बच्चों की विशेष सभा में अंतरिक्ष यात्री शुभांशु की सकुशल वापसी का स्वागत

बच्चों की विशेष सभा में अंतरिक्ष यात्री शुभांशु की सकुशल वापसी का स्वागत

Astronaut Shubhanshu’s safe return welcomed in a special gathering of children भोपाल। रातीबड़ स्थित शारदा विद्या मंदिर स्कूल में बच्चों की विशेष सभा आयोजित की गई। सभा में छात्र-छात्राओं ने पढ़ाई के अतिरिक्त व्यक्तित्व विकास के उद्देश्य से अपने भीतर छिपी प्रतिभा को प्रदर्शित कर जानकारी साझा की। बच्चों में एक ने ‘‘मॉ’’ पर हिंदी, इंग्लिश और संस्कृत में वर्णन किया। तो कोई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बनकर मंच पर आयी। सभी का उत्साह तब अधिक बढ़ गया जब स्कूली छात्र शिवांश अंतरिक्ष से सकुशल वापस लौटे शुभांशु की भूमिका में नजर आए। सभी ने शुभांशु का स्वागत किया। शारदा विद्या मंदिर की प्राचार्य ने बताया कि विद्यालय में अक्सर किसी अवसर का उत्सव मनाने, जानकारी साझा करने या प्रतिभा दिखाने के लिए इस प्रकार की स्पेशल असेम्बली का आयोजन किया जाता है। यह पढ़ाई में रूचि जाग्रत करने के साथ ही बच्चों को शिक्षा प्राप्ति के लिए उत्साहित एवं स्वप्रेरित करता है। विद्यार्थियों की उपलब्धियों का सम्मान करने स्कूल के भीतर संचार, प्रेरणा और सामुदायिक भावना को बढ़ावा देने के लिए एक मंच के रूप में यह विशेष सभा कार्य करती हैं।स्वाधीनता दिवस से पूर्व इस प्रकार की विशेष सभा महापुरूषों के नाम रही। सभी बच्चों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। स्कूल के बच्चों, शिक्षिकाओं ने ही नहीं, उनके अभिभावकों ने भी विशेष सभा को सराहा और बच्चों को प्रोत्साहित किया। स्कूल शिक्षिका ने बताया कि आगे भी सामाजिक मुद्दों, पर्यावरण संबंधी चिंताओं या स्वास्थ्य संबंधी विषयों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए इस प्रकार की विशेष सभाएं की जाएंगी। बच्चों का मनोबल बढ़ाने, सकारात्मक विद्यालय वातावरण को बढ़ावा देने और विद्यार्थियों में सम्मान, सहयोग और दायित्वबोध जैसे मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए यह आयोजन किया गया। recent visitors 113

कूनो में बारिश से बढ़ी चीतों की मुश्किलें, पानी भरे गड्ढों-दलदली जमीन में फंसने का मंडरा रहा खतरा

कूनो में बारिश से बढ़ी चीतों की मुश्किलें, पानी भरे गड्ढों-दलदली जमीन में फंसने का मंडरा रहा खतरा

Rain in Kuno has increased the difficulties of cheetahs, there is a danger of them getting trapped in water filled pits and marshy land ग्वालियर। Rain in Kuno has increased मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चीतों के पुनर्वास की महत्वाकांक्षी परियोजना एक बार फिर प्रकृति की चुनौती से जूझ रही है। लगातार हो रही भारी बारिश ने पार्क को दलदल में बदल दिया है, जिससे न सिर्फ ट्रैकिंग बाधित हो रही है बल्कि चीतों की जान पर भी खतरा मंडराने लगा है। सबसे चिंताजनक स्थिति उस वक्त उत्पन्न हुई जब मादा चीता ‘आशा’ अपने तीन शावकों के साथ पार्क की सीमा लांघकर बागचा क्षेत्र की ओर निकल गई। जिन इलाकों में वे पहुंचे हैं, वहां हर ओर जलभराव और कीचड़ है — और यहीं से चिंता गहराती है। Read more: विरोध का नया स्वर: OBC समागम व विपक्षी गठबंधन की रणनीति’ जंगल के बाहर, खतरे के भीतरचीतों का पार्क की सीमा से बाहर जाना कोई मामूली बात नहीं। बीते वर्ष ‘पवन’ नामक चीते की दर्दनाक मौत एक पानी से भरे गड्ढे में गिरकर हो गई थी, और अब ‘आशा’ व उसके नन्हे शावक उसी रास्ते पर हैं। बरसात के इस भीगे मौसम में, नहरें और गड्ढे जानलेवा जाल बन गए हैं। तकनीक भी बेबसहालांकि सभी चीतों के गले में ट्रैकिंग के लिए कालर ID लगे हैं, फिर भी भारी वर्षा और दलदली रास्तों ने ट्रैकर्स की पहुंच को सीमित कर दिया है। न गाड़ियाँ चल पा रही हैं और न ही पैदल ट्रैकिंग संभव है। ऐसे में निगरानी टीमें हर पल तनाव में हैं कि कहीं फिर कोई अनहोनी न घटे। प्राकृतिक चुनौती के सामने सुझाववन रक्षकों ने सुझाव दिया है कि मानसून समाप्त होने तक चीतों को सुरक्षित बाड़ों में शिफ्ट किया जाए, ताकि उनकी जान की हिफाज़त सुनिश्चित हो सके। हालांकि यह कदम उनके प्राकृतिक व्यवहार के अनुकूल नहीं होगा, परंतु वर्तमान हालात में यह सुरक्षा का बेहतर विकल्प बन सकता है। शावकों की नाजुक स्थितिशावकों के लिए यह मौसम और भी अधिक जोखिम भरा है। दलदली ज़मीन पर उनका संतुलन बनाना मुश्किल है और अगर वे गड्ढों या पानी में फंस गए तो बचाना बेहद कठिन हो सकता है। यही कारण है कि हर पल की निगरानी अब जरूरी बन गई है। सावधानी और सतर्कताकूनो के डीएफओ थिरूकुरल आर के अनुसार, सभी चीतों को संक्रमण से बचाने के लिए दवाएं दी जा चुकी हैं, और निगरानी लगातार जारी है। लेकिन निगरानी से ज्यादा अब ज़रूरत संरक्षण की रणनीति पर दोबारा विचार करने की है। चीतों को भारत की धरती पर फिर से बसाने का सपना, सिर्फ वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, पूरे देश का सपना है। लेकिन यह सपना तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक हम प्रकृति के सामने झुककर नहीं, बल्कि उसकी चुनौतियों का समाधान खोजकर खड़े नहीं होते। कूनो में हो रही यह संघर्ष की कहानी एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर करती है — क्या हम सच में तैयार हैं ‘प्रोजेक्ट चीता’ को सफल बनाने के लिए? recent visitors 118

विरोध का नया स्वर: OBC समागम व विपक्षी गठबंधन की रणनीति’

विरोध का नया स्वर: OBC समागम व विपक्षी गठबंधन की रणनीति’

New voice of protest: OBC Sammelan and the strategy of opposition INDIA alliance कांग्रेस द्वारा 25 जुलाई को आयोजित “OBC न्याय और भागीदारी सम्मेलन” केवल एक विपक्षी सभा नहीं, बल्कि उनको जातीय जनगणना और आरक्षण सीमा हटाने जैसे संवैधानिक मुद्दों पर नया मोर्चा खोलने की रणनीति है CM सिद्धारमैया ने ‘अहिन्दा मॉडल’ को राष्ट्रीय दृष्टिकोण के रूप में पेश करते हुए इसे सामाजिक न्याय की मिसाल बतायायह पूरी योजना कांग्रेस द्वारा पिछड़े वर्गों की राजनीतिक शक्ति को फिर से केंद्रित करने का स्पष्ट संकेत है। 19 जुलाई को हुई वर्चुअल बैठक में सीट बंटवारे, साझा घोषणा पत्र और आगामी चुनावी रणनीति जैसे विषयों पर विपक्षी दलों के बीच समन्वय की समीक्षा हुईबीजेपी के बढ़ते चुनावी दबाव को देखते हुए यह बैठकों का सिलसिला अब और तेज़ हो रहा है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि दोनों ही दल विरोधी के बिल्कुल समान मुद्दे उठाते हुए जनता के बीच अलग-अलग प्रस्तुति दे रहे हैं। कांग्रेस ने OBC सम्मेलन को न सिर्फ नैरेटिव बदलने का जरिया बनाया है, बल्कि उससे आक्रामक विपक्षी रणनीति भी तैयार कर रही है।INDIA गठबंधन की बैठक इस दिशा में पहला ठोस कदम है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रव्यापी समन्वय और स्पष्ट नेतृत्व की भी आवश्यकता है।बीजेपी और कांग्रेस के बीच की ‘कॉपिकैट’ रणनीतियों से स्पष्ट है कि आगामी चुनावी चर्चाएँ वस्तुनिष्ठ मुद्दों से हटकर प्रतीकात्मक राजनीति की ओर बढ़ रही हैं—जहां असली मुकाबला संवाद की न बजाय जुबानी प्रतिस्पर्धा की होगी। चुनौती और अवसर यदि विपक्ष की ये रणनीतियाँ स्थानीय जनभावनाओं से जुड़कर आगे बढ़ाईं गयीं, तो बीजेपी को न सिर्फ जवाबी मोर्चा बनाना पड़ेगा, बल्कि उसे नई राजनीतिक जोर जुटाना होगा।वहीं बीजेपी की जातिगत जनगणना अधिसूचना कांग्रेस की ओबीसी रणनीति को जबाव देने की सीधी कोशिश है—लेकिन देखना यह है कि कौन जनता को असली बदलाव का भरोसा दिला पाता है। recent visitors 124

कांग्रेस की चुनावी तैयारियों का आगाज “कांग्रेस का ‘नव संकल्प’: 2028 की रणभेरी मांडू से”

कांग्रेस की चुनावी तैयारियों का आगाज “कांग्रेस का ‘नव संकल्प’: 2028 की रणभेरी मांडू से”

Congress’s election preparations begin “Congress’s ‘Nav Sankalp’: The battle cry of 2028 from Mandu” Congress Nav Sankalp from Mandu मध्य प्रदेश की राजनीति में बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है। कांग्रेस ने 2028 विधानसभा चुनावों के लिए अपनी रणनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है — और इसकी शुरुआत हो रही है ऐतिहासिक नगरी मांडू से। 21 और 22 जुलाई को आयोजित ‘नव संकल्प शिविर’ कांग्रेस की गंभीरता, तैयारी और भविष्य की लड़ाई के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह महज एक शिविर नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक पुनर्निर्माण और विचारधारा की पुनर्स्थापना का एक मंच है। 12 सत्रों में बंटे इस शिविर में विधायकों को विचारधारा, विपक्ष की भूमिका, जन मुद्दों की समझ, और सोशल मीडिया रणनीति जैसे पहलुओं पर प्रशिक्षित किया जाएगा। यह दिखाता है कि कांग्रेस अब सिर्फ प्रतिक्रिया देने वाली पार्टी नहीं, बल्कि दिशा देने वाली ताकत बनना चाहती है। Congress Nav Sankalp from Mandu शिविर का सबसे अहम संदेश है — संगठन की मजबूती, विचारधारा की स्पष्टता और जनता से संवाद की नई शुरुआत। राहुल गांधी की वर्चुअल मौजूदगी और शीर्ष नेताओं — जैसे कमलनाथ, जीतू पटवारी, विवेक तन्खा, सुप्रिया श्रीनेत, अजय माकन — की सक्रिय भागीदारी इस बात को पुष्ट करती है कि कांग्रेस अब ‘नेताओं की भीड़’ नहीं, बल्कि ‘विचारधारा से जुड़ा कैडर’ बनाना चाहती है। विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने जहां एक ओर शिविर की रूपरेखा प्रस्तुत की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने सरकार की असफलताओं को उजागर करते हुए कांग्रेस के वैकल्पिक विज़न को भी सामने रखा। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को “झूठ का पुलिंदा” कहना और प्रदेश में बढ़ते अपराध, बेरोजगारी, और भ्रष्टाचार पर तीखे सवाल खड़े करना कांग्रेस के तीखे तेवरों को दर्शाता है। Read more: क्या बार-बार थकान और भूख न लगना फैटी लीवर की चेतावनी हो सकती है? जानिए कैसे बचाव संभव यह शिविर आने वाले वर्षों में कांग्रेस की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। अगर यह प्रशिक्षण और आत्ममंथन जमीन पर उतर पाया, तो मांडू कांग्रेस के लिए वही बन सकता है, जो कभी नव-भारत निर्माण के दौर में वर्धा और सेवाग्राम हुआ करते थे। कांग्रेस ने यह संकेत दे दिया है कि वह अब विपक्ष में बैठने के लिए नहीं, सत्ता में लौटने के लिए मैदान में है। अब देखना यह होगा कि मांडू से निकली यह संकल्पशक्ति 2028 तक कितना प्रभाव छोड़ती है। recent visitors 206

भारत के 5 अनोखे मंदिर जहां मांस, मछली और शराब चढ़ती है भगवान को भोग में

भारत के 5 अनोखे मंदिर जहां मांस, मछली और शराब चढ़ती है भगवान को भोग में

temples with non vegetarian prasad in india भारत में मंदिरों की अनोखी परंपराएं non vegetarian prasad in indiaभारत एक ऐसा देश है जहां हर राज्य, हर समुदाय और हर मंदिर की अपनी खास परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं हैं। जहां अधिकांश लोग भगवान को फल, फूल और मिठाई का भोग लगाते हैं, वहीं देश में कुछ ऐसे प्रसिद्ध मंदिर भी हैं जहां भगवान को मांस, मछली और शराब अर्पित की जाती है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। कामाख्या मंदिर 51 शक्तिपीठों में एक प्रमुख स्थल है। यह मंदिर तंत्र साधना का बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां देवी को मांस और मछली अर्पित की जाती है, और यह प्रसाद बाद में भक्तों को भी वितरित किया जाता है। विशेष रूप से अंबुबाची मेले के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। non vegetarian prasad in india तारापीठ एक तांत्रिक साधना स्थल है। यहां देवी तारा को बलि दी जाती है और शराब के साथ भोग लगाया जाता है। यह मंदिर खासकर दुर्गा पूजा और तंत्र साधना के दौरान काफी प्रसिद्ध होता है। प्रसाद को भक्त पूरी श्रद्धा से ग्रहण करते हैं। काल भैरव मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां भक्त शराब की बोतलें लेकर आते हैं और पुजारी भगवान को वह शराब ‘पिलाते’ हैं। इसे तांत्रिक पूजा का हिस्सा माना जाता है। यहां चढ़ाई गई शराब का कुछ भाग भक्तों को प्रसाद के रूप में भी मिलता है। यह मंदिर देवी काली को समर्पित है और भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां बलि की परंपरा अभी भी प्रचलन में है। बलि के बाद मांस को पकाकर प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है। यह परंपरा बंगाल की गहराई से जुड़ी है। मदुरई के पास स्थित यह मंदिर स्थानीय देवता मुनियांदी स्वामी को समर्पित है, जिन्हें भगवान शिव का रूप माना जाता है। यहां चिकन और मटन बिरयानी भोग में चढ़ाई जाती है और फिर प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटी जाती है। भारत की विविधता उसके मंदिरों और परंपराओं में साफ झलकती है। जहां एक ओर भक्त फल-फूल अर्पित करते हैं, वहीं कुछ जगहों पर मांस, मछली और शराब को भी उतनी ही श्रद्धा से भोग लगाया जाता है। यह न केवल धार्मिक विविधता को दर्शाता है, बल्कि हमारी संस्कृति की विशालता को भी उजागर करता है। recent visitors 294

भोपाल में ‘शुद्धिकरण अभियान’ की शुरुआत, अशोका गार्डन बना ‘राम बाग’ हमीदिया, हबीबगंज समेत कई नामों पर प्रस्ताव

भोपाल में ‘शुद्धिकरण अभियान’ की शुरुआत, अशोका गार्डन बना ‘राम बाग’ हमीदिया, हबीबगंज समेत कई नामों पर प्रस्ताव

ashoka garden now called ram bagh hamidia and habibganj also renamed भोपाल ! hamidia and habibganj also renamed मध्य प्रदेश की राजधानी इन दिनों एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। नगर निगम द्वारा शुरू किए गए ‘शुद्धिकरण अभियान’ के तहत अब शहर के प्रमुख स्थलों और इलाकों के नाम भारतीय सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप किए जा रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि यह कदम गुलामी और विदेशी आक्रांताओं की छाया को समाप्त करने के उद्देश्य से उठाया गया है। इस कड़ी में पहला बड़ा बदलाव अशोका गार्डन को लेकर हुआ है। अब इस इलाके को ‘राम बाग’ के नाम से जाना जाएगा। मेयर इन काउंसिल (MIC) ने इस प्रस्ताव को पारित कर दिया है और नगर निगम अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि, “भोपाल की पहचान राजा भोजपाल से जुड़ी हुई होनी चाहिए, न कि उन नामों से जो हमारी ऐतिहासिक चेतना को धूमिल करते हैं।” Read more: क्या बार-बार थकान और भूख न लगना फैटी लीवर की चेतावनी हो सकती है? जानिए कैसे बचाव संभव हमीदिया, हबीबगंज समेत कई नामों पर प्रस्ताव hamidia and habibganj also renamedनिगम ने हमीदिया अस्पताल, हमीदिया कॉलेज और हबीबगंज जैसे इलाकों के नामों को बदलने की सिफारिश भी शासन को भेजी है। इन नामों को नवाबी काल और विदेशी प्रभाव का प्रतीक माना जा रहा है। सूर्यवंशी ने स्पष्ट कहा कि, “हमीदुल्लाह खान जो कि भोपाल का अंतिम नवाब था, वह भारत की जगह पाकिस्तान में विलय चाहता था। ऐसे नाम अब भोपाल की संस्कृति के अनुकूल नहीं हैं।” राजनीति भी गर्माई, विपक्ष ने उठाए सवालजहां सत्ता पक्ष इसे “संस्कृति का सम्मान” और “गुलामी से मुक्ति” बता रहा है, वहीं विपक्ष ने इसे “राजनीतिक स्टंट” करार दिया है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए नाम बदलने की राजनीति की जा रही है। नवीन पहचान की ओर बढ़ता भोपाल hamidia and habibganj also renamedशहर सरकार द्वारा पारित यह प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि भोपाल अब अपनी पहचान भारतीय परंपरा, संस्कृति और गौरवशाली अतीत के आधार पर दोबारा गढ़ने की ओर अग्रसर है। हालांकि, इस अभियान पर विचारधारा और राजनीतिक मतभेदों की छाया भी स्पष्ट रूप से देखी जा रही है। recent visitors 112

भोपाल में स्कूलों के बाहर ई-रिक्शा पर लगेगा प्रतिबंध, बच्चों की सुरक्षा पर प्रशासन सख्त

E-rickshaws will be banned outside schools in Bhopal, administration strict on children’s safety भोपाल! राजधानी की ट्रैफिक व्यवस्था को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। अब स्कूलों के बाहर ई-रिक्शा पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। शुक्रवार को हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया, जिसमें सांसद आलोक शर्मा की अध्यक्षता में जिला प्रशासन, पुलिस, नगर निगम और पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि ई-रिक्शा में छोटे बच्चों को स्कूल लाना-ले जाना सुरक्षा की दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। कलेक्टर ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि ई-रिक्शा का उपयोग बच्चों की जान के लिए खतरा बन सकता है, खासकर अधिक संख्या में बच्चों को बिना सुरक्षा उपायों के बैठाने पर। इसी वजह से स्कूल परिसर और उसके आसपास ई-रिक्शा के संचालन पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया। ट्रैफिक सुधार की दिशा में ठोस पहलबैठक में 42 चौराहों पर ट्रैफिक सुगमता के लिए लेफ्ट टर्न सुधार की योजना पर भी चर्चा हुई। इसके लिए तीन करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है। सांसद शर्मा ने पीडब्ल्यूडी अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे मैनिट के ट्रैफिक एक्सपर्ट्स की मदद से एक हफ्ते के भीतर सुधार योजना पेश करें। उन्होंने बिना तैयारी आए अधिकारियों को फटकार भी लगाई। अन्य अहम फैसले: अतिक्रमण, कंडम वाहन और ट्रांसफार्मर हटेंगेइसके अलावा शहर की सड़कों से अतिक्रमण हटाने, पुराने और अनुपयोगी वाहनों को हटाने, तथा रास्तों में खंभे और ट्रांसफार्मर जैसी बाधाओं को दूर करने पर भी जोर दिया गया। पार्किंग व्यवस्था को आम नागरिकों के लिए सुविधाजनक बनाने के निर्देश दिए गए हैं। भोपाल में अब ट्रैफिक सुधार महज़ कागजों की बात नहीं रह जाएगी। प्रशासनिक सख्ती और योजनाबद्ध क्रियान्वयन से आने वाले दिनों में बच्चों की सुरक्षा और आमजन की आवाजाही में काफी सुधार देखने को मिलेगा। ई-रिक्शा पर लगाया गया यह प्रतिबंध एक सख्त लेकिन जरूरी कदम माना जा रहा है। recent visitors 106