Tuesday, July 7, 2026 12:19 am

झाबुआ मेडिकल कॉलेजअगले तीन साल में शुरू होगा, पहले चरण में एमबीबीएस की मान्यता ली जाएगी

झाबुआ देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) का पहला मेडिकल कॉलेज झाबुआ में स्थापित किया जाएगा। विश्वविद्यालय ने इसके लिए 100 एकड़ जमीन चिह्नित कर ली है, और इस महीने के अंत तक जमीन के नामांतरण की प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है। योजना के अनुसार, 2028-29 से मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई शुरू होगी। हालांकि, इससे पहले झाबुआ इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग में अगले सत्र से अस्थायी रूप से मेडिकल कॉलेज संचालित करने का प्रस्ताव रखा गया है।   डीएवीवी की पिछली कार्यपरिषद बैठक में झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी, जिसके बाद जमीन की तलाश शुरू की गई। जिला अस्पताल से करीब 5 किलोमीटर दूर डूंगरा लालू क्षेत्र में 100 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है। डीएवीवी कुलपति और झाबुआ कलेक्टर के बीच इस जमीन को लेकर सहमति बन गई है। दावा किया जा रहा है कि यहां अगले तीन वर्षों में मेडिकल कॉलेज शुरू कर दिया जाएगा। पहले चरण में एमबीबीएस कोर्स की मान्यता प्राप्त की जाएगी, और बाद में बीडीएस, आयुर्वेदिक तथा होम्योपैथी के कोर्स भी इसी कैंपस में जोड़े जाएंगे। झाबुआ में लंबे समय से मेडिकल कॉलेज खोलने की मांग की जा रही थी। यहां के स्थानीय लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए गुजरात के दाहोद जाना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज खुलने से स्वास्थ्य सुविधाओं में बड़ा सुधार होगा और लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिल सकेंगी।   1200 करोड़ होगी अनुमानित लागत   झाबुआ मेडिकल कॉलेज की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने पर विचार शुरू हो चुका है। इसकी अनुमानित लागत 1200 करोड़ रुपए बताई जा रही है। इस परियोजना में राज्य सरकार से अनुदान मिलेगा, जबकि शेष राशि विश्वविद्यालय के बजट से खर्च की जाएगी। हालांकि, मेडिकल कॉलेज की शुरुआत के लिए झाबुआ इंजीनियरिंग कॉलेज के भवन को विकल्प के रूप में रखा गया है। इस भवन का उपयोग किया जाए तो मेडिकल कॉलेज की शुरुआत के लिए केवल 600 करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को प्रस्ताव भेजा है कि यदि इंजीनियरिंग कॉलेज का भवन उपलब्ध हो जाता है, तो 2026-27 सत्र से ही मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई शुरू की जा सकती है। मुख्यमंत्री ने इस प्रस्ताव पर विचार करने और इसे आरजीपीवी (राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय) को भेजने के निर्देश दिए हैं।   डीएवीवी की पिछली कार्यपरिषद बैठक में ही झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। इसके बाद वहां जमीन की तलाश शुरू हुई थी। जिला अस्पताल से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर डूंगरा लालू क्षेत्र में ही 100 एकड़ जमीन मिल गई है। डीएवीवी कुलपति व झाबुआ कलेक्टर के बीच इस जमीन को लेकर सहमति बन गई है। दावा किया जा रहा है कि यहां अगले तीन साल में मेडिकल कॉलेज शुरू कर दिया जाएगा। पहले चरण में एमबीबीएस की मान्यता ली जाएगी। इसके बाद बीडीएस, आयुर्वेदिक और होम्योपैथी के कोर्स भी इसी कैंपस में चलाए जाएंगे। मालूम हो, झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोले जाने की मांग लंबे समय से उठ रही थी। अभी यहां के लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दाहोद जाना पड़ता है। 1200 करोड़ आंकी जा रही है लागत झाबुआ मेडिकल कॉलेज की डीपीआर को लेकर भी मंथन शुरू हो गया है। इसकी अनुमानित लागत 1200 करोड़ आंकी जा रही है। इसमें राज्य शासन की ओर से अनुदान मिलेगा। बाकी राशि यूनिवर्सिटी के बजट से खर्च की जाएगी। हालांकि, शुरुआत के लिए विकल्प के तौर पर झाबुआ का इंजीनियरिंग कॉलेज भी रखा गया है। यहां 600 करोड़ से ही शुरुआत हो सकेगी। यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने सीएम डॉ. मोहन यादव को प्रस्ताव दिया कि अगर इंजीनियरिंग कॉलेज का भवन मिल जाए तो अगले सत्र (2026-27) से ही मेडिकल कॉलेज शुरू हो सकता है। सीएम यादव ने इसे लेकर आरजीपीवी को प्रस्ताव भेजने के लिए कहा है। कॉलेज के लिए इसी महीने से काम शुरू कर देंगे ^झाबुआ में 100 एकड़ से अधिक जमीन चिह्नित कर ली है। स्थानीय प्रशासन से इसकी सहमति मिल गई है। हमारी कोशिश है कि इसी माह नामांतरण की प्रक्रिया पूरी कर मेडिकल कॉलेज के प्रस्ताव पर काम शुरू कर दिया जाएगा। इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग मिलती है तो 2026 से ही एमबीबीएस कोर्स शुरू कर दिया जाएगा। – प्रो. राकेश सिंघई, कुलपति, देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी यूनिवर्सिटी प्रशासन को जमीन पसंद आ गई है ^जिला अस्पताल से 5 किलोमीटर दूर डूंगरा लालू क्षेत्र में जमीन यूनिवर्सिटी प्रशासन को पसंद आई है। एक और विकल्प इंजीनियरिंग कॉलेज के पास की 12 हेक्टेयर जमीन का भी है। यह मिल जाती है तो इस जगह को एजुकेशन हब के तौर पर विकसित किया जा सकता है। – नेहा मीणा, कलेक्टर, झाबुआ जल्द शुरू होगा कॉलेज का काम   देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राकेश सिंघई ने बताया कि झाबुआ में मेडिकल कॉलेज के लिए 100 एकड़ से अधिक जमीन चिह्नित कर ली गई है और स्थानीय प्रशासन से इसकी स्वीकृति भी मिल चुकी है। विश्वविद्यालय प्रशासन की योजना है कि इस महीने के अंत तक जमीन का नामांतरण पूरा कर लिया जाए और मेडिकल कॉलेज के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए। अगर इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग मिल जाती है, तो 2026 से ही एमबीबीएस कोर्स शुरू कर दिया जाएगा।   झाबुआ प्रशासन ने दी हरी झंडी झाबुआ की कलेक्टर नेहा मीणा ने बताया कि जिला अस्पताल से 5 किलोमीटर दूर डूंगरा लालू क्षेत्र में विश्वविद्यालय प्रशासन को जमीन पसंद आई है। इसके अलावा, इंजीनियरिंग कॉलेज के पास स्थित 12 हेक्टेयर जमीन का भी एक विकल्प है। यदि यह जमीन मिल जाती है, तो इस क्षेत्र को एक प्रमुख एजुकेशन हब के रूप में विकसित किया जा सकता है। इस मेडिकल कॉलेज के निर्माण से झाबुआ और आसपास के क्षेत्रों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी और लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिल सकेंगी। recent visitors 57

सुप्रीम कोर्ट ने कहा लंबे समय से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिला अपने साथी पर रेप के आरोप नहीं लगा सकती क्योंकि यह सहमति से बना संबंध

नई दिल्ली  दो बालिगों में प्रेम संबंध। प्यार परवान चढ़ा। पुरुष बैंक अधिकारी तो महिला लेक्चरर। दोनों दो-चार नहीं, बल्कि 15-16 साल तक प्रेम संबंध में रहे। तमाम बार शारीरिक संबंध बनाए। फिर महिला ने एक दिन पुरुष पर शादी का झांसा देकर रेप का केस दर्ज करा दिया। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुरुष के खिलाफ चल रहे आपराधिक केस को रद्द करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह यकीन करना मुश्किल है कोई महिला शादी के झूठे वादे पर यकीन करके किसी से 16 साल तक संबंध बनाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामला सहमति से संबंध या लिव-इन रिलेशनशिप का है जो बिगड़ गया तो रेप का केस दर्ज करा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई महिला लंबे समय से लिव-इन में रह रही है, तो वो अपने पार्टनर पर सिर्फ शादी का झांसा देकर संबंध बनाने का आरोप नहीं लगा सकती। क्योंकि इतने लंबे समय बाद ये साबित करना मुश्किल है कि संबंध सिर्फ शादी के वादे के कारण ही बने थे। एक बैंक अफसर पर रेप का आरोप लगा था। उसकी लिव-इन पार्टनर, जो एक लेक्चरर हैं, ने कहा कि वो 16 साल तक उससे शादी के वादे के भरोसे संबंध बनाती रही। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने महिला की दलील नहीं मानी और बैंक अफसर के खिलाफ केस खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दोनों पढ़े-लिखे हैं और ये रिश्ता उनकी मर्जी से था। दोनों अलग-अलग शहरों में पोस्टिंग के दौरान भी एक-दूसरे के घर जाते थे। कोर्ट ने कहा कि ये एक प्रेम प्रसंग या लिव-इन रिलेशनशिप का मामला है जो बिगड़ गया। कोर्ट ने कहा, 'यह विश्वास करना कठिन है कि शिकायतकर्ता लगभग 16 वर्षों की अवधि तक अपीलकर्ता की मांगों के आगे झुकती रही, बिना कभी कोई विरोध किए कि अपीलकर्ता शादी के झूठे वादे के बहाने उसका यौन शोषण कर रहा था। 16 वर्षों की लंबी अवधि, जिसके दौरान पार्टियों के बीच यौन संबंध निर्बाध रूप से जारी रहे, यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त है कि रिश्ते में कभी भी बल या छल का तत्व नहीं था।' साफ शब्दों में कोर्ट को लगा कि 16 साल तक बिना किसी विरोध के संबंध बनाना, ये दिखाता है कि इसमें जबरदस्ती नहीं थी। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में भले ही मान लिया जाए कि झूठा वादा किया गया था, लेकिन इतने लंबे समय तक संबंध जारी रहने से महिला की दलील कमज़ोर हो जाती है। महिला का कहना था कि वो इस गलतफहमी में थी कि आरोपी उससे शादी करेगा, लेकिन 16 साल तक बिना किसी सवाल के संबंध जारी रखना, इस दलील को कमजोर बनाता है। कोर्ट ने कहा कि इतने समय तक चुप रहना समझ से परे है। यदि वाकई धोखा हुआ था, तो इतने सालों तक रिश्ते क्यों निभाए गए? ये एक बड़ा सवाल है।   recent visitors 37

मध्य प्रदेश में विधि एवं विधायी विभाग के कर्मचारियों को मिली पदोन्नति, आर्थिक लाभ, महाधिवक्ता कार्यालय के कर्मचारी भी शामिल

भोपाल  नौ वर्ष से मध्य प्रदेश में बंद पदोन्नतियों की राह विधि एवं विधायी विभाग ने खोल दी है। विभाग ने सवा सौ से अधिक कर्मचारियों को विभागीय भर्ती नियम के अनुसार वरिष्ठताक्रम में एक जनवरी 2024 से पदोन्नति के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी दे दिया। इसमें महाधिवक्ता कार्यालय के कर्मचारी भी शामिल हैं। ये पदोन्नतियां सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण को लेकर विचाराधीन प्रकरण में पारित होने वाले अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। इसी प्रक्रिया के आधार पर अब अन्य विभागों में भी सशर्त पदोन्नति दी जा सकती है। इसकी ही मांग कर्मचारी लंबे समय से कर रहे थे। मई 2016 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण नियम 2002 को निरस्त कर दिया था। सरकार ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों का मामला विचाराधीन है। इसके कारण पदोन्नतियां बंद थीं। हजारों कर्मचारी बिना प्रमोशन हुए रिटायर हजारों कर्मचारी बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो गए। इसका रास्ता निकालने का सरकार ने बहुत प्रयास किया पर कभी एकराय नहीं बन पाई। इस बीच विधि एवं विधायी विभाग के कर्मचारियों ने पदोन्नति न मिलने पर हाई कोर्ट में याचिका दायर की। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि पदोन्नति में आरक्षण नियम निरस्त हुए हैं न कि विभागीय भर्ती नियम। इसमें प्रविधान है कि एक निश्चित अवधि के बाद वरिष्ठताक्रम में उच्च पद पर पदोन्नत किया जाएगा। इसे ही आधार बनाते हुए हाई कोर्ट ने आरपी गुप्ता एवं अन्य विरुद्ध मध्य प्रदेश शासन एवं अन्य के प्रकरण में पारित आदेश के अनुसार समिति बनाकर भर्ती नियम 2010 के प्रविधान के अंतर्गत नए पदों को सम्मिलित करते हुए पदोन्नति दी गई। साथ ही विभाग के प्रमुख सचिव नरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ये पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में लंबित आरक्षण से संबंधित प्रकरण के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। मंत्री समिति भी बनाई उधर, सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सरकार पदोन्नति का रास्ता निकालने को लेकर गंभीर है और काफी समय से प्रयास भी चल रहे हैं। मंत्री समिति भी बनाई गई और विधिक परामर्श भी लिया गया। कर्मचारी संगठनों से भी चर्चा की लेकिन एक राय नहीं बनी। अब सभी परिस्थितियों को देखते हुए आगामी कदम उठाए जाएंगे। बढ़ा हुए वेतन भी मिल जाएगा उधर, मंत्रालयीन अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुधीर नायक का कहना है कि पदोन्नति का सबसे बेहतर विकल्प समयमान वेतनमान देकर पदनाम दे दिया जाए तो सारी समस्या ही समाप्त हो जाएगी। इससे बढ़ा हुए वेतन भी मिल जाएगा और पदनाम भी बदल जाएगा। सामान्य प्रशासन विभाग विधिक अभिमत लेने के बाद इसे लेकर नौ मार्च 2020 को परिपत्र जारी किया था। यही व्यवस्था राज्य प्रशासनिक सेवा, वित्त सेवा सहित अन्य सेवाओं में लागू हो चुकी है। recent visitors 41

स्कूलों में शारीरिक दंड पर पूर्ण प्रतिबंध,बच्चों को मारने पर शिक्षकों पर होगी कार्रवाई: एमपी सरकार का बड़ा फैसला 

Teachers will be punished for beating children: MP government’s big decision, complete ban on corporal punishment in schools भोपाल। मध्य प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में अब छात्र-छात्राओं के साथ मारपीट या किसी भी तरह की शारीरिक सजा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। टीचर्स और अन्य जिम्मेदार कर्मचारियों पर कानूनी कार्रवाई भी होगी। बाल अधिकार संरक्षण आयोग की चिट्ठी के बाद स्कूल शिक्षा विभाग ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी करते हुए ऐसी हालत में कार्रवाई के लिए कहा है। साथ ही ऐसे मामलों की रिपोर्ट भी देने के लिए कहा गया है। लोक शिक्षण संचालनालय के अपर संचालक रवीन्द्र कुमार सिंह की ओर से शारीरिक दंड (कॉर्पोरल पनिशमेंट) पर पूर्ण प्रतिबंध और कड़ी कार्रवाई संबंधी निर्देश मंगलवार को जारी किए गए हैं। मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इसको लेकर 4 फरवरी 2025 को स्कूल शिक्षा विभाग को पत्र लिखा था। आदेश के बाद अब इस मामले में सख्त एक्शन के निर्देश दिए जा रहे हैं। अपर संचालक ने कहा है कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 की धारा 17 (1) में शारीरिक मानसिक प्रताड़ना और भेदभाव पूरी तरह प्रतिबंधित है। साथ ही धारा 17 (2) के तहत ऐसा करना दंडनीय अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 323 के तहत शारीरिक दंड भी प्रतिबंधित है। इसलिए प्रदेश के सभी जिलों में संचालित सरकारी और निजी स्कूलों में छात्रों को शारीरिक दंड देने की घटनाओं की त्वरित पहचान करने और इस तरह की स्थितियों पर रोक लगाने के लिए उचित कदम उठाए जाएं। सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को ये निर्देश भी दिए गए हैं कि किसी स्कूल या शिक्षक द्वारा शारीरिक दंड देने के मामले में तत्काल एक्शन लेकर अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाए। इस तरह का एक मामला दो माह पहले भोपाल में हो चुका है। यहां सेंट माइकल स्कूल के टीचर ने 11वीं के छात्र को इतना पीटा था कि उसके दोनों पैरों की चमड़ी निकल गई थी। छात्र का कहना था कि टीचर ने उसके पैरों पर फुटबॉल के शूट की तरह मारा। इसके बाद छात्र के परिजनों ने जिला शिक्षा अधिकारी को इसकी शिकायत की थी जिस पर जांच समिति बनाई गई थी। recent visitors 277