60 साल के व्यक्ति ने पत्नी और बच्चों पर घर से निकालने, मारपीट व जासूसी करने का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी लगाई

भोपाल एक 60 साल के व्यक्ति ने अपनी पत्नी और बच्चों पर घर से निकालने, मारपीट करने और जासूसी करने का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी लगाई है। यह मामला फैमिली कोर्ट में चल रहा है। 30 साल से शादीशुदा यह जोड़ा पिछले 10 सालों से अलग रह रहा है। व्यक्ति अपनी बुजुर्ग मां के साथ रहता है, जबकि पत्नी अपनी तीन बेटियों और दामाद के साथ रहती है। दोनों घर आदमी के नाम पर हैं। 1995 में हुई इस शादी में अक्सर झगड़े होते रहते थे। आदमी सरकारी फैक्ट्री में काम करता था और पत्नी पापड़ बनाती थी। पत्नी और बच्चों ने घर से निकाल दिया एक दिन झगड़े के बाद पत्नी और बच्चों ने आदमी को घर से निकाल दिया। उनका कहना था कि शराब पीकर वह मारपीट और गाली-गलौज करता है। दो घर होने की वजह से वह आदमी अपनी मां के साथ दूसरे घर में रहने लगा। इसके बावजूद पत्नी और बच्चे उस पर नजर रखते थे। पत्नी ने अपने दामाद को बुर्का और सैंडल पहनाकर पति की जासूसी करने भेजा। पड़ोसियों ने दामाद को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले करने से पहले उसकी पिटाई कर दी। तलाक का केस दायर किया इस जासूसी की घटना के बाद आदमी ने तलाक का केस दायर कर दिया। फैमिली कोर्ट काउंसलर शैल अवस्थी इस केस को देख रही हैं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पहले वह तलाक के बारे में नहीं सोच रहा था। वह अपनी बुजुर्ग मां के साथ खुशी से रह रहा था। पत्नी ने पति से गुजारा भत्ता भी मांगा है। लंबे समय से चल रहा झगड़ा आदमी और उसकी पत्नी के बीच लंबे समय से अनबन चल रही थी। रोजमर्रा के झगड़ों ने उनके रिश्ते को कमजोर कर दिया था। शराब पीकर मारपीट करने का आरोप गंभीर है। पत्नी और बच्चों ने उसे घर से निकाल दिया। recent visitors 48

हाईकोर्ट ने सूचना आयुक्त पर ठोका जुर्माना

जबलपुर जबलपुर में सूचना आयुक्त पर HC ने ठोंका 40 हजार रुपये का जुर्माना. आवेदक को 2 लाख 38 हजार की जानकारी मुफ्त देने के आदेश. हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना आयुक्त सरकार के एजेंट के रूप में काम ना करे. भोपाल के फ़िल्म मेकर नीरज निगम की याचिका पर HC ने दिया आदेश. आवेदक को 30 दिनों के अंदर नही दी गई थी RTI की जानकारी. 30 दिनों के बाद जानकारी के बदले आवेदक से मांगे गए थे 2 लाख 38 हजार रुपये. HC के आदेश के बाद भी सूचना आयुक्त ने ख़ारिज कर दी थी RTI अपील. recent visitors 66

हाई कोर्ट ने महिला न्यायाधीश को बकाया वेतन की 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किये जाने के आदेश जारी किये

जबलपुर  हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने महिला न्यायाधीश को बकाया वेतन की 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किये जाने के आदेश जारी किये हैं. युगलपीठ ने इसके अलावा वरिष्ठता सूची को संशोधित करते हुए याचिकाकर्ता महिला जज को सभी उचित लाभ दिए जाने के निर्देश भी जारी किए. सिविल जज 2007 में घोषित रिजल्ट पर विवाद मामले के अनुसार वर्तमान में नीमच में पदस्थ महिला न्यायाधीश ने साल 2013 में हाई कोर्ट जबलपुर में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया "सिविल जज 2007 में घोषित रिजल्ट की प्रतीक्षा सूची में वह पहले स्थान में थी. वह अनुसूचित जाति वर्ग की उम्मीदवार थी. अनुसूचित जाति वर्ग के दो अन्य वर्ग के अभ्यर्थियों को चयन किया गया. इस कारण पात्र होने के बावजूद उसका चयन नहीं हुआ." इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया. हाई कोर्ट के आदेश पर महिला की नियुक्ति हाई कोर्ट के आदेश पर महिला को साल 2009 में नियुक्ति प्रदान की गयी. नियुक्ति प्रदान करने के बाद उन्हें वरिष्ठता व वेतन का लाभ नहीं मिला. युगलपीठ ने याचिका का निराकरण करते हुए आदेश में कहा "यह निर्विवाद है कि रामसुजन वर्मा और रामानुज सोंधिया अनुसूचित जनजाति वर्ग नहीं थे. इसके बावजूद उनका चयनित अनुसूचित जाति वर्ग में किया गया. याचिकाकर्ता पद के लिए पात्र थी परंतु उनका चयन नहीं हुआ. गलत रूप से चयनित दोनों व्यक्ति को बाद में हटा दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया में याचिकाकर्ता की कोई गलती नहीं थी." महिला जज को अन्य लाभ भी देने के निर्देश युगलपीठ ने याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश जारी करते हुए बकाया वेतन का 50 प्रतिशत राशि का भुगतान 4 सप्ताह में करने के आदेश जारी किए. इसके अलावा युगलपीठ ने संशोधित वरिष्ठता सूची जारी करते हुए वरिष्ठता के आधार पर सभी लाभ देने के भी आदेश जारी किये. याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर ने पैरवी की. recent visitors 53

आदेश के बाद नहीं किया आरआरसी का निष्पादन, भोपाल कलेक्टर के खिलाफ जमानतीय वारंट जारी

भोपाल /जबलपुर  मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए भोपाल कलेक्टर के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है. साथ ही व्यक्तिगत रूप से तलब किया है. हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने पाया कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कलेक्टर भोपाल बिल्डर के खिलाफ जारी आरआरसी का निष्पादन नहीं करवा सके. एकलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई 12 मार्च को निर्धारित की है. आदेश के बाद भी बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई नहीं याचिकाकर्ता प्रताप भानु सिंह की तरफ से दायर अवमानना याचिका में कहा गया "रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण मध्य प्रदेश ने कलेक्टर भोपाल के माध्यम से 23,26,363 रुपये प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत ब्याज के साथ बिल्डर के खिलाफ आरसीसी अक्टूबर 2020 में जारी की थी. कलेक्टर भोपाल द्वारा 3 साल का समय गुजर जाने के बावजूद बिल्डर के खिलाफ जारी आरआरसी का निष्पादन नहीं करवाया गया." इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की. कलेक्टर को व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा हाई कोर्ट ने जुलाई 2023 में कलेक्टर भोपाल को 3 माह में आरसीसी का निष्पादन करवाने के आदेश जारी किये थे. हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कलेक्टर भोपाल ने निर्धारित समय सीमा में आरआरसी का निष्पादन नहीं करवाया. इस कारण अवमानना याचिका दायर की गयी. एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अवमानना याचिका फरवरी 2024 में दायर की गयी थी. हाई कोर्ट के आदेश बावजूद कलेक्टर भोपाल ने आरआरसी के निष्पादन करने की कार्रवाई नहीं की. एकल पीठ ने भोपाली कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से उपस्थिति के लिए जमानती वारंट जारी किया. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता कपिल दुग्गल तथा अधिवक्ता ध्रुव वर्मा ने पैरवी की. recent visitors 74

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा एमपी हाईकोर्ट का फैसला, कहा- गवाह की कोई न्यूनतम उम्र नहीं

भोपाल /नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि बच्चे की गवाही भी किसी अन्य गवाह की तरह ही मान्य है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए एक व्यक्ति को अपनी पत्नी की हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला खास इसलिए है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल की बच्ची की गवाही को आधार बनाया, जिसने अपनी मां की हत्या होते देखी थी। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि गवाह के लिए कोई न्यूनतम उम्र नहीं होती और बच्ची के बयान को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि वह 7 साल की है। मां की हत्या, बच्ची की गवाही से पिता को उम्रकैद सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के बयान की जांच सावधानी से करनी चाहिए क्योंकि उन्हें आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने एमपी हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने बच्ची के बयान को खारिज कर दिया था और आरोपी को बरी कर दिया था। गवाह की न्यूनतम उम्र तय नहीं- SC सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एविडेंस एक्ट में गवाह की न्यूनतम उम्र तय नहीं है। इसलिए, बच्ची की गवाही को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर बच्चा गवाही देने के लिए सक्षम है, तो उसकी गवाही किसी अन्य गवाह की तरह ही मानी जाएगी। लेकिन, अदालत को बच्चे के बयान की जांच बहुत ध्यान से करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चे जल्दी बहकावे में आ सकते हैं। 'बच्ची की गवाही को सिरे से खारिज नहीं कर सकते' सर्वोच्च कोर्ट ने आगे कहा कि इसका मतलब यह नहीं कि छोटी-सी गलती पर बच्चे की गवाही को खारिज कर दिया जाए। बल्कि, बच्चे के बयान को बहुत सावधानी से परखा जाना चाहिए। इस मामले में, सर्वोच्च कोर्ट ने बच्ची की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए उसके पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में एक मिसाल का काम करेगा। ये निर्णय बच्चों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि बच्चों की आवाज भी सुनी जाए और उन्हें न्याय मिले। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में बच्चों की भूमिका को मजबूत करता है। recent visitors 47

दिल्ली पुलिस के SHO CL मीणा की वकीलों ने पिटाई की, पुरानी रंजिश का मामला

नई दिल्ली  राजधानी दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में  सुबह दिल्ली पुलिस के SHO की पिटाई होने की खबर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैली। मगर अधिकारिक तौर पर मामले में किसी ने कुछ नहीं कहा। यहां तक की पीड़ित खुद भी कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। सबसे पहले अपने पाठकों को बताने जा रहा है कि आखिरकार उस दिन कोर्ट में हुआ क्या था। सान्ध्य टाइम्स संवाददाता के हाथ इस मामले में दर्ज हुई एफआईआर की कॉपी लगी है। जिसमें SHO की आपबीती दर्ज है। SHO मारपीट में जमीन पर गिरे एफआईआर के मुताबिक, 54 वर्षीय पीड़ित इंस्पेक्टर सीएल मीणा इन दिनों सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के कमला मार्केट थाने में तैनात हैं। सोमवार सुबह वह साल 2014 में शकरपुर थाने में दर्ज हुए धोखाधड़ी के एक मामले में सुनवाई पर आए थे। कोर्ट नंबर 32 में सुनवाई के बाद वह करीब 11:30 बजे वापस लौट रहे थे। आरोप है कि वह अभी कोर्ट कॉम्प्लेक्स बिल्डिंग, पोस्ट ऑफिस के सामने पहुंचे ही थे कि तभी उन्हें आरोपी वकील और उसके साथियों ने घेर लिया। मुख्य आरोपी उनका हाथ खींचकर उन्हें घसीटने लगा और कहने लगा आज हम तुझे छोड़ेंगे नहीं। इसके बाद सभी ने SHO को लात-घूंसे मारने शुरू कर दिए। इस दौरान कई वकील उन्हें घेरे खड़े रहे। वकीलों ने पिटाई कर उनकी वर्दी तक फाड़ दी। SHO जमीन पर गिर गए। फिर भी आरोपी रुके नहीं। आरोपी ने पर्स भी छीना आरोपी उन्हें पीटते रहे और गालियां देते रहे। मुख्य आरोपी ने उनका पर्स भी छीन लिया। जिसमें पीड़ित का आधार कार्ड, सीजीएचएस कार्ड, दिल्ली पुलिस का आईडी कार्ड और करीब सात हजार रुपये कैश थे। पीड़ित के दोनों मोबाइल भी वहां गिर गए। अब कुछ और वकील आए और उन्होंने SHO को भीड़ से बचाकर कोर्ट के गेट नंबर-4 से बाहर किया। एक वकील ने उनके दोनों मोबाइल लौटाए। वकील ने बोला, ये उसे जमीन पर पड़े मिले थे। इसके बाद SHO ने पुलिस कंट्रोल रूम को कॉल की। हेडगेवार अस्पताल में मेडिकल करवाया और फिर थाने में जाकर आरोपियों के खिलाफ शिकायत दी। जिस पर मुख्य आरोपी के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई। SHO से पुरानी रंजिश वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि SHO की आरोपियों से कोई पुरानी रंजिश है। किसी गाड़ी को लेकर इनके बीच थाने में बहसबाजी हुई थी। उसी का बदला लेने के लिए मारपीट की गई। गैर जमानती धाराओं में केस दर्ज हुआ है। मगर उन धाराओं में सात साल से कम सजा होने का प्रावधान है। इस कारण आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। पुलिस बार को आरोपी के खिलाफ शिकायत देगी। वहीं इस पूरे मामले पर पीड़ित SHO से बातचीत करने का प्रयास किया तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि मैं कुछ नहीं बोल पाउंगा। recent visitors 56

अगर किसी की पत्नी गैर मर्द से प्यार करती है तो यह व्यभिचार नहीं है : हाई कोर्ट

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी की पत्नी गैर मर्द से प्यार करती है तो यह व्यभिचार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इसे तब तक व्यभिचार नहीं कहा जा सकता जब तक कि वह किसी और मर्द के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाती है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया ने कहा कि व्यभिचार तभी होता है जब शारीरिक संबंध होते हैं। पति ने कोर्ट में दावा किया था कि उसकी पत्नी किसी और से प्यार करत है। ऐसे में वह मेंटिनेंस की हकदार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (5) और सीआरपीसी की धारा 125 (4) में कहा गया है कि अगर पत्नी पर व्यभिचार के आरोप सही साबित होते हैं तब ही उसे गुजारे भत्ते से वंचित किया जा सकता है। कोर्ट ने फैसले में कहा, व्यभिचार साबित करने के लिए शारीरिक संबंधों को सबित करना जरूरी है। अगर पत्नी किसी से प्यार करती है और शारीरिक संबंध नहीं रखती है तो इसे व्यभिचार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। बता दें कि फैमिली कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि पति को हर महीने 4 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देना होगा। पति वॉर्ड बॉय की तौर पर का करता था और महीने में 8 हजार उसकी इनकम है। पति ने हाई कोर्ट में याचिका फाइल की और दावा किया कि उसकी पत्नी किसी और से प्यार करती थी। कोरक्ट ने कहा कि सेक्शन 24 के तहत आदेश के बाद पत्नी को पहले से ही 4 हजार का गुजारा भत्ता मिल रहा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अस्पताल से दिया गया सैलरी सर्टिफिकेट वेरिफाइ नहीं किया गया है। कोर्ट ने कहा, सैलरी सर्टिफिकेट पर इसे जारी करने का स्थान और तारीख ही नहीं दी गई है। ऐसे में कोर्ट के लिए यह निर्णय करना मुश्किल है कि यह सर्टिफिकेट सही है या फर्जी है। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया था कि वह एक सक्षम व्यक्ति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कम इनकम इस बात का आधार नहीं हो सकता कि वह मेंटिनेंस नहीं देगा। अगर पति को पता था कि वह उसकी रोजाना की जरूरत भी नहीं पूरी कर सकता तो इसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। उसे पत्नी की जिम्मेदारी उठाने के लिए कमाना चाहिए था। पति ने यह भी दावा किया था कि उसकी पत्नी ब्यूटी पार्लर चलाती है। कोर्ट ने कहा कि पति को 4 हजार रुपये का मासिक गुजारा भत्ता देना ही होगा। recent visitors 66