₹3,754 का UPS ₹11,247 में खरीदा! चार फर्मों ने आपस में लगाई बोली, MP में ₹10.99 करोड़ का कंप्यूटर खरीदी घोटाला,,,,

A UPS worth ₹3,754 was purchased for ₹11,247! Four firms bid among themselves, revealing a ₹10.99 crore computer purchase scam in Madhya Pradesh. टेंडर सितंबर में निकला, कंप्यूटर जुलाई में ही इंस्टॉल! चार फर्मों के कथित कनेक्शन और तकनीकी गड़बड़ियों पर EOW की FIR ने सरकारी खरीद व्यवस्था की खोली पोल सरकारी खजाने पर भारी पड़ती खरीदी! GeM कीमत से करीब तीन गुना भुगतान, लोकल SSD और संदिग्ध मॉडल की सप्लाई के आरोप; सवाल—करोड़ों की खरीद में जिम्मेदार अधिकारी सो रहे थे या सब कुछ नजरअंदाज किया गया? Sub Editor: Kamlesh  भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी धन के इस्तेमाल और खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगा दिया है। सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग में वर्ष 2024 में हुई करीब 10.99 करोड़ रुपये की कंप्यूटर, प्रिंटर और UPS खरीदी को लेकर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने FIR दर्ज की है। जांच में सामने आई कथित अनियमितताओं ने सरकार की टेंडर व्यवस्था, विभागीय निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस UPS की GeM पर कीमत करीब ₹3,754 बताई गई, उसके लिए विभाग ने कथित तौर पर ₹11,247 प्रति नग का भुगतान किया। यानी सरकारी खरीद में कीमत करीब तीन गुना तक पहुंच गई। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि सामान महंगा खरीदा गया या नहीं—सवाल यह है कि सरकारी खजाने से भुगतान होने से पहले कीमतों की जांच किसने की? GeM पर ₹3,754, सरकारी खरीद में ₹11,247—किसके फायदे का सौदा? UPS की कीमतों में सामने आया कथित अंतर इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। जांच के अनुसार GeM पर जिस UPS की कीमत करीब ₹3,754 थी, उसी के लिए विभाग ने ₹11,247 प्रति नग का भुगतान किया। वहीं UPS के डिब्बे पर ₹6,086 कीमत अंकित होने की बात भी सामने आई। अगर जांच में यह मूल्य अंतर सही पाया जाता है, तो सरकारी खरीद प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता के पैसे से खरीदी में बाजार मूल्य और GeM दर की तुलना क्यों नहीं हुई? इतनी बड़ी कीमत पर भुगतान को मंजूरी किस स्तर पर दी गई? टेंडर सितंबर में… कंप्यूटर जुलाई में ही इंस्टॉल! मामले का सबसे विस्फोटक बिंदु कंप्यूटरों की इंस्टॉलेशन तारीख से जुड़ा है। उपलब्ध वारंटी रिकॉर्ड में कंप्यूटरों की इंस्टॉलेशन तारीख 22 जुलाई 2024 दर्ज होने की बात सामने आई है, जबकि खरीद के लिए टेंडर 23 सितंबर 2024 को जारी किया गया था। यानी रिकॉर्ड के मुताबिक टेंडर आने से करीब दो महीने पहले ही कंप्यूटर इंस्टॉल हो चुके थे। यह सामान्य तकनीकी गलती है, रिकॉर्ड में त्रुटि है या खरीद प्रक्रिया में पहले से सब कुछ तय था—इसका जवाब जांच में सामने आना बाकी है। लेकिन सरकार से सवाल तो बनता है— जब टेंडर ही सितंबर में आया, तो जुलाई में कंप्यूटर किस आदेश पर और किस प्रक्रिया के तहत इंस्टॉल हुए? चार फर्में… और कथित तौर पर आपसी कनेक्शन EOW ने मामले में रणधीर कुमार पटेल की मेसर्स साईं बाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, हेमलता पटेल की मेसर्स शांति ट्रेडर्स, अशोक कुमार सिंह की मेसर्स HTM India और देवेंद्र सिंह की मेसर्स सूरज इंटरप्राइजेज से जुड़े लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। जांच एजेंसी के अनुसार इन फर्मों के बीच कारोबारी संबंधों के संकेत मिले हैं। GST रिकॉर्ड में शांति ट्रेडर्स और साईं बाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का एक ही मोबाइल नंबर पाए जाने की बात सामने आई है। वहीं HTM India की ई-मेल आईडी और भोपाल स्थित अतिरिक्त कार्यालय के पते को भी साईं बाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से जुड़ा पाया गया। अगर चारों कंपनियां अलग-अलग और स्वतंत्र बोलीदाता थीं, तो ये समानताएं कैसे सामने आईं? और यदि इनके बीच कारोबारी संबंध थे, तो टेंडर प्रक्रिया में स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या ‘प्रतिस्पर्धा’ सिर्फ कागजों पर थी? EOW की जांच में यह भी सामने आने की बात कही गई है कि ये फर्में GeM के कई अन्य टेंडरों में भी साथ-साथ बोली लगाती रही थीं। कुछ टेंडरों में बोली दरों में कम अंतर और अलग-अलग मौकों पर इन्हीं फर्मों में से किसी एक को काम मिलने की जानकारी की भी जांच की जा रही है। यदि जांच में कृत्रिम प्रतिस्पर्धा या मिलीभगत साबित होती है, तो मामला सिर्फ एक विभागीय खरीदी का नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी ई-टेंडरिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे। नए कंप्यूटरों में लोकल SSD? विभागीय तकनीकी कमेटी की जांच में कुछ कंप्यूटरों में टेंडर की निर्धारित शर्तों के विपरीत RAM और स्टोरेज डिवाइस मिलने की बात सामने आई। कुछ Acer कंप्यूटरों में निर्धारित ब्रांड की SSD के स्थान पर लोकल कंपनी की SSD लगी होने की जानकारी भी सामने आई है। यानी जिस सामान के लिए सरकार ने तकनीकी शर्तें तय की थीं, क्या विभाग को उसी स्पेसिफिकेशन का सामान मिला? अगर नहीं मिला, तो तकनीकी सत्यापन के समय इसे किसने पास किया? सरकार से पांच सीधे सवाल 1. ₹3,754 वाले UPS के लिए ₹11,247 भुगतान की मंजूरी कैसे मिली? 2.सितंबर के टेंडर से पहले जुलाई में कंप्यूटर इंस्टॉल कैसे हो गए? 3. चारों फर्मों के कथित आपसी कनेक्शन की टेंडर से पहले जांच क्यों नहीं हुई? 4. निर्धारित स्पेसिफिकेशन के बजाय लोकल SSD मिलने के बावजूद सप्लाई कैसे स्वीकार हुई? 5. करोड़ों की खरीद में विभागीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया क्या थी? EOW की FIR के बाद असली परीक्षा सरकार की EOW ने FIR दर्ज कर दी है और जांच आगे बढ़ रही है। अभी आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। लेकिन मामला सरकार के लिए इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें सवाल सीधे सरकारी पैसे, खरीद प्रक्रिया और विभागीय निगरानी से जुड़े हैं। अब सिर्फ फर्मों की भूमिका की जांच काफी नहीं होगी। जनता यह जानना चाहेगी कि करोड़ों रुपये की इस खरीद को मंजूरी देने से लेकर सामान की गुणवत्ता जांचने और भुगतान जारी करने तक कौन-कौन से अधिकारी जिम्मेदार थे। सरकार यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करती है, तो इस मामले में भी दोषी चाहे सप्लायर हो या जिम्मेदार अधिकारी—जांच निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़नी चाहिए … Read more

विकास कार्य करवाए बिना सरपंच-सचिव डकार गए 23 लाख , EOW ने गबन का किया खुलासा, FIR दर्ज

Sarpanch and Secretary embezzled Rs 23 lakh without carrying out development work; EOW exposed the embezzlement and registered an FIR. जबलपुर ! मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में लाखों की सरकारी राशि के गबन का मामला सामने आया है। विकास कार्य कराए बिना ही सरपंच और सचिव ने 23 लाख रूपये का गबन किया। ईओडब्ल्यू ने जांच के बाद दोनों आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी व भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अलग-अलग धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर ली है। ईओडब्ल्यू से मिली जानकारी के अनुसार मामला मंडला जिले के ग्राम बरखेड़ा का है। यहां के तत्कालीन सरपंच बीरन सिंह काकोडिया और सचिव मिथलेश उददे के खिलाफ शिकायत मिली थी। इसमें विकास कार्य के नाम पर राशि के दुरुपयोग की बात कही गई थी। ईओडब्ल्यू ने जांच में पाया कि ग्राम पंचायत बरखेड़ा में साल 2014 से 2022 तक विभिन्न निर्माण कार्यो के लिए राशि का आवंटन सरकार के द्वारा किया गया है। कागजों में बनी सड़कें और नाली-पुलियाइस दौरान तत्कालीन सरपंच और सचिव ने विकास कार्यों को कागजों में दिखाते हुए बिना निर्माण कराए 22 लाख 87 हजार रूपये की शासकीय राशि का गबन किया है। सरपंच और सचिव ने अपने 6 वर्षों के कार्यकाल में गांव में सीसी रोड,चौपाल सभा निर्माण,पुलिया एव नाली निर्माण,पंचायत भवन मरम्मत सहित 9 प्रकार के कार्यों में उक्त राशि का गबन किया गया है। यह कार्य वास्तव में नहीं हुए थे और कागजों में दिखाये गये थे। ईओडब्ल्यू ने जांच के पाया कि दोनों आरोपियों ने पद का दुरुपयोग करते हुए शासकीय राशि का दुरुपयोग किया है। साथ ही विकास कार्यों के फर्जी दस्तावेज पेश किए गए हैं। ईओडब्ल्यू ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया है। recent visitors 88

EOW की टीम ने कि बड़ी कार्यवाही: सहायक राजस्व अधिकारी और प्रभारी बिल कलेक्टर को 40 हजार की रिश्वत लेते पकड़ाए

EOW की टीम ने कि बड़ी कार्यवाही: सहायक राजस्व अधिकारी और प्रभारी बिल कलेक्टर को 40 हजार की रिश्वत लेते पकड़ाए

EOW team major action: Assistant Revenue Officer and In-charge Bill Collector caught accepting bribe of 40 thousand rupees इंदौर ! मध्यप्रदेश में रिश्वतखोर अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई का सिलसिला लगातार जारी है। लगभग हर दूसरे दिन कहीं न कहीं EOW और लोकायुक्त रिश्वतखोर अधिकारी-कर्मचारियों को रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों पकड़ रही है लेकिन इसके बावजूद रिश्वतखोर बाज आते नजर नहीं आ रहे हैं। ताजा मामला मध्यप्रदेश के इंदौर जिले का है जहां सहायक राजस्व अधिकारी को 40 हजार रूपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया है। इस मामले में प्रभारी बिल कलेक्टर को भी आरोपी बनाया गया है। सील गोदाम को दोबारा खोलने के बदले मांगी रिश्वतशिकायतकर्ता संतोष सिलावट निवासी गीता नगर इंदौर ने 01 अक्टूबर को ईओडब्लयू कार्यालय इंदौर में शिकायत की थी कि उसके गोदाम को निगम के राजस्व अधिकारी द्वारा नोटिस चस्पा कर सील कर दिया गया है और अब सील गोदाम को खोलने हेतु पुनीत अग्रवाल सहायक राजस्व अधिकारी नगर पालिका निगम झोन-19 एवं रोहित साबले, प्रभारी बिल कलेक्टर, राजस्व विभाग, नगर पालिका निगम, झोन क्रमांक 19 उससे 40 हजार रूपये रिश्वत की मांग कर रहे हैं EOW ने रिश्वत लेते पकड़ाफरियादी संतोष पटेल की शिकायत की जांच के बाद EOW ने रिश्वतखोर अधिकारियों को पकड़ने के लिए जाल बिछाया। 3 अक्टूबर को फरियादी संतोष सिलावट को रिश्वत के 40 हजार रूपये देने के लिए सहायक राजस्व निरीक्षक पुनीत अग्रवाल के पास भेजा गया। सहायक राजस्व अधिकारी पुनीत अग्रवाल ने नगर पालिका निगम जोन-19 के दफ्तर में रिश्वत देने के लिए फरियादी को बुलाया और जैसे ही वहां उसने व प्रभारी बिल कलेक्टर रोहित साबले ने रिश्वत की रकम की तो EOW की टीम ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया। recent visitors 117

हैंडपंप मेंटेनेंस का बिल पास करने मांगें 24 हजार रु.; EOW ने कार्यपालन यंत्री और क्लर्क को किया गिरफ्तार 

Demanded 24 thousand rupees to pass the bill of hand pump maintenance; EOW arrested the executive engineer and clerk  जितेन्द्र श्रीवास्तव विशेष संवाददाता  जबलपुर । आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो (EOW) की टीम ने बुधवार को पीएचई विभाग में पदस्थ कार्यपालन यंत्री को 24 हजार रुपए की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया है। EOW की टीम ने अकाउंटेंट क्लर्क को भी पकड़ा है। कार्यपालन यंत्री ने हैंडपंप मेंटेनेंस का बिल पास करने के लिए ठेकेदार से रिश्वत मांगी थी। दमोह के रहने वाले ठेकेदार रोहित बरौलिया ने सिहोरा ब्लॉक में हैंडपंप मेंटेनेंस का काम लिया था। जिसे पूरा करने के बाद उन्होंने दमोह नाका स्थित मुख्य कार्यालय में 2 लाख 47 हजार रुपए का बिल लगाया था। बिल पास करने के लिए कार्यपालन यंत्री द्वारा 10% रिश्वत की मांग की जा रही थी। जिसकी शिकायत रोहित ने जबलपुर आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो के एसपी अनिल विश्वकर्मा से लिखित में शिकायत दी। शिकायकर्ता का कहना है कि उसने सिहोरा ब्लॉक के कई क्षेत्रों में हैंडपंप मेंटेनेंस का काम किया था। उसका बिल पास करवाने के लिए कार्यपालन यंत्री शरद कुमार सिंह और क्लर्क विकास पटेल 24 हजार रुपए मांग रहे थे। यह काम का 10 प्रतिशत होता है। शिकायत का सत्यापन करने के बाद बुधवार दोपहर को EOW ने यह ने कार्रवाई की ।  recent visitors 108