राहत : हाईकोर्ट ने दी EWS के अभ्यर्थियों को 5 साल की छूट, अब 45 साल तक के अभ्यर्थी कर सकते हैं आवेदन

जबलपुर  मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों के पक्ष में राहतकारी आदेश जारी किया है। डबल बेंच ने अपने अंतरिम आदेश में माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2024 में उन्हें आयु सीमा में 5 साल की छूट प्रदान करने के अंतरिम आदेश दिया है। रीवा निवासी ने दायर की थी याचिका रीवा निवासी पुष्पेंद्र द्विवेदी और अन्य की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि शिक्षक चयन परीक्षा की रूल बुक की कंडिका 7.1 और 7.2 में ईडब्ल्यूएस को आरक्षित वर्ग माना गया था। रूल बुक की कंडिका 6.2 में अन्य आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) को आयु सीमा में छूट दी गई थी। आरक्षित ईडब्ल्यूएस वर्ग को उम्र में किसी प्रकार की छूट प्रदान नहीं गयी है। याचिका में भर्ती नियम की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी थी। क्या है EWS में उम्र की सीमा का मामला? दरअसल, रीवा निवासी पुष्पेंद्र द्विवेदी व अन्य की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि शिक्षक चयन परीक्षा की रूल बुक की कंडिका 7.1 और 7.2 में ईडब्ल्यूएस को आरक्षित वर्ग माना गया था. रूल बुक की कंडिका 6.2 में अन्य आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) को आयु सीमा में छूट दी गई थी. वहीं ईडब्ल्यूएस वर्ग को उम्र में किसी प्रकार की छूट प्रदान नहीं गई थी. आयू सीमा में छूट की मांग याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अधिवक्ता धीरज तिवारी और ईशान सोनी ने तर्क दिया गया कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को आयु सीमा में छूट न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का उल्लंघन है। ईडब्ल्यूएस कोटा को आरक्षित वर्ग में रखे जाने के कारण उम्र सीमा में भी उम्मीदवारों को छूट प्रदान की जानी चाहिए। डबल बेंच ने सुनवाई पश्चात उक्त ईओडब्ल्यू वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहतकारी अंतरिम आदेश जारी किए। युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तारीख 11 फरवरी है। कोर्ट के फैसले के बाद 45 की उम्र तक के ईडब्ल्यूएस अभ्यर्थी फॉर्म भर सकेंगे। कोर्ट में दिए गए ये तर्क याचिका में कहा गया कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को आयु सीमा में छूट न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का उल्लंघन है. याचिका में भर्ती नियम की संवैधानिकता को भी चुनौती दी गई थी. याचिका में राहत चाही गई थी कि ईडब्ल्यूएस कोटा को आरक्षित वर्ग में रखे जाने के कारण उम्र सीमा में भी उम्मीदवारों को छूट प्रदान की जानी चाहिए. हजारों EWS कैंडिडेट्स को होगा फायदा युगल पीठ ने सुनवाई के बाद अपने अंतरिम आदेश में ईओडब्ल्यू वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा में पांच साल की छूट प्रदान करने के आदेश जारी किए हैं. इस आदेश के बाद 45 वर्ष तक के EWS कैंडिडेट भी शिक्षक चयन परीक्षा में शामिल हो सकेंगे, जिससे हजारों कैंडिडेट्स को फायदा होगा. युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है. याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता धीरज तिवारी व ईशान सोनी ने पैरवी की. recent visitors 53

HC से IPS जीपी सिंह को राहत, अब केंद्रीय एजेंसी की जांच को निरस्त करने का आदेश दिया

 बिलासपुर. हाईकोर्ट ने आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ केंद्रीय एजेंसी की उस प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) को निरस्त करने का आदेश दिया है, जिसमें उन पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप है। इसके साथ ही हाईकोर्ट चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस रवींद्र अगवाल की डिवीजन बेंच ने पहले जारी किए गए दोनों नोटिस को भी रद्द कर दिया है।बता दें कि नई दिल्ली की हेड इन्वेस्टिगेटिंग यूनिट ने जीपी सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आईपीएस जीपी सिंह पर राजद्रोह और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज किया गया, तब उन पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने अपनी पत्नी मनप्रीत कौर के नाम पर संपत्ति बनाई है। इसी मामले में एसीबी के अलावा नई दिल्ली की हेड इन्वेस्टिगेटिंग यूनिट ने धनशोधन अधिनियम के तहत आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ ईसीआईआर दर्ज किया था, जिसके बाद उन्हें नोटिस जारी कर उनकी पत्नी मनप्रीत कौर के नाम पर अर्जित की गई संपत्ति का ब्यौरा मांगा था। जीपी सिंह ने राज्य सरकार की तरफ से दर्ज आपराधिक प्रकरणों के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया था। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आय से अधिक संपत्ति सहित अन्य सभी मामलों को खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली द्वारा दर्ज ईसीआईआर को निरस्त करने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। recent visitors 48

कौन से कानून के तहत सीएम के कार्यक्रम में निगमायुक्त डीजल भरवाए? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का सवाल

जबलपुर  मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री का सम्मान कार्यक्रम जबलपुर में रखा गया था, जिसमें बसों के डीजल का मामला कोर्ट पहुंच गया है. दरअसल, सीएम के सम्मान कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित की गई बसों में भरे गए डीजल का अबतक भुगतान नहीं किया गया है, जिसके बाद एक पेट्रोल पंप संचालक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. सीएम के कार्यक्रम के लिए 6 लाख का डीजल दरअसल, जबलपुर के आईएसबीटी बस स्टैंड के पास स्थित पेट्रोल पंप के संचालक सुगम चंद्र जैन ने ये याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया था कि 3 जनवरी 2024 को मुख्यमंत्री के सम्मान कार्यक्रम का आयोजन जबलपुर में किया गया था. कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में डीजल भरने के लिए नगर निगम के खाद्य अधिकारी ने व्यक्तिगत रूप से आकर निर्देश दिए थे. उन्होंने कहा था कि निगमायुक्त ने उक्त निर्देश दिए थे. कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में लगभग 6 लाख रु का डीजल उनके पेट्रोल पंप से भरा गया था. बिल भुगतान कराने के लिए की कई बार की मांग अगस्त 2024 में याचिकाकर्ता ने बिल भुगतान के लिए संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से संपर्क किया. इसके अलावा कलेक्टर कार्यालय से निगमायुक्त को राशि भुगतान के संबंध में आदेश जारी किए गए थे, पर भुगतान नहीं हुआ. एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से पूछा कि अधिग्रहित बस में डीजल भरने के लिए प्रशासन की ओर से पीओएल जारी किया गया था या नहीं? याचिकाकर्ता ने इसपर जवाब दिया कि सिर्फ मौखिक आदेश जारी किए गए थे. बिना पीओल कैसे भर दिया बसों में डीजल? एकलपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अपने आदेश में कहा है कि बिना किसी प्राधिकरण के याचिकाकर्ता ने बसों में कैसे डीजल भरा? इसके साथ ही कोर्ट ने संयुक्त कलेक्टर, जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से एसोसिएशन व उसके सदस्य को पीओएल की प्रतिपूर्ति करवाने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कलेक्टर से मांगा जवाब कोर्ट ने इसके अलावा कलेक्टर से जवाब मांगा है कि किस कानून में यह लिखा है कि निगमायुक्त का दायित्व है कि वह मुख्यमंत्री की रैली में लगी बसों में डीजल भरवाए? एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि प्रथम दृष्टया यह सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर गोलमाल का मामला प्रतीत हो रहा है. इस संबंध में एकलपीठ ने जिला कलेक्टर को हलफनामे में जवाब पेश करने के आदेश जारी किए हैं. एकलपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं होगा. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष रावत ने पैरवी की. पेट्रोल पंप से भरवाया गया छह लाख का डीजल याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष रावत ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि आइएसबीटी बस स्टैंड के समीप याचिकाकर्ता का पेट्रोल पंप है। मुख्यमंत्री के सम्मान में तीन जनवरी, 2024 को जबलपुर में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में डीजल भरने के लिए नगर निगम आयुक्त ने खाद्य अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से भेजा था। अधिग्रहित बसों में लगभग छह लाख रुपये का डीजल उनके पेट्रोल पंप से भरा गया था। डीजल का भुगतान न होने के कारण उन्होंने निगमायुक्त से संपर्क किया। निगमायुक्त द्वारा बताया गया कि संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी के कार्यालय की ओर से बसों में डीजल भरवाने कहा गया था। याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं याचिकाकर्ता ने अगस्त, 2024 को बिल भुगतान के लिए संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से संपर्क किया। इसके बाद कलेक्टर कार्यालय से निगमायुक्त को राशि भुगतान करने के संबंध में लिखित निर्देश दिए गए थे। शपथ पत्र के जरिए जवाब प्रस्तुत करें संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त ने पीओएल की प्रतिपूर्ति करवाने का निर्देश दिए। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस संबंध में जिला कलेक्टर शपथ पत्र के जरिए जवाब प्रस्तुत करें। इसके अलावा यह भी बताएं कि किस कानून में निगमायुक्त का दायित्व है कि वह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में लगी बसों में डीजल भरवाए। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं होगा। recent visitors 53

SC ने बांग्लादेशियों उनके देश भेजने के बजाय सुधार गृहों में रखने के संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने भारत में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की अनिश्चितकालीन हिरासत पर सवाल उठाया है। अदालत ने इन्हें उनके देश भेजने के बजाय पूरे भारत के सुधार गृहों में लंबे समय तक हिरासत में रखने के संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इस बात पर बल दिया कि जब किसी अवैध बांग्लादेशी प्रवासी को पकड़ा जाता है और विदेशी अधिनियम 1946 के अंतर्गत उसे दोषी ठहराया जाता है, तो उसकी सजा पूरी होने के तुरंत बाद उसे निर्वासित किया जाना चाहिए। पीठ ने पूछा कि विदेशी अधिनियम के अंतर्गत अपनी सजा पूरी करने के बाद फिलहाल कितने अवैध आप्रवासियों को विभिन्न सुधार गृहों में हिरासत में रखा गया है? शीर्ष अदालत ने लगभग 850 अवैध प्रवासियों की अनिश्चितकालीन हिरासत पर चिंता व्यक्त की। एससी ने 2009 के परिपत्र के खंड 2 (v) का पालन करने में सरकार की विफलता पर सवाल उठाया, जो निर्वासन प्रक्रिया को 30 दिनों में पूरा करने का आदेश देता है। न्यायालय ने इस बात पर भी केंद्र से ठोस स्पष्टीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार से क्या कदम अपेक्षित हैं। 'सजा पूरी होने के बाद सुधार गृहों में कैद' माजा दारूवाला बनाम भारत संघ का मामला 2013 में कलकत्ता उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में भेजा गया था। यह मामला मूल रूप से 2011 में शुरू हुआ जब एक याचिकाकर्ता ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला, जिन्हें उनकी सजा पूरी होने के बाद भी पश्चिम बंगाल सुधार गृहों में कैद रखा गया था। शीर्ष अदालत में स्थानांतरित होने से पहले कलकत्ता एचसी ने इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया था। पीठ ने कहा कि ये प्रथाएं मौजूदा दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं, जो तेजी से निर्वासन प्रक्रियाओं की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 फरवरी को होगी। recent visitors 74

मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने सिंगरौली जिले के 4 अधिकारियों को अवमानना का नोटिस थमाया

सिंगरौली मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने सिंगरौली जिले के 4 अधिकारियों को अवमानना का नोटिस थमाया है। इनमें सिंगरौली कलेक्टर, SDM देवसर, सरई तहसीलदार और नायब तहसीलदार (सर्किल खनुआ) शामिल हैं। हाइकोर्ट ने एक सप्ताह में सभी अधिकारियों से हलफनामा पेश करने को कहा है। अधिवक्ता ब्रहमेन्द्र पाठक के माध्यम से दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जबलपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत और न्यायाधीश विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया है। ये है पूरा मामला इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय में पैरवी कर रहे अधिवक्ता ब्रहमेन्द्र पाठक ने बताया कि ईएमआईएल बंधा कोल माइंस ने पचौर बंधा सहित कुछ अन्य गांवों के विस्थापितों के पुनर्वास के लिए लामीदह में जिस शासकीय भूमि को चिन्हित किया है उस भूमि पर कई दर्जन आदिवासी समाज के लोग निवासरत हैं जिन्हें  प्रशासन के द्वारा बिना मुआवजा दिए जबरन हटाया जा रहा है। अधिवक्ता ब्रहमेंद्र पाठक की ओर से पूर्व में इस मामले में दायर जनहित याचिका में दिए गए तर्क को सही मानते हुए उच्च न्यायालय ने विस्थापितों के पुनर्वास के लिए चिन्हित की गई सिंगरौली जिले की लामीदह गांव की शासकीय भूमि में निवासरत लोगों को हटाने की कार्यवाही पर रोक लगाते हुए कलेक्टर को 4 सप्ताह के भीतर मामले का निराकरण करने के लिए निर्देशित किया था। recent visitors 58

भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट से जुड़ेगा मामला, सुनवाई अब सीजेआई करेंगे

धार  हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्थलों पर चल रहे विवादों की सभी कार्यवाही पर रोक लगाने का फैसला सुनाया था। इस हालिया फैसले के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट ने  आदेश दिया कि एमपी के धार जिले में भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर पर चल रही कानूनी लड़ाई को पूजा स्थल अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ जोड़ा जाए और सुना जाए। इस मामले में सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई कर रही है। पिछले साल अप्रैल में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को साइट का सर्वेक्षण करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि बिना उसकी अनुमति के सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाए। इसने एएसआई को परिसर में ऐसी कोई भी खुदाई नहीं करने का भी निर्देश दिया, जिससे संरचना के चरित्र में बदलाव हो सकता है। सुनवाई में ये हुई चर्चा सुनवाई की शुरुआत में, जस्टिस हृषिकेश रॉय और एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि इस मामले को पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इन याचिकाओं में सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने किसी भी पूजा स्थल के स्वामित्व और शीर्षक को चुनौती देने वाले नए मुकदमे दायर करने या अगले आदेश तक विवादित धार्मिक स्थलों के सर्वेक्षण का आदेश देने पर रोक लगाने का आदेश पारित किया था। वकील के तर्क पर क्या बोली पीठ? हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यह विवाद पूजा स्थल अधिनियम से संबंधित नहीं है और उन्होंने न्यायालय से मामले की सुनवाई कर निर्णय देने का आग्रह किया। पीठ ने संकेत दिया कि यदि वह मामले की सुनवाई करती है, तो उसके आदेश का उल्लंघन करने के लिए अवमानना नोटिस जारी करना होगा। न्यायालय ने कहा कि याचिका के साथ दायर की गई तस्वीरों से पता चलता है कि उसके आदेश के बावजूद खुदाई की गई और पक्षों को पहले अवमानना नोटिस का जवाब देना होगा। इसके बाद न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह मुख्य न्यायाधीश से निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दे। यह है विवाद 11वीं शताब्दी का यह स्मारक हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद का केंद्र है। हिंदुओं का मानना है कि यह देवी वाग्देवी का मंदिर है, जो देवी सरस्वती का अवतार हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। 11 मार्च को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एएसआई को छह सप्ताह में भोजशाला परिसर का 'वैज्ञानिक सर्वेक्षण' करने का निर्देश दिया था। recent visitors 80

मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाने की खबर निराधार: हाई कोर्ट

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट प्रशासन ने हाल ही में मुख्य न्यायाधीश एस.के. कैत के आधिकारिक बंगले से मंदिर हटाए जाने के दावे वाली खबरों का खंडन किया है। प्रशासन ने यह साफ किया है कि ऐसी खबरें पूरी तरह से आधारहीन, झूठी और गुमराह करने वाली हैं। कोर्ट ने इसे न्याय के काम में दखल मानते हुए गलत कहा है, मीडिया और लोगों से ऐसी बातें न फैलाने की अपील भी की है। यह भी कहा है कि ऐसी बातें न्यायपालिका की इज्जत को ठेस पहुंचाने की कोशिश है। मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाने की खबरें झूठी इस मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल धर्मिंदर सिंह ने एक बयान में मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाई जाने वाली खबरों को झूठा ठहराया है। उन्होंने बताया है कि लोक निर्माण विभाग ने भी पुष्टि की है, की मुख्य न्यायाधीश की आवास पर कोई भी मंदिर नहीं था। इस तरह की अफवाहें और खबरें सिर्फ और सिर्फ जनता को गुमराह करने की कोशिश करती हैं, और न्यायपालिका की छवि को खराब करने के लिए फैलाई जा रही है। हाई कोर्ट ने अपने बयान में कहा है कि न्यायपालिका के खिलाफ झूठी और गुमराह बातें फैलाने का प्रयास न केवल कानून व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता और उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है।     मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के बंगले के अंदर मंदिर की खबरें झूठी, भ्रामक और निराधार, रजिस्ट्रार जनरल ने किया खंडन रिपोर्ट्स का खंडन इन निराधार रिपोर्ट्स का सिर्फ और सिर्फ एक ही उद्देश्य लगता है, और वह है न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना। जबकि हमारी न्यायपालिका निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ न्याय देने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इसी तरह अदालत ने मीडिया संगठनों और आम जनता से अपील की है कि वे ऐसी अपमानजनक और झूठी जानकारी को फैलाने से बचें और न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखने में मदद करें। recent visitors 65