बीजेपी पूर्व सांसद का विवादित बयान , जब नेपाल जैसी क्रांति आएगी तो राहुल-अखिलेश का घर फूंक दिया जाएगा’

Former BJP MP’s controversial statement: “When a revolution like the one in Nepal comes, Rahul and Akhilesh’s houses will be burnt down.” Subrat Pathak: भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रत पाठक ने एक बार फिर से लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर जोरदार हमला बोला है। गुरुवार को कन्नौज में सुब्रत पाठक ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि अगर भारत में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी कोई क्रांति होती है, तो सबसे पहले राहुल गांधी और अखिलेश यादव के घर फूंक दिए जाएंगे। इन सभी के ऊपर भ्रष्टाचार के मुकदमें हैं। सुब्रत पाठक ने कहा कि देश में अगर कोई क्रांति निकलेगी तो वह देशद्रोही होंगे। ऐसे देशद्रोही अगर सड़कों पर आएंगे, तो राष्ट्रवादी भी सड़कों पर उतरेंगे और उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारेंगे। पाठक ने विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कहा कि राहुल,अखिलेश, लालू सहित कई विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर मुकदमे चल रहे हैं। पूर्व सांसद ने कहा कि 2014 में जब जनता ने ईवीएम के जरिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया,वही असली लोकतांत्रिक क्रांति थी। उन्होंने पाकिस्तान और आतंकियों की भाषा की ओर इशारा करते हुए कहा कि बम फोड़ना और विस्फोट करना उनकी सोच है, जो विपक्ष की बयानबाजी में झलकता है। भाजपा के पूर्व सांसद ने ने राहुल गांधी के आरोपों को बेबुनियाद बताया और कहा कि उन्होंने अब तक प्रधानमंत्री मोदी पर कोई ठोस सबूत के साथ आरोप नहीं लगाया है। उनका मकसद सिर्फ एक परिवार को सत्ता में बनाए रखना है। पाठक ने कहा कि देश चाहता था कि सरदार वल्लभभाई पटेल देश के प्रधानमंत्री बनें, लेकिन उन्हें बनने नहीं दिया गया… यह उनकी (कांग्रेस की) मानसिकता को दर्शाता है। वे शायद यह बदरता नहीं कर सकते कि एक पिछड़े समुदाय का व्यक्ति प्रधानमंत्री बने और देश का नेतृत्व कर रहा है। recent visitors 186

मोदी का विपक्ष पर करारा प्रहार कहा – मैं शिव भक्त हूं, जहर निगल लेता हूं: जनता ही मेरी भगवान, आत्मा की आवाज यहां नहीं तो कहां निकलेगी

मोदी का विपक्ष पर करारा प्रहार कहा – मैं शिव भक्त हूं, जहर निगल लेता हूं: जनता ही मेरी भगवान, आत्मा की आवाज यहां नहीं तो कहां निकलेगी

Modi’s strong attack on the opposition said – I am a Shiv Bhakt, I swallow poison: The public is my God, if not here, then where will the voice of the soul come out पीएम नरेंद्र मोदी ने असम के दरांग में कहा- जब भारत सरकार ने भूपेन हजारिका को भारत रत्न दिया था, उस दिन कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा था- मोदी, नाचने-गाने वालों को भारत रत्न दे रहा है। मैं भगवान शिव का भक्त हूं, सारा जहर निगल लेता हूं, मुझे कितनी भी गालियां दें। लेकिन बेशर्मी के साथ जब किसी और का अपमान होता है, तो मुझसे रहा नहीं जाता है। पीएम बोले- मेरे लिए तो मेरी जनता ही भगवान है। मेरे भगवान के पास जाकर मेरी आत्मा की आवाज वहां नहीं निकलेगी तो कहां निकलेगी, यही मेरे मालिक हैं, पूजनीय हैं, 140 करोड़ देशवासी मेरा रिमोट कंट्रोल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के असम दौरे पर हैं। रविवार को उन्होंने दरांग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, जीएनएम स्कूल और बीएससी नर्सिंग कॉलेज का उद्घाटन और शिलान्यास किया। जिसकी लागत 6300 करोड़ है। शनिवार को गुवाहाटी पहुंचे पीएम ने खानापारा में पशु चिकित्सा मैदान में महान गायक भूपेन हजारिका की विशेष श्रद्धांजलि सभा में भी मौजूद रहे। recent visitors 147

जो कल गलत था, आज सही कैसे? जीएसटी विवाद पर मोदी सरकार जनता से क्या छिपाना चाहती है?

जो कल गलत था, आज सही कैसे? जीएसटी विवाद पर मोदी सरकार जनता से क्या छिपाना चाहती है?

How can what was wrong yesterday be right today? What does the Modi government want to hide from the public on the GST controversy? Modi government a GST controversy आखिर 8 साल बाद भी मोदी सरकार माफी क्यों नहीं मांग रही? जनता से क्या छिपाना चाहती है? चिदंबरम ने पूछा – जो कल गलत था, आज सही कैसे?जीएसटी दरों में कमी के बाद भी मोदी सरकार ने जनता से माफी नहीं मांगी। आखिर सरकार क्या छिपाना चाहती है? जानिए 8 साल की देरी, विवाद और सुधार की अधूरी कहानी। यदि टूथपेस्ट, हेयर आयल, मक्खन, शिशु नैपकिन, पेंसिल, नोटबुक, ट्रैक्टर, स्प्रिंकलर आदि पर पांच फीसद जीएसटी आज अच्छा है, तो पिछले आठ वर्षों में यह बुरा क्यों था? लोगों को आठ वर्षों तक अत्यधिक टैक्स क्यों चुकाना पड़ा? आखिरकार केंद्र सरकार को बात समझ में आ गई। तीन सितंबर, 2025 को सरकार ने कई वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी दरों को तर्कसंगत बना कर कम किया। कर संरचना अब उस अच्छे और सरल कर के करीब है, जिसकी वकालत पिछले आठ वर्षों से कई राजनीतिक दल, व्यवसायी, संस्थान और व्यक्ति (जिनमें मैं भी शामिल हूं) करते रहे हैं। अगस्त, 2016 में जब संसद में संविधान (122वां संशोधन) विधेयक पर बहस हुई थी, तब मैंने राज्यसभा में भाषण दिया था। उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं अडिग रुख Modi government a GST controversy‘मुझे खुशी है कि वित्त मंत्री ने स्वीकार किया कि यूपीए सरकार ने ही सबसे पहले आधिकारिक तौर पर जीएसटी लागू करने के अपने इरादे का एलान किया था। 28 फरवरी, 2005 को बजट भाषण के दौरान लोकसभा में इसकी घोषणा की गई थी। ‘महोदय, चार प्रमुख मुद्दे हैं… Modi government a GST controversy‘अब मैं विधेयक के सबसे महत्त्वपूर्ण भाग पर आता हूं… यह कर की दर के बारे में है। मैं अभी मुख्य आर्थिक सलाहकार की रपट के कुछ अंश पढूंगा… कृपया याद रखें कि हम एक अप्रत्यक्ष कर पर विचार कर रहे हैं। अप्रत्यक्ष कर की परिभाषा के अनुसार, यह एक प्रतिगामी कर है। कोई भी अप्रत्यक्ष कर अमीर और गरीब दोनों पर समान रूप से लागू होता है… मुख्य आर्थिक सलाहकार की रपट कहती है: ‘उच्च आय वाले देशों में औसत जीएसटी दर 16.8 फीसद है भारत जैसी उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं में यह औसत 14.1 फीसद है।’ इस तरह दुनिया भर में 190 से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में जीएसटी लागू है। यह 14.1 फीसद से 16.8 फीसद के बीच है।‘हमें करों को कम रखना होगा। साथ ही, हमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के मौजूदा राजस्व की रक्षा करनी होगी। …हम ‘राजस्व तटस्थ दर’ यानी आरएनआर के जरिए यह करते हैं। ‘मुख्य आर्थिक सलाहकार राज्य सरकार के प्रतिनिधियों और अन्य विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श के बाद 15 फीसद से 15.5 फीसद के आरएनआर पर पहुंचे और फिर सुझाव दिया कि मानक दर 18 फीसद होनी चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने 18 फीसद कोई हवा से नहीं निकाला है। यह आपकी रपट से निकला है। ‘…किसी को तो जनता के लिए आवाज उठानी ही होगी। जनता की ओर से, मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि इस दर को मुख्य आर्थिक सलाहकार द्वारा अनुशंसित दर पर ही रखें, यानी मानक दर 18 फीसद से अधिक नहीं होनी चाहिए रपट के पैरा 29, 30, 52 और 53 पढ़ें। इसमें स्पष्ट रूप से तर्क दिया गया है… Modi government a GST controversy अठारह फीसद की मानक दर केंद्र और राज्यों के राजस्व की रक्षा करेगी, यह पर्याप्त होगी, मुद्रास्फीति-रोधी होगी, कर चोरी से बचाएगी और भारत के लोगों को स्वीकार्य होगी… यदि आप वस्तुओं और सेवाओं पर 24 फीसद या 26 फीसद कर लगाने जा रहे हैं, तो फिर जीएसटी विधेयक लाने की क्या आवश्यकता है? Read more: प्रतिनियुक्ति लेकर मलाईदार पदों पर वर्षों से जमे शिक्षक ‘अंतत: आपको कर विधेयक में एक दर रखनी ही होगी। मैं अपनी पार्टी की ओर से स्पष्ट रूप से मांग करता हूं कि जीएसटी की मानक दर, जो 70 फीसद से अधिक वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होती है, वह अठारह फीसद से अधिक नहीं होनी चाहिए और निम्न एवं अन्य दर अठारह फीसद के आधार पर तय की जा सकती है। आठ वर्ष की पीड़ा Modi government a GST controversyवर्ष 2016 में भी मैंने यही बात कही थी, जो आज कह रहा हूं। मुझे खुशी है कि सरकार इस विचार पर सहमत हो गई कि दरों को युक्तिसंगत और कम किया जाना चाहिए। हालांकि, शुरुआत में सरकार का तर्क था कि अठारह फीसद की सीमा से राजस्व का भारी नुकसान होगा, खासकर राज्य सरकारों को। यह चिंता का एक बड़ा कारण था। आज दो कर दरें पांच फीसद और अठारह फीसद हैं! केंद्र के पास कर राजस्व बढ़ाने के कई तरीके हैं; अगर राज्य सरकारों को राजस्व का नुकसान होता है, तो सही कदम यही होगा कि उन्हें मुआवजा दिया जाए पिछले आठ वर्षों में सरकार ने उपभोक्ताओं से ज्यादा से ज्यादा पैसा वसूलने के लिए कई जीएसटी दरों का इस्तेमाल किया। पहले वर्ष (जुलाई 2017 से मार्च 2018) में सरकार ने लगभग 11 लाख करोड़ रुपए एकत्र किए। वर्ष 2024-25 में लगभग 22 लाख करोड़ रुपए संग्रहित किए गए। उपभोक्ताओं द्वारा अपनी मेहनत से कमाया गया पैसा सरकार ने जीएसटी के माध्यम से छीन लिया- इसे सही मायने में और उपहासपूर्वक गब्बर सिंह टैक्स कहा गया। उच्च जीएसटी दरें कम खपत और बढ़ते घरेलू कर्ज के कारणों में से एक थीं। यह बुनियादी अर्थशास्त्र है कि करों में कमी से खपत को बढ़ावा मिलेगा। यदि टूथपेस्ट, हेयर आयल, मक्खन, शिशु नैपकिन, पेंसिल, नोटबुक, ट्रैक्टर, स्प्रिंकलर आदि पर पांच फीसद जीएसटी आज अच्छा है, तो पिछले आठ वर्षों में यह बुरा क्यों था? लोगों को आठ वर्षों तक अत्यधिक कर क्यों चुकाना पड़ा? अभी बहुत कुछ बाकीदरों में कमी तो बस शुरुआत है। अभी और भी बहुत कुछ करना बाकी है। सरकार को चाहिए कि- राज्यों, उत्पादकों और उपभोक्ताओं को एक ही जीएसटी दर (जरूरत पड़ने पर और छूट के साथ) के लिए तैयार करे; अधिनियमों और नियमों की धाराओं के लिए प्रचलित अस्पष्ट भाषा को खत्म करे; उन्हें सरल भाषा में फिर से लिखे; सरल फार्म और रिटर्न निर्धारित करे, फार्म भरने की आवृत्ति में तर्कसंगत कमी करे; … Read more

जो खून बहना था वह बह गया, पैसे से लोगों की सोच बदलने गए मोदी : कांग्रेस नेता

जो खून बहना था वह बह गया, पैसे से लोगों की सोच बदलने गए मोदी : कांग्रेस नेता

The blood that was to be shed has been shed, Modi went to change people’s thinking with money: Congress leader नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 सितंबर को मणिपुर के दौरे पर हैं। यह उनका 2023 की जातीय हिंसा के बाद पहला दौरा है। इस यात्रा को राज्य में शांति और विकास को मजबूत करने के लिए अहम माना जा रहा है। पीएम मोदी ने चुराचांदपुर और इंफाल में कई परियोजनाओं का उद्घाटन किया। वहीं इस दौरे को लेकर विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।कांग्रेस बोली-बहुत देर हो चुकी हैCongress leader Udit Raj ने बयान में पीएम मोदी के दौरे पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले ही कुकी और मैतेई दोनों समूह पीएम के खिलाफ विरोध जता रहे हैं और अब यह यात्रा ‘हीलिंग टचÓ नहीं मानी जाएगी। Congress leader Udit Raj का कहना है कि एक समय था जब पीएम जाकर बहुत कुछ कर सकते थे, लेकिन अब बहुत खून बह चुका है और सिर्फ 3 घंटे की यात्रा से कुछ नहीं होगा। वह भले ही कुछ परियोजनाओं की घोषणा करें लेकिन पैसों से लोगों की सोच नहीं बदली जा सकती। 2023 में भड़की थी जातीय हिंसाबता दें कि 2023 में मणिपुर में जातीय हिंसा भड़की थी, जिसमें कम से कम 260 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विस्थापित हुए थे। इसके बाद से ही राज्य में तनाव और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है. पीएम मोदी का यह दौरा लंबे समय से प्रतीक्षित था और इसे जनता और राजनीतिक दल दोनों करीब से देख रहे हैं। चुराचांदपुर और इंफाल ऐसे इलाके हैं, जहां हिंसा का असर सबसे ज्यादा रहा और अब यहां नए विकास कार्यों के जरिए माहौल को सामान्य करने की कोशिश की जा रही है। दौरे का महत्व और आगे की राहविशेषज्ञों का मानना है कि पीएम मोदी का यह दौरा मणिपुर में शांति और पुनर्निर्माण के लिए एक बड़ा संदेश है। यह सिर्फ परियोजनाओं का उद्घाटन नहीं बल्कि राज्य के लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश भी है. हालांकि विपक्ष इसे ‘बहुत देर से उठाया गया कदम बता रहा है। अब देखना होगा कि इस यात्रा से क्या सकारात्मक असर होता है और क्या यह मणिपुर में स्थायी शांति और विकास के नए रास्ते खोल पाएगी। recent visitors 105

कलेक्टर नहीं, मप्र में मुख्यमंत्री को स्वयं बदलने की जरूरत : संगीता शर्मा

कलेक्टर नहीं, मप्र में मुख्यमंत्री को स्वयं बदलने की जरूरत : संगीता शर्मा

Not the collector, but the Chief Minister himself needs to be changed in Madhya Pradesh: Sangeeta Sharma भोपाल। प्रदेश की राजनीतिक हलचल के बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव पर कांग्रेस ने तीखा हमला बोला है। हाल ही में भिंड में विधायक और कलेक्टर के बीच हुए टकराव को निशाना बनाते हुए कांग्रेस ने कहा कि सरकार में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच तालमेल पूरी तरह बिगड़ चुका है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के राज में न तो जनप्रतिनिधियों की सुनवाई हो रही है और न सरकार प्रशासन की साख बचा पा रही है।राज महिला आयोग की पूर्व सदस्य एवं प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता संगीता शर्मा ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री कलेक्टर को हटाने की बात कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि प्रदेश में किसानों पर लाठियाँ बरस रही हैं, मासूम अस्पतालों में दम तोड़ रहे हैं और अधिकारी भ्रष्टाचार में डूबे हैं।उन्होंने कहा कि खाद के लिए किसान घंटों कतारों में खड़े अपमान झेल रहे हैं और उन पर पुलिस की लाठियाँ बरसाई जा रही हैं। इंदौर के एमवाय अस्पताल में दो बच्चों की मौत चूहों के काटने से होना सरकार की गंभीर लापरवाही को उजागर करता है। वहीं कुत्तों के इलाज के नाम पर आए करोड़ों रुपये निकाय अफसरों की जेबों में चले जा रहे हैं।शर्मा ने सवाल उठाया कि क्या यही भाजपा की “डबल इंजन” सरकार का सुशासन है? उनका कहना है कि मुख्यमंत्री को कलेक्टर नहीं, बल्कि खुद को बदलने की जरूरत है। recent visitors 84

कांग्रेस का बड़ा सियासी धमाका, बीजेपी-बीएसपी के नेताओं ने जीतू पटवारी कि मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम

कांग्रेस का बड़ा सियासी धमाका, बीजेपी-बीएसपी के नेताओं ने जीतू पटवारी कि मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम

Big political by Congress, BJP-BSP leaders joined Congress in the presence of Jeetu Patwari ग्वालियर। Big political by Congress ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीति में नए समीकरण बनने लगे हैं। रविवार को ग्वालियर ग्रामीण से बीजेपी और बीएसपी के कई नेता व कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हुए। इस कदम ने कांग्रेस के संगठन को नई ताकत और सियासी परिदृश्य को नया मोड़ दिया है। ग्वालियर ग्रामीण विधानसभा की राजनीति ने रविवार को नया मोड़ ले लिया। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से जुड़े कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम लिया। इस मौके पर पटवारी ने कहा – कांग्रेस परिवार में सभी का स्वागत और हृदय से अभिनंदन करता हूं। लोकतंत्र और संविधान बचाने की लड़ाई, हम सब मिलकर लड़ेंगे। ग्वालियर-चंबल: सत्ता की कुंजी वाला क्षेत्र Big political by Congress मध्यप्रदेश की राजनीति में ग्वालियर-चंबल अंचल हमेशा निर्णायक रहा है। यहाँ की दिशा ही कई बार सत्ता की दशा तय करती आई है। बीजेपी और बीएसपी से कांग्रेस में हुआ यह जुड़ाव स्थानीय और राज्य स्तरीय समीकरणों को गहराई से प्रभावित करेगा। लोकतंत्र बनाम सत्ता की राजनीति Big political by Congress पटवारी का वक्तव्य यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस केवल सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए संघर्षरत है। मौजूदा हालात में जब विपक्ष पर दबाव और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, कांग्रेस ने खुद को लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक बताने की कोशिश की है। नए कार्यकर्ता, नई ऊर्जा Big political by Congress किसी भी राजनीतिक दल की ताकत उसके कार्यकर्ता होते हैं। बीजेपी और बीएसपी छोड़कर कांग्रेस में आए इन कार्यकर्ताओं से न केवल संगठन को मजबूती मिलेगी बल्कि गांव-गांव में कांग्रेस का जनाधार भी और गहराएगा। यह बदलाव कार्यकर्ताओं की नाराजगी और जनता की नई उम्मीदों दोनों को दर्शाता है। बीजेपी और बीएसपी को झटका Big political by Congress ग्वालियर ग्रामीण में यह घटना बीजेपी और बीएसपी के लिए बड़ा झटका है। यहाँ के जातीय और सामाजिक समीकरण अक्सर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस में हुए इस जुड़ाव से विपक्षी दलों का परंपरागत वोट बैंक प्रभावित होना तय माना जा रहा है। जनता की प्राथमिकताएँ बदल रही हैं Big political by Congress महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों से जूझती जनता अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में है, जो सच्चे अर्थों में उनकी आवाज बने। कांग्रेस में शामिल हुए नए नेता और कार्यकर्ता इस उम्मीद को मजबूत कर सकते हैं। राजनीतिक संदेश स्पष्ट Big political by Congress यह सदस्यता अभियान केवल दल-बदल की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश है जनता बदलाव चाहती है। ग्वालियर ग्रामीण की यह तस्वीर प्रदेश में नई राजनीति की पृष्ठभूमि तैयार करती दिख रही है। ग्वालियर ग्रामीण का यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए नई ऊर्जा लेकर आया है। वहीं बीजेपी और बीएसपी के लिए यह चेतावनी है कि जनता अब उनके पारंपरिक वादों से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक मूल्यों और वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है।कांग्रेस का बढ़ता परिवार प्रदेश की राजनीति में नई करवट का संकेत है—बदलाव अब सिर्फ शुरुआत है, असली लड़ाई आगे है। ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीति में हलचल, जब बीजेपी और बीएसपी के कई नेताओं ने कांग्रेस का दामन थामा। जीतू पटवारी ने कहा – लोकतंत्र और संविधान की रक्षा ही अब असली राजनीति है। recent visitors 113

सत्ता जातें हीं पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीश धनखड़ को आईं कांग्रेस कि याद, किया कांग्रेस का सदस्य होने का दावा

सत्ता जातें हीं पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीश धनखड़ को आईं कांग्रेस कि याद, किया कांग्रेस का सदस्य होने का दावा

As soon as the power went away, former Vice President Jagdish Dhankhar remembered Congress and claimed to be a member of Congress पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ एक बार फिर चर्चा में हैं। सरकारी बंगला खाली कर छतरपुर के निजी आवास में लौटना और साथ ही कांग्रेस के पूर्व विधायक के तौर पर पेंशन के लिए दोबारा आवेदन करना—ये दोनों खबरें अपने आप में गहरे राजनीतिक संकेत देती हैं। यह वही धनखड़ हैं, जो कभी सत्ता के शिखर पर बैठे थे। उपराष्ट्रपति जैसे गरिमामयी पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने सार्वजनिक मंचों से दूरी बना ली और अब अचानक निजी जीवन की ओर लौटते दिखाई देते हैं। सवाल उठता है कि क्या यह महज व्यक्तिगत निर्णय है, या फिर सत्ता से बाहर होते ही नेताओं की असलियत उजागर हो जाती है? पद पर रहते हुए नेता विशेषाधिकारों का भोग करते हैं—सरकारी बंगले, सुरक्षा, गाड़ियाँ और तमाम रुतबे के साथ। लेकिन सत्ता छूटते ही जब वही नेता आम नागरिक की तरह पेंशन के लिए आवेदन करते हैं, तो लोकतंत्र की हकीकत खुलकर सामने आ जाती है। धनखड़ का यह कदम एक आईना है—जो दिखाता है कि सत्ता अस्थायी है और नागरिक अधिकार स्थायी। लेकिन इस आईने में लोकतंत्र की खामियां भी झलकती हैं। जिन नेताओं के पास करोड़ों की संपत्ति होती है, वे भी जनता की गाढ़ी कमाई से मिलने वाली पेंशन पर आश्रित हो जाते हैं। राजनीतिक तौर पर यह सवाल और बड़ा है: क्या जनता उन्हें केवल सत्ता तक पहुंचाने का साधन भर है, या फिर नेताओं के जीवन का आधार भी? धनखड़ का यह पेंशन प्रकरण उसी राजनीति की परतें खोलता है, जिसमें पद पर रहते हुए नेता जनता से ऊपर दिखते हैं, और पद छूटते ही जनता जैसी कतार में खड़े हो जाते हैं। लोकतंत्र में यह असमानता असली चुनौती है। और शायद यही वजह है कि जनता नेताओं से सवाल पूछना चाहती है—सत्ता में रहते हुए आपने क्या किया, और सत्ता से बाहर होकर किसके सहारे खड़े हैं? recent visitors 118