सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता के हित में बड़ा और सार्थक कदम उठाया, कोर्ट की सुनवाई को लाइव देख सकेगें

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता के हित में बड़ा और सार्थक कदम उठाया है। अब कोई भी आम आदमी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को लाइव देख सकेगा। इसके लिए तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। अब से, आप सभी अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर देख पाएंगे। इससे पहले तक, सुप्रीम कोर्ट सिर्फ संविधान पीठ और राष्ट्रीय महत्व के अन्य मामलों की सुनवाई को ही यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीम करता था। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में स्वप्निल त्रिपाठी मामले में अपने फैसले में महत्वपूर्ण मामलों में कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग का समर्थन किया था।  इसके बाद, देश के कोने-कोने के नागरिकों को शीर्ष अदालत की कार्यवाही देखने का मौका मिले, इसलिए पूरे न्यायालय ने संविधान पीठों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण करने का फैसला किया। इसके अलावा, महत्वपूर्ण सुनवाई का लाइव ट्रांसक्रिप्शन तैयार करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग तकनीक का भी उपयोग किया जाता है। हाल ही में, नीट-यूजी मामले और आरजीकर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को लोगों ने काफ़ी संख्या में ऑनलाइन देखा। पिछले साल अगस्त में, संविधान के अनुच्छेद 370 पर संविधान पीठ की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश डी।वाई। चंद्रचूड़ ने कहा था कि शीर्ष अदालत देश भर की सभी निचली अदालतों में वर्चुअल सुनवाई को सक्षम बनाने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए अपना खुद का क्लाउड सॉफ्टवेयर स्थापित कर रही है। उन्होंने कहा था कि ईकोर्ट्स (प्रोजेक्ट) के तीसरे चरण में, हमारे पास एक बड़ा बजट है, इसलिए हम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए अपना खुद का क्लाउड सॉफ्टवेयर स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं। मुख्य न्यायाधीश ने बताया था कि महामारी के दौरान, भारत भर की अदालतों ने वर्चुअल माध्यम से 43 मिलियन सुनवाई कीं। औपनिवेशिक छाप और पारंपरिक विशेषताओं को त्यागते हुए एक अन्य पहल में, सीजेआई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुस्तकालय में लेडी जस्टिस की मूर्ति अब एक तलवार के बजाय भारतीय संविधान की एक प्रति रखी है, और उसकी आंखों से पट्टी हटा दी गई है। परंपरागत रूप से, आंखों पर बंधी पट्टी कानून के समक्ष समानता का सुझाव देती थी, जिसका अर्थ है कि न्याय का वितरण पक्षकारों की स्थिति, धन या शक्ति से प्रभावित नहीं होना चाहिए। तलवार ऐतिहासिक रूप से अधिकार और अन्याय को दंडित करने की क्षमता का प्रतीक थी। हालांकि, लेडी जस्टिस के दाहिने हाथ में न्याय के तराजू को बरकरार रखा गया है, जो सामाजिक संतुलन और फैसला सुनाने से पहले दोनों पक्षों के तथ्यों और तर्कों पर सावधानीपूर्वक विचार करने के महत्व का प्रतीक है।   recent visitors 78

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बाल विवाह रोकथाम कानून जरूरी है, कोई और मजहब का पर्सनल लॉ इस कानून के आड़े नहीं आ सकता

नई दिल्ली बाल विवाह रोकथाम अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून जरूरी है। इसके अलावा किसी भी मजहब का पर्सनल लॉ इस कानून के आड़े नहीं आ सकता। अदालत ने कहा कि बाल विवाह गलत है और इससे किसी के भी मनपसंद जीवनसाथी चुनने का अधिकार प्रभावित होता है। कोर्ट ने कहा कि बचपन में कराए गए विवाह अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का विकल्प छीन लेते हैं। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की पीठ ने देश में बाल विवाह रोकथाम कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कई दिशानिर्देश भी जारी किए। प्रधान न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि बाल विवाह की रोकथाम के कानून को ‘पर्सनल लॉ’ के जरिए प्रभावित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस तरह की शादियां नाबालिगों की जीवन साथी चुनने की स्वतंत्र इच्छा का उल्लंघन हैं। पीठ ने कहा कि अधिकारियों को बाल विवाह की रोकथाम और नाबालिगों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उल्लंघनकर्ताओं को अंतिम उपाय के रूप में दंडित करना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि बाल विवाह निषेध कानून में कुछ खामियां हैं। इसे दूर करने की जरूरत है। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 बाल विवाह को रोकने और इसका उन्मूलन सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था। इस अधिनियम ने 1929 के बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम का स्थान लिया। पीठ ने कहा, 'बाल विवाह पर रोकथाम की रणनीति अलग-अलग समुदायों के हिसाब से बनाई जानी चाहिए। यह कानून तभी सफल होगा जब बहु-क्षेत्रीय समन्वय होगा। कानून प्रवर्तन अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता है। हम इस बात पर जोर देते हैं कि इस मामले में समुदाय आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।’ कोर्ट का कहना था कि इन मामलों की रोक के लिए कानून के पालन के साथ ही जागरूकता और शिक्षा की भी जरूरत है। recent visitors 92

चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की जाने वाली मुफ्त योजनाओं के वादे को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए, SC में एक और याचिका दाखिल

नई दिल्ली  चाहे बस यात्रा हो या फिर राशन की व्यवस्था। हर राज्य में होने वाले चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा ऐसी योजनाओं को फ्री में देने का ऐलान किया जाता है। जब राजनीतिक दल की चुनाव में जीत होती है तो मुफ्त की सरकारी योजनाओं को राज्य में लागू भी किया जाता है। देश के कई राज्य ऐसे हैं, जहां इस समय जनता के लिए फ्री योजनाएं चल रही हैं। हालांकि, अब ऐसी चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है कि देश के कई राज्यों में चल रही सभी मुफ्त की सरकारी योजनाएं बंद हो जाएंगी। आइये जानते हैं क्या सही में ऐसा कुछ होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में चुनाव के दौरान फ्रीबीज (चुनावी रेवड़ियों) के वादे को लेकर एक याचिका दायर की गई है। इस याचिका में मांग की गई है कि चुनावों के दौरान किसी भी तरह के फ्री वादे को रिश्वत करार दिया जाए। साथ ही चुनाव आयोग को इलेक्शन के दौरान राजनीतिक दलों के द्वारा की जाने वाली मुफ्त योजनाओं के वादे को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही पीठ ने इस याचिका को अन्य लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया है। पीठ ने याचिकाकर्ता को छूट देते हुए कहा कि वो सभी याचिकाओं पर जल्द सुनवाई के लिए अनुरोध कर सकता है। देश में बीते कुछ समय में चुनाव के समय फ्री योजनाओं को देने की मांग ने जोर पकड़ा है। लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनावों तक इसकी गूंज सुनाई दी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने कुछ यूनिट फ्री बिजली और मुफ्त पानी देने का वादा किया। इसके अलावा कांग्रेस ने भी कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान इसी तरह के वादे किए। वहीं, भाजपा शासित राज्यों में भी मुफ्त सरकारी योजनाएं चल रही हैं। फ्रीबीज (चुनावी रेवड़ियों) के वादे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही कई याचिकाएं लंबित हैं। पूर्व चीफ जस्टिस एनवी रमना, पूर्व सीजेआई जस्टिस यूयू ललित की पीठ पहले ही फ्रीबीज मामले में सुनवाई कर चुकी है। हाल ही में डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने इस मामले में सुनवाई की है।     recent visitors 76

पंजाब और हरियाणा सरकारों को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, पराली जलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर नाराजगी

नई दिल्ली दिल्ली एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण की समस्या का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बुधवार को कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा सरकारों को फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पराली जलाने की घटनाओं के लिए दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं करने के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों को तलब किया है और उन्हें 23 अक्टूबर को अदालत में पेश होकर अपनी सफाई पेश करने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा कि दोनों राज्य प्रदूषण की समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पराली जलाने वाले लोगों पर मामूली जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ दिया जा रहा है। यही वजह है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने में कोई मदद नहीं मिल रही है। कोर्ट ने आगे कहा कि यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। कोर्ट ने एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन को निर्देश दिया है कि वह उन अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करें जो अदालत के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) खतरे के निशान के पार पहुंच गया है। नोएडा ग्रेटर, नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली के कई ऐसे इलाके हैं जहां पर एक्यूआई 300 के आंकड़े को पार कर चुका है। स्थिति को देखते हुए दिल्ली सरकार ने एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पांस सिस्टम यानी ग्रैप का पहला चरण लागू कर दिया है। ग्रैप के पहले चरण के तहत पूरे दिल्ली एनसीआर में आतिशबाजी, होटल रेस्टोरेंट में कोयला और लकड़ी जलाने के उपयोग पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई है। इसके साथ ही खुले में कूड़ा फेंकना और कचरा जलाना भी पूरी तरीके से प्रतिबंधित कर दिया गया है।   recent visitors 65

सामग्री में संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो प्राथमिकी को रद्द करके जांच को विफल नहीं किया जा सकता: Supreme Court

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जब प्राथमिकी में किसी आरोपी पर बेईमानी का आरोप लगाया जाता है और सामग्री में संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो प्राथमिकी को रद्द करके जांच को विफल नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक कार्यवाही या प्राथमिकी को शुरुआत में ही रद्द कर दिया जाना चाहिए या नहीं, इस पर निर्णय लेते समय जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्रियों सहित प्राथमिकी में लगाए आरोपों पर गौर किया जाना चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ जांच के लिए मामला बनता है या नहीं। पीठ ने  अपने फैसले में कहा, ‘‘इस प्रकार, जब प्राथमिकी में आरोपी पर बेईमान आचरण का आरोप लगाया जाता है, जिसका पता संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली सामग्रियों से चलता है तो प्राथमिकी को रद्द करके जांच को विफल नहीं किया जाना चाहिए।’’ उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला सोमजीत मलिक की अपील पर दिया है जिसने एक आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी रद्द करने के झारखंड उच्च न्यायालय के एक फरवरी के आदेश को चुनौती दी थी। मलिक ने आरोप लगाया था कि उसका ट्रक जुलाई 2014 से आरोपी के पास था लेकिन 12.49 लाख रुपये के बकाये समेत उसका किराया नहीं चुकाया गया। पीठ ने कहा कि प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि आरोपी ने 14 जुलाई 2014 और 31 मार्च 2016 के बीच मलिक के ट्रक को 33,000 रुपये के मासिक किराये पर लिया था लेकिन पहले महीने के बाद किराया नहीं चुकाया और झूठा आश्वासन देता रहा। उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘किराया नहीं चुकाने के आरोप से ही सामान्य तौर पर यह मान लिया जाएगा कि आरोपी ने वाहन पर कब्जा बरकरार रखा है। ऐसी परिस्थितियों में उस ट्रक का क्या हुआ, यह जांच का विषय बन जाता है। यदि इसे आरोपी ने बेईमानी से खुर्द-बुर्द कर दिया था, तो यह आपराधिक विश्वासघात का मामला बन सकता है। इसलिए जांच के दौरान एकत्रित की गयी सामग्रियों पर विचार किए बिना शुरुआत में ही प्राथमिकी रद्द करने का कोई औचित्य नहीं है।’’ उसने कहा, ‘‘हमारी राय में उच्च न्यायालय को प्राथमिकी रद्द करने के अनुरोध पर विचार करने से पहले जांच के दौरान एकत्रित की गयी सामग्रियों पर गौर करना चाहिए था।’’ उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए, शीर्ष अदालत ने कानून के अनुसार और जांच एजेंसी द्वारा एकत्र की गई सामग्री पर विचार करने के बाद याचिका पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मामला वापस उच्च न्यायालय को भेज दिया।   recent visitors 74

केवल मानक की दिव्यांगता होने के आधार पर अभ्यर्थी को एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए पात्रता के अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा: SC

नई दिल्ली  उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केवल 40 प्रतिशत दिव्यांगता का तय मानक किसी को मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने से नहीं रोकता, जब तक कि विशेषज्ञ की रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख न हो कि अभ्यर्थी एमबीबीएस करने में असमर्थ है। न्यायामूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने अपने 18 सितंबर के आदेश के लिए विस्तृत कारण बताए। इस आदेश में न्यायालय ने एक उम्मीदवार को एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने की अनुमति दी थी क्योंकि मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि वह बिना किसी बाधा के मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने में समर्थ है। पीठ ने कहा कि दिव्यांग उम्मीदवार की एमबीबीएस पाठ्यक्रम में पढ़ाई करने की क्षमता की जांच विकलांगता मूल्यांकन बोर्ड द्वारा की जानी चाहिए। इसने कहा, ‘‘केवल निर्धारित मानक की दिव्यांगता होने के आधार पर अभ्यर्थी को एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए पात्रता के अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। अभ्यर्थी की दिव्यांगता का आकलन करने वाले विकलांगता बोर्ड को सकारात्मक रूप से यह दर्ज करना होगा कि अभ्यर्थी की दिव्यांगता पाठ्यक्रम की पढ़ाई में अभ्यर्थी के लिए बाधा बनेगी या नहीं।’’ शीर्ष अदालत ने कहा कि विकलांगता बोर्ड को यह भी बताना चाहिए कि क्या वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि उम्मीदवार पाठ्यक्रम में पढ़ाई के लिए असमर्थ है। अगर ऐसा है तो उसे कारण बताना चाहिए। न्यायालय ने ओंकार नामक छात्र की याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसने 1997 के स्नातक चिकित्सा शिक्षा विनियमन को चुनौती दी है जो 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता वाले अभ्यर्थी को एमबीबीएस करने से रोकता है।     recent visitors 68

बोइनपल्ली को शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत

नई दिल्ली दिल्ली के कथित शराब घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हैदराबाद के कारोबारी अभिषेक बोइनपल्ली को जमानत दे दी। बोइनपल्ली को शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में जस्टिस एमएम सुंदरेश और अरविंद कुमार की बेंच ने जमानत दी है। ईडी की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने जमानत का विरोध नहीं किया। बेंच ने कहा, 'हम जमानत देने के पक्ष में हैं।' सर्वोच्च अदालत ने 13 अगस्त को बोइनपल्ली को मिली अंतरिम जमानत को बढ़ा दिया था। 20 मार्च को कोर्ट ने यह कहते हुए उन्हें पांच सप्ताह की जमानत दी थी कि वह 18 महीनों से जेल में बंद हैं। इसके बाद लगातार उनकी जमानत अवधि बढ़ती रही। अंतरिम जमानत देते हुए सर्वोच्च अदालत ने बोइनपल्ली को अपना पासपोर्ट जमा कराने को कहा था। उन्हें हैदराबाद के अलावा एनसीआर से बाहर कहीं और नहीं जाने को कहा गया था।कारोबारी ने दिल्ली हाई कोर्ट के तीन जुलाई 2023 के आदेश को चुनौती दी है जिसमें 2022 में उनकी गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल उठाने वाली याचिका खारिज कर दी गई थी। उन्होंने पीएमएलए की धारा 19 का पालन न करने के आधार पर गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। उनका कहना है कि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। दिल्ली सरकार ने 2021-22 के लिए बनी शराब नीति 17 नवंबर, 2021 को लागू की थी लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच सितंबर, 2022 के अंत में इसे रद्द कर दिया था। केंद्रीय जांच एजेंसियों सीबीआई और ईडी का आरोप है कि इस नीति के तहत शराब कारोबारियों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाया गया और बदले में उनसे रिश्वत ली गई। इस मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, राज्यसभा सांसद संजय सिंह जैसे बड़े नेता भी आरोपी हैं। तीनों सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर निकले हैं। recent visitors 66