कई दुकानों में पहुंचा बेहद खराब क्वालिटी का खाद्यान्न, पीडीएस के जिम्मेदार अधिकारी अनजान

कई दुकानों में पहुंचा बेहद खराब क्वालिटी का खाद्यान्न, पीडीएस के जिम्मेदार अधिकारी अनजान

Very poor quality food grains reached many shops, PDS officials are unaware सिंगरौली । सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सस्ती कीमतों पर गरीबों को मिलने वाले खाद्यान्न वितरण की क्वालिटी भी सवालों के घेरे में आ गई है। बैढ़न ब्लॉक के कई शासकीय उचित मूल्य दुकानों में तीन महीने के लिए पहुंचा खाद्यान्न बेहद खराब है। जहां हितग्राही खाद्यान्न लेने में आनाकानी कर रहे हैं। वही जिम्मेदार अधिकारी उक्त मामले में अनजान हैं।गौरतलब है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को सस्ते दर पर राशन देने का निर्देश है। जिसमें जमकर भर्रेशाही मची हुई है। आरोप है कि जिला खाद्य अमला इस निरंकुश व्यवस्थाओं पर अंकुश लगाने में अब तक नाकाम रहा है। एक ओर जहां आये दिन शिकायते मिलती रहती हैं कि गरीबों को खाद्यान्न दो-दो, तीन-तीन महीने का वितरण विके्रताओं के द्वारा नही किया जाता है और ई-केवाईसी समेत आवंटन न मिलने का बहाना बताकर गरीब परिवारों को वैरंग लौटा दिया जाता है। जबकि गोदाम एवं स्टॉक पंजी में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध भी रहता है। यह तो कहानी विके्रताओं की है। वही अब राशन दुकानों में बेहद खराब क्वालिटी के गेहूॅ-चावल का परिवहन राशन दुकानों में किया गया है। बताया जाता है कि बैढ़न इलाके के कई दुकानों में अत्यंत घटिया किस्म के चावल-गेहूं का भण्डारण किया गया है। जिसे लेने में उपभोक्ता लेने में आनाकानी कर तरह-तरह के सवाल खड़े करते हुये यह कहते नजर आ रहे हैं कि जब पीडीएस का खाद्यान्न गुणवत्ता युक्त देने का निर्देश है, फिर यह घटिया चावल-गेहूं कहां से आ गया। सरकार एवं प्रशासन खाद्यान्न वितरण के नाम पर केवल कोरम पूर्ति कर अपनी पीठ थपथपाने में लगा हुआ है। गरीबों को किस तरह का खाद्यान्न मिल रहा है उसको देखने एवं सुनने वाला कोई नही है।तीन महीने का दुकानों के गोदामों में पहुंचा है राशनजानकारी के मुताबिक कलेक्टर चन्द्रशेखर शुक्ला का निर्देश है बरसात सीजन को देखते हुये तीन महीने का एक साथ राशन दुकानों के गोदामों में भण्डारण का जून से अगस्त महीने तक वितरण कराया जाना है। जहां खाद्यान्नों का वितरण भी शुरू हो गया है। लेकिन खाद्यान्न गेहूं-चावल की क्वालिटी को देखकर हर कोई सक्श कोस रहा है। बैढ़न कस्बे के आसपास के उपभोक्ताओं ने यहां तक कहा कि उक्त खाद्यान्न को अधिकारी चख कर देखे तो पता चल जायेगा। यह खाद्यान्न इतना घटिया है कि देखते ही मन उचट जाता है। इतना घटिया खाद्यान्न मिलों में कैसे पहुंचा, इसकी जवाबदेही किसकी है और क्या ऐसे लापरवाहों पर कार्रवाई होगी?विंध्या एग्रो इण्ड्रस्ट्रीज के मिल से पहुंचा है खाद्यान्नजानकारी के मुताबिक बैढ़न मुख्यालय के आसपास के शासकीय उचित मूल्य दुकानों में गेहूं विंध्या एग्रो इण्ड्रस्ट्रीज उद्योग दीप बैढ़न के मिल से परिवहन किया गया है। जिसमें एमपी स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन लिमिटेड सिंगरौली के मद 2024-25 के प्रत्येक बोरिया में टैग भी लगा हुआ है और टैग में राइस की स्थिति क्या है, उसमें एनर्जी, सूगर, बिटामिन की मात्रा कितनी है, उसका विधिवत जिक्र है। अब सवाल उठता है कि उचित मूल्य दुकानों में सिर्फ गुणवत्ता विहीन जिसे देखने लायक भी नही है, वह दुकानों में कैसे पहुंचा। अब चर्चा यह है कि केवल टैग लगाकर राइस के बेहतर क्वालिटी बताया जा रहा है। जबकि मामला कुछ और है। इनका कहना:-अभी मैं अवकाश पर हू। ऐसी कोई शिकायत मेरे पास नही आई है और ऐसा हो भी नही सकता है कि गुणवताविहीन खाद्यान्न वितरण के लिए दिया जाये। अवकाश से आने के बाद देखता हॅू।पीसी चन्द्रवंशीजिला खाद्य अधिकारी, सिंगरौली recent visitors 199

क्या आपकी प्राइवेसी खतरे में है? सोशल मीडिया, सरकार और निगरानी की सच्चाई

क्या आपकी प्राइवेसी खतरे में है? सोशल मीडिया, सरकार और निगरानी की सच्चाई

Is your privacy at risk? The truth about social media, government and surveillance Is your privacy at risk आज हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ सूचना ही शक्ति है — लेकिन ये शक्ति अब आम नागरिकों के हाथ से निकलकर सरकारों, कॉर्पोरेशनों और डेटा एग्रीगेटिंग प्लेटफॉर्म्स के पास चली गई है। हमने अपनी मर्जी से, बिना कुछ समझे, सोशल मीडिया पर वह सब साझा कर दिया जो कभी सिर्फ घर की चारदीवारी में सुरक्षित था। फोटो, लोकेशन, पसंद-नापसंद, रिश्ते, विचार—हर चीज़ हमने पोस्ट की, लाइक की, शेयर की। शुरू में ये एक आज़ादी जैसी लगी, लेकिन यह आज़ादी धीरे-धीरे एक जाल में बदल गई। Is your privacy at risk जब हम अपनी निजी ज़िंदगी का डिजिटल खाका खुद ही खींच रहे थे, तब न सरकारें दिखती थीं और न ही राजनीतिक एजेंडा। पर जैसे ही यह डेटा बढ़ा, सरकारें चौकन्नी हुईं, निगरानी शुरू हुई और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इसे मॉनेटाइज करना शुरू कर दिया। अब यह डेटा हमारे खिलाफ हथियार बन चुका है। Read more: भगवान बिरसा मुंडा की 125वीं पुण्यतिथि वेब स्टोरी आज का यथार्थ यही है कि सोशल मीडिया पर दी गई हर जानकारी का इस्तेमाल हमारी मानसिकता को प्रभावित करने, हमें उपभोक्ता में बदलने और कभी-कभी राजनीतिक टूल बनाने तक में हो रहा है। यह न केवल व्यक्ति की निजता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के लिए भी खतरा है। हमें यह समझना होगा कि Is your privacy at risk प्राइवेसी कोई सुविधा नहीं, बल्कि एक मूलभूत अधिकार है। जब तक हम इसके महत्व को नहीं समझेंगे, तब तक हम और हमारा समाज लगातार नियंत्रण में आता जाएगा। हमें खुद तय करना होगा कि हम तकनीक का इस्तेमाल करेंगे या तकनीक हमारा इस्तेमाल करेगी। प्राइवेसी ही पावर है। यही वह शक्ति है जो हमें सवाल पूछने, सोचने और चुनने की आज़ादी देती है। इसे समझना, इसकी रक्षा करना आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। यदि आप इस विषय में जागरूकता फैलाना चाहते हैं, तो इस लेख को अधिक से अधिक साझा करें — क्योंकि सोच तभी बचेगी जब निजता बचेगी। recent visitors 115

कन्नौद में तहसीलदार अंजलि गुप्ता की तानाशाही: किसानों और महिलाओं के साथ बर्बरता, सरकार पर उठे सवाल

कन्नौद में तहसीलदार अंजलि गुप्ता की तानाशाही: किसानों और महिलाओं के साथ बर्बरता, सरकार पर उठे सवाल

Dictatorship of Tehsildar Anjali Gupta in Kannaud: Brutality with farmers and women, questions raised on the government कन्नौद से आई यह खबर न सिर्फ दिल को झकझोरती है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। मामूली तहसीलदार अंजलि गुप्ता द्वारा किसानों और महिलाओं के साथ की गई बदसलूकी, धक्का-मुक्की और थाने तक भिजवाने जैसी घटनाएं कहीं से भी एक लोकसेवक के आचरण को उचित नहीं ठहरातीं। यह मामला न केवल कन्नौद की स्थानीय राजनीति का विषय है, बल्कि यह पूरे प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह है। किसान: व्यवस्था के शिकाररेलवे जमीन अधिग्रहण के नाम पर किसानों को जिस तरह से डराया और धमकाया जा रहा है, वह लोकतंत्र में अक्षम्य है। किसान, जो इस देश की रीढ़ माने जाते हैं, अगर उन्हीं को सरकारी व्यवस्था अपमानित करने लगे तो यह लोकतंत्र की बुनियाद को हिला देने वाला कदम है। अंजलि गुप्ता की कार्यशैली यह बताने के लिए काफी है कि प्रशासन में बैठे कुछ अफसर आज भी खुद को राजा समझते हैं और जनता को रियाया। महिला विरोधी रवैया, कानून की अवहेलनातहसीलदार द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और हाथापाई की खबरें बेहद चिंताजनक हैं। ऐसे समय में जब सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, महिला सशक्तिकरण जैसे अभियानों को आगे बढ़ा रही है, तब एक महिला अफसर द्वारा महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार पूरे अभियान की भावना को झुठलाता है। पुलिस वैन में महिलाओं को भरकर थाने भेजना, उनके सम्मान को ठेस पहुंचाना — यह सब सत्ता की अमानवीयता को दर्शाता है। यह कोई पहली बार नहींसोनकच्छ में भी पहले अंजलि गुप्ता पर किसानों से अभद्रता का आरोप लग चुका है, और वहां भी जनदबाव में सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा था। पर क्या एक बार चेतावनी देकर अफसरों को छोड़ देना ही समाधान है? क्या यह न्याय है कि जनता बार-बार अपमानित हो और अफसर बच निकलें? मुख्यमंत्री से अपील: तुरंत सख्त कदम उठाएंप्रदेश के मुखिया के तौर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अपेक्षा की जाती है कि वे इस घटनाक्रम पर त्वरित संज्ञान लें और अंजलि गुप्ता को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर निष्पक्ष जांच के आदेश दें। यदि इस प्रकार की तानाशाही और दमनकारी प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह जनता का प्रशासन से विश्वास उठने जैसा होगा। जनता का आक्रोश, सरकार के लिए खतराजनता के मन में गुस्सा और आक्रोश दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। किसान आंदोलन की संभावनाएं प्रबल हो रही हैं, और यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला सरकार की छवि पर गहरे दाग छोड़ सकता है। यह लोकतंत्र है, न कि तानाशाही का अड्डा। कन्नौद की घटना सिर्फ एक तहसीलदार की गलती नहीं है, यह एक व्यवस्था के असंवेदनशील होने का प्रमाण है। अब वक्त है कि सरकार केवल घोषणाएं न करे, बल्कि जमीन पर उतरकर ऐसे अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई करके एक मिसाल पेश करे। प्रशासन अगर जनता की सेवा नहीं कर सकता, तो उसे सत्ता में बने रहने का कोई हक नहीं। recent visitors 241

परवरिश: मोबाइल की लत बच्चों के भविष्य पर भारी, जानें इससे छुटकारा पाने के उपाय

परवरिश: मोबाइल की लत बच्चों के भविष्य पर भारी, जानें इससे छुटकारा पाने के उपाय

Parenting: Mobile addiction is harmful for children’s future, know the ways to get rid of it क्या आपका बच्चा मोबाइल के बिना रह सकता है?Mobile addiction for children future आज यह सवाल हर माता-पिता के मन में गूंज रहा है। तकनीक के इस दौर में मोबाइल बच्चों की जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है, मानो उनका एक नया अंग हो। चाहे भोजन हो, पढ़ाई या आराम का समय हर क्षण मोबाइल उनके साथ है। यह डिजिटल डिवाइस केवल उनके शरीर को ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक विकास को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। बच्चों पर मोबाइल का असर: सिर्फ आंखें नहीं, पूरी सोच पर असर Mobile addiction for children future धैर्य में गिरावट:स्क्रीन पर मिलने वाला त्वरित मनोरंजन बच्चों को अधीर बना रहा है। किसी भी असफलता या देरी पर वे गुस्से में आ जाते हैं। माता-पिता या शिक्षकों की मामूली बात भी उन्हें आहत कर देती है। एकाग्रता में कमी:लगातार आने वाले नोटिफिकेशन्स और ऑनलाइन एक्टिविटी बच्चों की एकाग्रता को कमजोर कर रही है। वे लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान नहीं दे पाते। संवादहीनता और सामाजिक दूरी:मोबाइल की लत बच्चों को परिवार और दोस्तों से दूर कर रही है। अब वे भावनाओं को शब्दों में नहीं, इमोजी में बयां करते हैं। इसका असर उनके आत्मविश्वास, भाषा कौशल और सामाजिकता पर पड़ रहा है। ऑनलाइन गेमिंग और मानसिक स्वास्थ्य:गेमिंग ऐप्स बच्चों के लिए एक नशे की तरह बन चुके हैं। लेवल पार करने का जुनून, पैसे हारने का डर और त्वरित सफलता की उम्मीद उन्हें तनाव, एंग्ज़ायटी और यहां तक कि आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम तक ले जा रही है। Read More: ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंसते युवा: कर्ज, लत और तबाही की ओर ले जाते ऐप्स, सरकार की चुप्पी चिंता का कारण नींद और शारीरिक समस्याएं:देर रात तक स्क्रीन देखने से मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर बिगड़ता है, जिससे नींद की गुणवत्ता घटती है। इससे चिड़चिड़ापन, मोटापा और आंखों की समस्याएं जैसे डिजिटल आई स्ट्रेन और दृष्टि दोष उत्पन्न होते हैं। अभिभावकों की भूमिका: शुरुआत घर से ही होती हैआमतौर पर मोबाइल की लत के बीज माता-पिता ही बोते हैं—कभी बच्चे को चुप कराने के लिए, तो कभी उसे व्यस्त रखने के लिए। एक साल के बच्चे को मोबाइल पर राइम्स दिखाना आज सामान्य बात हो गई है। फिर जब वही बच्चा 12-13 साल में मोबाइल मांगता है, तो माता-पिता उसे रोक नहीं पाते। समाधान: स्क्रीन से दूरी, जीवन से जुड़ाव स्क्रीन टाइम तय करें:परिवार में मोबाइल उपयोग का एक साझा नियम बनाएं। बच्चे को 15 साल की उम्र तक अपना व्यक्तिगत मोबाइल न दें। मैदानी खेल और आउटडोर एक्टिविटी:हर दिन कम से कम दो घंटे बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी में व्यस्त रखें। फैमिली आउटिंग में मोबाइल ले जाना प्रतिबंधित करें। बातचीत और समय:बच्चों से बात करें, उनकी समस्याएं समझें। जब वो आपकी बात सुनते हैं, तो आप भी उनकी दुनिया से जुड़ पाते हैं। तकनीक से नहीं, रिश्तों से जुड़ाव बढ़ाएं:उन्हें यादें लिखने के लिए प्रेरित करें, न कि इंस्टाग्राम पर पोस्ट करने के लिए। मोबाइल कोई बुरा उपकरण नहीं है, लेकिन उसके गलत इस्तेमाल ने बच्चों को मानसिक, शारीरिक और सामाजिक रूप से नुकसान पहुंचाया है। माता-पिता यदि आज सतर्क नहीं हुए, तो कल बहुत देर हो जाएगी। सही परवरिश तकनीक से नहीं, समय और समझ से होती है। Tag: Parenting, Screen Addiction, Children Mental Health, Digital Detox recent visitors 206

ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंसते युवा: कर्ज, लत और तबाही की ओर ले जाते ऐप्स, सरकार की चुप्पी चिंता का कारण

ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंसते युवा: कर्ज, लत और तबाही की ओर ले जाते ऐप्स, सरकार की चुप्पी चिंता का कारण

Youth getting caught in the trap of online gaming: Apps leading to debt, addiction and destruction, government’s silence is a cause of concern नई दिल्ली ! online gaming a government’s silence देश में ऑनलाइन फैंटेसी गेमिंग और ऑनलाइन गैंबलिंग प्लेटफॉर्म्स का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है, और इसके चपेट में लाखों युवा आ चुके हैं। जल्दी अमीर बनने का सपना, उन्हें एक ऐसे रास्ते पर धकेल रहा है जहाँ लत, कर्ज और कई बार आत्महत्या जैसे खतरनाक परिणाम सामने आ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई मामलों में सामने आया है कि युवा बार-बार इन ऐप्स पर पैसा लगाते हैं, हारते हैं, कर्ज लेते हैं और अंततः मानसिक अवसाद में चले जाते हैं। कई युवाओं ने तो कर्ज के बोझ तले आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम तक उठा लिया है। सरकार की नीतियों पर उठते सवाल online gaming a government’s silence प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने डिजिटल इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया”, और “मेक इन इंडिया जैसे अभियानों से युवाओं को नए भारत का सपना दिखाया था, लेकिन हकीकत यह है कि न नई नौकरियों का ठोस रोडमैप सामने आया, न तकनीकी शिक्षा को लेकर ठोस सुधार। सरकार की ओर से इन ऑनलाइन गेमिंग और गैंबलिंग प्लेटफॉर्म्स को अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता मिलने और इन पर किसी भी स्पष्ट नियमन की कमी से हालात और खराब हो रहे हैं। क्या चाहिए ठोस नीति और सख्त नियंत्रण online gaming a government’s silence विशेषज्ञों और अभिभावकों का कहना है कि इन ऐप्स को लेकर स्पष्ट और सख्त कानून बनाए जाने चाहिए, ताकि युवा इन लतों से दूर रहें और उनका भविष्य सुरक्षित हो।सवाल यह है कि जब युवाओं को इस देश का भविष्य कहा जाता है, तो फिर सरकार कब इन ऐप्स की लूट पर लगाम लगाएगी? Read More: कर्नल सोफिया केस में नया मोड़: मंत्री विजय शाह को एसआईटी भेजेगी नोटिस, जल्द होगी पूछताछ मुख्य बिंदु वित्तीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार ने शीघ्र ठोस क़दम नहीं उठाए, तो डिजिटल गैंबलिंग से जुड़ा सामाजिक-आर्थिक संकट और गहराएगा। उद्योग का आकार जितना बड़ा होगा, उतना ही मुश्किल होगा इसे नियंत्रित करना। निष्कर्ष: तेज़ टेक्नोलॉजी और सुस्त नीति के बीच फँसते युवाओं को बचाने के लिए कई मंत्रालयों की समन्वित रणनीति और सख़्त नियम अनिवार्य हैं। वरना “डिजिटल इंडिया” का सपना, कर्ज़ और लत की स्याही से धुँधला हो सकता है। recent visitors 118

कर्नल सोफिया केस में नया मोड़: मंत्री विजय शाह को एसआईटी भेजेगी नोटिस, जल्द होगी पूछताछ

कर्नल सोफिया केस में नया मोड़: मंत्री विजय शाह को एसआईटी भेजेगी नोटिस, जल्द होगी पूछताछ

New twist in Colonel Sofia case: SIT will send notice to Minister Vijay Shah, interrogation will take place soon भोपाल। कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए गए कथित विवादास्पद बयान मामले में अब मंत्री विजय शाह से पूछताछ की तैयारी तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच टीम (SIT) जल्द ही विजय शाह को नोटिस भेजकर उनका बयान दर्ज करेगी। सूत्रों के अनुसार, अब तक की जांच रिपोर्ट में विजय शाह के कथनों को शामिल नहीं किया गया था। लेकिन जांच के अगले चरण में SIT महू का दौरा दोबारा करेगी और बयान से संबंधित वीडियो की भी गहन जांच होगी। यह वीडियो फिलहाल भोपाल स्थित सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री (CFSL) में परीक्षणाधीन है, ताकि उसकी प्रमाणिकता की पुष्टि हो सके। इससे पहले यह वीडियो रीजनल फॉरेंसिक लैब में भेजा गया था, लेकिन तकनीकी कारणों से वहाँ इसकी जांच संभव नहीं हो पाई थी। इधर, पुलिस मुख्यालय (PHQ) से मिली जानकारी के मुताबिक, SIT प्रमुख प्रमोद वर्मा का हाल ही में तबादला सागर से जबलपुर कर दिया गया है। हालांकि, SIT के नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं किया गया है और प्रमोद वर्मा ही टीम की कमान संभालते रहेंगे। recent visitors 99

कैबिनेट से दूरी या दबाव? मंत्री विजय शाह की लगातार तीसरी अनुपस्थिति

कैबिनेट से दूरी या दबाव? मंत्री विजय शाह की लगातार तीसरी अनुपस्थिति

Distance from the cabinet or pressure? Minister Vijay Shah’s absence for the third time in a row भोपाल। मध्यप्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह लगातार तीसरी बार कैबिनेट बैठक से अनुपस्थित रहे हैं। उनकी गैरमौजूदगी ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब वे कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिए गए विवादित बयान** को लेकर जांच के घेरे में हैं। कैबिनेट की इस अहम बैठक में एक बार फिर विजय शाह की कुर्सी खाली रहना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय ने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए स्पष्ट निर्देश दिए थे, बावजूद इसके शाह की लगातार अनुपस्थिति कई तरह के सवाल खड़े कर रही है। क्या है सोफिया कुरैशी विवाद? गौरतलब है कि कुछ समय पहले विजय शाह ने सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर एक टिप्पणी की थी, जिसे लेकर न केवल विपक्ष, बल्कि आम जनता और महिला संगठनों में भी नाराजगी देखी गई। इस मामले की जांच फिलहाल जारी है और यह अटकलें तेज हैं कि जांच की गंभीरता को देखते हुए शाह खुद को फिलहाल सार्वजनिक मंचों से दूर रख रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज विजय शाह मध्यप्रदेश के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं और पूर्व में वन मंत्री के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। लेकिन अब तीन बार लगातार कैबिनेट मीटिंग से नदारद रहना उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी अटकलें बढ़ा रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर जांच में कोई ठोस निष्कर्ष निकलता है, तो पार्टी नेतृत्व उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। recent visitors 137