मध्य प्रदेश में फाइलों का जंजाल खत्म! नगर पालिका और परिषदों में एक क्लिक पर होगा काम

No more red tape in Madhya Pradesh! Work in municipalities and councils to be done with just a single click. भोपाल : मध्य प्रदेश की नगर पालिकाओं और नगर परिषदों में अब फाइलें टेबल से टेबल घूमने के बजाय ऑनलाइन दौड़ेंगी. नगर निगमों के बाद अब छोटे नगरीय निकायों में भी ई-फाइल व्यवस्था लागू की जा रही है. इससे जनता को अपनी फाइल का स्टेटस जानने के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, वहीं कागज और स्टेशनरी की खपत घटने से पर्यावरण पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा. इस व्यवस्था से हर महीने नगरीय निकायों को लाखों रुपये के स्टेशनरी की बचत का अनुमान है. एक क्लिक में पता चलेगा फाइल का स्टेटसई-फाइल व्यवस्था शुरू होने के बाद किसी आवेदन की फाइल किस अधिकारी या शाखा के पास है, यह ऑनलाइन देखा जा सकेगा. फाइल कितने दिन किस स्तर पर रुकी, कब आगे बढ़ी और किस अधिकारी के पास पहुंची, इसका डिजिटल रिकॉर्ड भी तैयार होगा. इससे काम में देरी होने पर जिम्मेदारी तय करना आसान होगा 30 हजार से ज्यादा फाइलें होंगी ऑनलाइननगर पालिका और नगर परिषदों में करीब 30 हजार नई फाइलें ऑनलाइन तैयार की जा रही हैं. नागरिकों से मिलने वाले आवेदन और दस्तावेज पहले स्कैन किए जाएंगे, इसके बाद संबंधित ई-फाइल के साथ ऑनलाइन आगे भेजे जाएंगे. वहीं प्रदेश के 16 नगर निगमों में पहले से 4 लाख से ज्यादा फाइलों का ऑनलाइन मूवमेंट हो रहा है. अब इसी व्यवस्था का विस्तार छोटे नगरीय निकायों तक किया जा रहा है. प्रमाण पत्र से संपत्ति तक, कई काम होंगे डिजिटलई-फाइल व्यवस्था का दायरा रोजमर्रा की कई नागरिक सेवाओं तक रहेगा. इनमें जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, भवन अनुज्ञा, नामांतरण और संपत्ति से जुड़े मामलों की फाइलों को ऑनलाइन ट्रैक किया जा सकेगा. इससे आवेदन की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और फाइल गुम होने या लंबे समय तक लंबित रहने की समस्या पर भी निगरानी रखी जा सकेगी. दफ्तर के चक्कर कम, कागज की खपत भी कमनई व्यवस्था का सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा. वहीं आवेदन की स्थिति जानने के लिए बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत कम होगी. इसके साथ ही दस्तावेजों की बार-बार फोटोकापी कराने और कागजी फाइलों में रिकॉर्ड रखने की जरुरत घटेगी. कागज की खपत कम होने का पर्यावरणीय फायदा भी होगा. recent visitors 22

यूपीआई पर शुल्क से खत्म हुआ मुफ्त डिजिटल भुगतान का दौर, पर इसकी असली कीमत आखिर चुकाएगा कौन?

The era of free digital payments has ended with the introduction of UPI charges, but who will ultimately pay the real price? डिजिटल इंडिया की रीढ़ बन चुका यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) अब अपनी पूरी तरह से मुफ्त सेवाओं के दौर से बाहर निकलकर एक नए वित्तीय मॉडल में कदम रख रहा है। 15 अक्तूबर से 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट पेमेंट्स पर 0.4% का नया शुल्क लागू किया जा रहा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर यह दावा किया गया है कि यह शुल्क आम उपभोक्ताओं की रसीद में नहीं जोड़ी जाएगा। लेकिन देश में अब तक का आर्थिक अनुभव यह साफ दिखाता है कि यह शुल्क प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से हर नागरिक की जेब पर ही असर डालेगा। यूपीआई पर नया शुल्क क्या है और यह कब से लागू हो रहा है?15 अक्तूबर से लागू होने वाले नए नियमों के तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या शुल्क वसूला जाएगा। बड़े भुगतानों के लिए राहत देते हुए 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर इस फीस की अधिकतम सीमा (कैप) 300 रुपये तय की गई है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) के अनुसार, इस राशि का उपयोग डिजिटल पेमेंट के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, धोखाधड़ी रोकने और साइबर सुरक्षा को बेहतर बनाने में किया जाएगा। उद्योग ने क्या मांग की थी और सरकार/एनपीसीआई ने क्या तय किया?इस नए शुल्क को लागू करने में बैंकिंग और फिनटेक सेक्टर की अहम भूमिका रही है। बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (पीएसपी) और फिनटेक कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को पत्र लिखकर बड़े व्यापारियों पर 0.3% एमडीआर लगाने और रूपे (रूपे) डेबिट कार्ड के लिए एमडीआर में समानता की सिफारिश की थी। हालांकि, जो अंतिम दर लागू की गई, वह 0.4% है- जो खुद उद्योग की मांग (0.3%) से भी अधिक है। उद्योग की मांग और अंतिम तय दर के बीच इस 0.1% के अंतर पर किसी भी आधिकारिक संस्था ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है।इस शुल्क संरचना का असली गणित क्या है?यूपीआई के तकनीकी और वित्तीय ढांचे में एक प्रमुख असंतुलन नजर आता है: लागत में समानता: यूपीआई सर्वर, फ्रॉड चेक और साइबर सुरक्षा परत के लिए 2,100 रुपये के भुगतान और 50,000 रुपये के भुगतान की प्रोसेसिंग लागत लगभग एक समान होती है।शुल्क में भारी अंतर: समान प्रोसेसिंग लागत के बावजूद 2,100 रुपये के ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट को लगभग 8 रुपये देने होंगे, जबकि 50,000 रुपये के भुगतान पर यह शुल्क लगभग 200 रुपये बैठता है।लागत स्थिर होने के बावजूद प्रतिशत आधारित शुल्क लगाना यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था लागत की भरपाई नहीं, बल्कि लेनदेन मूल्य के आधार पर राजस्व बांटने का तंत्र है। किस वर्ग को होगा मुनाफा और किसे उठाना पड़ेगा नुकसान?इस नई नीति के लागू होने से डिजिटल इकोसिस्टम में दो स्पष्ट वर्ग सामने आते हैं: लाभार्थी: कमर्शियल बैंक, पीएसपी और एनपीसीआई, जिन्हें पिछले छह वर्षों से यूपीआई चैनल से शुल्क के रूप में शून्य आय मिल रही थी, उन्हें अब एक नया और नियमित राजस्व स्रोत मिल गया है।प्रभावित वर्ग: बड़े व्यापारियों को रातों-रात एक नया लागत बोझ सहना पड़ेगा। वहीं, आम नागरिक जो मान रहे हैं कि वे इस चार्ज से बचे हुए हैं, वे अनजाने में इसका वित्तीय जोखिम उठाएंगे।ग्राहकों की जेब पर यह शुल्क अप्रत्यक्ष रूप से कैसे भारी पड़ेगा?सरकारी नियम व्यापारियों को ग्राहकों से अलग से यूपीआई रसीद पर शुल्क वसूलने से रोकते हैं। लेकिन यह नियम व्यापारियों को अपने उत्पादों और सेवाओं की कीमतें फिर से तय करने से नहीं रोकता। व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को तीन तरीकों से बाजार में पास कर सकते हैं:उत्पादों का एमआरपी बढ़ाकर: सामान का मूल मूल्य थोड़ा बढ़ाकर लागत ग्राहकों पर डालना।छूट और डिस्काउंट खत्म करके: ग्राहकों को मिलने वाले डिस्काउंट और ऑफर्स को धीरे-धीरे बंद करना।नकद लेनदेन को प्राथमिकता देकर: 2,000 रुपये से अधिक के भुगतानों पर डिजिटल के बजाय कैश मांगने की शुरुआत होना।डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के टिकाऊ भविष्य का सही रास्ता क्या है?डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का खाका शुल्क सेवा की वास्तविक लागत के बजाय लेनदेन के मूल्य से तय होता है। एमडीआर जैसा शुल्क लागत की भरपाई नहीं रहकर डिजिटल लेनदेन पर एक अप्रत्यक्ष कर बन जाता है। यह शुल्क व्यापारियों के माध्यम से घूमकर अंततः देश के आम नागरिकों की जेब से ही निकलता है। ऐसे में सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक पारदर्शी और टिकाऊ फंडिंग मॉडल की आवश्यकता है, जो गहन तकनीकी जांच में खरा उतर सके। recent visitors 44

जबलपुर: कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली शर्तों पर हाईकोर्ट सख्त, बिजली कंपनी की टेंडर प्रक्रिया पर लगाई रोक

Jabalpur: High Court takes a strict stance on terms favoring companies; stays power company’s tender process. विशेष संवाददाता: जितेन्द्र श्रीवास्तव/अर्पिता श्रीवास्तवमध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा नौ लॉट में आउटसोर्स मैनपावर उपलब्ध कराने के लिए जारी निविदा प्रक्रिया पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक रूसिया की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता उर्मिला इंटरनेशनल सर्विसेज, भोपाल सहित पांच कंपनियों की ओर से दायर याचिकाओं में कहा गया था कि निविदा में ऐसी शर्तें निर्धारित की गई हैं, जिन्हें केवल कुछ कंपनियां ही पूरा करती हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि निविदा में तकनीकी मूल्यांकन में प्राप्त अंक महत्वपूर्ण हैं, जबकि मूल्य बोली निर्धारित है। मापदंड तय करने के लिए 50 अंकों का विशेष टेक्नो-कमर्शियल स्कैनिंग सिस्टम बनाया गया है। इसमें 51 करोड़ रुपए से अधिक का टर्नओवर करने वाली कंपनियों को 35 अंक दिए जाने का प्रावधान है। जिस कंपनी के पास सबसे अधिक मैनपावर सप्लाई का अनुभव होगा, उसे पांच अतिरिक्त अंक दिए जाएंगे। इसके अलावा प्रदेश की ऊर्जा कंपनी में दस साल का अनुभव भी अनिवार्य किया गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि वे पिछले तीन वर्षों से विद्युत वितरण कंपनी के लिए तकनीकी और गैर-तकनीकी आउटसोर्स कर्मचारियों की सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। इस दौरान उन्हें कार्य के लिए प्रशंसा प्रमाण पत्र भी मिले हैं। इसके बावजूद ऐसे प्रतिबंधात्मक मापदंड निर्धारित किए गए हैं, जिनसे उन्हें निविदा प्रक्रिया से बाहर किए जाने की आशंका है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि देशभर में प्राप्त समान अनुभव को तकनीकी मूल्यांकन में उचित महत्व नहीं दिया गया है। ऐसे में तकनीकी अंकों और बराबरी की स्थिति में अपनाए जाने वाले मापदंडों का निविदा के परिणाम पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने इन मापदंडों को मनमाना, भेदभावपूर्ण और समान अवसर के सिद्धांत के विपरीत बताया। युगलपीठ ने याचिकाओं की सुनवाई के बाद निविदा प्रक्रिया पर रोक लगाते हुए अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता राम बिहारी गौतम और अधिवक्ता शुभम शुक्ला ने पैरवी की। recent visitors 25

फर्जी एक्सपीरियंस सार्टिफिकेट और सैलरी स्लिप से बना CEO, लिया लाखों का पैकेज… ऐसे खुली जालसाज की पोल, अरेस्ट

Became CEO using fake experience certificates and salary slips, secured a package worth lakhs… here is how the fraudster was exposed and arrested. ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने एक शख्स को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार शख्स का नाम देवेन्द्र कुमार है. शख्स ने फर्जी सैलरी स्टेटमेंट और फर्जी एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट के आधार पर ऑटोमोबाइल कंपनी में ऊंची पोस्ट और भारी-भरकम सैलरी ऐंठी. ग्वालियर क्राइम ब्रांच पुलिस ने आरोपी को उत्तर प्रदेश के कानपुर से गिरफ्तार किया है. आरोपी ने फर्जी दस्तावेज दिखाकर नौकरी पाई. आरोपी ने आनंद टोयोटा कंपनी में लैंडमार्क ग्रुप में काम करने का फर्जी दस्तावेज दिखाया था, दस्तावेज में उसने अपनी सैलरी 2.80 लाख दिखाई थी. इसके बाद आनंद टोयोटा में उसे वाइस प्रेसीडेंट की पोस्ट मिली. फिर बाद में ग्रुप सीईओ (आफ्टर सेल्स) बनाया गया. मई 2026 में अचानक आरोपी ने नौकरी छोड़ दी. जब आरोपी के फाइनल सेटलमेंट के लिए दस्तावेज खंगाले गए तो यह पूरा फर्जीवाड़ा सामने आया. तभी से पुलिस आरोपी की तलाश में थी. आरोपी ने इस्तीफा देकर अचानक छोड़ा पदक्राइम ब्रांच से मिली जानकारी के अनुसार, देवेन्द्र कुमार दुबे (43 वर्ष) यूपी के कानपुर का रहने वाला है. अगस्त 2025 में श्रीतुलजा भवानी ऑटोमोबाइल्स प्रा.लि में आरोपी को ग्रुप वाइस प्रेसिडेंट का पद दिया गया था. ये कंपनी अनंत टोयोटा के नाम से जानी जाती है. बाद में कंपनी ने आरोपी को ग्रुप सीईओ (आफ्टर सेल्स) का प्रभार सौंप दिया था. आरोपी ने मई 2026 में अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफे के बाद कंपनी जब उसका फुल एंड फाइनल सेटलमेंट तैयार कर रही थी तो बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और दस्तावेजों की गई. इसी में ये सारा फर्जीवाड़ा सामने आया. जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी ने लैंडमार्क ग्रुप में काम करने का जो अनुभव पत्र दिया था वो फर्जी था. उसने लैंडमार्क ग्रुप के नाम से 2,80,670 प्रति माह का फर्जी बैंक स्टेटमेंट तैयार कर कंपनी में जमा कराया था. इस पर उसके साइन थे. फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारीआरोपी ने ऐसा इसलिए किया था ताकि उसको कंपनी में अधिक सैलरी पैकेज मिले. जांच में पता चला कि लैंडमार्क ग्रुप में कभी उसकी नौकरी लगी ही नहीं थी. जिस बारे में एचआर ने कंपनी को बताया. इसके बाद क्राइम ब्रांच में शिकायत की गई थी. अगस्त 2026 में आरोपी देवेन्द्र कुमार पर फ्रॉड का केस दर्ज किया गया था. क्राइम ब्रांच की टीम फिलहाल आरोपी से पूछताछ कर रही है. क्राइम ब्रांच ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आरोपी ने फर्जी दस्तावेज कहां तैयार कराए और इस फर्जीवाड़े में उसके साथ कोई अन्य व्यक्ति की मिलीभगत थी या नहीं recent visitors 34

जबलपुर बरगी बांध विस्थापितों ने खुद सड़क बनाने का काम किया शुरू, 40 साल इंतजार के बाद गैंती-फावड़ा लेकर उतरे ग्रामीण, बच्चे भी कर रहे मदद

Displaced residents of the Bargi Dam project in Jabalpur have started building a road themselves; after waiting 40 years, villagers have stepped out with pickaxes and shovels, and even children are helping. विशेष संवाददाता : जितेन्द्र श्रीवास्तव अर्पिता श्रीवास्तवजबलपुर । बरगी बांध विस्थापितों का सब्र आखिरकार टूट चुका है। दरअसल दुर्गानगर के ग्रामीणों ने सरकारी मदद का इंतजार छोड़कर अब खुद ही करीब 2 किलोमीटर सड़क बनाने का काम शुरू कर दिया है।जबलपुर बरगी बांध विस्थापितों ने खुद सड़क बनाने का काम किया शुरू, 40 साल इंतजार के बाद गैंती-फावड़ा लेकर उतरे ग्रामीण, बच्चे भी कर रहे मददजबलपुर जिले के शहपुरा जनपद के दुर्गानगर गांव में बरगी बांध परियोजना के विस्थापितों ने सड़क निर्माण की जिम्मेदारी अब खुद संभाल ली है। दरअसल करीब चार दशक पहले अपना गांव छोड़ने वाले परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहीं सड़क नहीं बनने से परेशान ग्रामीण अब रोज सुबह गैंती, फावड़ा और तसला लेकर श्रमदान कर रहे हैं, ताकि बारिश के मौसम में गांव का संपर्क पूरी तरह न टूटे। दरअसल दुर्गानगर में करीब 100 परिवार और लगभग 1500 की आबादी रहती है। ग्रामीणों के अनुसार गांव की मुख्य सड़क हर बारिश में दलदल बन जाती है। कई दिनों तक लोगों का आना-जाना मुश्किल हो जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है। इसी वजह से गांव वालों ने सरकारी इंतजार छोड़कर अपने स्तर पर सड़क सुधारने की शुरुआत कर दी। महिलाएं और बच्चे भी कर रहे मददवहीं ग्रामीणों के मुताबिक करीब दो किलोमीटर लंबे इस रास्ते की हालत इतनी खराब हो जाती है कि पैदल निकलना भी मुश्किल हो जाता है। कई जगह कीचड़ और गड्ढों के कारण दोपहिया वाहन फंस जाते हैं। गांव के लोग अपने खर्च से मुरम और पत्थर लाकर सड़क पर डाल रहे हैं ताकि कम से कम आवाजाही बनी रहे। ग्रामीण सोनू राजपूत ने बताया कि कई बार अधिकारियों और प्रशासन को आवेदन दिए गए लेकिन सड़क निर्माण का काम आगे नहीं बढ़ा। इसके बाद गांव वालों ने सामूहिक श्रमदान का फैसला लिया। वहीं भीमा बाई ने बताया कि गांव के लोग रोज मजदूरी पर जाने से पहले दो से तीन घंटे सड़क बनाने में लगा रहे हैं। उनका कहना है कि अब लोगों को भरोसा हो गया है कि अगर वे खुद आगे नहीं आएंगे तो समस्या खत्म नहीं होगी। हैरानी की बात है इस अभियान में महिलाएं भी पुरुषों के साथ बराबरी से हिस्सा ले रही हैं और बच्चे भी मिट्टी और पत्थर पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। सड़क नहीं होने से हो रही परेशानीदरअसल दुर्गानगर के लोगों का कहना है कि सड़क की खराब हालत का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। बारिश के दौरान एंबुलेंस और 108 जैसी आपातकालीन सेवाएं गांव तक नहीं पहुंच पातीं है। गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पहले दूसरे गांव में जाकर रुकना पड़ता है ताकि जरूरत पड़ने पर अस्पताल पहुंचना आसान रहे। जिला पंचायत सदस्य रामकुमार सैयाम ने बताया कि उन्होंने यह मुद्दा जिला पंचायत की बैठकों में तीन से चार बार उठाया और जिला पंचायत सीईओ को लिखित प्रस्ताव भी दिया लेकिन सड़क निर्माण शुरू नहीं हो सका। दूसरी ओर बरगी विधायक नीरज सिंह ने कहा है कि ग्रामीणों की परेशानी गंभीर है और अधिकारियों से चर्चा कर सड़क निर्माण के लिए बजट का प्रावधान किया जाएगा। recent visitors 59

मप्र जल निगम का बदलेगा नाम, अब कहलाएगा एमपी वाटर एंड सेनिटेशन कार्पोरेशन, मीटिंग में प्रस्ताव पास

MP Jal Nigam to be renamed ‘MP Water and Sanitation Corporation’; proposal passed in meeting. भोपाल: सीएम मोहन यादव की अध्यक्षता में एमपी जल निगम के संचालक मंडल की 26वीं बैठक हुई है। बैठक सीएम हाउस में हुई है। इस बैठक में एमपी जल निगम मर्यादित को पुनर्गठित कर अब मध्यप्रदेश वाटर एंड सेनिटेशन कार्पोरेशन बनाने का अहम प्रस्ताव पारित हुआ है। कैबिनेट में मंजूरी के लिए भेजादरअसल, बैठक में वर्तमान मप्र जल निगम मर्यादित (एमपीजेएनएम) को पुर्नगठित कर अब मध्यप्रदेश वाटर एंड सेनिटेशन कार्पोरेशन (एमपी-वास्को) बनाने का अहम प्रस्ताव पारित किया गया। संचालक मंडल ने यह महत्वपूर्ण प्रस्ताव अंतिम अनुमोदन के लिए मंत्रि-परिषद् को भेजने की मंजूरी दे दी। जल विकास और स्वच्छता प्रबंधन में नए लक्ष्यों पर काम करेगाबैठक में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश जल निगम अब अपने नए नाम (एमपी-वास्को) और नई जिम्मेदारियों के साथ प्रदेश में जल विकास एवं स्वच्छता प्रबंधन में नए लक्ष्यों और अतिरिक्त संसाधनों के साथ काम करेगा। सीएम ने मप्र जल निगम द्वारा विचार और अनुमोदन के लिए रखे गए विभिन्न एजेंडा प्रस्तावों को मंजूरी दी। मोहन यादव ने जल निगम के वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए तैयार संचालक मण्डल के प्रतिवेदन और वित्तीय वर्ष 2024-25 के अनअंकेक्षित वार्षिक लेखाओं का अनुमोदन किया। बजट अनुमान 57 करोड़ रुपए करने का अनुमोदनमोहन यादव ने कैप्टिव मोड के तहत 60 मेगावॉट ग्रिड-कनेक्टेड पवन ऊर्जा परियोजना विकसित करने के लिए गठित परियोजना कंपनी में मप्र जल निगम के प्रतिनिधित्व के लिए प्रबंध संचालक को अधिकृत कर दिया। साथ ही इसी परियोजना के विकास के लिए गठित प्रोजेक्ट कंपनी में डीमैटीरियलाइज्ड रूप में 26 प्रतिशत इक्विटी शेयर रखने का अनुमोदन किया। उन्होंने मप्र जल निगम के इक्विटी शेयरों के नए पदाधिकारियों को हस्तांतरण और जल निगम द्वारा वर्तमान वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तैयार किए गए बजट अनुमान 57 करोड़ रुपए का अनुमोदन किया टेंडर मंजूरी की तय सीमा बढ़ीसीएम यादव ने मप्र जल निगम के संचालक मण्डल में स्वतंत्र निदेशक के पद पर सुमित बोस की पुनः नियुक्ति का भी अनुमोदन किया। उन्होंने प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन और एक्जी़क्यूशन मेथोडोलॉजी के अनुसार मप्र जल निगम के एमडी की टेंडर मंजूरी की तय सीमा 5 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 25 करोड़ रुपए करने के प्रस्ताव का भी अनुमोदन किया। recent visitors 27

मोदी के चीता प्रोजेक्ट के 4 साल : 8 चीतों में कौन-कौन जिंदा? आशा-ज्वाला ने बढ़ाया कुनबा, बाकी 6 अब कहां हैं?

Four Years of Modi’s Cheetah Project: Which of the 8 Cheetahs Are Still Alive? Asha and Jwala Have Expanded the Pride—Where Are the Other 6 Now? मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चीता प्रोजेक्ट के चार साल पूरे हो गए हैं। 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो में छोड़ा था। उस समय इन आठ चीतों के साथ भारत में चीता पुनर्वास की शुरुआत हुई थी। चार साल बाद इन आठ में से तीन चीते ही जीवित हैं, जबकि पांच की अलग-अलग कारणों से मौत हो चुकी है। खास बात यह है कि शुरुआती आठ में शामिल आशा और ज्वाला ने भारत में प्रजनन कर चीता कुनबा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। बता दें अभी भारत में जन्मे जीवित शावकों की संख्या 32 और देश में कुल चीतों की संख्या 52 पहुंच गई थी। इसमें 49 कूनो में और तीन गांधी सागर में हैं। पीएम ने इन आठ चीतों को छोड़ा था17 सितंबर 2022 को नामीबिया से लाए गए आठ चीतों में पांच मादा और तीन नर थे। बाद में इनके नाम बदले गए। आशा का नाम आशा, ओबान का पवन, सवाना का नाभा, सियाया का ज्वाला, एल्टन का गौरव, फ्रेडी का शौर्य और तिब्लिसी का धात्री रखा गया। आठवां चीता साशा अपने इसी नाम से जाना गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 17 सितंबर 2022 को कूनो में छोड़े गए आठ चीतों में अब आशा, ज्वाला और गौरव ही बचे हैं। अब कौन-कौन जिंदा है?आशा: यह शुरुआती आठ चीतों में शामिल मादा है। कूनो में इसने प्रजनन किया और भारत में जन्मे चीतों की नई पीढ़ी बढ़ाने में योगदान दिया। आशा ने पहले लीटर में तीन और दूसरे लीटर में पांच शावकों को जन्म दिया।ज्वाला: इसका पुराना नाम सियाया था। ज्वाला अब इस प्रोजेक्ट की अहम मादा चीतों में शामिल है। पहले लीटर में चार शावकों को जन्म दिया, लेकिन इसमें एक ही शाव बच पाया। दूसरे लीटर में चार शावको को जन्म दिया, जिसमें तीन जिंदा और तीसरे लीटर में पांच शावकों को जन्म दिया। यह पांचों जिंदा हैं।गौरव: इसका पुराना नाम एल्टन था। यह भी 2022 में आए आठ चीतों में शामिल है और अब जीवित तीन चीतों में है।पांच चीतों की हो चुकी है मौतसाशा: मार्च 2023 में इसकी मौत हुई। जांच में किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारी सामने आई थी।धात्री: इसका पुराना नाम तिब्लिसी था। अगस्त 2023 में इसकी मौत हो गई।शौर्य: इसका पुराना नाम फ्रेडी था। जनवरी 2024 में इसकी मौत हुई।पवन: इसका पुराना नाम ओबान था। अगस्त 2024 में इसकी मौत हो गई।नाभा: इसका पुराना नाम सवाना था। जुलाई 2025 में चोटों के बाद इसकी मौत हुई।आठ से शुरू हुआ सफर, अब नई पीढ़ी संभाल रही कमानकूनो में सितंबर 2022 में पहले आठ चीते लाए गए थे। इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत पहुंचे। आगे चलकर चीतों का प्रजनन शुरू हुआ और भारत में ही शावकों का जन्म होने लगा। मार्च 2026 में ज्वाला के पांच शावकों के जन्म के बाद देश में चीतों की कुल संख्या 52 और भारत में जन्मे जीवित शावकों की संख्या 32बताई गई थी। यानी चार साल पहले जिन आठ चीतों से भारत में दोबारा चीते बसाने की शुरुआत हुई थी, उनमें से तीन आज भी इस सफर का हिस्सा हैं। वहीं, आशा और ज्वाला से जन्मी नई पीढ़ी ने कूनो की कहानी को एक नए दौर में पहुंचा दिया है। अप्रैल 2026 में भारत में जन्मी एक मादा चीते ने भी कूनो के जंगल में चार शावकों को जन्म दिया, जिससे प्राकृतिक परिस्थितियों में प्रजनन की एक और उपलब्धि सामने आई।कठिन अनुभवों से मिली सीखवन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहला साल कूनो की टीम ने परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाया। पहला साल कठिन अनुभवों से मिली उम्मीद के साथ खत्म हुआ। इससे यह सीख मिली कि चीतों को दोबारा बसाना कोई एक बार में पूरा होने वाली प्रक्रिया नहीं है। इसमें लगातार सीखना, परिस्थितियों के अनुसार बदलाव करना, चुनौतियों का सामना करना और उनसे उबरना शामिल है। इसके बाद सफल प्रजनन से उम्मीद बढ़ती गई। recent visitors 39