यूरिया के बढ़ते इस्तेमाल से फसल पर असर, नाइट्रोजन की अधिक मात्रा से पौधे कमजोर, कीट-रोग का बढ़ता खतरा

Impact of rising urea usage on crops: excess nitrogen weakens plants and increases the risk of pests and diseases. खंडवा । कृषि विभाग ने हाल में किए विश्लेषण में यह जानकारी सामने आई है। विभाग के अनुसार नाइट्रोजन की अधिक मात्रा मिलने से पौधे कोमल और रसीले हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में माहू और थ्रिप्स जैसे रस चूसक कीटों के साथ फफूंदजनित रोगों का प्रकोप बढ़ने की आशंका रहती है। पौधे की वानस्पतिक अवस्था भी लंबी हो जाती है, जिससे फसल देर से पकती है और दानों के भराव पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विभाग किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड में दी गई अनुशंसा के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करने की सलाह देगा। डीएपी के विकल्प भी बताएगा विभाग रबी और खरीफ की बोवनी के समय डीएपी की मांग बढ़ने से बाजार में इसकी आपूर्ति पर दबाव रहता है। कृषि विभाग किसानों को केवल डीएपी पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध वैकल्पिक उर्वरक संयोजनों के उपयोग की जानकारी देगा। विभाग के अनुसार यूरिया के साथ टीएमपी या एमएसपी जैसे विकल्पों का उपयोग करने पर प्रति एकड़ लागत डीएपी के आसपास या कम रह सकती है। इन विकल्पों से फसल को सल्फर और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व भी मिलते हैं। शिविरों में किसानों को इन उर्वरकों के सही अनुपात और उपयोग की विधि की जानकारी दी जाएगी। एनपीके की संतुलित मात्रा देना जरूरी कृषि उपसंचालक सीएल केवड़ा ने बताया कि फसल की आवश्यकता के अनुसार एनपीके की संतुलित मात्रा देना जरूरी है। किसानों को बुआई के समय बेसल डोज में फास्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों की 100 प्रतिशत तथा नाइट्रोजन की 25 से 50 प्रतिशत मात्रा देने की सलाह दी जाएगी। नाइट्रोजन की शेष मात्रा फसल की आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग अवस्थाओं में देने के लिए किसानों को प्रेरित किया जाएगा। इस संबंध में जिले के सभी कृषि विस्तार अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। recent visitors 20

चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग, कपिल सिब्बल बहुमत साथ नहीं तो पद पर क्यों?

Demand for Election Commissioner Gyanesh Kumar’s resignation; Kapil Sibal asks: Why hold the post if you don’t have the majority’s support? SIR News: वोटर लिस्ट में बदलाव को लेकर चल रही SIR की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में है। राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कई सवाल उठाए हैं। सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग के अंदर ही कुछ फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों ने कई बार आपत्ति जताई है। सिब्बल ने अपनी बात रखते हुए द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और काम करने के तरीके पर आपत्ति जताई। ये आपत्तियां वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, नाम हटाने और वोटर लिस्ट से जुड़े कंप्यूटर सिस्टम जैसे मामलों पर थीं। आखिर SIR को लेकर सवाल क्या है?SIR यानी वोटर लिस्ट की खास तरीके से जांच। इसके तहत यह देखा जा रहा है कि वोटर लिस्ट में किसका नाम होना चाहिए और किस नाम में बदलाव की जरूरत है। इसी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। सिब्बल का कहना है कि चुनाव आयोग में तीन सदस्य होते हैं। ऐसे में अगर दो चुनाव आयुक्त किसी फैसले पर आपत्ति जता रहे हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि फैसला किस तरह लिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने कई मामलों में कहा कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए। दोनों ने वोटर लिस्ट के कंप्यूटर सिस्टम तक स्थानीय अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि वोटर लिस्ट का काम जमीन पर मौजूद अधिकारियों के हाथ में रहना चाहिए। नए वोटर के फॉर्म पर भी सवालनए वोटर बनने के लिए Form 6 भरा जाता है। सिब्बल ने इस फॉर्म में हुए बदलाव का भी मुद्दा उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, फॉर्म 6 में SIR से जुड़ा एक नया सवाल जोड़ा गया। इसमें आवेदक से पूछा गया कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली वोटर लिस्ट में था या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव को लेकर सवाल उठाया था और कहा था कि नियम बदले बिना फॉर्म में इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की। वोटर लिस्ट से नाम हटाने का भी मुद्दासिब्बल ने वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का भी दावा किया। रिपोर्ट के मुताबिक, SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 13 करोड़ से ज्यादा नामों पर असर पड़ा है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इतने सभी नाम अंतिम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया है। वहां 97 लोगों को स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने वोटर लिस्ट में शामिल किए जाने के योग्य माना, लेकिन सॉफ्टवेयर में उन्हें वापस जोड़ने की सुविधा समय पर नहीं मिल सकी। इसके चलते उनके नाम अंतिम सूची में नहीं आ पाए। सिब्बल ने क्या मांग की?इन मुद्दों को लेकर सिब्बल ने CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने और SIR की प्रक्रिया रोकने की मांग की है। उन्होंने चुनाव आयोग के फैसलों और उसके काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए। वहीं, चुनाव आयोग के भीतर सामने आई आपत्तियों पर भी आयोग से सवाल पूछे गए थे, लेकिन आयोग की ओर से जवाब नहीं दिया गया। अब SIR को लेकर बहस सिर्फ वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं रह गई है। चुनाव आयोग के अंदर दो आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों ने भी इस मामले को चर्चा में ला दिया है। recent visitors 73

राहुल चौधरी बने भीम आर्मी भारत एकता मिशन संभाग जबलपुर के संभाग महासचिव

Rahul Chaudhary became the divisional general secretary of Bhim Army Bharat Ekta Mission Division Jabalpur. जबलपुर। भीम आर्मी भारत एकता मिशन ने संगठनात्मक विस्तार के तहत संभाग जबलपुर की संभागीय कार्यकारिणी का गठन करते हुए पदाधिकारियों को नई जिम्मेदारियां सौंपी हैं। इसी क्रम में राहुल चौधरी जी को संभाग महासचिव एवं सह प्रभारी, जबलपुर नियुक्त किया गया है।संगठन की ओर से जारी नियुक्ति आदेश के अनुसार यह नियुक्ति 14 सितंबर 2026 को जारी आदेश क्रमांक भीम आर्मी/BAM/JBP/10/2026 के तहत की गई है। आदेश में राहुल चौधरी को संभाग महासचिव के साथ सह प्रभारी, जबलपुर की जिम्मेदारी दी गई है। संगठन विस्तार और सामाजिक मिशन को मजबूती देने की जिम्मेदारीनियुक्ति आदेश में कहा गया है कि सभी नियुक्त पदाधिकारी संगठन के संविधान, अनुशासन एवं प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन करते हुए संगठन के विस्तार तथा सामाजिक मिशन को मजबूत करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे।राहुल चौधरी की नियुक्ति को जबलपुर संभाग में संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है। नई जिम्मेदारी के तहत संगठन से जुड़े कार्यों के संचालन, समन्वय और विस्तार में उनकी भूमिका रहेगी।संगठन में नई जिम्मेदारी पर जोरआदेश में नियुक्त पदाधिकारी से संगठनात्मक अनुशासन का पालन करते हुए सामाजिक मिशन और संगठन के विस्तार में सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई है। राहुल चौधरी को मिली नई जिम्मेदारी के साथ अब जबलपुर संभाग में संगठन की गतिविधियों और कार्यकारिणी के समन्वय पर ध्यान रहेगा। recent visitors 109

जबलपुर हाईकोर्ट की चिंता: POCSO की 14 हजार से अधिक अपीलें लंबित, कम उम्र के आरोपियों की बढ़ती संख्या पर हैरानी

Jabalpur High Court’s concern: Over 14,000 POCSO appeals pending; surprise expressed over the rising number of underage accused. विशेष संवाददाता : जितेन्द्र श्रीवास्तव/अर्पिता श्रीवास्तवजबलपुर। हाईकोर्ट की तीनों पीठ में पॉक्सो एक्ट के तहत साढ़े 14 हजार से अधिक अपील लंबित होने पर चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे तथा जस्टिस विवेक रूसिया की युगलपीठ ने चिंता जाहिर की है। युगलपीठ ने पॉक्सो कानून के प्रावधानों के प्रति व्यापक जन-जागरूकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार डीई को निगरानी का दायित्व सौंपा है। गौरतलब है कि अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं होने के कारण पॉक्सो एक्ट के प्रकरणों में बढ़ोतरी हो रही है। एक्ट के तहत केंद्र व राज्य सरकार को एक्ट के संबंध में व्यापक प्रचार-प्रसार करना है, जिससे किशोर और नवयुवकों तक एक्ट के संबंध में जानकारी पहुंच सके। इसके अलावा हाईकोर्ट संज्ञान याचिका के रूप में भी मामले की सुनवाई कर रहा था। इसके अलावा एक अन्य याचिका भी दायर की गई थी।विज्ञापन पॉक्सो और किशोर न्याय कानून को लेकर चलाए गए जागरूकता अभियान याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से बताया गया कि पॉक्सो और किशोर न्याय कानून के संबंध में विभिन्न स्तरों पर प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए हैं। राज्य स्तरीय कार्यक्रम में लगभग 52 हजार लोग शामिल हुए, जबकि विभिन्न जिला स्तरीय कार्यक्रमों में 2,73,701 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया। इनमें पुलिसकर्मी, स्कूली विद्यार्थी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, जिला बाल संरक्षण इकाई के स्वयंसेवक और ग्राम एवं ब्लॉक स्तर के प्रतिभागी शामिल थे। गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। एक संगठन द्वारा छह जिलों में बाल अधिकार अभियान के माध्यम से लगभग 4.50 लाख लोगों को जागरूक किया गया है। याचिका की सुनवाई करते हुए युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि हाईकोर्ट की तीनों पीठों के समक्ष पॉक्सो एक्ट की 14,531 आपराधिक अपीलें लंबित हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में पीड़ित की उम्र 16 से 18 वर्ष और आरोपी की उम्र 19 से 22 वर्ष के बीच है। कई आरोपी कम उम्र के हैं और पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध के आरोप में जेल में हैं। प्रावधानों के बारे में जागरूकता की कमी पॉक्सो मामलों में वृद्धि का प्रमुख कारण कानून के प्रावधानों के बारे में जागरूकता की कमी है। कई मामलों में आरोपी और पीड़ित दोनों इस बात से अनजान होते हैं कि दोस्ती या प्रेम संबंध के कारण घर से चले जाने जैसी परिस्थितियां भी पॉक्सो कानून के तहत कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकती हैं। युगलपीठ ने अपने आदेश में पॉक्सो अधिनियम की धारा 43 का उल्लेख करते हुए कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों का दायित्व है कि कानून के प्रावधानों का टेलीविजन, रेडियो और प्रिंट मीडिया सहित विभिन्न माध्यमों से नियमित रूप से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। जागरूकता के लिए किए गए उपायों के बावजूद पॉक्सो अधिनियम के तहत मामले लगातार दर्ज हो रहे हैं। लंबित आपराधिक मामलों और अपीलों का शीघ्र निपटारा तभी प्रभावी ढंग से हो सकेगा, जब नए मामलों की संख्या को कानून के प्रभावी उपायों के जरिए नियंत्रित किया जा सके। याचिका पर सुनवाई की जाएगी युगलपीठ ने हाईकोर्ट रजिस्ट्रार डीई को पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट से संबंधित मामलों की प्रगति तथा अधिनियम के प्रावधानों के क्रियान्वयन की निगरानी का दायित्व सौंपा है। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि कमेटी पॉक्सो मामलों की प्रगति की निगरानी करेगी और मामलों के समयबद्ध निपटारे के लिए आवश्यक निर्देश जारी कर सकेगी। कमेटी को मध्य प्रदेश सरकार के संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देने का अधिकार भी होगा। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि दो याचिकाओं का निराकरण करते हुए सिर्फ संज्ञान याचिका पर सुनवाई की जाएगी। युगलपीठ ने अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता को न्यायालय मित्र नियुक्त किया है। recent visitors 26

MP :’No UPI Day’, MDR शुल्क के विरोध में व्यापारी लामबंद, QR स्कैनर पर काला कपड़ा बांधकर जताएंगे विरोध

MP: Traders rally against MDR charges, observing a ‘No UPI Day’; will protest by tying black cloth over QR scanners. डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश में यूपीआई भुगतान पर प्रस्तावित शुल्क के विरोध में व्यापारी संगठन गुरुवार को ‘नो यूपीआई डे’ मनाएंगे। अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल ने प्रदेशभर के व्यापारियों से इस अभियान में शामिल होने की अपील की है। इस दौरान व्यापारी कुछ समय के लिए यूपीआई भुगतान स्कैनर को काले कपड़े से ढककर सांकेतिक विरोध जताएंगे। व्यापारियों का कहना है कि दो हजार रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर प्रस्तावित शुल्क से कारोबार की लागत बढ़ेगी। 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क और 2000 रुपये की सीमा का विरोधअखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल मध्य प्रदेश के महासचिव अनुपम अग्रवाल ने बताया कि 15 अक्टूबर से दो हजार रुपये से अधिक के व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लागू होने की बात सामने आई है। 75 हजार रुपये या उससे अधिक के लेन-देन पर शुल्क की अधिकतम राशि तीन रुपये तक होने की बात कही जा रही है। व्यापारियों का कहना है कि थोक बाजार, सराफा और वाहन कारोबार जैसे क्षेत्रों में अधिकांश भुगतान दो हजार रुपये से अधिक के होते हैं। कारोबारियों पर पड़ेगा अतिरिक्त भारभोपाल के थोक किराना बाजार में करीब पांच सौ थोक और खुदरा दुकानें हैं। व्यापारियों के अनुसार यहां 90 प्रतिशत से अधिक लेन-देन दो हजार रुपये से ज्यादा के होते हैं। किराना कारोबारी अनिल कुमार साहू ने कहा कि व्यापारियों को पहले डिजिटल भुगतान की ओर प्रोत्साहित किया गया, अब शुल्क लगने से अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ेगा। सराफा कारोबारी नवनीत अग्रवाल के अनुसार 95 प्रतिशत से अधिक भुगतान दो हजार रुपये से ज्यादा के होते हैं। वहीं, वाहन कारोबार में एक बुकिंग का भुगतान ही 25 हजार से एक लाख रुपये तक होता है। भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ने भी दो हजार रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर शून्य एमडीआर की मांग की है। चैंबर अध्यक्ष गोविंद गोयल ने प्रधानमंत्री, केंद्रीय वित्त मंत्री सहित प्रदेश के प्रमुख संवैधानिक पदाधिकारियों को पत्र भेजकर शुल्क वापस लेने की मांग की है। recent visitors 26

एमपी पुलिस में अब वर्दी वाली रील बंद! AI पर सरकारी फाइल डाली तो एक्शन, 30 दिन में बतानी होगी सोशल मीडिया कमाई

No more ‘uniform reels’ for MP Police! Action to be taken if official files are uploaded to AI; social media earnings must be disclosed within 30 days. मध्यप्रदेश पुलिस ने अपने अधिकारी-कर्मचारियों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। डीजीपी कैलाश मकवाना की तरफ से जारी आदेश में अब पुलिसकर्मी वर्दी में रील, फोटो, वीडियो या ऑडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं कर सकेंगे। वहीं केस डायरी, जांच रिपोर्ट, खुफिया जानकारी और दूसरे गोपनीय सरकारी दस्तावेज चैटजीपीटी जैसे एआई टूल पर डालने पर भी रोक रहेगी। पुराना आपत्तिजनक कंटेंट भी हटाना होगा।एआई पर सरकारी फाइल अपलोड की तो कार्रवाईनई गाइडलाइन के अनुसार पुलिस अधिकारी-कर्मचारी किसी भी संवेदनशील सरकारी दस्तावेज को AI प्लेटफॉर्म पर अपलोड नहीं कर सकेंगे। इसमें केस डायरी, जांच से जुड़ी रिपोर्ट, खुफिया इनपुट और अन्य गोपनीय दस्तावेज शामिल हैं। इन दस्तावेजों का सारांश बनाने, समझने या ड्राफ्ट तैयार कराने के लिए भी उन्हें एआई टूल पर अपलोड नहीं किया जा सकेगा। पुलिस मुख्यालय ने इसकी वजह संवेदनशील जानकारी के बाहरी सिस्टम तक पहुंचने का खतरा बताया है।वर्दी में रील और फोटो भी नहींपुलिसकर्मी सोशल मीडिया पर सरकार की नीतियों, विभागीय कामकाज, फैसलों या वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ आलोचनात्मक टिप्पणी नहीं कर सकेंगे। सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट से भी बचना होगा, जिससे विभाग की छवि प्रभावित हो। पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान या ड्यूटी के बाद वर्दी में रील, फोटो, वीडियो या ऑडियो पोस्ट नहीं कर सकेंगे। अशोभनीय वेशभूषा में सोशल मीडिया कंटेंट डालने पर भी रोक रहेगी। पहले से ऐसा कोई कंटेंट मौजूद है तो उसे हटाना होगा।सोशल मीडिया से कमाई की जानकारी देनी होगीबिना अनुमति सोशल मीडिया अकाउंट को मॉनेटाइज करने, पेड प्रमोशन करने या निजी कारोबार का प्रचार करने पर भी रोक लगाई गई है। यदि किसी पुलिसकर्मी ने पहले सोशल मीडिया के जरिए कमाई की है तो उसे 30 दिन के भीतर उसकी जानकारी देनी होगी। आपराधिक या असामाजिक गतिविधियों से जुड़े लोगों की सोशल मीडिया फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने, उन्हें फॉलो करने या उनके साथ फोटो पोस्ट करने पर भी रोक रहेगी। सरकारी इंटरनेट से निजी सोशल मीडिया नहींपुलिसकर्मी निजी सोशल मीडिया अकाउंट चलाने के लिए सरकारी सीयूजी सिम, सरकारी वाई-फाई, इंटरनेट, आईपी एड्रेस या आधिकारिक ई-मेल का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। निजी मोबाइल में सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट लॉगिन करने पर भी पाबंदी रहेगी। ऑपरेशन और हथियार प्रशिक्षण की लाइव स्ट्रीमिंग पर रोकदबिश, संवेदनशील ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, हथियार प्रशिक्षण और फायरिंग प्रैक्टिस से जुड़ी लाइव स्ट्रीमिंग, फोटो-वीडियो बनाने और जियो टैगिंग पर भी रोक लगाई गई है। गाइडलाइन का मकसद पुलिस से जुड़ी संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक होने से रोकना और सोशल मीडिया पर पुलिसकर्मियों की गतिविधियों के लिए स्पष्ट नियम तय करना है। recent visitors 24

प्रेगनेंसी की प्लानिंग कर रहे हैं तो पहले दांतों की भी कराएं जांच

If you are planning a pregnancy, get a dental check-up first. विशेष संवाददाता जितेन्द्र श्रीवास्तव/अर्पिता श्रीवास्तवजबलपुर। परिवार बढ़ाने की योजना बना रही महिलाओं के लिए गर्भधारण से पहले सामान्य स्वास्थ्य जांच के साथ दांतों और मसूड़ों का परीक्षण कराना भी उपयोगी कदम है। दंत चिकित्सक डॉ. धवल खरे के अनुसार इस दौरान कैविटी, मसूड़ों की बीमारी, संक्रमण, अकल दाढ़ एवं रूट कैनाल की जरूरत जैसी समस्याओं का पता लगाकर समय रहते उपचार कराया जा सकता है। इससे गर्भावस्था के दौरान अचानक दांत में तेज दर्द व संक्रमण होने पर उपचार की परेशानी कम हो सकती है। गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल बदलाव से मसूड़े अधिक संवेदनशील होकर सूज या खून कर सकते हैं। उल्टी, खान-पान में बदलाव, बार-बार स्नैकिंग या मुंह की सफाई प्रभावित होने से कैविटी का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसलिए गर्भधारण की योजना बनाते समय डेंटिस्ट से जांच कराकर आवश्यक सफाई और उपचार पूरा कराना बेहतर रहता है। संक्रमण को न टालें यदि दांत में गहरी कैविटी, पस, लगातार दर्द या रूट कैनाल की जरूरत है तो डॉक्टर से उपचार की योजना बनाएं। पढ़ने पर डेंटल एक्स-रे भी गर्भधारण से पहले कराया जा सकता है। पूर्व जांच और आवश्यक उपचार से गर्भधारण के बाद दांतों से संबंधित अन्य जांच और उपचार की आवश्यकता को कम किया जा सकता है, जो आने वाले समय के लिए सुविधाजनक होता है। खुद से दवा लेने से बचें डॉ. खरे बताते हैं कि कैविटी या रूट कैनाल की जरूरत है तो डॉक्टर से उपचार की योजना बनाएं। यह धारणा सही नहीं है कि गर्भावस्था में कोई डेंटल उपचार एवं एंटीबायोटिक बिल्कुल नहीं लिया जा सकता। जरूरत पड़ने पर गर्भावस्था में भी कई उपचार और कुछ एंटीबायोटिक्स चिकित्सकीय सलाह से दिए जा सकते हैं। इसलिए खुद से दवा लेने के बजाय डेंटिस्ट और स्त्रीरोग विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है। गर्भवती होने के बाद दांतों की देखभाल में भी सजग रहना चाहिए। फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट से दांत साफ करें और रोज फ्लॉस करें। उल्टी होने के बाद तुरंत ब्रश न करें, पानी से कुल्ला करें, क्योंकि उल्टी का एसिड अस्थायी रूप से दांतों की सतह को कमजोर कर सकता है। दंत उपचार गर्भावस्था में भी किया जा सकता है। गर्भावस्था के दौरान संक्रमण को सिर्फ इस कारण टालना उचित नहीं कि आप गर्भवती हैं। जरूरत पड़ने पर डेंटिस्ट और स्त्रीरोग विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है। गर्भ ठहरने के बाद भी दांतों की देखभाल जारी रखें और डॉक्टर की सलाह के बिना स्वयं से दवा न लें। recent visitors 22