10 करोड़ खर्च, 50 हजार किताबें छपीं, फिर भी हिंदी में मेडिकल परीक्षा देने नहीं आया एक भी छात्र

₹10 crore spent, 50,000 books printed—yet not a single student turned up to take the medical exam in Hindi. मध्य प्रदेश में बड़े जोर-शोर से शुरू हुए ‘हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई’ के प्रोजेक्ट की जमीनी हकीकत बेहद निराशाजनक है। रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला सच सामने आया है कि पिछले तीन सालों में सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना पर 10 करोड़ रुपये खर्च कर दिए और 50 हजार किताबें भी छाप दीं, लेकिन एक भी छात्र ने हिंदी माध्यम में परीक्षा देने की हिम्मत नहीं जुटाई।तीन साल पहले जो योजना अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ने के लिए लाई गई थी। वह अब सिस्टम की उदासीनता और छात्रों के मन में बैठे डर के कारण बुरी तरह उपेक्षा का शिकार हो रही है। अनुवाद और छपाई पर बहाया करोड़ों का बजटकरीब 300 डॉक्टरों की टीम ने दिन-रात मेहनत करके 16 मेडिकल विषयों की किताबों का हिंदी में अनुवाद किया था। इस पूरी कवायद में अनुवाद पर 2 करोड़, किताबों की छपाई पर 5.5 करोड़ और कॉलेजों में स्थापित ‘मंदार केंद्रों’ पर 3 करोड़ रुपये खर्च किए गए।इसके बावजूद, मेडिकल छात्रों के बीच यह धारणा घर कर गई है कि अगर उन्होंने परीक्षा में हिंदी में जवाब लिखे, तो उन्हें कम अंक मिलेंगे या शून्य दे दिया जाएगा। इसी खौफ का नतीजा है कि परीक्षाओं में द्विभाषी प्रश्नपत्र मिलने के बावजूद किसी भी छात्र ने हिंदी में उत्तर लिखने का जोखिम नहीं उठाया। कहीं डिब्बों में कैद किताबेंहिंदी को बढ़ावा देने के लिए कॉलेजों में जो ‘मंदार केंद्र’ स्थापित किए गए थे, उनका हाल बेहाल है। भोपाल के जीएमसी सहित कई जगहों पर इन केंद्रों में ताले लटक रहे हैं और पिछले एक साल से कार्यसमिति की कोई बैठक तक नहीं हुई है।अधिकारियों की रुचि के हिसाब से अलग-अलग जिलों में योजना का असर भी अलग है। इंदौर मेडिकल कॉलेज में हिंदी की लाखों की किताबें डिब्बों में पैक पड़ी हैं, जबकि रतलाम में डीन डॉ. अनीता मुथा की सक्रियता के चलते हर साल पुस्तक मेला लगाकर करीब 80% किताबें छात्रों तक सफलतापूर्वक पहुंचाई गई हैं।शुरुआती उत्साह हुआ गायबप्रोजेक्ट की शुरुआत में मुख्यमंत्री और मंत्री स्तर पर 50 से ज्यादा समीक्षा बैठकें हुई थीं और अनुवाद करने वाली ‘मंदार की टोली’ का जमकर सम्मान भी हुआ था। लेकिन अब यह उत्साह पूरी तरह ठंडा पड़ चुका है। क्लिनिकल रिकॉर्ड बुक का निर्माण और शिक्षकों का प्रशिक्षण ठप है।इस लचर स्थिति को देखते हुए अब नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने राज्य सरकार से पूरे प्रयोग की विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है। आयोग ने हिंदी के सैंपल पेपर, चेक की गई उत्तर पुस्तिकाएं और हिंदी चुनने वाले छात्रों का पूरा डेटा मांगा है।इंजीनियरिंग का भी वही हश्रसिर्फ मेडिकल ही नहीं, हिंदी में इंजीनियरिंग (बीटेक) की पढ़ाई की स्थिति भी दयनीय है। राज्य के एकमात्र तकनीकी विश्वविद्यालय, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) ने तो हिंदी में बीटेक के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) से विधिवत मान्यता लेने की ही पहल नहीं की।वर्तमान में पूरे प्रदेश में सिर्फ चार कॉलेजों (एक्रोपोलिस, श्री दादाजी इंस्टिट्यूट, एसजीएसआईटीएस और आईपीएस अकैडमी) के पास ही इसकी मंजूरी है, जहां कुल मिलाकर केवल 53% सीटें ही भर पाई हैं। इस मामले में आरजीपीवी के कुलपति प्रो. आलोक शर्मा का कहना है कि अब यूनिवर्सिटी की तरफ से एआईसीटीई से मान्यता और अतिरिक्त सीटों के लिए प्रयास किए जाएंगे। recent visitors 20

अरब में चुनाव लड़ने चले जाते, भाई का नाम ही पप्पू है; राहुल गांधी पर सीएम मोहन यादव ने,,

You could have gone to Arab to contest elections, your brother’s name is Pappu; CM Mohan Yadav on Rahul Gandhi अगर मालवा । राज्य के सीएम मोहन यादव ने जनता को संबोधित करते हुए डबल इंजन सरकार के कामों को गिनाया। इसके साथ ही नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर जमकर निशाना भी साधा। मोहन यादव ने कहा- एक नेता आ रहे हैं, झूठ की गूंज लेकर। उन्होंने, उनकी मां ने, दादा जी ने सारे खानदान ने कभी देश का भला नहीं किया। इसके साथ ही राहुल गांधी को पप्पू कहकर तंज कसते हुए कहा- ये तो समुद्र में चुनाव लड़ने चले गए थे। राहुल गांधी के खानदान ने कभी देश का भला नहीं किया दरअसल, राहुल गांधी द्वारा झूठ की गूंज नामक कार्यक्रम किये जा रहे हैं। इसी सिलसिले में उनको एमपी आना है। इस पर राज्य के सीएम मोहन यादव ने आरोप लगाते हुए कहा- राहुल गांधी के खानदान ने कभी भी देश का भला नहीं किया है। लेकिन अब वो यहां आ रहे हैं जनता की बात करने के लिए। युवा की बात करने के लिए। राहुल गांधी अरब में चुनाव लड़ने चले जाते जनता अच्छे से जानती है। जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी… बाद के समय में भी दिल्ली से चुनाव क्यों नहीं लड़ते थे। क्योंकि जनता इन्हें अच्छे से जानती थी। इसलिए ये लोग रायबरेली, अमेठी से लड़ते थे। राहुल पर तंज कसते हुए कहा- अब तो ये सब भी छोड़कर वायनाड गए हैं, केरल। वो कहते हैं कि समुद्र आ गया, नहीं तो अरब में चुनाव लड़ने जाते। भाई का नाम ही पप्पू है… मोहन यादव का तंज ये लोग न्यायालय के ऊपर भी उंगली उठाते हैं। सेना के पराक्रम पर भी उंगली उठाते हैं। राहुल गांधी पर फिर से तंज कसते हुए कहा- कई टेक्नोलॉजी के मामले में भारत कैसे आगे बढ़ रहा है, लेकिन भाई है कि मानता ही नहीं है। ताली बजाते हुए कहा- भाई भी क्या करे, भाई का नाम ही पप्पू है। दबी मुस्कान में कहा- अब पप्पू है, तो पप्पू जैसा काम करेगा। झूठ की गूंज कार्यक्रम के लिए एमपी आने वाली बात पर सीएम ने कहा- हमारे राज्य में आ रहे हैं, हम स्वागत करते हैं। recent visitors 46

एमपी: गोवंश खुले में घूमे तो सरपंचों की कुर्सी जाएगी! 8 सरपंचों को नोटिस, जानें क्या है पूरा मामला

MP: If cattle roam freely, sarpanches will lose their positions! Notices issued to 8 sarpanches, learn the full story. भिण्ड। मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले में सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर खुले में घूम रहे गोवंश को लेकर जिला पंचायत ने पंचायतों की जिम्मेदारी तय करते हुए आठ सरपंचों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। जिला पंचायत सीईओ वीरसिंह चौहान ने निरीक्षण के दौरान गोवंश के सड़कों और किसानों की फसलों में घूमते मिलने पर यह कार्रवाई की है। सभी सरपंचों को 15 सितंबर को साक्ष्य सहित अपना पक्ष रखने के लिए समक्ष में उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर सरपंचों को पद से पृथक करने की कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। जनपद पंचायत भिण्ड की मानपुरा पंचायत के सरपंच ओमवीर सिंह चौहान, बाराकलां की सरपंच ममता बघेल, ऊमरी के सरपंच वीरेंद्र सिंह यादव, ढोंचरा के सरपंच सुनील कुमार और खेरा श्यामपुरा की सरपंच प्रीति देवी को नोटिस जारी किए गए हैं। इसी तरह जनपद पंचायत लहार की लपवाहा पंचायत के सरपंच अरविंद शर्मा, ररी पंचायत की सरपंच सावित्री बाई और जनपद पंचायत रौन की मेहदा पंचायत की सरपंच उमा देवी से भी जवाब मांगा गया है। सीईओ के निरीक्षण के दौरान इन पंचायतों में गोवंश सड़क, सड़क किनारे, सार्वजनिक स्थानों और किसानों की फसलों में घूमता मिला। नोटिस में कहा गया है कि इससे जन-धन की हानि के साथ परिवहन में परेशानी और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। पंचायत स्तर पर गोवंश को सुरक्षित स्थान पर रखने की जिम्मेदारी होने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं होने को पदीन कर्तव्य के विपरीत माना गया है। सीईओ ने पूछा है कि पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की धारा 40 के तहत सरपंचों को पद से पृथक करने की कारर्वाई क्यों न की जाए। 15 सितंबर को सरपंचों को साक्ष्य सहित अपना पक्ष रखना होगा। समय पर जवाब नहीं देने या जवाब असंतोषजनक पाए जाने पर एकपक्षीय कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। इन पंचायतों में शासन की ओर से गोशालाओं का निर्माण कराया गया है और इनके निर्माण एवं संचालन पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। गोवंश के लिए भूसा-दाना, पानी और साफ-सफाई की व्यवस्था पर भी राशि खर्च होती है। इसके बावजूद कई स्थानों पर गोशालाएं खाली पड़ी हैं और गोवंश सड़कों पर घूम रहा है। ऐसे में गोवंश को सुरक्षित रखने के लिए पंचायत स्तर पर की जा रही व्यवस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं। recent visitors 72

दिग्विजय सिंह: सागर एसपी 50 लाख मासिक वसूली करते थे, जहरीली शराब कांड पर का हमला,; EOW जांच मांगी

Digvijay Singh: Sagar SP used to collect Rs 50 lakh monthly, attacks hooch scandal, demands EOW probe सागर । पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने रविवार को सागर के पुलिस अधीक्षक पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने पत्रकार वार्ता बुलाकर आरोप लगाया कि एसपी अनुराग सुजानिया हर महीने 50 लाख की वसूली कर रहे हैं। यदि यह आरोप प्रमाणित नहीं हैं तो एसपी उनके खिलाफ मानहानि का दावा कर सकते है। अवैध वसूली के आरोपों को वह अदालत में प्रमाणित कर देंगे। ईओडब्ल्यू से जांच कराने की मांग जहरीली शराब कांड के बाद सागर पहुंचे दिग्विजय सिंह ने शनिवार-रविवार को प्रभावित परिवारों और स्थानीय कांग्रेस नेताओं से मुलाकात के बाद शराब माफिया को राजनीति, प्रशासनिक और पुलिस संरक्षण मिलने का आरोप लगाया। जहरीली शराब कांड के लिए इसी गठजोड़ को जिम्मेदार ठहराते हुए दिग्विजय ने कहा कि इससे पहले मुरैना जिले में जहरीली शराब से कई लोगों की मौत हुई। उस वक्त वहां के एसपी अनुराग सुजानिया ही थे। सागर में उसी तरह की स्थितियों में मौतें हुईं और यहां भी एसपी वहीं हैं। उन्होंने एसपी सुजानिया को हटाकर उनकी जांच ईओडब्ल्यू से कराने की मांग की। इधर, एसपी सुजानिया ने इस पर कोई भी टिप्पणी देने से इन्कार किया है। न्यायिक जांच पर भी सवाल दिग्विजय सिंह ने न्यायिक जांच पर भी सवाल उठाए। कहा कि जिन अधिकारियों या एजेंसियों से जांच कराई जा रही है, उन पर उन्हें भरोसा नहीं है। जब भी लीपापोती करना होती है, जो न्यायिक जांच बैठा दी जाती है। व्यापम मामले में भी इन्हीं को जांच करने के लिए बुलाया गया था और अब शराब कांड के लिए भी इन्हीं को बुलाया लिया है। दिग्विजय ने शराब कारोबारियों और राजनीतिज्ञों के बीच संबंधों की जांच की मांग की। चार प्रभावित परिवारों को गोद लेने की घोषणा दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि सरकार ने अभी तक पीड़ितों को मुआवजा नहीं दिया। सरकार ने अभी यह तक नहीं बताया कि कब तक और कितना मुआवजा दिया जाएगा। दिग्विजय ने मृतक भोला अहिरवार, राम स्वरूप अहिरवार, भोपाली आदिवासी और धन सिंह अहिरवार के परिवार को गोद लेने की घोषणा की। कहा कि वह परिवार को 10 हजार रुपये प्रतिमाह देंगे और बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाएंगे। recent visitors 47

रीवा सांसद का कांग्रेस विधायक पर पलटवार, बोले- अभय मिश्रा यौन विकृतियों से पीड़ित, पॉकेटमारी से शुरू किया था बिजनेस 

Rewa MP hits back at Congress MLA, says Abhay Mishra suffers from sexual perversions, started his business by pickpocketing सांसद ने विधायक अभय मिश्रा को यौन विकृतियों से पीड़ित तक बता दिया। सांसद ने कहा कि बिना सिर-पैर इस तरह की बात कोई सामान्य मानसिकता वाला व्यक्ति सोच भी…और पढ़ें रीवा। संजय गांधी मेडिकल कॉलेज के मुर्दाघर में महिलाओं के शवों के साथ दुष्कर्म के सेमरिया विधानसभा से कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा के सनसनीखेज आरोप के बाद रीवा की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस विधायक के इस बयान पर अब रीवा के भाजपा सांसद जनार्दन मिश्रा ने तीखा और बेहद निजी हमला बोला है। सांसद ने विधायक अभय मिश्रा को यौन विकृतियों से पीड़ित तक बता दिया। सांसद ने कहा कि बिना सिर-पैर इस तरह की बात कोई सामान्य मानसिकता वाला व्यक्ति सोच भी नहीं सकता। उन्होंने कहा कि संजय गांधी अस्पताल जैसे प्रतिष्ठित संस्थान पर बिना साक्ष्य के इस तरह का अनर्गल आरोप लगाना पूरे चिकित्सकीय स्टाफ का अपमान है और इससे रीवा की छवि खराब होती है। डिप्टी सीएम के पिता पर की गई टिप्पणी पर पलटवार इससे पहले कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा ने डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल के पिता स्वर्गीय भैयालाल शुक्ल के व्यवसाय को लेकर टिप्पणी की थी। इस पर पलटवार करते हुए सांसद जनार्दन मिश्रा ने कहा कि स्वर्गीय भैयालाल शुक्ल यदि कोई व्यवसाय करते भी थे तो वह ईमानदारी का व्यवसाय था। इसी दौरान सांसद ने विधायक अभय मिश्रा के अतीत को लेकर भी बड़े आरोप लगाए। कहा कि विधायक अभय मिश्रा ने वाहनों की स्टपनी चोरी करके और स्टेट बैंक में पॉकेटमारी कर अपना कारोबार शुरू किया था। सांसद ने दावा किया कि एक समय कोतवाली में जिस तरह अपराधियों की फोटो स्लेट लेकर लगाई जाती थी, उसी तरह लंबे समय तक अभय मिश्रा की फोटो भी लगी रहती थी। अब यहां तक पहुंचे हैं, तो अशोभनीय बातें कर रहे हैं। recent visitors 37

एमपी में फिर चलीं देर रात तबादला एक्सप्रेस, 10 IPS समेत 137 पुलिस अफसरों को नई जिम्मेदारी

Late night transfer express trains resume in MP, 137 police officers, including 10 IPS officers, get new responsibilities भोपाल । मध्यप्रदेश में रविवार रात पुलिस विभाग में बड़े फेरबदल किए गए हैं. गृह विभाग ने 10 IPS अधिकारियों और 127 राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों समेत कुल 137 पुलिस अफसरों के ट्रांसफर किए हैं. सभी अधिकारियों को आगामी आदेश तक नई पदस्थापना पर कार्यभार संभालने के निर्देश दिए गए हैं. 2023-24 बैच के 10 आईपीएस यहां से वहां मध्यप्रदेश में 10 IPS समेत 137 पुलिस अफसरों के तबादला सूची जारी हो गई है. तबादला सूची में 2023 बैच के 4 और 2024 बैच के 6 IPS अधिकारी शामिल हैं. कई अधिकारियों को पुलिस मुख्यालय से मैदानी जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि कुछ अधिकारियों को एक जिले से दूसरे जिले में नई जिम्मेदारी दी गई है. IPS अधिकारियों की नई पदस्थापना आईपीएस मनीष भारद्वाज को पुलिस मुख्यालय की साइबर शाखा से हटाकर ACP कोतवाली, नगरीय इंदौर की जिम्मेदारी दी गई है. वहीं मनोज कुमार को ACP एमपी नगर, नगरीय भोपाल पदस्थ किया गया है. इसके अलावा आलोक कुमार वर्मा को देवास से CSP रीवा की जिम्मेदारी दी गई है. वैभव प्रिया को रतलाम से SDOP नेपानगर, शुभम सिंह ठाकुर को जबलपुर से SDOP गाडरवारा और अमित कुमार को खंडवा से SDOP सिंगरौली पदस्थ किया गया है. 127 DSP स्तर के अधिकारियों का भी फेरबदल IPS अधिकारियों के साथ ही राज्य पुलिस सेवा के 127 अधिकारियों की पदस्थापना में बदलाव किया गया है. इनमें उप पुलिस अधीक्षक (DSP), SDOP, नगर पुलिस अधीक्षक (CSP), सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) और सहायक सेनानी स्तर के अधिकारी शामिल हैं. तबादला सूची में कई ऐसे अधिकारी भी हैं, जिन्हें पुलिस मुख्यालय से मैदानी जिम्मेदारियां दी गई हैं. वहीं अलग-अलग जिलों में तैनात SDOP और नगर पुलिस अधीक्षकों को भी दूसरी जगह नई जिम्मेदारी सौंपी गई है. recent visitors 45

हाईकोर्ट ने सरकार ने मांगा जवाब,डकैत नहीं, फिर भी ग्वालियर-चंबल में डकैती एक्ट में 1000 से ज्यादा FIR

The High Court has asked the government to respond, stating that there are no dacoits, yet over 1,000 FIRs have been filed under the Dacoity Act in Gwalior-Chambal region. प्रतिनिधि: संतोष सिंह तोमर  ग्वालियर। जिस कानून को कभी ग्वालियर-चंबल के बीहड़ों में डकैतों के आतंक से निपटने के लिए बनाया गया था, उसकी आज की जरूरत पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ही सवाल उठा दिया है। पूर्व गृह मंत्री डॉ. गोविंद सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने सरकार से पूछा है कि जब प्रदेश में अब कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो मध्य प्रदेश डकैती एवं व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981 को खत्म क्यों न कर दिया जाए। याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 2020 से 2026 के बीच ग्वालियर-चंबल संभाग के ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना और श्योपुर जिलों में इस विशेष कानून के तहत एक हजार से अधिक एफआईआर दर्ज की गईं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि कई मामलों में सामान्य विवाद, जमीन-जायदाद के झगड़े और मारपीट जैसी घटनाओं में भी इस कानून की कठोर धाराएं जोड़ दी जाती हैं। हाई कोर्ट में उठा सवाल- जब डकैत गिरोह नहीं तो कानून क्यों? याचिका में कहा गया है कि 2020 से 2026 के बीच विधानसभा में तत्कालीन गृह मंत्री तीन अलग-अलग मौकों पर यह जानकारी दे चुके हैं कि प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है। इसके बावजूद इसी अवधि में ग्वालियर-चंबल के छह जिलों में इस कानून के तहत बड़ी संख्या में एफआईआर दर्ज होने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शर्मा ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि जिस विशेष परिस्थिति से निपटने के लिए 1981 में यह कानून बनाया गया था, वह स्थिति अब समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद कानून का इस्तेमाल जारी रहना नागरिकों के समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों से जुड़े सवाल खड़े करता है। धारा 11 और 13 पर क्यों है आपत्ति? याचिका में अधिनियम की धारा 11 और 13 के इस्तेमाल पर विशेष आपत्ति जताई गई है। धारा 11 के तहत गिरफ्तारी के बाद हिरासत से जुड़े विशेष प्रावधान हैं और ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है। धारा 13 दोषसिद्धि की स्थिति में न्यूनतम सजा का प्रावधान करती है, जो तीन वर्ष से कम नहीं हो सकती। याचिकाकर्ता का आरोप है कि आपसी रंजिश, जमीन विवाद या सामान्य मारपीट जैसे मामलों में भी इन धाराओं को जोड़ने से आरोपितों के लिए कानूनी राहत हासिल करना मुश्किल हो जाता है। खासतौर पर ग्रामीणों, किसानों और युवाओं के खिलाफ इसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए हैं। 1981 में क्यों बनाया गया था कानून? यह विशेष कानून वर्ष 1981 में उस दौर में लागू किया गया था, जब ग्वालियर-चंबल के बीहड़ों के अलावा सतना और पन्ना के जंगलों में डकैत गिरोह सक्रिय थे। अपहरण, डकैती और सामूहिक हत्याओं जैसी गंभीर वारदातों से निपटने के लिए सामान्य कानूनों से अलग कठोर प्रावधान किए गए थे। अब याचिका में यही सवाल उठाया गया है कि जब वह परिस्थितियां बदल चुकी हैं और प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो इस विशेष कानून को बनाए रखने का औचित्य क्या है। सरकार से चार सप्ताह में जवाब हाई कोर्ट ने मामले में गृह विभाग के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना व श्योपुर के पुलिस अधीक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। सभी से चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता धर्मेंद्र शर्मा ने बताया कि इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई विशेष न्यायालय में होती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले कई वर्षों से जंगल या बीहड़ क्षेत्र में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है। recent visitors 49