निजी संपत्ति अधिग्रहण मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला, कहा कि सरकार निजी संपत्ति का अधिग्रहण नहीं कर सकती

नई दिल्ली  निजी संपत्ति का सरकार सार्वजनिक हितों के लिए अधिग्रहण कर सकती है या नहीं, इस मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत से अपने फैसले में कहा है कि सभी निजी संपत्ति को सरकार नहीं ले सकती है। पीठ ने 8-1 के बहुमत से ये फैसला सुनाया है। 9 जजों की पीठ ने सुनाया फैसला चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने 8-1 के बहुमत से फैसला सुनाया है। पीठ में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस सुधांशु धूलिया, जस्टिस ऋषिकेश रॉय, जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस ए जी मसीह शामिल हैं। सीजेआई ने 9 जजों की बेंच के मामले में बहुमत से फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर के पिछले फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि सभी निजी स्वामित्व वाले संसाधनों को राज्य द्वारा अधिग्रहित किया जा सकता है। जस्टिस अय्यर के विचार से सहमत नहीं सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था का मकसद विकासशील देश की चुनौतियों से निपटना है, ना कि किसी एक आर्थिक ढांचे में बंधे रहना। कोर्ट ने माना कि बीते 30 सालों में बदली हुई आर्थिक नीतियों के कारण भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना है। जस्टिस अय्यर के इस विचार से सुप्रीम कोर्ट सहमत नहीं है कि निजी संपत्ति को भी सामुदायिक संपत्ति माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि भारत की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य किसी खास आर्थिक मॉडल को फॉलो करना नहीं है। बल्कि, उसका उद्देश्य एक विकासशील देश होने के नाते आने वाली चुनौतियों का सामना करना है। सीजेआई बोले- तीन जजमेंट हैं सुप्रीम कोर्ट ने निजी संपत्ति से जुड़ी 16 याचिकाओं पर फैसला सुनाया है। जिसमें मुंबई के प्रॉपर्टी मालिकों की याचिका भी शामिल है। मामला 1986 में महाराष्ट्र में हुए कानून संशोधन से जुड़ा है, जिसमे सरकार को प्राइवेट बिल्डिंग को मरम्मत और सुरक्षा के लिए अपने कब्जे में लेने का अधिकार मिला था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह संशोधन भेदभावपूर्ण है। CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने बताया कि इस मामले में तीन जजमेंट हैं – उनका और छह अन्य जजों का, जस्टिस नागरत्ना का आंशिक सहमति वाला और जस्टिस धुलिया का असहमति वाला। recent visitors 78

Supreme Court:निजी संपत्तियां ‘समुदाय के भौतिक संसाधन’ नहीं, राज्य नहीं कर सकता जबरन अधिग्रहण

Supreme Court: Private properties are not ‘physical resources of the community’, the state cannot forcibly acquire them नई दिल्ली ! सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सभी निजी स्वामित्व वाली संपत्तियां सामुदायिक संसाधन नहीं होतीं, जिन्हें राज्य आम भलाई के लिए अपने अधीन कर सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 8-1 के बहुमत से इस विवादास्पद मुद्दे पर फैसला सुनाया। तीन फैसले लिखे गएमुख्य न्यायाधीश ने अपने और छह सहयोगियों के लिए एक फैसला लिखा, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने एक समवर्ती लेकिन अलग फैसला लिखा और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने असहमति जताई। पीठ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति नागरत्ना बीवी, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति एससी शर्मा और न्यायमूर्ति एजी मसीह शामिल थे।यह मामला संविधान के अनुच्छेद 31सी से संबंधित है जो राज्य द्वारा राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को पूरा करने के लिए बनाए गए कानूनों की रक्षा करता है – संविधान सरकारों को कानून और नीतियां बनाते समय पालन करने के लिए दिशा-निर्देश देता है। अनुच्छेद 31सी जिन कानूनों की रक्षा करता है उनमें अनुच्छेद 39बी भी शामिल है। अनुच्छेद 39बी में प्रावधान है कि राज्य अपनी नीति इस प्रकार बनाएगा कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार वितरित हो कि सर्वजन हिताय हो।किसी की निजी संपत्ति नहीं हो सकती पब्लिकइस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “क्या 39बी में इस्तेमाल किए गए समुदाय के भौतिक संसाधन में निजी स्वामित्व वाले संसाधन शामिल हैं? सैद्धांतिक रूप से, इसका उत्तर हां है, इस वाक्यांश में निजी स्वामित्व वाले संसाधन शामिल हो सकते हैं। हालांकि, यह न्यायालय रंगनाथ रेड्डी में न्यायमूर्ति अय्यर के अल्पमत के दृष्टिकोण से सहमत नहीं है। हमारा मानना ​​है कि किसी व्यक्ति के स्वामित्व वाले प्रत्येक संसाधन को केवल इसलिए समुदाय का भौतिक संसाधन नहीं माना जा सकता क्योंकि वह भौतिक आवश्यकताओं की योग्यता को पूरा करता है।”उन्होंने कहा, “39बी के अंतर्गत आने वाले संसाधन के बारे में जांच विवाद-विशिष्ट होनी चाहिए और संसाधन की प्रकृति, विशेषताओं, समुदाय की भलाई पर संसाधन के प्रभाव, संसाधन की कमी और ऐसे संसाधन के निजी लोगों के हाथों में केंद्रित होने के परिणामों जैसे कारकों की एक गैर-संपूर्ण सूची के अधीन होनी चाहिए, इस न्यायालय द्वारा विकसित सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत भी उन संसाधनों की पहचान करने में मदद कर सकता है जो समुदाय के भौतिक संसाधन के दायरे में आते हैं।”46 साल बाद पलटा फैसला1977 में, सात न्यायाधीशों की पीठ ने 4:3 बहुमत से फैसला सुनाया था कि निजी स्वामित्व वाली सभी संपत्ति समुदाय के भौतिक संसाधनों के दायरे में नहीं आती है। हालाँकि, अल्पमत की राय में, न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने माना कि सार्वजनिक और निजी दोनों संसाधन अनुच्छेद 39(बी) के तहत “समुदाय के भौतिक संसाधनों” के दायरे में आते हैं। अपने अलग फैसले में, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने न्यायमूर्ति अय्यर के फैसले पर उनकी टिप्पणियों पर मुख्य न्यायाधीश से असहमति जताई। recent visitors 123

मरने से पहले किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता: SC

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि मरने से पहले किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने इस प्रकार के बयानों पर गंभीरता से परीक्षण की जरूरत पर बल देते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी है, जिसमें तीनों आरोपियों को बरी किया गया था। यह मामला एक अक्टूबर 1996 का है, जब नसीम खान की हत्या के आरोप में रमजान खान, मुसफ खान और हबीब खान को मध्यप्रदेश के सेशन कोर्ट ने दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामले में मृतक की मां ने ट्रायल कोर्ट में बयान दिया था कि मरने से पहले उसके बेटे ने आरोपियों के नाम बताए थे, और इसी बयान को ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि का आधार बनाया था। हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ दिया, जिसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सीटी रविकुमार की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि मरने से पहले दिया गया मौखिक बयान अकेले पुख्ता साक्ष्य नहीं हो सकता, खासकर जब उसमें विरोधाभास हो और अन्य प्रमाण कमजोर हों। कोर्ट ने कहा कि संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों को रिहा किया जाना चाहिए। इस फैसले को कानूनी मामलों में एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मृत्यु से पहले दिए गए बयान की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता का गहराई से परीक्षण किया जाना चाहिए।     recent visitors 78

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि मरने से पहले किसी करीबी रिश्तेदार को दिए गए मौखिक बयान को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने इस प्रकार के बयानों पर गंभीरता से परीक्षण की जरूरत पर बल देते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी है, जिसमें तीनों आरोपियों को बरी किया गया था। यह मामला एक अक्टूबर 1996 का है, जब नसीम खान की हत्या के आरोप में रमजान खान, मुसफ खान और हबीब खान को मध्यप्रदेश के सेशन कोर्ट ने दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामले में मृतक की मां ने ट्रायल कोर्ट में बयान दिया था कि मरने से पहले उसके बेटे ने आरोपियों के नाम बताए थे, और इसी बयान को ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि का आधार बनाया था। हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ दिया, जिसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सीटी रविकुमार की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि मरने से पहले दिया गया मौखिक बयान अकेले पुख्ता साक्ष्य नहीं हो सकता, खासकर जब उसमें विरोधाभास हो और अन्य प्रमाण कमजोर हों। कोर्ट ने कहा कि संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों को रिहा किया जाना चाहिए। इस फैसले को कानूनी मामलों में एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मृत्यु से पहले दिए गए बयान की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता का गहराई से परीक्षण किया जाना चाहिए।   recent visitors 76

SC ने दहेज हत्या के एक मामले में एक आरोपी को बरी करते हुए कहा- दहेज उत्पीड़न के मामलों में सावधानी बरतें कोर्ट

नई दिल्ली अगर आपसे पूछा जाए कि 2-4 ऐसे कानूनों का नाम बताइए जिसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग होता है। जवाब में दहेज उत्पीड़न से जुड़ा कानून शायद ही किसी की लिस्ट में जगह पाने से छूटे। इस कानून को पति के घरवालों और रिश्तेदारों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। गुनाह किसी का भी हो लेकिन घर के हर बालिग सदस्य को आरोपी बना दिया जाता है। जमानत भी मुश्किल से होती है। कानून के दुरुपयोग को लेकर समय-समय पर अदालतें भी चिंता जताती रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए अदालतों को सलाह दी है कि वे दहेज उत्पीड़न या दहेज हत्या से जुड़े मामलों सावधानी बरतें। ध्यान रखें कि कोई बेगुनाह परेशान न हो। कानून के दुरुपयोग को लेकर सावधानी बरतने की सलाह सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों को दहेज उत्पीड़न के मामलों में सावधानी बरतने को कहा है। अक्सर इन मामलों में पति के रिश्तेदारों को भी फंसा लिया जाता है, जबकि मुख्य आरोपी पति होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के कई मामलों में आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। ऐसे में अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए ताकि निर्दोष परेशान न हों। जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने दहेज मृत्यु के एक मामले में एक व्यक्ति को बरी करते हुए यह बात कही। दहेज हत्या के मामले में ननदोई भी था आरोपी बेंच ने कहा कि आरोपी ने मृतका की ननद से अक्टूबर 2010 में शादी की थी। दहेज उत्पीड़न का आरोप पहली बार लगने के बाद उसने शादी की थी। सिर्फ इसलिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसकी पत्नी को दोषी पाया गया था। बेंच ने कहा कि सामान्य और व्यापक आरोप अभियोजन का आधार नहीं हो सकते। अदालतों को ऐसी शिकायतों से निपटने में सावधानी बरतनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने अपने एक पूर्व के फैसले का हवाला देते हुए कहा, 'कोर्ट ने देखा है कि यह सर्वविदित है कि बड़ी संख्या में शिकायतों में घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। बड़ी संख्या में मामलों में फंसाने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है।' बेंच ने कहा, 'हमारा विचार है कि ऐसी परिस्थितियों में, अदालतों को आरोपियों को फंसाए जाने के मामलों की पहचान करने और ऐसे व्यक्तियों द्वारा अपमान और पीड़ा को टालने के लिए सावधान रहना होगा।' आरोपी की 5 महीने पहले ही हुई थी शादी सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आरोपी ने मुख्य आरोपी (पति) की बहन से अक्टूबर 2010 में शादी की और जिस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण महिला की मृत्यु हुई, वह परिवार का रिश्तेदार बनने के साढ़े पांच महीने के भीतर ही हुई। बेंच ने कहा, 'यह एक सच्चाई है कि सामान्य, अस्पष्ट आरोपों के बावजूद, अपीलकर्ता के खिलाफ कोई विशेष आरोप नहीं लगाया गया था। इसके अलावा, हमारी सूक्ष्म जांच के बावजूद, हम अभियोजन पक्ष द्वारा अपीलाकर्ता के खिलाफ किसी भी गवाह के माध्यम से कोई विशेष सबूत नहीं पा सके। …अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने विशेष रूप से अपीलकर्ता के खिलाफ यह कहते हुए गवाही नहीं दी थी कि उसने कोई क्रूरता की है जो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 498-A के तहत अपराध का मामला बन सके।' 'आरोपी एक दोषी का रिश्तेदार है तो इसका मतलब ये नहीं कि वह भी दोषी' बेंच ने कहा, 'ऐसा भी कोई मामला नहीं है कि इस प्राथमिकी से पहले अपीलकर्ता के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज कराई गई हो। संक्षेप में, हम पाते हैं कि अपीलकर्ता के खिलाफ यह मानने के लिए कोई सबूत नहीं है कि उसने IPC की धारा 498-A के तहत अपराध किया है। दूसरे आरोपी का पति होने के नाते, जिसे निचली अदालतों ने उक्त अपराध के लिए दोषी पाया था, अपीलकर्ता को उक्त अपराध के तहत दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकता है, क्योंकि रिकॉर्ड पर कोई विशेष सामग्री नहीं है।ट सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ इसलिए किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह मामले में दोषी पाई गई महिला का रिश्तेदार है। अदालत ने कहा कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में सबूतों के आधार पर ही फैसला लिया जाना चाहिए। recent visitors 81

बहराइच हिंसा में आरोपियों के खिलाफ डेमोलेशन ऐक्शन पर रोक, सुप्रीम कोर्ट आज करेगा केस की सुनवाई

नई दिल्ली  उच्चतम न्यायालय ने  कहा कि उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में हिंसा और दंगों में कथित रूप से शामिल आरोपियों के खिलाफ 'बुलडोजर' चलाने की प्रस्तावित कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर बुधवार को सुनवाई की जायेगी। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी यू सिंह और अन्य वकीलों की शीघ्र सुनवाई करने की गुहार स्वीकार करते हुए इस मामले को 23 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार कथित रूप से दंगों में शामिल लोगों के खिलाफ तोड़-फोड़ की कार्रवाई इस आधार पर करना चाहती है कि उनका निर्माण अवैध है।इस पर पीठ ने कहा, "आप इस अदालत द्वारा पारित आदेशों से अवगत हैं। यदि वे (राज्य सरकार) इन आदेशों का उल्लंघन करने का जोखिम उठाना चाहते हैं, तो यह उनकी पसंद है।" पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज से कहा कि उसे बुधवार तक कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने सहमति जताते हुए कहा, "हम कुछ नहीं करेंगे।" उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) ने बहराइच जिले के एक गांव में धार्मिक जुलूस के दौरान संगीत बजाने को लेकर कथित रूप से सांप्रदायिक हिंसा में शामिल तीन लोगों की अचल संपत्ति के ध्वस्तीकरण के लिए नोटिस जारी किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अक्टूबर को अपने 17 सितंबर के आदेश को बढ़ा दिया था कि इस न्यायालय की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में शामिल अभियुक्त की संपत्ति को ध्वस्त करने के लिए राज्यों द्वारा बुलडोजर का उपयोग नहीं किया जाएगा शीर्ष अदालत ने हालांकि,तब सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों, रेलवे लाइनों या जल निकायों पर अतिक्रमण से जुड़ी कार्रवाई को छूट दी थी।शीर्ष अदालत ने तब बुलडोजर कार्रवाई के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करने पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अक्टूबर को कहा था कि वह "बुलडोजर न्याय" के विवादास्पद मुद्दे से निपटने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर दिशा-निर्देश तैयार करेगा, जिसका उपयोग कुछ राज्य सरकारें किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगने के तुरंत बाद उसके घर या दुकान को ध्वस्त करने के लिए करती हैं।     recent visitors 104

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल, एक वकील वकालत के पेशे में रहते हुए पत्रकारिता जैसे पेशे की दोहरी भूमिका कैसे निभा सकता है

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि एक वकील वकालत के पेशे में रहते हुए पत्रकारिता जैसे पेशे की दोहरी भूमिका कैसे निभा सकता है, जबकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के मुताबिक दोहरी भूमिका निभाना प्रतिबंधित है। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दो टूक लहजे में कहा कि किसी भी वकील को डबल रोल निभाने की इजाजत नहीं दे सकते हैं। पिछली सुनवाई में भी कोर्ट ने वकील के डबल रोल पर सवाल उठाए थे और इसे व्यावसायिक कदाचार बताया था। आज फिर जब उस मामले की सुनवाई शुरू हुई तो जस्टिस ओका ने कहा, "आप या तो वकालत कर लीजिए या फिर पत्रकारिता। हम इस तरह की प्रैक्टिस की अनुमति नहीं देंगे।" कोर्ट ने आरोपी अधिवक्ता से कहा, जो उस समय एक पत्रकार के तौर पर भी काम कर रहा था, जब बार काउंसिल के नियमों में ऐसी दोहरी भूमिकाएं निभाने पर प्रतिबंध है तो आपको हम इसकी इजाजत कैसे दे सकते हैं। जस्टिस ओका ने कहा, "हम ऐसी दोहरी भूमिका की अनुमति नहीं दे सकते। यह एक नेक पेशा है। आप यह भी नहीं कह सकते कि एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।" इसके बाद पीठ ने अधिवक्ता-सह-पत्रकार की याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नया नोटिस जारी किया। यह मामला मोहम्मद कामरान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य का है। दरअसल, डॉ. मोहम्मद कामरान इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस करते हैं और साथ में ही वह स्वतंत्र पत्रकारिता भी करते हैं। उन्होंने भाजपा के पूर्व सांसद और भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस दर्ज किया था, जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कामरान ने अपनी याचिका में आरोप लगाए थे कि तत्कालीन भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने उन्हें बदनाम करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को सितंबर 2022 में पत्र लिखे थे। जब हाई कोर्ट ने कमरान की मानहानि की अर्जी इस साल मार्च में खारिज हो गई तो उन्होंने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। अपील याचिका में कामरान ने लिखा कि वह वकील और पत्रकार दोनों हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता और नाराजगी जताई और कहा कि नियमों के मुताबिक, एक वकील कोई दूसरा पेशा नहीं अपना सकता। पीठ ने अपीलकर्ता मोहम्मद कामरान के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से भी जवाब मांगा है। recent visitors 114