BJP प्रत्याशी: मेरे जीतने पर पुलिस को ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने की जरूरत नहीं, मेरा नाम ही लाइसेंस होगा 

BJP candidate: If I win, there is no need to show driving license to the police, my name will be on the license  लखनऊ । उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की कुंदरकी विधानसभा सीट पर आगामी उपचुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने रामवीर सिंह ठाकुर को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। रामवीर सिंह ठाकुर ने एक हालिया कार्यक्रम में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए एक खास घोषणा की, जिसमें उन्होंने BJP के पन्ना प्रमुखों के लिए ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता खत्म करने का दावा किया।  रामवीर सिंह ठाकुर ने मंच से अपने समर्थकों से कहा कि उपचुनाव में जीत हासिल करने के बाद BJP के पन्ना प्रमुखों को किसी भी प्रकार का ड्राइविंग लाइसेंस रखने की जरूरत नहीं होगी। उन्होंने कहा, “BJP के पन्ना प्रमुख की डायरी ही उनका लाइसेंस होगी, और किसी पुलिस अधिकारी की हिम्मत नहीं होगी कि वह उन्हें रोक सके। चुनाव प्रचार में चर्चित बयानबाजी रामवीर सिंह ठाकुर के इस बयान ने चुनाव प्रचार के दौरान हलचल मचा दी है। बीजेपी कार्यकर्ताओं में इस बयान के बाद खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। हालांकि, यह बयान सोशल मीडिया और आम जनता के बीच चर्चाओं का विषय बना हुआ है।  पन्ना प्रमुख की भूमिका BJP के संगठनात्मक ढांचे में पन्ना प्रमुख की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। पन्ना प्रमुख पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करते हैं, मतदाताओं से संपर्क बनाए रखते हैं और पार्टी की नीतियों को उन तक पहुंचाते हैं। ठाकुर के इस बयान को पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के उद्देश्य से देखा जा सकता है। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और चर्चा रामवीर सिंह ठाकुर का यह बयान विपक्षी दलों के निशाने पर भी आ गया है। विपक्षी नेताओं ने इसे कानून के प्रति गैर-जिम्मेदाराना करार दिया है। वहीं, कुछ लोगों ने इसे चुनावी जोश में दिया गया बयान कहा है।  रामवीर सिंह ठाकुर के इस बयान का कुंदरकी उपचुनाव पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। recent visitors 140

दुनिया के सबसे बड़े सामूहिक आयोजन महाकुंभ 2025 की तैयारियों को लेकर पूरा सरकारी अमला दिन रात काम में जुटा

प्रयागराज दुनिया के सबसे बड़े सामूहिक आयोजन महाकुंभ 2025 की तैयारियों को लेकर प्रयागराज में पूरा सरकारी अमला दिन रात काम में जुटा हुआ है। अधिकारी दिन भर जहां कार्यालयों में महाकुंभ की तैयारियों से संबंधित अपने जरूरी काम निपटा रहे हैं तो वहीं देर रात तक विकास और निर्माण कार्यों का निरीक्षण कर प्रगति का जायजा भी ले रहे हैं। यही नहीं, कहीं पर भी कोई अव्यवस्था होने पर तुरंत अधीनस्थ कर्मचारियों को व्यवस्था सही करने के लिए निर्देशित किया जा रहा है। गतिविधियों में आई इस तेजी से स्पष्ट है कि सीएम योगी की मंशा के अनुरूप मेला प्रशासन और जिला प्रशासन समस्त कार्यों को डेडलाइन से पहले ही पूर्ण कर महाकुंभ को श्रद्धालुओं के लिए एक यादगार और शानदार अनुभव बनाने के प्रति तत्परता से कार्य कर रहा है। विकास कार्यों में दिखाई दे रही तेजी महाकुंभ 2025 की शुरुआत को अभी दो महीने से भी ज्यादा का समय बचा हुआ है। पूरे प्रयागराज में महाकुंभ की तैयारियां पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं। श्रद्धालुओं के लिए तमाम तरह की व्यवस्थाओं को अमली जामा पहनाया जा रहा है। रेलवे ओवरब्रिज से लेकर सड़कों का चौड़ीकरण का कार्य जारी है। थीमेटिक गेट्स से लेकर वॉल पेंटिंग की जा रही है। पार्कों का सौंदर्यीकरण चल रहा है। मंदिरों के जीर्णोद्धार से लेकर घाटों पर भी निर्माण कार्य समेत महाकुंभ क्षेत्र में तमाम विकास कार्य तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। मेला प्राधिकरण, पीडब्ल्यूडी, प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी, नगर निगम, पर्यटन विभाग, सिंचाई विभाग, सेतु निगम समेत तमाम विभाग आपसी समन्वय के साथ इन परियोजनाओं को पूर्ण करने में लगे हुए हैं। विकास कार्यों की भौतिक प्रगति को देखने के लिए विभिन्न विभागों के अधिकारी देर रात निरीक्षण में जुट गए हैं। आधी रात को अधिकारियों के औचक निरीक्षण से काम की रफ्तार में भी तेजी आई है। स्थायी कार्यों पर है जोर बीते कुछ दिनों में पीडीए के वीसी और सचिव ने हाई कोर्ट रोड, छोटा बघाड़ा रोड, अरैल, कीडगंज, हटिया, नूरुल्लाह, झूंसी बस स्टैंड और लेटे हनुमान मंदिर में चल रहे विकास कार्यों का देर रात निरीक्षण किया और कार्यदायी संस्थाओं को आवश्यक सुधार निर्देश दिए गए हैं। इसी तरह मेला प्रशासन से जुड़े अधिकारी भी विभिन्न स्थानों पर चल रहे विकास और निर्माण कार्यों का आधी रात निरीक्षण करने पहुंच गए और पानी से लेकर बिजली सप्लाई को लेकर विभागीय कर्मचारियों को निर्देशित किया। देर रात अधिकारियों की सक्रियता से विभागीय कार्यों में तेजी देखने को मिल रही है। फोकस उन कार्यों पर है, जो विगत काफी दिनों से पेंडिंग चल रहे हैं। इसके साथ ही गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि लंबे समय तक प्रयागवासी महाकुंभ के दौरान हुए विकास कार्यों का लाभ उठा सकें। ज्यादातर कार्य टेंपरेरी की बजाए पर्मानेंट बेसिस पर किए जा रहे हैं।   recent visitors 93

दीपावली के साथ बुंदेलखंड में मौनिया नृत्य की बहार ,कलाकार दे रहे अदभुत प्रस्तुति 

With Diwali, Bundelkhand is celebrating Mouniya dance, artists are giving amazing performance  टीकमगढ़ । दीपावली के दूसरे दिन शुक्रवार को निवाड़ी जिले के ओरछा में राम राजा सरकार के दरबार में बुंदेलखंड से मौनिया की टोलियां पहुंचीं। यहां सबसे पहले बेतवा में स्नान किया। दरबार में हाजिरी दी। इसके बाद शुरू हुआ मंदिर के बाहर मौनिया नृत्य। कमर में घुंघरू बांध, हाथ में मोरपंख लेकर ढोल-नगड़िया की थाप, मजीरा की ताल पर मौनिया थिरक रहे हैं। सुबह 5 बजे से लोगों का आना शुरू हो गया। दिनभर यहां लोक कला और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। इस दिन यहां 15 से 20 हजार लोग आते हैं। माइ सीक्रेट न्यूज़ कि टीम ने लोगों से बात की। जाना कि मौनिया नृत्य का इतिहास, मान्यता और कैसे किया जाता है। मौनिया नृत्य करने राम राजा के दरबार में कई टोलियां पहुंची हैं। खरीफ की अच्छी फसल की खुशी, रबी के लिए कामना बुंदेलखंड के ग्रामीण खरीफ की अच्छी फसल होने की खुशी और रबी की अच्छी फसल की कामना करते हैं। इसके लिए दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के बाद मौनिया बुंदेलखंड के 12 देव स्थानों के दर्शन के लिए निकल पड़ते हैं। 12 धार्मिक स्थलों पर जाकर नृत्य करते हैं। इनमें ओरछा के रामराजा सबसे प्रमुख हैं। टोली के सभी ग्रामीण मौन व्रत रखते हैं। इसके बाद घर पहुंचकर मौन व्रत खोलते हैं। ओरछा के रामराजा दरबार में खुशहाली के लिए नृत्य की यह अनूठी परंपरा सैकड़ों वर्षों से जीवंत है। गोवर्धन पूजा तक चलता है कार्यक्रम लोंग बताते हैं कि बुंदेलखंड में दीपावली पर मौनिया नृत्य की प्रस्तुति के लिए एक महीने पहले से कलाकार तैयारी करते हैं। दीपावली की सुबह तीर्थ स्थानों पर पहुंचकर नृत्य करते हैं। लक्ष्मी पूजन के बाद घर से निकल जाते हैं। यह उत्सव गोवर्धन पूजा तक चलता है। यहां छतरपुर, पन्ना, दमोह, उत्तर प्रदेश के झांसी, महोबा, हमीरपुर, बांदा, दतिया से लोग आते हैं। लाठी और डंडों से किया जाता है नृत्य  लोगों ने बताया कि मौनिया नृत्य बुंदेलखंड में खासतौर से सागर, झांसी, निवाड़ी, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना जिले के लोगों द्वारा किया जाता है। इसका स्वरूप सांस्कृतिक के साथ युद्ध कौशल से भी जुड़ा है। इसमें मात्र पुरुष ही हिस्सा लेते हैं। इसका केंद्र वीर रस प्रधान होता है। इसमें ग्रामीण रावला को मनौती के रूप में मानते हैं। इसी वजह से इसे मौनिया नृत्य कहते हैं। इसमें 12 से ज्यादा कलाकार गोला बनाते हैं। बीच में एक नर्तक होता है। सभी के हाथ में लाठियां होती हैं। वे साथ गीत और ढोल नगड़िया की थाप पर लाठियों से वार करते हैं। कलाकार दो डंडे हाथ में लेकर नाच-नाचकर इन डंडों से खेलते हैं। इसमें ढोलक, मंजीरा, रमतूला, झीका, नगारा आदि प्रमुख वाद्य यंत्र हैं। recent visitors 355

मध्यप्रदेश दिवस ख़ास: आखिर कैसे अस्तित्व में आया मध्यप्रदेश? 

Madhya Pradesh Day Special: How did Madhya Pradesh come into existence?  इंदौर और ग्वालियर जैसे धनी शहरों वाला मध्यप्रांत कैसे मध्यप्रदेश में शामिल हुआ? नेता और अफसर जबलपुर को राजधानी मान जमीन खरीदते रहे लेकिन नेहरू और पटेल ने बाजी क्यों पलट दी? भोपाल (कमलेश)। राजधानी के लिए कैसे भोपाल का चुनाव हुआ? जब नया प्रदेश बना तो चार राज्यों के अफसर-कर्मचारियों के बीच कई तरह के विवाद हुए। यहां तक कि पोहे को लेकर भी अफसर-कर्मचारियों में झगड़ा होता था। आइए चलते हैं यादों के खट्‌टे-मीठे सफर पर… मध्य प्रांत, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल को मिलाकर मध्य प्रदेश बना। आखिर नए राज्य की जरूरत क्यों पड़ी मध्यप्रदेश का जन्म एक विचित्र संयोग था। यहां के रहने वालों ने कभी किसी ऐसे प्रदेश की मांग नहीं की थी, लेकिन जब दिसंबर 1952 में श्रीरामुलु नाम का एक व्यक्ति तेलुगू भाषी राज्य की मांग को लेकर भूख हड़ताल करते हुए मर गया और आंध्र प्रदेश का गठन हुआ, तब देश के बाकी इलाके भी भाषायी आधार पर राज्य की मांग करने लगे। तब सुप्रीम कोर्ट के जज सैयद फजल अली की अध्यक्षता में कवालम माधव पाणिक्कर और डॉ. हृदयनारायण कुंजरु की सदस्यता में 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया। मध्यप्रदेश ऐसा राज्य बना, जिसकी कोई भाषायी पहचान नहीं थी। गुना से हिन्दू महासभा के सांसद विष्णु घनश्याम देशपाण्डे ने संसद में नए राज्य का विरोध किया। पुनर्गठन की बहस में बोलते हुए उन्होंने कहा- अगर कोई प्रांत है, जिसका अपना जीवन नहीं है… लाइफ ऑफ इट्स ओन नहीं है, तो वह मध्यप्रदेश है। विधायकों की संयुक्त बैठक नागपुर के विधानसभा भवन में हुई चार राज्यों में सबसे छोटा भोपाल राज्य था। ये अपने शासक नवाब हमीदुल्लाह के बगावती तेवरों के कारण सबसे चर्चित था। आजादी के डेढ़ साल तक नवाब ने भोपाल रियासत का भारत संघ में विलय नहीं किया था। सरदार पटेल के हस्तक्षेप के बाद भोपाल में 30 सदस्यीय विधानसभा का निर्माण हुआ और डॉ. शंकरदयाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया। मध्य प्रांत सबसे बड़ा राज्य था। इसमें नागपुर, विदर्भ के 8 जिलों सहित पूरा छत्तीसगढ़ भी शामिल था। राज्यों के विलीनीकरण के दौरान अंग्रेजों की प्रशासकीय इकाई सेंट्रल प्रॉविन्स और बरार को 1950 में मध्यप्रदेश बना दिया गया था। ये सबसे व्यवस्थित राज्य इसलिए भी था क्योंकि यह अंग्रेजों के समय से एक प्रशासनिक इकाई था। 1956 में जब नया राज्य बनना तय हो गया तो अक्टूबर में चारों राज्यों के सभी कांग्रेसी विधायकों की संयुक्त बैठक नागपुर के विधानसभा भवन में की गई। बैठक में सर्वसम्मति से रविशंकर शुक्ल को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया। राज्य बना तो राजधानी को लेकर उठापटक शुरू हो गई 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद जब नया मध्यप्रदेश बना, तब राजधानी को लेकर काफी जद्दोजहद हुई। जहां ग्वालियर और इंदौर मध्यभारत के बड़े शहर थे, वहीं रायपुर रविशंकर शुक्ल का गृहनगर था। इसके बाद जबलपुर का भी दावा मजबूत था। पुनर्गठन आयोग ने अपनी सिफारिश में जबलपुर का नाम राजधानी के लिए प्रस्तावित किया था। कहा जाता है कि सेठ गोविंददास ने जबलपुर को राजधानी बनवाने के लिए सबसे ज्यादा कोशिश की थी। उन्हीं दिनों विनोबा भावे ने जबलपुर को संस्कारधानी की उपमा भी दी थी। जबलपुर के राजधानी न बन पाने का एक कारण ये भी माना गया कि वहां के समाचार पत्रों में खबर प्रकाशित हुई कि सेठ गोविंददास के परिवार ने जबलपुर-नागपुर रोड पर सैकड़ों एकड़ जमीन खरीद ली है। अखबारों में छपा कि सेठ परिवार ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि जब जबलपुर राजधानी बनेगी तो वहां जमीनों का अच्छा मुआवजा मिलेगा। ये बात जब प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को पता चली तो भोपाल का पक्ष और मजबूत हो गया। भोपाल को राजधानी बनाने का एक कारण और था- विंध्य प्रदेश में समाजवादी आंदोलन को कमजोर करना। जबलपुर राजधानी बनता तो महाकौशल के साथ विंध्य भी राजनीतिक सरगर्मी का केंद्र रहता। जबलपुर को राजधानी न बनाने का एक तर्क और दिया गया कि वहां सरकारी कर्मचारी और कार्यालयों के लिए उपयुक्त इमारतें नहीं हैं। इधर, डॉ. शर्मा प्रधानमंत्री पं. नेहरू को यह समझाने में सफल रहे कि भोपाल में बहुत सारी सरकारी इमारतें और जमीन खाली हैं। यहां जमीन खरीदने की जरूरत नहीं होगी। 1958 में नेहरू ने रखी वल्लभ भवन की नींव राज्य बनने के साथ ही नई राजधानी बनाने का काम भी शुरू हुआ। दूसरे मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू ने दक्षिण की तरफ एक सुनसान जगह को मंत्रालय के लिए चुना। इस इलाके का नाम लक्ष्मीनारायण गिरी रखा गया। 1958 में नेहरु ने वल्लभ भवन की आधारशिला रखी। वल्लभ भवन को बनने में 7 साल का समय लगा। सचिवालय का नाम वल्लभ भवन तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के कहने पर रखा गया। मिश्र वल्लभ भाई पटेल से बहुत प्रभावित थे। उस जमाने में भोपाल का सबसे आखिरी छोर रोशनपुरा चौराहा हुआ करता था। जब भोपाल राजधानी बना तो कर्मचाारियों के लिए नाॅर्थ टीटीनगर और साउथ टीटी नगर बना। उसके बाद भोपाल में एक नंबर, दो नंबर से लेकर ग्यारह नंबर स्टॉप तक बिल्डिंगें बनती रहीं। भोपाल राजधानी बना तो बाकी शहरों को संतुष्ट करने की कोशिश हुई। जबलपुर को हाईकोर्ट, ग्वालियर को रेवेन्यू बोर्ड और इंदौर को लोक सेवा आयोग दिया गया। recent visitors 364

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 10वें हाथी की मौत, दिनभर जांच करती रही टीमें; जांच एजेंसियों ने डेरा जमाया

10 elephants arrived one by one in bandhavgarh Tiger Reserve उमरिया । बांधवगढ़ नेशनल पार्क में गुरुवार को दो और हाथियों ने दम तोड़ दिया। दोपहर में 9वें हाथी और शाम को दसवें हाथी की मौत हुई। मामले में एसटीएफ ने डॉग स्क्वॉड की मदद से 7 खेतों और 7 घरों की तलाशी ली है। उमरिया जिले का बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में मंगलवार को चार हाथियों की मौत हो गई। बुधवार को सुबह खबर आई कि तीन और हाथियों ने दम तोड़ दिया है, फिर बुधवार रात को एक गुरुवार को सुबह एक और शाम को एक और हाथी ने दम तोड़ दिया। इस तरह से मरने वाले हाथियों की संख्या कुल 10 हो चुकी है। कई स्तर पर जांच जारी, हाथियों के शवों का किया जा रहा परीक्षण हाथियों की मौत के बाद राज्य से लेकर केंद्र तक हड़कंप मचा हुआ है। हर कोई सकते में है कि आखिर अचानक इतने हाथियों की मौत कैसे हो गई। ऐसा क्या हुआ जिससे एक-एक करके दस हाथियों ने दम तोड़ दिया। मौत की जांच के लिए केंद्र और राज्य की वाइल्डलाइफ एजेंसी की टीम भी बुधवार को बांधवगढ़ पहुंची है। मौत की सही वजह का पता लगाने के लिए हाथियों के शवों का परीक्षण किया जा रहा है। recent visitors 198

दिवाली पर जहां ठंड की शुरूआत, 3 नवंबर से बदल जाएगा मौसम, 10 राज्यों में आंधी-तूफान, भारी बारिश का अलर्ट

नई दिल्ली दिवाली पर जहां ठंड की शुरूआत हो जाती है वहीं दिल्ली-NCR में अभी भी गर्मी का असर बना हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार, बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती तूफान 'दाना' का असर और कई क्षेत्रों में साइक्लोनिक सर्कुलेशन के सक्रिय होने से दक्षिण ओडिशा, तटीय आंध्र प्रदेश, और दक्षिण-पश्चिम अरब सागर के ऊपर मौसम में बदलाव देखने को मिल सकता है। इसी बीच, IMD ने 29 अक्टूबर से 3 नवंबर के लिए देशभर के मौसम का पूर्वानुमान जारी किया है। उत्तर भारत में ठंड का असर, दक्षिण और मध्य भारत में बारिश का अलर्ट मौसम विभाग का कहना है कि उत्तर भारत में धीरे-धीरे ठंड का असर बढ़ने लगेगा। वहीं, दक्षिण भारत और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में चक्रवाती सर्कुलेशन के कारण भारी बारिश का अनुमान है। ओडिशा, तटीय आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, पश्चिम बंगाल, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, कोंकण-गोवा, लक्षद्वीप, लेह-लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। दिल्ली-NCR: ठंड के संकेत दिल्ली-NCR में दिवाली के बाद गुलाबी ठंड का अहसास शुरू हो जाएगा। मौसम विभाग के अनुसार, 15 नवंबर के बाद सुबह-शाम के तापमान में गिरावट होगी और ठंड के चलते लोगों को गर्म कपड़े पहनने की जरूरत पड़ सकती है। 5 नवंबर तक दिल्ली का मौसम साफ और शुष्क रहने की संभावना है, लेकिन इसके बाद ठंड बढ़ने लगेगी। तापमान और मौसम का हाल 29 अक्टूबर को दिल्ली का अधिकतम तापमान 31.87 °C दर्ज किया गया। दिन में न्यूनतम और अधिकतम तापमान क्रमशः 23.05 °C और 34.47 °C रहने का अनुमान है। हवा में 33% नमी और 33 किलोमीटर प्रति घंटे की गति है। दिल्ली में सूर्योदय सुबह 6:31 बजे और सूर्यास्त शाम 5:38 बजे हुआ। कल, 30 अक्टूबर को राजधानी का न्यूनतम और अधिकतम तापमान 27.16 °C और 35.5 °C रहने की संभावना है। आगामी ठंड: ला नीना का प्रभाव वैश्विक मौसम संगठन ने नवंबर से फरवरी तक उत्तर भारत में सामान्य से ज्यादा ठंड पड़ने की संभावना जताई है, जिसका कारण ला नीना के सक्रिय होने को माना जा रहा है। हालाँकि, इस पर IMD का आधिकारिक अपडेट अभी नहीं आया है। recent visitors 124

दहेज में भारी रकम की डिमांड से लड़की का परिवार सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार

नई दिल्ली सोशल मीडिया पर एक वायरल पोस्ट में दावा किया गया है कि एम्स के यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर ने शादी के लिए 50 करोड़ रुपए का दहेज मांगा है। पोस्ट के मुताबिक दहेज मांगने वाले डॉक्टर की होने वाली पत्नी भी डॉक्टर हैं और हैदराबाद में लिवर ट्रांसप्लांट एनेस्थिसिया विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। इस भारी-भरकम दहेज की मांग से लड़की और उसका परिवार टूट गया है और वे इसे जुटाने के लिए अपनी रिटायरमेंट की बचत तक दांव पर लगाने को तैयार हो है। पोस्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि दोनों तेलुगु परिवारों से हैं, जहां दहेज को एक परंपरा के रूप में देखा जाता है। सोशल मीडिया एक्स पर यह पोस्ट डॉक्टर फीनिक्स नामक यूजर ने की है और इसे अब तक एक मिलियन से ज्यादा लोग देख चुके हैं। सोशल मीडिया पर डॉक्टर की इस मांग की कड़ी आलोचना हो रही है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि इतनी पढ़ाई और प्रतिष्ठित पद पर होने के बावजूद डॉक्टर ने दहेज जैसी प्रथा को क्यों बढ़ावा दिया। कई यूजर्स ने इसे लालच और शर्मनाक बताया और लड़की के परिवार को सलाह दी है कि वे इस मांग के आगे न झुकें। कई लोगों ने लिखा कि इस तरह की घटनाएं समाज में दहेज प्रथा के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि लड़की, जो खुद एक स्वतंत्र और पेशेवर डॉक्टर है, उसे अपने आत्म-सम्मान को बनाए रखते हुए इस रिश्ते से पीछे हटने का फैसला लेना चाहिए। इस घटना ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है, जिसमें लोग पढ़े-लिखे और सम्मानित पदों पर आसीन लोगों द्वारा दहेज मांगने पर सवाल उठा रहे हैं।   recent visitors 85