फर्जी एक्सपीरियंस सार्टिफिकेट और सैलरी स्लिप से बना CEO, लिया लाखों का पैकेज… ऐसे खुली जालसाज की पोल, अरेस्ट

Became CEO using fake experience certificates and salary slips, secured a package worth lakhs… here is how the fraudster was exposed and arrested. ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने एक शख्स को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार शख्स का नाम देवेन्द्र कुमार है. शख्स ने फर्जी सैलरी स्टेटमेंट और फर्जी एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट के आधार पर ऑटोमोबाइल कंपनी में ऊंची पोस्ट और भारी-भरकम सैलरी ऐंठी. ग्वालियर क्राइम ब्रांच पुलिस ने आरोपी को उत्तर प्रदेश के कानपुर से गिरफ्तार किया है. आरोपी ने फर्जी दस्तावेज दिखाकर नौकरी पाई. आरोपी ने आनंद टोयोटा कंपनी में लैंडमार्क ग्रुप में काम करने का फर्जी दस्तावेज दिखाया था, दस्तावेज में उसने अपनी सैलरी 2.80 लाख दिखाई थी. इसके बाद आनंद टोयोटा में उसे वाइस प्रेसीडेंट की पोस्ट मिली. फिर बाद में ग्रुप सीईओ (आफ्टर सेल्स) बनाया गया. मई 2026 में अचानक आरोपी ने नौकरी छोड़ दी. जब आरोपी के फाइनल सेटलमेंट के लिए दस्तावेज खंगाले गए तो यह पूरा फर्जीवाड़ा सामने आया. तभी से पुलिस आरोपी की तलाश में थी. आरोपी ने इस्तीफा देकर अचानक छोड़ा पदक्राइम ब्रांच से मिली जानकारी के अनुसार, देवेन्द्र कुमार दुबे (43 वर्ष) यूपी के कानपुर का रहने वाला है. अगस्त 2025 में श्रीतुलजा भवानी ऑटोमोबाइल्स प्रा.लि में आरोपी को ग्रुप वाइस प्रेसिडेंट का पद दिया गया था. ये कंपनी अनंत टोयोटा के नाम से जानी जाती है. बाद में कंपनी ने आरोपी को ग्रुप सीईओ (आफ्टर सेल्स) का प्रभार सौंप दिया था. आरोपी ने मई 2026 में अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफे के बाद कंपनी जब उसका फुल एंड फाइनल सेटलमेंट तैयार कर रही थी तो बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और दस्तावेजों की गई. इसी में ये सारा फर्जीवाड़ा सामने आया. जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी ने लैंडमार्क ग्रुप में काम करने का जो अनुभव पत्र दिया था वो फर्जी था. उसने लैंडमार्क ग्रुप के नाम से 2,80,670 प्रति माह का फर्जी बैंक स्टेटमेंट तैयार कर कंपनी में जमा कराया था. इस पर उसके साइन थे. फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारीआरोपी ने ऐसा इसलिए किया था ताकि उसको कंपनी में अधिक सैलरी पैकेज मिले. जांच में पता चला कि लैंडमार्क ग्रुप में कभी उसकी नौकरी लगी ही नहीं थी. जिस बारे में एचआर ने कंपनी को बताया. इसके बाद क्राइम ब्रांच में शिकायत की गई थी. अगस्त 2026 में आरोपी देवेन्द्र कुमार पर फ्रॉड का केस दर्ज किया गया था. क्राइम ब्रांच की टीम फिलहाल आरोपी से पूछताछ कर रही है. क्राइम ब्रांच ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आरोपी ने फर्जी दस्तावेज कहां तैयार कराए और इस फर्जीवाड़े में उसके साथ कोई अन्य व्यक्ति की मिलीभगत थी या नहीं recent visitors 1

जबलपुर बरगी बांध विस्थापितों ने खुद सड़क बनाने का काम किया शुरू, 40 साल इंतजार के बाद गैंती-फावड़ा लेकर उतरे ग्रामीण, बच्चे भी कर रहे मदद

Displaced residents of the Bargi Dam project in Jabalpur have started building a road themselves; after waiting 40 years, villagers have stepped out with pickaxes and shovels, and even children are helping. विशेष संवाददाता : जितेन्द्र श्रीवास्तव अर्पिता श्रीवास्तवजबलपुर । बरगी बांध विस्थापितों का सब्र आखिरकार टूट चुका है। दरअसल दुर्गानगर के ग्रामीणों ने सरकारी मदद का इंतजार छोड़कर अब खुद ही करीब 2 किलोमीटर सड़क बनाने का काम शुरू कर दिया है।जबलपुर बरगी बांध विस्थापितों ने खुद सड़क बनाने का काम किया शुरू, 40 साल इंतजार के बाद गैंती-फावड़ा लेकर उतरे ग्रामीण, बच्चे भी कर रहे मददजबलपुर जिले के शहपुरा जनपद के दुर्गानगर गांव में बरगी बांध परियोजना के विस्थापितों ने सड़क निर्माण की जिम्मेदारी अब खुद संभाल ली है। दरअसल करीब चार दशक पहले अपना गांव छोड़ने वाले परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहीं सड़क नहीं बनने से परेशान ग्रामीण अब रोज सुबह गैंती, फावड़ा और तसला लेकर श्रमदान कर रहे हैं, ताकि बारिश के मौसम में गांव का संपर्क पूरी तरह न टूटे। दरअसल दुर्गानगर में करीब 100 परिवार और लगभग 1500 की आबादी रहती है। ग्रामीणों के अनुसार गांव की मुख्य सड़क हर बारिश में दलदल बन जाती है। कई दिनों तक लोगों का आना-जाना मुश्किल हो जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है। इसी वजह से गांव वालों ने सरकारी इंतजार छोड़कर अपने स्तर पर सड़क सुधारने की शुरुआत कर दी। महिलाएं और बच्चे भी कर रहे मददवहीं ग्रामीणों के मुताबिक करीब दो किलोमीटर लंबे इस रास्ते की हालत इतनी खराब हो जाती है कि पैदल निकलना भी मुश्किल हो जाता है। कई जगह कीचड़ और गड्ढों के कारण दोपहिया वाहन फंस जाते हैं। गांव के लोग अपने खर्च से मुरम और पत्थर लाकर सड़क पर डाल रहे हैं ताकि कम से कम आवाजाही बनी रहे। ग्रामीण सोनू राजपूत ने बताया कि कई बार अधिकारियों और प्रशासन को आवेदन दिए गए लेकिन सड़क निर्माण का काम आगे नहीं बढ़ा। इसके बाद गांव वालों ने सामूहिक श्रमदान का फैसला लिया। वहीं भीमा बाई ने बताया कि गांव के लोग रोज मजदूरी पर जाने से पहले दो से तीन घंटे सड़क बनाने में लगा रहे हैं। उनका कहना है कि अब लोगों को भरोसा हो गया है कि अगर वे खुद आगे नहीं आएंगे तो समस्या खत्म नहीं होगी। हैरानी की बात है इस अभियान में महिलाएं भी पुरुषों के साथ बराबरी से हिस्सा ले रही हैं और बच्चे भी मिट्टी और पत्थर पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। सड़क नहीं होने से हो रही परेशानीदरअसल दुर्गानगर के लोगों का कहना है कि सड़क की खराब हालत का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। बारिश के दौरान एंबुलेंस और 108 जैसी आपातकालीन सेवाएं गांव तक नहीं पहुंच पातीं है। गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पहले दूसरे गांव में जाकर रुकना पड़ता है ताकि जरूरत पड़ने पर अस्पताल पहुंचना आसान रहे। जिला पंचायत सदस्य रामकुमार सैयाम ने बताया कि उन्होंने यह मुद्दा जिला पंचायत की बैठकों में तीन से चार बार उठाया और जिला पंचायत सीईओ को लिखित प्रस्ताव भी दिया लेकिन सड़क निर्माण शुरू नहीं हो सका। दूसरी ओर बरगी विधायक नीरज सिंह ने कहा है कि ग्रामीणों की परेशानी गंभीर है और अधिकारियों से चर्चा कर सड़क निर्माण के लिए बजट का प्रावधान किया जाएगा। recent visitors 5

मप्र जल निगम का बदलेगा नाम, अब कहलाएगा एमपी वाटर एंड सेनिटेशन कार्पोरेशन, मीटिंग में प्रस्ताव पास

MP Jal Nigam to be renamed ‘MP Water and Sanitation Corporation’; proposal passed in meeting. भोपाल: सीएम मोहन यादव की अध्यक्षता में एमपी जल निगम के संचालक मंडल की 26वीं बैठक हुई है। बैठक सीएम हाउस में हुई है। इस बैठक में एमपी जल निगम मर्यादित को पुनर्गठित कर अब मध्यप्रदेश वाटर एंड सेनिटेशन कार्पोरेशन बनाने का अहम प्रस्ताव पारित हुआ है। कैबिनेट में मंजूरी के लिए भेजादरअसल, बैठक में वर्तमान मप्र जल निगम मर्यादित (एमपीजेएनएम) को पुर्नगठित कर अब मध्यप्रदेश वाटर एंड सेनिटेशन कार्पोरेशन (एमपी-वास्को) बनाने का अहम प्रस्ताव पारित किया गया। संचालक मंडल ने यह महत्वपूर्ण प्रस्ताव अंतिम अनुमोदन के लिए मंत्रि-परिषद् को भेजने की मंजूरी दे दी। जल विकास और स्वच्छता प्रबंधन में नए लक्ष्यों पर काम करेगाबैठक में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश जल निगम अब अपने नए नाम (एमपी-वास्को) और नई जिम्मेदारियों के साथ प्रदेश में जल विकास एवं स्वच्छता प्रबंधन में नए लक्ष्यों और अतिरिक्त संसाधनों के साथ काम करेगा। सीएम ने मप्र जल निगम द्वारा विचार और अनुमोदन के लिए रखे गए विभिन्न एजेंडा प्रस्तावों को मंजूरी दी। मोहन यादव ने जल निगम के वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए तैयार संचालक मण्डल के प्रतिवेदन और वित्तीय वर्ष 2024-25 के अनअंकेक्षित वार्षिक लेखाओं का अनुमोदन किया। बजट अनुमान 57 करोड़ रुपए करने का अनुमोदनमोहन यादव ने कैप्टिव मोड के तहत 60 मेगावॉट ग्रिड-कनेक्टेड पवन ऊर्जा परियोजना विकसित करने के लिए गठित परियोजना कंपनी में मप्र जल निगम के प्रतिनिधित्व के लिए प्रबंध संचालक को अधिकृत कर दिया। साथ ही इसी परियोजना के विकास के लिए गठित प्रोजेक्ट कंपनी में डीमैटीरियलाइज्ड रूप में 26 प्रतिशत इक्विटी शेयर रखने का अनुमोदन किया। उन्होंने मप्र जल निगम के इक्विटी शेयरों के नए पदाधिकारियों को हस्तांतरण और जल निगम द्वारा वर्तमान वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तैयार किए गए बजट अनुमान 57 करोड़ रुपए का अनुमोदन किया टेंडर मंजूरी की तय सीमा बढ़ीसीएम यादव ने मप्र जल निगम के संचालक मण्डल में स्वतंत्र निदेशक के पद पर सुमित बोस की पुनः नियुक्ति का भी अनुमोदन किया। उन्होंने प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन और एक्जी़क्यूशन मेथोडोलॉजी के अनुसार मप्र जल निगम के एमडी की टेंडर मंजूरी की तय सीमा 5 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 25 करोड़ रुपए करने के प्रस्ताव का भी अनुमोदन किया। recent visitors 2

मोदी के चीता प्रोजेक्ट के 4 साल : 8 चीतों में कौन-कौन जिंदा? आशा-ज्वाला ने बढ़ाया कुनबा, बाकी 6 अब कहां हैं?

Four Years of Modi’s Cheetah Project: Which of the 8 Cheetahs Are Still Alive? Asha and Jwala Have Expanded the Pride—Where Are the Other 6 Now? मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चीता प्रोजेक्ट के चार साल पूरे हो गए हैं। 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो में छोड़ा था। उस समय इन आठ चीतों के साथ भारत में चीता पुनर्वास की शुरुआत हुई थी। चार साल बाद इन आठ में से तीन चीते ही जीवित हैं, जबकि पांच की अलग-अलग कारणों से मौत हो चुकी है। खास बात यह है कि शुरुआती आठ में शामिल आशा और ज्वाला ने भारत में प्रजनन कर चीता कुनबा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। बता दें अभी भारत में जन्मे जीवित शावकों की संख्या 32 और देश में कुल चीतों की संख्या 52 पहुंच गई थी। इसमें 49 कूनो में और तीन गांधी सागर में हैं। पीएम ने इन आठ चीतों को छोड़ा था17 सितंबर 2022 को नामीबिया से लाए गए आठ चीतों में पांच मादा और तीन नर थे। बाद में इनके नाम बदले गए। आशा का नाम आशा, ओबान का पवन, सवाना का नाभा, सियाया का ज्वाला, एल्टन का गौरव, फ्रेडी का शौर्य और तिब्लिसी का धात्री रखा गया। आठवां चीता साशा अपने इसी नाम से जाना गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 17 सितंबर 2022 को कूनो में छोड़े गए आठ चीतों में अब आशा, ज्वाला और गौरव ही बचे हैं। अब कौन-कौन जिंदा है?आशा: यह शुरुआती आठ चीतों में शामिल मादा है। कूनो में इसने प्रजनन किया और भारत में जन्मे चीतों की नई पीढ़ी बढ़ाने में योगदान दिया। आशा ने पहले लीटर में तीन और दूसरे लीटर में पांच शावकों को जन्म दिया।ज्वाला: इसका पुराना नाम सियाया था। ज्वाला अब इस प्रोजेक्ट की अहम मादा चीतों में शामिल है। पहले लीटर में चार शावकों को जन्म दिया, लेकिन इसमें एक ही शाव बच पाया। दूसरे लीटर में चार शावको को जन्म दिया, जिसमें तीन जिंदा और तीसरे लीटर में पांच शावकों को जन्म दिया। यह पांचों जिंदा हैं।गौरव: इसका पुराना नाम एल्टन था। यह भी 2022 में आए आठ चीतों में शामिल है और अब जीवित तीन चीतों में है।पांच चीतों की हो चुकी है मौतसाशा: मार्च 2023 में इसकी मौत हुई। जांच में किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारी सामने आई थी।धात्री: इसका पुराना नाम तिब्लिसी था। अगस्त 2023 में इसकी मौत हो गई।शौर्य: इसका पुराना नाम फ्रेडी था। जनवरी 2024 में इसकी मौत हुई।पवन: इसका पुराना नाम ओबान था। अगस्त 2024 में इसकी मौत हो गई।नाभा: इसका पुराना नाम सवाना था। जुलाई 2025 में चोटों के बाद इसकी मौत हुई।आठ से शुरू हुआ सफर, अब नई पीढ़ी संभाल रही कमानकूनो में सितंबर 2022 में पहले आठ चीते लाए गए थे। इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत पहुंचे। आगे चलकर चीतों का प्रजनन शुरू हुआ और भारत में ही शावकों का जन्म होने लगा। मार्च 2026 में ज्वाला के पांच शावकों के जन्म के बाद देश में चीतों की कुल संख्या 52 और भारत में जन्मे जीवित शावकों की संख्या 32बताई गई थी। यानी चार साल पहले जिन आठ चीतों से भारत में दोबारा चीते बसाने की शुरुआत हुई थी, उनमें से तीन आज भी इस सफर का हिस्सा हैं। वहीं, आशा और ज्वाला से जन्मी नई पीढ़ी ने कूनो की कहानी को एक नए दौर में पहुंचा दिया है। अप्रैल 2026 में भारत में जन्मी एक मादा चीते ने भी कूनो के जंगल में चार शावकों को जन्म दिया, जिससे प्राकृतिक परिस्थितियों में प्रजनन की एक और उपलब्धि सामने आई।कठिन अनुभवों से मिली सीखवन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहला साल कूनो की टीम ने परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाया। पहला साल कठिन अनुभवों से मिली उम्मीद के साथ खत्म हुआ। इससे यह सीख मिली कि चीतों को दोबारा बसाना कोई एक बार में पूरा होने वाली प्रक्रिया नहीं है। इसमें लगातार सीखना, परिस्थितियों के अनुसार बदलाव करना, चुनौतियों का सामना करना और उनसे उबरना शामिल है। इसके बाद सफल प्रजनन से उम्मीद बढ़ती गई। recent visitors 6