारा 375 और 377 केवल जीवित मनुष्यों पर लागू होती है। धारा 375 और 377 का गहराई से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि मृत शरीर को 'व्यक्ति' या 'मानव' नहीं माना जा सकता। इसलिए, इन धाराओं के तहत कोई अपराध नहीं बनता और आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत सजा नहीं दी जा सकती। हाई कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि नेक्रोफिलिया एक गंभीर समस्या है और संसद को इसे अपराध घोषित करने के लिए कानून बनाना चाहिए। एक मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भी दिसंबर में कहा था कि किसी मृत महिला या बच्ची के साथ यौन अपराध किया जाता है तो उसे IPC की धारा 375 (बलात्कार) या POCSO अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कानून में बदलाव की दरकार अस्पतालों और मुर्दाघरों में युवतियों के शवों के साथ यौन संबंध की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन भारत में ऐसे मामलों के लिए कोई विशेष कानून नहीं है। नेक्रोफिलिया एक मनो-यौन विकार (psychosexual disorder) है। यह सही समय है कि केंद्र सरकार मृत व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए IPC की धारा 377 में संशोधन करे और नेक्रोफिलिया को अपराध घोषित करे, जैसा कि यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में किया गया है। यह मामला भारतीय दंड संहिता में संशोधन की आवश्यकता को उजागर करता है ताकि मृत व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों की रक्षा की जा सके। recent visitors 64

सुप्रीम कोर्ट जज का दावा- इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर मांग रहे थे बंद कमरे में माफी, बाहर निकलकर पलटे

नई दिल्ली इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव ने एक कार्यक्रम में मुसलमानों के लिए कठमुल्ला शब्द का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा उन्होंने देश में बहुसंख्यकों के हिसाब से व्यवस्था चलने की बात कही थी। उनके इस बयान को लेकर जमकर विवाद हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका संज्ञान लिया। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के सामने जस्टिस यादव व्यक्तिगत तौर पर पेश हुए थे। इस बीच कॉलेजियम के मेंबर रहे जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने कई अहम खुलासे किए हैं। उनका कहना है कि जस्टिस शेखर कुमार यादव ने कॉलेजियम के साथ मीटिंग में कहा था कि मैं आप लोगों से माफी मांग लेता हूं। उन्होंने कहा कि मैं आपसे माफी मांगने के लिए तैयार हूं। इस पर चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि बंद कमरे में माफी मांगने का कोई मतलब नहीं है। ऐसा आपको सार्वजनिक तौर पर करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से 31 जनवरी को रिटायर होने वाले जस्टिस रॉय ने कहा कि जस्टिस शेखर कुमार यादव ने सार्वजनिक माफी की बात को मान लिया था। वह यह कहते हुए मीटिंग से निकले थे, लेकिन आज तक माफी की मांग नहीं की। यही नहीं उन्होंने तो अपने एक जवाब में यहां तक कहा था कि मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा है। जस्टिस रॉय ने कहा कि ऐसा लगता है कि बाद में उनका विचार बदल गया। पहले तो वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने के लिए तैयार हो गए थे। जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने उनके इस व्यवहार को लेकर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा, 'ऐसा एक और वाकया हुआ था, जब एक जज ने ऐसा ही बयान दिया था। तब उन्होंने बाद में माफी मांग ली थी। जस्टिस यादव ने भी पब्लिक में माफी की बात कही, लेकिन अब तक ऐसा नहीं किया है। अब चीफ जस्टिस ने इन-हाउस इन्क्वॉयरी शुरू की है।' जस्टिस रॉय ने कहा, 'उन्होंने कॉलेजियम के सभी 5 जजों के सामने कहा था कि मैं आप सभी लोगों से माफी मांगता हूं। वह उस समय तैयार थे। लेकिन चीफ जस्टिस ने जब पब्लिक में माफी की मांग की तो वह तैयार हो गए। वहां से निकले तो फिर ऐसा नहीं किया।' समान नागरिक संहिता पर एक भाषण देते हुए जस्टिस शेखर कुमार यादव ने विवादित बयान देते हुए कहा था कि देश का सिस्टम बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा। उन्होंने कहा था कि परिवार में आखिर जिस बात को ज्यादा लोग मानते हैं, वही होता है। इसके अलावा उन्होंने मुस्लिमों के लिए कठमुल्ला शब्द का इस्तेमाल किया था। इसी मामले पर उन्हें कॉलेजियम ने समन जारी किया था। बता दें कि जस्टिस शेखर यादव ने इश मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को जवाब दिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि मैं अब भी अपने बयान पर कायम हूं। उनका कहना था कि मैंने अपना बयान जज के तौर पर नहीं बल्कि एक हिंदू के रूप में दिया था। इसलिए अदालत परिसर से बाहर कही गई कोई बात उनके जज रहने की आचार संहिता का उल्लंघन नहीं करती। इसके अलावा हाई कोर्ट की मर्यादा को भी इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचता। recent visitors 41

कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को जारी किए गए जीएसटी ‘कारण बताओ नोटिस’ पर रोक लगाई: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को जारी किए गए 1.12 लाख करोड़ रुपये के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) 'कारण बताओ नोटिस' पर रोक लगा दी, जिससे इस सेक्टर को अस्थायी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मामले के अंतिम निपटारे तक डीजीजीआई द्वारा जारी सभी 'कारण बताओ नोटिस' के संबंध में आगे की सभी कार्यवाही पर रोक लगा दी। मामले की अंतिम सुनवाई 18 मार्च को तय की गई है। फैसले के बाद, स्टॉक एक्सचेंजों पर इंट्रा-डे ट्रेड के दौरान डेल्टा कॉर्प और नाजारा टेक जैसी गेमिंग कंपनियों के शेयरों में 7 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। ई-गेमिंग फेडरेशन (ईजीएफ) के सीईओ अनुराग सक्सेना ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई राहत का स्वागत किया। सक्सेना ने कहा, "यह सरकार और गेमिंग ऑपरेटर्स दोनों के लिए फायदेमंद है। गेमिंग ऑपरेटर्स के लिए जो जबरदस्ती की कार्रवाई का सामना कर रहे थे और सरकार के लिए जिसकी समयसीमा अब बढ़ाई जा सकती है। हम इस मुद्दे के निष्पक्ष और प्रगतिशील समाधान को लेकर आश्वस्त हैं, जिसके बाद हम गेमिंग सेक्टर में निवेश, रोजगार और वैल्यूएशन को अपनी पूरी क्षमता तक बढ़ते देखेंगे।" डीजीजीआई ने 2023 में गेमिंग कंपनियों को 71 नोटिस भेजे, जिसमें उन पर 2022-23 और 2023-24 के पहले सात महीनों के दौरान 1.12 लाख करोड़ रुपये के जीएसटी की चोरी करने का आरोप लगाया गया, जिसमें ब्याज और जुर्माना शामिल नहीं है। जीएसटी अधिनियम की धारा 74 के तहत नोटिस जारी किए गए थे, जो विभाग को कर मांग के 100 प्रतिशत तक का जुर्माना लगाने की अनुमति देता है और कुल देयता ब्याज सहित 2.3 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। अगस्त 2023 में, जीएसटी परिषद ने कानून में संशोधन किया, जिसमें कहा गया कि दांव लगाने वाले सभी ऑनलाइन गेम, स्किल या चांस की परवाह किए बिना, उसी वर्ष 1 अक्टूबर से लगाए गए दांव के पूरे मूल्य पर 28 प्रतिशत की जीएसटी दर लगेगी, न कि सकल गेमिंग राजस्व पर।   recent visitors 94

33% महिला आरक्षण कानून को चुनौती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को निरर्थक बताया

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने 33% महिला आरक्षण कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई से शुक्रवार को इनकार कर दिया। अदालत ने उस याचिका को निरर्थक बताया जिसमें विधेयक को चुनौती दी गई थी, न कि अधिनियम को। दूसरी याचिका में इस मामले को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने सहित अन्य उपाय तलाशने की मांग रखी गई, जिसे नकार दिया गया। एससी की बेंच ने कहा कि पहले भी संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का मुद्दा उठाया गया, मगर इसे कभी लागू नहीं किया जा सका। हालांकि, इस बार इसे परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने की शर्त पर लागू किया जा रहा है। महिला आरक्षण कानून क्या है? महिला आरक्षण अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023) लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी यह नियम लागू होगा। इसका मतलब है कि लोकसभा की 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाएंगी। हालांकि, पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित नहीं होंगी। मालूम हो कि जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद यह आरक्षण लागू होगा। जनगणना के आधार पर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होंगी जिसके लिए परिसीमन किया जाएगा। यह आरक्षण 15 साल की अवधि के लिए मिलेगा। फिलहाल, लोकसभा की 131 सीटें एससी-एसटी के लिए आरक्षित की गई हैं। महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद इनमें से 43 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इन 43 सीटों को सदन में महिलाओं के लिए आरक्षित कुल सीटों का ही हिस्सा माना जाएगा। इसका मतलब है कि महिलाओं के लिए आरक्षित 181 सीटों में से 138 ऐसी होंगी, जिन पर किसी भी जाति की महिला उम्मीदवार होगी। साफ है कि इन सीटों पर उम्मीदवार पुरुष नहीं हो सकते हैं। मालूम हो कि यह गणना लोकसभा में सीटों की मौजूदा संख्या पर की गई है। परिसीमन के बाद इसमें बदलाव हो सकता है। recent visitors 75