Monday, July 6, 2026 1:35 pm

जिन सरपंचों ने 20 फीसदी कमीशन जमा किया, उन्हें भी नहीं मिल रहा काम : दिग्विजय सिंह

जिन सरपंचों ने 20 फीसदी कमीशन जमा किया, उन्हें भी नहीं मिल रहा काम : दिग्विजय सिंह

Even those sarpanches who deposited 20% commission are not getting work: Digvijay Singh भोपाल। प्रदेश स्तरीय पंचायत कार्यशाला को लेकर राज्यसभा सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा है कि भाजपा को 22 साल बाद पंचायत प्रतिनिधियों की याद आई है। उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों के मुद्दे पर मुख्यमंत्री मोहन यादव और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रह्लाद पटेल को खुली बहस की चुनौती दी है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि भाजपा को 22 साल बाद पंचायत प्रतिनिधियों को अधिकार देने की याद आई है। हमने सोचा था कि वे पंचायत प्रतिनिधियों को ऐसें अधिकार देंगे, जिससे अधिकारी उनके नियंत्रण में आ सकें। लेकिन केवल एक ही घोषणा हुई है कि जिला पंचायतों और जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष जो शिक्षा समिति का अध्यक्ष होता है, उनको विद्यालयों के निरीक्षण का अधिकार दिया है। उन्हें सिर्फ जांच करने का अधिकार देने की बात तो कही गई है, लेकिन निरीक्षण पर कार्रवाई का अधिकार अधिकारी-कर्मचारी के पास ही रहेगा। मंत्री पटेल के कार्यकाल में चल रहा कमीशन का खेल सिंह ने कहा कि मुझे सीएम डॉ मोहन यादव के मुकाबले पंचायत मंत्री प्रह्लाद पटेल से ज्यादा उम्मीद थी। क्योंकि वे ग्रामीण परिवेश के हैं। पंचायत का जितना अनुभव प्रह्लाद पटेल को होगा, उतना सीएम डॉ मोहन यादव को नहीं होगा। लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि उनके कार्यकाल में भी खुलेआम प्रदेश स्तर पर कमीशनखोरी हो रही है।जो पैसा सीधा पंचायत के पास जाना चाहिए वो नहीं जा रहा है। दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा कि इससे पहले पंचायत मंत्री थे महेंद्र सिसोदिया। उन्होंने सिस्टम बना रखा था कि “20 फीसदी दो और मंजूरी लो” वो आज भी कायम है। मेरे चुनाव क्षेत्र राजगढ़ के कई सरपंचों ने बताया कि उन्होंने एडवांस बुकिंग भी कर दी 20 फीसदी कमीशन जमा भी कर दिया, लेकिन पैसा उन्हें नहीं मिला। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और मंत्री प्रह्लाद पटेल से कहा कि कम से कम जिसने कमीशन दे दिया है, उनका तो काम कर दीजिए। इन अधिकारों की मांग दिग्विजय सिंह ने कहा कि इससे ज्यादा इस सरकार से उम्मीद भी नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री dr यादव और मंत्री पटेल से पूछा है कि कि क्या वे पंचायत प्रतिनिधियों को शिक्षक नियुक्ति का अधिकार देंगे? आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति का अधिकार देंगे? सीएम इतना ही करें कि तृतीय श्रेणी में जो पंचायत विभाग में काम करते हैं या ग्रामीण विकास में काम करते हैं उनकी नियुक्ति का अधिकार देंगे? उन्होंने पूछा कि जिस धारा 40 का धौंस दिखाकर सरपंचों को पृथक करते हैं क्या उसे वापस लेंगे? बेकार की बात करते हैं सीएम यादव पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि मोहन यादव बेकार की बात करते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और प्रह्लाद पटेल को बहस करने की खुली चुनौती दी है। साथ ही कहा कि भले वे भाजपा के ही पंचायत प्रतिनिधियों को साथ लेकर आएं। उन्होंने कहा कि पंचायत प्रतिनिधियों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। जिला परिषद अध्यक्ष को गाड़ी और राज्यमंत्री का दर्जा है, लेकिन राजगढ़ में जिला परिषद अध्यक्ष को एक कॉन्स्टेबल मंच पर चढ़ने से रोक देता है। ये आपका पंचायत प्रतिनिधियों के प्रति सम्मान है? recent visitors 69

वेंटिलेटर पर मंडला जिला अस्पताल की व्यवस्थायें, जिम्मेदार बेफिक्र

Mandla District Hospital’s arrangements on ventilator, responsible unconcerned मंडला। जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था अपनी बदहाली के कारण एक बार फिर सवालों के घेरे में है। धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों की मनमानी और अव्यवस्थाओं के चलते जिला अस्पताल अब इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि मरीजों के लिए परेशानी का सबब बन गया है। सबसे गंभीर आरोप सिविल सर्जन की भूमिका पर लग रहे हैं, जिनकी निष्क्रियता के चलते पूरी व्यवस्था चरमरा गई है।जानकारी अनुसार जिला अस्पताल में ओपीडी का समय सुबह 9:30 बजे निर्धारित है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यहां पदस्थ अधिकांश डॉक्टर 10:30 या 11 बजे के बाद ही अपनी कुर्सियों पर नजर आते हैं। वहीं दोपहर 2 बजते ही केबिन सख्ती से बंद कर दिए जाते हैं। दूर-दराज के गांवों से सुबह 7 बजे आकर कतार में लगे मरीजों को अक्सर बिना इलाज के बैरंग लौटना पड़ता है। बुजुर्गों के लिए न लाइन, न सम्मान, स्वच्छता अभियान दिखा रहा ठेंगा निजी अस्पतालों में जहाँ वरिष्ठ नागरिकों को प्राथमिकता मिलती है, वहीं जिला अस्पताल में बुजुर्ग और दिव्यांग घंटों लाइन में धक्के खाने को मजबूर हैं। चलने में असमर्थ मरीजों के लिए व्हीलचेयर तो हैं, लेकिन वे शो-पीस बनी हुई हैं। बताया गया कि वार्डों में गंदगी और शौचालयों की बदबू ने स्वच्छ भारत अभियान की पोल खोलकर रख दी है। मरीजों को स्वस्थ माहौल देने के बजाय गंदगी के बीच रहने को मजबूर किया जा रहा है। पार्किंग और ब्लड बैंक में वसूली का खेल : अस्पताल परिसर में पार्किंग के नाम पर अवैध वसूली और अभद्रता की शिकायतें आम हो गई हैं। वहीं जीवन रक्षक माने जाने वाले ब्लड बैंक में भी नियमों के बजाय जान-पहचान और मनमर्जी हावी है। आरोप है कि बिना सिफारिश के खून उपलब्ध नहीं होता, जो मानवता को शर्मसार करने जैसा है। सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। लोगों का सवाल है कि वर्षों से एक ही पद पर जमे जिम्मेदार पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या राजनीतिक संरक्षण जनता की सेहत से बड़ा है? प्रमुख मांगें: सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि सिविल सर्जन को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए।बायोमेट्रिक हाजिरी से डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित हो। अस्पताल की नियमित सफाई और बुजुर्गों के लिए अलग काउंटर की व्यवस्था हो। recent visitors 70

बालाघाट में एसआईआर के दबाव में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता का मौत

Anganwadi worker dies under pressure from SIR in Balaghat बालाघाट। बालाघाट विधानसभा क्षेत्र-111 के अंतर्गत मतदान केन्द्र क्रमांक -10 बोट्टा की बीएलओ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता 50 वर्षीय अनिता पति नरेश नागेश्वर का उपचार के दौरान निधन हो गया। जिससे हड़कंप की स्थिति है। वहीं मृतिका के पति ने एसआईआर कार्य का लोड होने से तनाव में आने के कारण बीमार होने का आरोप लगाया है। अनीता नागेश्वर का रात्रि में उपचार के दौरान आकस्मिक निधन हो गया। विगत 13 नवम्बर से उनका गोंदिया में उपचार चल रहा था और गंभीर होने पर रात्रि में नागपुर ले जाने के दौरान रस्ते में मौत गई। बीएलओ अनीता नागेश्वर के निधन पर विधायक अनुभा मुंजारे ने शोक व्यक्त किया है। विधायक अनुभा मुंजारे ने कहा कि यह दुखद खबर है कि हमारे क्षेत्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और बीएलओ का कार्य कर रही अनीता नागेश्वर का निधन हो गया। जैसी उन्हें जानकारी परिजनों से मिली है कि उनपर एसआईआर कार्य का लोड था और इसी के चलते वह बीमार हो गई। जिससे उपचार के लिए उन्होंने बालाघाट और गोंदिया में उपचार कराया। नागपुर ले जाने के दौरान निधन हो गया। उन्होंने बताया कि एसआईआर कार्य कराने के नाम पर काम का बोझ या दबाव नहीं बनाना चाहिए। कर्मचारियों के साथ तनाव के कारण ऐसी घटना सामने आना चिंतनीय है। प्रशासन को एसआईआर कार्य करना है तो कर्मचारियों को विश्वास में ले और सद्भावना के तहत कार्य कराए। दबाव बनाकर कार्य नहीं कराया जाना चाहिए। recent visitors 74

रीवा मेडिकल कालेज के जर्जर आवासीय भवन को बगैर टेंडर गिराने का खेल

रीवा मेडिकल कालेज के जर्जर आवासीय भवन को बगैर टेंडर गिराने का खेल

The game of demolishing the dilapidated residential building of Rewa Medical College without tender रीवा। श्यामशाह मेडिकल कालेज के आवासीय जर्जर भवन को गिराने का खेल चल रहा है। बगैर टेंडर एवं मूल्यांकन कराए चहेते ठेकेदार को भवन गिराने का काम दे दिया गया। इसके पूर्व गांधी मेमोरियल अस्पताल के पीछे जर्जर वार्ड और नर्सिंग कालेज के जर्जर भवन को गिराया गया था जिसका टेंडर नही कराया गया था। डिप्टी सीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट की आड़ में चहेते ठेकेदार को अधिकारी अनुचित लाभ पहुंचाने के लिये नियमो को ताक में रखकर काम कर रहे है। जल्द ही इस मामले की शिकायत ईओडब्ल्यू में की जाएगी। दरअसल टेंडर और मूल्यांकन न कराकर शासन के राजस्व का नुकसान किया गया है। विभागीय सूत्रो की माने तो इस्तयाक नामक ठेकेदार को मौखिक आदेश देकर भवन गिराया जा रहा है। इसमें डीजीएम की अहम भूमिका है। सवाल यह उठता है कि अगर इतनी जल्दी थी तो टेंडर की प्रक्रिया क्यो नही की गई? केवल प्रोजेक्ट के आड़ में चेहेते ठेकेदार को अधिकारी उपकृत कर रहे है। लगातार जर्जर भवन गिराए जाने का खेल जारी है। शासन को भले ही राजस्व के रूप में कुछ न मिले लेकिन बेश कीमती पत्थर-पटिया आदि से ठेकेदार को पैसा जरूर मिल रहा है। चहेते दो ठेकेदारो पर अधिकारी मेहरबान शहर के अंदर कही भी सरकारी जर्जर भवन अगर गिराया जाना है तो उसका काम केवल दो ही चर्चित ठेकेदारो को मिलता है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त इन ठेकेदारो पर अधिकारी भी मेहरबान है। मेडिकल कालेज के जर्जर आवासीय भवन गिराने का काम चल रहा है। बगैर टेंडर प्रक्रिया के चहेते ठेकेदार को काम दे दिया गया जो लगातार भवन को गिरा रहे है। विभागीय सूत्रो ने बताया कि इस्तयाक और इकबाल नामक दो ठेकेदारो को काम दिया गया है। सवाल यह उठता है कि ऐसी आखिर क्या जल्दी थी कि बगैर टेंडर और मूल्यांकन कराए भवन गिराने का काम दे दिया गया। इन ठेकेदारो के अलावा भी कई लोग है जो भवन गिराने का काम करते है।शासन के राजस्व का नुकसानमेडिकल कालेज परिसर में स्थित जर्जर आवासीय भवन एवं नर्सिंग कालेज का भवन गिराने का काम किया गया। जिसका कोई टेंडर नही कराया गया है। म.प्र भवन विकास निगम के डीजीएम अजय ठाकुर द्वारा चहेते ठेकेदार को भवन गिराने की अनुमति दे दी गई। टेंडर तो दूर कोई मूल्यांकन भी नही कराया गया और न ही राशि जमा कराई गई। ऐसी क्या जल्दी थी कि बगैर मूल्यांकन के आनन-फानन भवन को गिराया गया. कही न कही यह आर्थिक अनियमितता है और शासन के राजस्व का नुकसान हुआ है। प्रोजेक्ट के कारण गिराए गए भवन: डीजीएमम.प्र भवन विकास निगम के डिप्टी जीएम अजय ठाकुर ने बताया कि मेडिकल कालेज परिसर में वही भवन बगैर टेंडर के गिराए गए है जो प्रोजेक्ट में बाधा बन रहे थे और टेंडर प्रक्रिया में समय लगता। ऐसे में प्रोजेक्ट को गति देने के लिये मूल्यांकन कराकर जर्जर भवन गिराया गया है और जो शेष आवासीय भवन है उनका टेंडर कराने की प्रक्रिया चल रही है, टेंडर होने के बाद ही गिराया जायेगा। recent visitors 64